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रविवार, 11 मई 2014

जब सब दुनिया सो जाती है (Jab sab duniya so jati hai by Meeraji)


जब सब दुनिया सो जाती है, मैं अपने घर से निकलता हूँ
बस्ती से दूर पहुँचता हूँ, सूने रस्तों पर चलता हूँ। 

और दिल में सोचता जाता हूँ क्या काम मिरा इस जंगल में !
क्या बात मुझे ले आई है इस ख़ामोशी के मंडल मैं !

ये जंगल, ये मंडल जिसमें चुपचाप का राजा रहता है 
ये रस्ता भूले मुसाफ़िर के कानों में कुछ कहता है :

सुन सदियाँ बीतीं, इस जंगल में एक मुसाफ़िर आया था 
और अपने साथ इक मनमोहन, सुन्दर प्रीतम को लाया था 

और अन्धी जवानी का जो नशा उन दोनों के दिल पर छाया था 
दोनों ही नादाँ थे, मूरख, दोनोँ ने धोका खाया था। 

वो जंगल, वो मंडल जिसमें चुपचाप का राजा रहता है
जब अपनी गूँगी बोली में ऐसी ही बातें कहता है 

मेरा दिल घबरा जाता है, मैं अपने घर लौट आता हूँ 
सब दुनिया नींद में होती है, और फिर मैं भी सो जाता हूँ।


शायर - मीराजी 
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मीराजी 
संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

रविवार, 23 मार्च 2014

हज़ल (Hazal by Meeraji)

जितनी बर्फ़ नज़र आती है हमको कंचनगंगा में 
उतना ही दंगा होता होगा शायद दरभंगा में 

आप मरे तो जग परलै, हर डूबनेवाला कहता था 
अपने लिए तो फ़र्क़ नहीं, चाहे जमना में चाहे गंगा में 

कुछ तो एक ख़लीज है और कंघा सरदार की ज़ीनत है 
कुछ में लेकिन बात नहीं जो बात है उनके कंघा में 

अंगे का तो क़ाफ़िया मेरे बस में नहीं क्यों ? ये भी सुनो 
अंगे का गर क़ाफ़िया बाँधा, कहना पड़ेगा अंगा में 

हज़रते-मोहमिल इक दिन नंग-धड़ंग मलंग से कहने लगे 
ये तो कहो कुछ लुत्फ़ भी आता है इस नंग-धड़ंगा में 


परलै = प्रलय 
ख़लीज = खाड़ी 
ज़ीनत = शोभा
हज़रते-मोहमिल = निरर्थक महोदय

शायर - मीराजी (25.9.1912 - 3.11.1949)
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मीराजी  संपादक - नरेश 'नदीम' प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

उर्दू शायरी में हज़ल के तीन अर्थ प्रचलित हैं : उलटबानी जैसी शायरी, बेतुकी शायरी या अश्लील शायरी। 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

नागसभा का नाच (Nagsabha ka nach by Meeraji)

नागराज से, नागराज से मिलने जाऊँ आज 
नागराज सागर में बैठे सर पर पहने ताज 
नागराज की सभा जमी है, ख़ुशबुएँ लहराएँ 
बहती, रुकती, उलझती जाती, मन को मस्त बनाएँ 
चन्दरमाँ की किरनें आएँ, बल खाएँ, बल खाएँ 
नन्हे-नन्हे, हलके-हलके, मीठे गीत सुनाएँ 
गाते-गाते थकती जाएँ, सोएँ सुख की नींद 
(नागसभा में) हल्की-हल्की, मीठी-मीठी नींद
कुछ घड़ियाँ यूँ बीतें, और फिर संख बजाएँ नाग 
वहशी और बेबाक, अनोखे नश्शे लाएँ नाग 
सूनी किरनें जाग उठें, और नाचें सुन्दर नाच 
देवदासी याद आ जाए, हाँ, और मन्दिर, नाच 
नागसभा के नाच अनोखे, सारा सागर-नाच 
मेरा मन भी बनता जाए देख-देखकर-नाच  

शायर - मीराजी  संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मीराजी  संपादक - नरेश 'नदीम' प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

देवदासी के ज़िक्र को छोड़ दें तो पूरी नज़म अभी की राजनीतिक उठा-पटक को ध्यान में रखकर लिखी गई  मालूम पड़ रही है।

रविवार, 15 सितंबर 2013

हज़ल (Hazal by Meeraji)

जीना जीना कहते हो, कुछ लुत्फ़ नहीं है जीने में 
साँस भी अब तो रुक-रुककर चलता है अपने सीने में 

हम तो तुम्हें दाना समझे थे, भेद की बात बता ही दी 
इस दिन को हम कहते थे क्या फ़ायदा ऐसे पीने में!

