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शनिवार, 2 नवंबर 2013

बिटिया के जन्म पर (Bitiya ke janm par by Nandkishore Nawal)



नदी के जल की 
पहली किलकारी,
भोर की किरण का 
पहला स्पर्श 
और वृक्ष की शाखा पर फूटा 
पहला किसलय … 

कैसा लगा होगा यह सब 
सृष्टि की पहली सुबह को ?

मुझे पता चला इसका,
जब अस्पताल के बेड पर 
मैंने अपनी बिटिया की 
पहली कंठ-गूंज सुनी,
उसके पतले नन्हें होंठ छुए 
और उसे माँ की गोद में लिपटा हुआ 
पद्मकोश-सा देखा … 


कवि - नंदकिशोर नवल
संकलन - नील जल कुछ और भी धुल गया
संपादक - श्याम कश्यप
प्रकाशक - शिल्पायन, दिल्ली, 2012

पापा ने यह कविता मेरे जन्म के दो दिन बाद लिखी थी। 

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