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गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

सैर और दस्तरख़्वान (By Purwa Bharadwaj)

इन दिनों सुबह की सैर को नियमित करने का भरपूर प्रयास कर रही हूँ। पहली वजह अपना स्वास्थ्य ठीक रखने का दबाव है और दूसरी वजह है प्रिंगल रानी के लिए हवाखोरी की ज़रूरत। तीसरी वजह भी है और वह है अपने साथ होने का अहसास।

यह सिलसिला कितने दिन तक चलेगा उसे लेकर चिंता है, मगर ना से हाँ सही मानकर खुश हूँ। आज काफी देर तक मैं कल रात के खाने के बारे में सोचती रही। कल इरादा किया था कि फ्रिज को पूरा खाली कर देना है। कोने-कोने में, छोटे-बड़े डिब्बे में जो कुछ पड़ा है, उसे निपटा देना है। जिम्मेदारी अकेले मेरी नहीं थी, पूरा घर शामिल था। अपूर्व बिना ना-नुकुर के कुछ भी खा लेते हैं। बासी को लेकर नखरा मेरा भले हो, घर में और किसी का नहीं है। बेटी तो खाती ही रहती है। तीन दिन पहले का पिज़्ज़ा और चार दिन पुरानी कढ़ी वह चाव से खा लेती है। उसके लिए गर्म केवल भात होना चाहिए।

बहरहाल कल के दस्तरख़्वान का दृश्य बड़ा अच्छा था। पहले मैंने सुबह का नमकीन दलिया निकाला और दिन में बना राजमा, चावल के साथ। ताज़ा सादी रोटी रहने दी और उसकी जगह दो दिन पहले की सत्तू भरी रोटी घी चुपड़कर और करारा सेंक कर परोस दी मैंने। उसका सूखापन फिर भी गया नहीं। पिछले दिन की पोस्ता दाना की चटनी बची थी तो आग्रह करके उसे अपूर्व को खिला दिया। जितना मजेदार वह लगता है, उतना लगा नहीं क्योंकि उसमें हरी मिर्च नहीं थी और 'कॉम्बिनेशन' गलत था। साथ में पिछले दिन रेस्तरां से लाए गए लेबनानी खाने के साथ दिया गया सिरका में डूबा सलाद निकाला - गोभी, गाजर, जैतून और टमाटर का। ताज़गी का रोगन डालने के लिए भरवाँ शिमला मिर्च था। वैसे सब्ज़ी के नाम पर लौकी को हटाकर वे दो फाँक जो परसों की आलू-गोभी की सब्ज़ी थी वह ले चुके थे।

अपने लिए मैंने दलिया से काम चलाना चाहा, मगर इतना भी सात्त्विक क्या ! सत्तू की रोटी का एक टुकड़ा ले लिया, मगर बड़ा सूखा लग रहा था। लगा कि गर्रा लग जाएगा। मेरे लिए लौकी की सब्ज़ी भरपूर थी, लेकिन उसमें लज़्ज़त नहीं थी। मैंने फ्रिज की पूरी तलाशी ले ली, लेकिन खीरे के रायते का अवशेष मिला ही नहीं। एक कटोरी में जो निकला वह दूध की मलाई थी जिसमें पता नहीं क्यों मिठास थी। मुझे वह खीरे के रायते के अंश का आभास दे रहा था, परंतु पतिदेव ने बरज दिया कि कुछ भी खाकर तबीयत मत बिगाड़ो। मन मारकर अपने सामने से मैंने कटोरी सरका दी। माँ के नुस्खे पर इमली की चटनी पाँच दिन पहले दही बड़े के लिए बनाई थी, उसे लेने का कल मन नहीं हुआ। (यों भी वह जल्दी खराब नहीं होती है। फ्रिज में पड़ी रहेगी तो खराब नहीं होगी।) समापन के लिए मैंने अमेरिकन चौप्सी निकाली जो तीन कौर से अधिक न थी।

भांजे ने राजमा-चावल चुना और साथ में भरवाँ शिमला मिर्च। उसने दलिया सुबह ही नाश्ते में खाई थी, इसलिए सधाने के लिए उसे कहना अन्याय होता। उसका मन चटपटा नहीं हुआ तो चुपचाप अपने पसंदीदा 'वेज' मोमो से उसने भरपाई की। यह उसका नित्य चलता है। मुखशुद्धि उसकी मोमो या चाउमिन से होती है जो वह बाहर से गरमागरम ले आता है। कभी दिन, कभी शाम और कभी देर रात भी। उसे मैं धोखला खिला सकती थी क्योंकि धोखला शाम को ही आया था, परंतु खाने की मेज़ पर कुछ न कुछ भूलना भी एक नियम ही है। और धोखला नाश्ते में तो चलता है, खाने में नहीं। वैसे कल फ्रिज और रसोई की बाकी चीज़ें बच्चों के लिए तो अखाद्य ही थीं। मीठे के नाम पर मुझे छोड़कर बाकियों के लिए चीज़ केक था (मनाही के बावजूद पिछले दिन इनायत फरमाते हुए बेटी मुझे खिला चुकी थी, इसलिए दुबारा उधर नज़र डालना भी लालच होता)। मैंने तरबूज़ की फाँक से संतोष कर लिया था। सूजी का हलवा सबके द्वारा अगली सुबह के लिए छोड़ दिया गया था। दही केवल अपूर्व ने खाया। फ्रीज़र में पड़ी आइसक्रीम की तो मुझे आज याद आई। उसे मैं हफ़्तों पहले रखकर भूल चुकी थी।

बच गई थीं बिटिया रानी। उसकी कोल्ड कॉफ़ी दोपहर से पड़ी थी। उसके हिस्से का थोड़ा देवघरिया शैली में बना मटन पड़ा था जिसे लेकर मैं निश्चिन्त थी। मगर सोचा हुआ किसका पूरा होता है जो मेरा होगा ! उन्होंने सीधे एलान किया कि मटन अच्छा नहीं था और अब मैं दुबारा-तिबारा नहीं खाऊँगी। विकल्प आया पास्ता का। मैंने सारे डिब्बे टटोल लिए। राशन में पास्ता आया था, लेकिन किसी खाने में उसका डिब्बा नहीं दिखा। स्टीलवाले टिन में होगा, यह सोचकर झख मारकर मैंने उसमें हाथ डाला। किस्मत अच्छी थी कि तुरत मिल गया।  फरमान के मुताबिक़ कुड़कुड़ करते हुए मैंने पास्ता उबलने को डाला।  रात के ग्यारह बजने को आए थे और मुझपर चिंता सवार होने लगी थी कि देर होगी तो सुबह की सैर मारी जाएगी। रहम बरता गया कि पास्ता बेटी खुद बनाएँगी। वैसे सच्चाई यह है कि पास्ता-स्पैगेटी हमेशा वही बनाती है। खैर, मेरी छुट्टी हुई। सैर के बारे में सोचते हुए मैंने खाने का मैदान छोड़ा।

आज जब पलटकर सोच रही थी तो कल के असंतोष, ऊब, तिश्नगी का भाव जा चुका था। बच गया था रंग, खाने का रंग और खाने का ढंग। पटनिया, देवघरिया, बिहारी, झारखंडी, मराठी, उत्तर-पूर्व, चाइनीज़, इटैलियन, लेबनानी - कैसा कैसा व्यंजन ! मोहल्ला, शहर, राज्य, देश, विदेश सब एक मेज़ पर ! मैंने सोचा कि चार जन के परिवार में इतना वैविध्यपूर्ण खाना ! और क्या चाहिए जीवन में !

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