बढ़े जो चाह तो बढ़ती जाए, घटे तो घटती जाती है 
दिल में चाह की बात है ऐसी जैसे चाँद महीने में 

कोठा-अटारी, मंजिल भारी, हौसले जी के निकालेंगे 
सामना उनसे अचानक हो जाए जो किसी दिन ज़ीने में 

जब जी चाहा, जिसको देखा, दिल ने कहा ये हासिल है 
कैसे-कैसे हीरे रक्खे हैं यारों के दफ़ीने में 

मेरा दिल तो मेरा दिल है, सबका दिल क्यों बनने लगा !
जामे-जम का हर इक जल्वा है मिरे दिल के नगीने में 

हम तो अपनी आँख के रोगी, दुश्मन दुश्मन की जाने 
चाहत की कैफ़ीयत है ये, बात नहीं वो कीने में 

औरों के आईने में तू अपनी मूरत देखेगा 
हर इक सूरत झूम उठेगी जब मेरे आईने में 

'मीराजी' ने बात कही जो, ज्ञानी खोज लगाएँगे 
कहनेवालों की आँखों में, सुननेवाले के सीने में 

दाना = बुद्धिमान 
दफ़ीने = गड़े खजाने में 
जामे-जम = ईरानी बादशाह जमशेद का जाम जिसमें वह सबकुछ देख सकता था 

उर्दू शायरी में हज़ल के तीन अर्थ प्रचलित हैं : उलटबानी जैसी शायरी, बेतुकी शायरी या अश्लील शायरी। हज़लें ग़ज़ल की विधा में भी कही जा सकती हैं या किसी और विधा में भी। हज़ल को एक गंभीर साहित्यिक विधा नहीं माना जाता। हज़ल कहना कभी-कभी शायर के लिए सिर्फ़ मनबहलाव का साधन होता है।  मीराजी की अभी तक पाँच ही हज़लें उपलब्ध हैं। 

शायर - मीराजी 
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मीराजी 
संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

मन मूरख (Man moorakh by Meeraji)

मन मूरख मिट्टी का माधो, हर साँचे में ढल जाता है 
इसको तुम क्या धोका दोगे, बात की बात बहल जाता है 

जी की जी में रह जाती है, आया वक़्त ही ढल जाता है 
ये तो बताओ, किसने कहा था काँटा दिल से निकल जाता है 

क्यों करती है अन्धी क़िस्मत अपने भावें आनाकानी 
जग के मुँह पर हँसी-कहानी देखके जी ही जल जाता है 

झूठ-मूठ ही होंट खुले तो दिल ने जाना अमृत पाया 
एक-इक मीठे बोल पे मूरख दो-दो हाथ उछल जाता है 

जैसे बालक पा के खिलौना तोड़ दे उसको और फिर रोए 
वैसे आशा के मिटने पर मेरा दिल भी मचल जाता है 

सुध बिसरे पर हँसनेवालो, चाह की राह चलो तो जानो 
ओछा पड़ता है हर दाँव जब ये जादू चल जाता है 

अब तो साँस यूँ ही आते हैं, काँपते-काँपते कुछ ठहराव 
जैसे रस्ता चलते शराबी गिरते-गिरते सँभल जाता है 

जीवन-रेत की छान-पटक में सोच-सोच दिन-रैन गँवाए 
बैरन वक़्त की हेराफेरी, पल आता है, पल जाता है 

'मीराजी' दर्शन का लोभी, बिन बस्ती जोग का फेरा 
देख के हर अनजानी सूरत पहला रंग बदल जाता है 


शायर - मीराजी 
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मीराजी 
संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010