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शनिवार, 1 नवंबर 2025

खुश होऊँ क्या ! नाखुश भी क्या !! (Khush houn kya by Ramgopal Sharma 'Rudra')


खुश होऊँ क्या ! नाखुश भी क्या !!


फिर आज गगन भर आया है,

स्वाती का मन ढर आया है;

पर कौन करे स्वागत इनका ?

पिंजड़े का बोल पराया है!

पथराई आँखों को घन क्या,

बिजली क्या, इंद्रधनुष भी क्या !!

 

जिनकी सुध ही से मोर मगन 

चलते थे नाच किये बन-बन ,

जब टूट गए नुपुर के सुर,

तब आए तो क्या आए घन ! 

पंखिल चाँदों की पतझड़ को

दल क्या, दूर्वा क्या, कुछ भी क्या !!



कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र में संकलित '
मूर्च्छना' संग्रह से 
संपादक - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

 

 


मंगलवार, 19 अगस्त 2025

आह्वान (Ahvaan by Ramgopal Sharma 'Rudra')


कोड़ते चलो जमीन कोड़ते चलो! --
                           कोड़ते चलो !!

इस जमीन में हजारों धन-भरे घड़े 
व्यर्थ हैं पड़े, समाज-पाप से गड़े :
बन्द हैं विकास, कोप-कैद में पड़े :
लाखों-लाख गुल शराब के लिए सड़े :
      वे गड़े लहू के घड़े फोड़ते चलो !
                                 कोड़ते चलो !!

सूख गई धार वहाँ धूर हुई रेत :
एक बियावाँ, जहाँ जिंदगी अचेत,
आते नहीं मेह, मधुर भूल गये हेत :
टाँड़-टाँड़ कास हँसे : बाग-बाग बेंत !
     मेह बनो, धार नई छोड़ते चलो !
                               कोड़ते चलो !!

सैंकड़ों पसार शाख, फैल सभी ओर,
भूमि में हजारों गोड़-गोड़ सूँड़-सोर,
लाखों-लाख पौधों के आधार छीन-छोर 
फैले सात-पाँच बड़े रख भूमि-चोर :
      भूमि के लिए इन्हें मरोड़ते चलो !
                                 कोड़ते चलो !!

राह बँधी, चाह बँधी, आह भी बँधी :
कोटि-कोटि बेपनाह जिंदगी बँधी :
कोठियाँ खुली, कि मुक्ति की मही बँधी :
सड़ गई वहाँ बयार तक बँधी-बँधी :
      वे सड़ाँध के तिलिस्म तोड़ते चलो ! 
                                    कोड़ते चलो !!
                                                 - 1951 (हिमशिखर)


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र' (1.11.1912 -19.8.1991)
किताब - रुद्र समग्र
संपादक - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

नानाजी 19 अगस्त, 1991 की रात कंधे पर बिजली का नंगा तार गिरने की वजह से चले गए थे, वरना कुछ और साल जरूर रहते। साहित्य को लेकर उनकी दीवानगी यह थी कि उसी शाम आयोजित कवि सम्मेलन में उनकी कविता की डायरी छूट गई थी तो रात को अपनी साइकिल से दुबारा उसे लाने निकल पड़े थे। पटना में अपने घर से थोड़ी ही दूर गए थे कि यह हादसा हो गया। 

आज अपूर्व ने नानाजी की यह कविता चुनी। सुनाई भी और बोले कि कितने शब्द हैं और उनका कैसा निस्संकोच इस्तेमाल है! 

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

रोज शाम को (Roj shaam ko by Ramgopal Sharma 'Rudra')

रोज शाम को मन थकान से भर जाता है !!

बस मरु ही मरु, आँख जहाँ तक जाए :

कोई छाँव नहीं कि जहाँ सुस्ताए :

उड़ता ही रह जाता है जो पंछी,

क्या लेकर अपने खोंते में आए !

रोज  शाम को मन उफान से भर जाता है !!


रोज-रोज  एक ही बात होती है - 

रोज पाँख से आँख मात होती है!

लेकिन, इतनी दूर निकल जाता हूँ -

आते-आते साँझ रात होती है !

रोज शाम को मन उड़ान से भर जाता है !

