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मंगलवार, 7 जनवरी 2014

निशा-निमन्त्रण (Nisha-nimantran by Bachchan)

              साथी, सो न, कर कुछ बात !

              बोलते उडुगण परस्पर,
              तरु दलों में मन्द 'मरमर',
बात करतीं सरि-लहरियाँ कूल से जल-स्नात !
             साथी, सो न, कर कुछ बात !

             बात करते सो गया तू,
             स्वप्न में फिर खो गया तू,
रह गया मैं और आधी बात, आधी रात !
             साथी, सो न, कर कुछ बात !

             पूर्ण कर दे वह कहानी,
             जो शुरू की थी सुनानी,
आदि जिसका हर निशा में, अन्त चिर-अज्ञात !
             साथी, सो न, कर कुछ बात !

कवि - हरिवंशराय बच्चन
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : हरिवंशराय बच्चन
संपादक - मोहन गुप्त
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1986


मन है कि स्थिर ही नहीं हो रहा ! बच्चन की ये पंक्तियाँ  - "साथी, सो न, कर कुछ बात !" बार-बार याद आ रही हैं.

1 टिप्पणी:

  1. व्यथा कितनी निजी होती है .. स्वयं से ही बांटता है आदमी....

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