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शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

भ्रमरगीतसार (Bhramargeetsaar by Soordas)

               मेरे मन इतनी सूल रही l
वे बतियाँ  छतियाँ  लिखी  राखों  जे  नंदलाल कही ll
एक   दिवस   मेरे   गृह  आए  मैं  ही   मथति  दही l
देखि  तिन्हें मैं मान कियो सखि सो हरि गुसा गही ll
सोचति अति पछताति राधिका मूर्छित धरनि ढही l
सूरदास  प्रभु   के  बिछुरे  तें  बिथा  न  जाति सही ll37ll


कवि - सूरदास
संकलन - भ्रमरगीतसार
संपादक - आचार्य रामचंद्र शुक्ल
प्रकाशक - नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी, संवत्

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