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गुरुवार, 21 अगस्त 2025

गोबरैले (Gobraile by Sarveshvar Dayal Saxena)

यह क्या हुआ 

देखते-देखते 

चारों तरफ गोबरैले छा गए। 


गोबरैले - 

काली चमकदार पीठ लिए 

गंदगी से अपनी-अपनी दुनिया रचते 

ढकेलते आगे बढ़ रहे हैं 

कितने आत्मविश्वास के साथ। 


जितनी विष्ठा 

उतनी निष्ठा। 

कितनी तेज़ी से 

हर कोई यहाँ रच रहा है 

एक गोल-मटोल संसार 

और फिर उसे 

तीखी चढ़ाइयों 

और ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर 

ठेलता जा रहा है। 


देखने-सुनने और समझने के लिए 

अब यहाँ कुछ नहीं रहा - 

सत्ताधारी, बुद्धिजीवी, 

जननायक, कलाकार,

सभी की एक जैसी पीठ 

कालई चमकदार,

एक जैसी रचना 

एक जैसा संसार। 


पच्चीस वर्षों से लगातार 

यही देखते-देखते 

लगता है हम सब 

गोबरैलों में बदल गए हैं,

यह दूसरी बात है 

कि अपना संसार रचने के प्रयास में 

हम औंधें गिर पड़े हैं ;

हमारे नन्हें-नन्हें पैर 

इस शून्य में निरंतर चल रहे हैं 

और चलते जा रहे हैं 

जब तक यह विराट आकाश 

एक गंदी गोली में न बदल जाए। 

                   2 

अच्छे से अच्छा शब्द फूलकर 

गोबरैले में बदल जाता है 

और बड़े से बड़े विचार को 

गंदी गोली की तरह ठेलने लगता है - 

चाहे वह ईश्वर हो या लोकतंत्र । 


गोबरैले चढ़ रहे हैं 

गोबरैले बढ़ रहे हैं 

और हम सब 

ग़लीज़ इश्तहारों से लदी 

दीवार की तरह निर्लज्ज खड़े हैं। 


क्रांति के नाम पर 

यदि ये कभी कुचल भी गये 

तो कहीं खून नहीं होगा 

एक लिजलिजे पीले मवाद-सा 

चारों तरफ़ कुछ फैल जायेगा। 

                3 

हरे हैं जंगल 

हरे हैं घाव 

हरे हैं दुख 

लेकिन सब काला-काला दीखता है 

(इन्हीं गोबरैलों के कारण)


काली हैं आँधियाँ 

काले हैं खून 

काले हैं मन 

लेकिन सब हरा-हरा दीखता है 

(इन्हीं गोबरैलों के कारण)  

                                       (दिसंबर, 1969) 


कवि - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 

संकलन - कुआनो नदी 

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1973 


यह किताब पापा की है। पहले पन्ने  पर उनके दस्तखत के नीचे तारीख 20.2.74 की है। 'गोबरैले' कविता के अंत में उनकी लिखावट में टिप्पणी दर्ज है - "बेचैनी, घनघोर अनास्था की कविता"। पहले पन्ने पर "जितनी विष्ठा/उतनी निष्ठा।" जहाँ है उस पर निशान लगा कर उन्होंने लिख रखा है - "धूमिल - 'भाषा की नाक पर रूमाल रखकर निष्ठा की तुक विष्ठा से मिला दूँ।' यह तुक सर्वेश्वर ने मिलाई।" आज सालों बाद उनकी लिखावट देखकर बहुत अच्छा लगा। ऐसा लगा कि वे हैं, पटना में हैं, डुब्बी मारकर लिख-पढ़ रहे हैं। 


शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

सुनो मैं तुम्हें बुला रहा हूँ (Suno main tumko bula raha hoon by Malek Haddad)

मेरे अतिरिक्त इस छिन्न-भिन्न झाड़ी के गीत भी 
मेरी बात सुनो,
मैं एक लाश के मुख से बोलता हूँ 
मेरी बात सुनो,
मैं अपने हाथ से 
जो उसके गिटार पर टूट गया है लिखता हूँ 

