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बुधवार, 20 मार्च 2013

रात गये (Raat gaye by Firaq Gorakhpuri)



ये रात !  हवाओं की सोंधी सोंधी महक 
ये खेल करती हुई चांदनी की नर्म दमक 
सुगंध 'रात की रानी' की जब मचलती है 
फ़ज़ा में रूहे-तरब करवटें बदलती हैं 
ये रूप सर से क़दम तक हसीं जैसे गुनाह 
ये आरिज़ों की दमक, ये फ़ुसूने-चश्मे-सियाह 
ये धज न दे जो अजन्ता की सनअतों को पनाह 
ये सीना, पड़ ही गई देवलोक की भी निगाह 
ये सरज़मीन है आकाश की परस्तिश-गाह 
उतारते हैं तेरी आरती सितारा-ओ-माह 
सिजल बदन की बयां किस तरह हो कैफ़ीयत 
सरस्वती के बजाये हुए सितार की गत 
जमाले-यार तेरे गुलिस्तां की रह रह के 
जबीने-नाज़ तेरी कहकशां की रह रह के 
दिलों में आईना-दर-आईना सुहानी झलक 


रूहे-तरब = आह्लाद की आत्मा        आरिज़ों = कपोलों  
फ़ुसूने-चश्मे-सियाह = काली आंखों का जादू        सनअतों = कलाओं 
सरज़मीन = धरती        सितारा-ओ-माह = चांद-सितारे 
जमाले-यार = प्रेयसी की सुन्दरता        जबीने-नाज़ = प्रेयसी का माथा   
 कहकशां = आकाशगंगा  

शायर - फ़िराक़ गोरखपुरी 
संकलन - उर्दू के लोकप्रिय शायर : फ़िराक़ गोरखपुरी 
संपादक - प्रकाश पंडित 
प्रकाशक - हिन्द पॉकेट बुक्स, दिल्ली, 

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