                                                       - 1955 


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र
संपादक - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

नानाजी के जन्मदिन पर उनको याद करते हुए उनकी कविताएँ पढ़ रही हूँ। लगभग 70-100 साल पुरानी रचनाओं के मूड को देखकर लग रहा है कि अभी का मूड है।  

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

इधर तोपते हैं, उधर झाँपते हैं (Idhar topte hain, udhar jhanpte hain by Ramgopal Sharma 'Rudra')

इधर तोपते हैं, उधर झाँपते हैं --
सड़ा ठाट ही है ! -- वृथा ढाँपते हैं !

इधर कुछ घटाकर, उधर कुछ बढ़ाकर 
गुणा क्या करेंगे ? --- वो क्या नापते हैं ?

ज़मीं ही ग़लत है -- महल क्या टिकेगा !
क़िला है तो यह ! जीभ क्या जाँपते हैं ?

करेंगे दवा मेरी जूड़ी की वो क्या ?
मेरे पास आते जो खुद काँपते हैं !

सराब है ! न चेते अगर 'रुद्र' तो फिर 
मरेंगे, जिधर जा रहे हाँपते हैं !
                                 - 1978 



कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991 

सोमवार, 7 जुलाई 2014

नींद उड़ गई है ! (Neend ud gai hai by Ramgopal Sharma 'Rudra')


नींद उड़ गई है !

       उगते अस्त हुआ रवि जिस दिन 
       आँधी उठी, उड़े सुख के तृण ;
       सिमट गए सब दृश्य ; किस कदर 
                  दृशि सिकुड़ गई है !

      बहार कोई क्या पहचाने !
      घायल की घायल ही जाने ;
      मृग से उसकी नाभि, सर्प से 
                  मणि बिछुड़ गई है !

      भीतर जैसी है यह माटी,
      कैसे निकले, ऐसी काँटी ?
      वज्रहृदय में गड़कर कोई 
                  याद मुड़ गई है !

                                - 1977 


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र 
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991 





शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

अलग भी हैं, लगे भी हैं ! (Alag bhi hain, lage bhi hain by Ramgopal Sharma 'Rudra')


अलग भी हैं, लगे भी हैं !

       उगा जो चाँद पूनम का,
       समुन्दर का चलन चमका ;
       चकोरों की न कुछ पूछो !
                 सजग भी हैं, ठगे भी हैं !

       खुली पाँखें, लगी आँखें ;
       बँधें, पर किसलिए माँखें ?
       कमल के कोष में भौंरे 
                बिसुध भी हैं, जगे भी हैं !

       कहें क्या, कौन होते हैं -
       कि जिन बिन प्राण रोते हैं !
       रुलाते हैं, हँसाते हैं !
                पराये भी हैं, सगे भी हैं !
                                          - 1974 


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र 
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

सोमवार, 19 अगस्त 2013

आओ बैठा जाय (Aao baitha jaay by Ramgopal Sharma 'Rudra')

आओ, बैठा जाय -
आओ, बैठा जाय यहाँ, कुछ देर बैठा जाय !
      
                       दूबों का मखमली गलीचा
                       धरती की ममता से सींचा,
                       खुली चाँदनी, धुला बगीचा,
आओ, बैठ यहाँ वह कौतुक फिर दुहराया जाय !

                      जीवन में ऐसे सुख के छिन 
                      गिने-चुने होते हैं, लेकिन,
                      भूले नहीं भूलते वे दिन ;
आओ, उस दिन-सा, आँखों-आँखों मुसकाया जाय l 
                                                               - 1944 

 
कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र', 1943
संकलन - 'हर अक्षर है टुकड़ा दिल का' में 'शिंजिनी' से 
संपादक - नंदकिशोर नवल  
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2008

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

गीत (Geet by Ramgopal Sharma 'Rudra')

 मेरे गीतों को भी प्यार मिलेगा क्या !!

                  कलियाँ हो जाएँगी बासी,
                  जब तक आएगी पुनवाँसी !
पतझर के काँटों में फूल खिलेगा क्या !

                  काँटे जो लगते आए हैं,
                  लाल-गुलाबी दल लाए हैं !
इनसे पत्थर का भी मर्म छिलेगा क्या !

                  सूई भी है, डोरा भी है ;
                  शशि है, और चकोरा भी है !
टाँके पाकर मेरा घाव सिलेगा क्या !
                                              - 1954




कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र 
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

बीती बात भुला लेने दो (Beetee baat bhula lene do by Ramgopal Sharma 'Rudra'


बीती बात भुला लेने दो !

