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सोमवार, 26 नवंबर 2012

तज्दीद (Tajdeed by Kaifi Azmi)


तलातुम, वलवले, हैजान, अरमाँ
सब उसके साथ रुख़्सत हो चुके थे
यकीं था  अब न हँसना है न रोना
कुछ इतना हँस चुके थे, रो चुके थे

किसी ने आज इक अँगड़ाई लेकर
नज़र में  रेशमी  गिरहें  लगा दीं
तलातुम, वलवले, हैजान, अरमाँ
वही  चिंगारियाँ  फिर मुस्करा दीं 

तज्दीद = नवीनीकरण, नवीनता;    तलातुम = बाढ़, तूफ़ान, उद्वेग;

वलवले = उमंगें;    हैजान = बेचैनी, अशांति 
 
शायर - कैफ़ी आज़मी
किताब - कैफ़ियात (कुल्लियात-ए-कैफ़ी आज़मी, 1918-2002)
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2011

1 टिप्पणी:

  1. वही चुप्पी
    कलेजा तोड़ती
    आँखें वही बेथाह
    वही ख्वाहिश बेखुदी की
    देह तेजाबी
    तराशी
    बुलाती बेराह

    वह नहीं लेकिन
    इलाही ! आह ...

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