Translate

रविवार, 9 जून 2013

रश्मिरथी (Rashmirathi by Dinkar)


वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पाण्डव आये कुछ और निखर l 
             सौभाग्य न सब दिन सोता है,
             देखें, आगे क्या होता है ?

मैत्री की राय बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
            भगवान् हस्तिनापुर आये,
            पाण्डव का सन्देशा लाये l 

"दो न्याय अगर, तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम l 
          हम वही खुशी से खायेंगे,
          परिजन पर असि न उठायेंगे l"

दुर्योधन वह भी दे न सका,
आशिष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला l 
           जब नाश मनुज पर छाता है,
           पहले विवेक मर जाता है l 




कवि - रामधारी सिंह दिनकर (1908 -1974)
किताब - दिनकर रचनावली, खंड-2 में संकलित 'रश्मिरथी' के तृतीय सर्ग से 
संपादक - नन्दकिशोर नवल, तरुण कुमार 
प्रकाशक - लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2011


आज कचनार के साथ मीरा के पद पढ़ रही थी. उसमें द्रौपदी के प्रसंग से महाभारत की कथा पर हम आ गए. बचपन में सुने कुछ प्रसंग कचनार को याद थे और वह अलग-अलग पात्रों के बारे में और अधिक जानने को उत्सुक थी. इतने में अपूर्व 'रश्मिरथी' ले आए और उसका पाठ करने लगे. कचनार के बहाने हम सब ने कथा दुहराई.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें