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सोमवार, 30 मार्च 2026

ज़ौक़ की रुबाइयाँ (ZAUQ)

क्या फ़ायदा फ़िक्रे-बेशो-कम से होगा 

हम क्या हैं जो कोई काम हम से होगा 

जो कुछ कि हुआ हुआ 'करम' से तेरे 

जो कुछ होगा तेरे करम से होगा 


दिल को सरे-बाज़ारे-जहां कर न उचाट 

जिस तरह बने सूदो-ज़ियां में दिन काट 

ऐ 'ज़ौक़' फ़लक के जब हैं बारह हिस्से 

सौदा न हो क्यों ज़ेरे-फ़लक बारह-बाट 


आंख उसकी नशे में जब गुलाबी हो जाय 

सूफ़ी उसे देखे तो शराबी हो जाय 

दिखलाये जो वह रूए-किताबी ऐ 'ज़ौक़'

सब मदरसा काफ़िरे-किताबी हो जाय 


जिन दांतों से हंसते थे हमेशा खिल-खिल 

अब दर्द से हैं वही रुलाते हिल-हिल 

पीरी में कहां अब वे जवानी के मज़े 

ऐ 'ज़ौक़' बुढ़ापे से हैं दांता-किल-किल 


करम = कृपा                               सूदो-ज़ियां = हानि-लाभ       

रूए-किताबी = किताबी चेहरा       पीरी = बुढ़ापा 


शायर : ज़ौक़ 

संकलन : ज़ौक़ (प्रकाश पंडित द्वारा संपादित लोकप्रिय शायर और उनकी शायरी शृंखला, नया संस्करण)

सह-संपादन : सुरेश सलिल 

प्रकाशन : राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, 2017