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गुरुवार, 21 जून 2012

दुर्दिन (Durdin by unknown Sanskrit poet)

देवे कुर्वति दुर्दिनव्यतिकरं नास्त्येव तन्मन्दिरं 
यत्राहारगवेषणाय बहुशो नासीद् गता वायसी ।
किन्तु प्राप न किञ्चन क्वचिदपि प्रस्वापहेतोस्तथा 
प्युद्भिन्नार्भकचञ्चुषु भ्रमयति स्वं रिक्त-चञ्चुपुटम् ।।

अर्थात्
कैसा दुर्दिन दिखाया देव ने 
पानी बरसता ही रहा लगातार 
कोई घर नहीं था जहाँ न गई हो कौवी 
दाना खोजने के लिये.
पर कहीं से कुछ न पा सकी.
चोंचें खोले हुए चूजों को सुलाने के लिये अब वह 
घुमा रही है अपनी खाली चोंच
उनकी चोंचों में.

                      कवि - अज्ञात 
                      अनुवाद - डा राधावल्लभ त्रिपाठी
                      संग्रह - संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा  
                      प्रकाशक - रामकृष्ण प्रकाशन, विदिशा, मध्य प्रदेश, 2000

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छी कविता ! यहाँ साझा करने के लिए आभार पूरब दी।

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