          मैं लूँ समझ कि सब सपना था,
          जो कुछ था, भ्रम-भर अपना था ;
          इस रस में क्या स्वाद मिलेगा ?
                            मन को और घुला लेने दो !


          ठंडी तो हो ही जाएँगी,
          बादल बन जब ये छाएँगी,
          कुछ दिन तो तल की ज्वाला में
                            चाहों को अकुला लेने दो !

          इतने तड़के आज पधारे !
          जाग रहे जब दीये-तारे ;
          ठहरोगे ? ठहरो, आँखों की
                             गीली धूल धुला लेने दो !
                              
                          (1944)


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र 
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

बन्धु ! जरूरी है (Bandhu jaroori hai by Ramgopal Sharma 'Rudra')



बन्धु ! जरूरी है मुझको घर लौटना,
एक मुझे भी ले लो अपनी नाव पर 

देर तनिक हो गई वहाँ, बाजार में, 
मोल-तोल के भाव और व्यवहार में ;
आईना था एक अनोखी आब का,
इन्द्रजाल-सा था जिसके दीदार में ;
        मैं गरीब ले सका न अपने भाव पर 

सनक नहीं तो क्या कहिए, इस ठाट को -
कौड़ी लेकर साथ, चला था हाट को,
जहाँ प्रसाधन बिकते हैं शृंगार के ! -
कौन पूछता मुझ-जैसे बेघाट को ? 
        पड़ता रहा नमक ही मेरे घाव पर !

हल्का हूँ, कुछ खास न हूँगा भार मैं ;
निर्धन हूँ, दे सकता हूँ, बस, प्यार मैं ;
गीत सुनाऊँगा मीरा के, सूर के ;
ले लेना, जो पाऊँगा दो-चार मैं ;
        कृपा करो अब, सर धरता हूँ पाँव पर      


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र' (1.11.1912 -19.8.1991)
किताब - रुद्र समग्र 
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

आज नानाजी होते तो 100 साल के होते l उनका यह गीत मैंने उनके स्वर में सुना है और अक्सर अपनी माँ व सबसे छोटी बेबी मौसी के स्वर में भी l हम भाई-बहनों के लिए यह काफी जाना-पहचाना है और आज नानाजी को याद करते हुए एक बार फिर गुनगुनाने का मन कर रहा है : 
बन्धु ! जरूरी है मुझको घर लौटना,
एक मुझे भी ले लो अपनी नाव पर 

बुधवार, 27 जून 2012

भैरवी (Bhairavi by Ramgopal Sharma 'Rudra')


                      तलहटी की रेत में,
                      बाजरे के खेत में,
          भोरे-भोरे छोहरियाँ भैरवी जगा रहीं.

                      तुलता अनुराग-बाण,
                      खुलता हँसता बिहान,
          खिल रहे कपोल लाल-लाल आसमान के ;
          और लाख-लाख बिन्दियों से ठौर-ठौर मौर
                      सज रहे जहान के ;
                      जिनके राग-रंग में,
          भोरे-भोरे छोहरियाँ रँग रहीं, रँगा रहीं.

                     हँस रहीं पहाड़ियाँ
                     स्वर्ग की अटारियाँ,
          हँस रहे नयन छलक-छलक नदी की धार में
          बज रहे सितार मंद्र-मंद्र तीर-तार में ;
                     जिनकी तरल तान को
          भोरे-भोरे छोहरियाँ गान में लगा रहीं.

                      तितलियों के नेह से 
          भोर की हवा में खेल, खिल रही हैं पत्तियाँ ;
                     ओस के सनेह से 
          जग रही हैं आरती-सी दूबियों की बत्तियाँ ;
                     जिनको अपने चाव से,
                     गीत के प्रभाव से, 
          भोरे-भोरे छोहरियाँ भाव में डुबा रहीं.

                     पंछियों की रागिनी
          चहचहा रही फुदक-फुदक नदी कछार पर ;
                     मछलियाँ सुहागिनी
          झाँकतीं गगन लहर-लहर के पट उघारकर ;
                     जिनको अपने बोल से,
                     कंठ के किलोल से,
          भोरे-भोरे छोहरियाँ प्रेम में पगा रहीं.


                         कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र', 1943
                         संकलन - 'हर अक्षर है टुकड़ा दिल का' में 'शिंजिनी' से 
                         प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2008