मैं तुम्हारा दर्पण हूँ 
हत्यारा देखने में सुंदर है। 
और मेरे पास सही कुरूपता है इस सत्य की 
जिसे कहने पर चोट लगती है। 

'चोर को पकड़ो' एक चीख है 
जो हर बार निकलती है 
जब कवि अपने संगीत के 
और शब्दों के मर्म में डूब जाता है,
जहाँ तक मेरा सवाल है, शब्द जो मैं लिखता हूँ गणित है 
कि इतने अल्जीरियाइयों को मौत के घाट उतारा गया :

'चोर को पकड़ो' एक चीख है 
जो निकलती है हर बार। 
जब सजधज कर निकलता है तुषार 
प्रतीक्षा करता है 
अति विशुद्ध सिकन्दरियाई मवेशियों की। 
प्रेम की पहिचान के लिए 
मैं केवल टेलीफ़ोन 
और स्नानघर के बाल्टे को जानता हूँ 

'चोर को पकड़ो' एक चीख है 
जो निकलती है जब कविता लिखने चलता हूँ,
हम बहादुरी स्वांग को इतिहास बनाते हैं 
हम शब्द का मनुहार और प्रेम की भिक्षा माँगते हैं 
हम एक दर्पण में स्वयं को देखते हैं। 

झोपड़ी और हृदय ?
अल्जीरिया की ऊँचाई पर है 
'सेसनी विला'
मेरे प्रेम का क़िला। 

मेरे सारे सत्य एक स्वप्न हैं 
मुझे बताया गया है कि मासूमियत बच्चों की तरफ़दार होती है 
लेकिन मैंने 
ज़िंदा 
मरे 
और बचे हुओं को गिना है 
उन्हें भूलने में हमें हज़ारों वर्ष लगेंगे। 

मेरा संगीत 
जो अल्जीरिया की भूमि पर हर जगह सो रहे हैं 
उनकी नींद में व्याघात नहीं डालना चाहता 
सेना,मैं तुम्हें बुला रहा हूँ। 

इसे याद रखो 
जब मैं निर्वासन में अपनी लाश घसीटता था 
जब मेरी निगाहें बिना तुम्हारी निगाहों से मिले 
तुम्हें देखती थीं 
और यदि मैं जब अपनी चिट्ठियाँ खोलने से पहले अख़बार खोलता हूँ 
यदि मैं गुलाब की कोमलता को अब सराहता नहीं 
यदि मेरी फिर फिर यही टेक है 
कि वे कहीं दूर मेरी बात सुनते हैं 
यदि मेरा दिल मर गया है 
और तुम्हारा मेरे लिए गुनगुना रहा है जहाँ कहीं भी तुम हो 
इसे याद रखो :
मैं उनके साथ मर चुका हूँ। 



अल्जीरियाई कवि -  मलैक हद्दाद (5. 7. 1927 - 2. 6. 1978)
संकलन - धूप की लपेट 
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 


शनिवार, 21 मार्च 2015

केवल यही (It's not more by Eliseo Diego translated in Hindi)


कविता कुछ नहीं है 
सिवा एक प्राचीन स्टोव की चढ़ती 
परछाईं में बातचीत के 
जब सब चले गए हों,
और दरवाज़े के बाहर 
अभेद्य वन सरसरा रहे हों। 

कविता केवल कुछ भ्रम है 
जिनसे किसी को प्यार हो,
और जिनका क्रम समय ने बदल दिया हो,
जिनमें कि अब 
केवल एक संकेत,
एक अनभिव्यक्त आशा,
वास करती हो। 

कविता और कुछ नहीं है 
सिवा आनंद के, परछाइयों में 
बातचीत के,
जबकि और सब कुछ विदा ले चुका हो 
और केवल खामोशी हो। 



क्यूबाई कवि - एलिसेओ दिएगो (2.7.1920 - 1.3.1994)
स्पैनिश से अंग्रेज़ी अनुवाद - एलिसेओ दिएगो
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 

रविवार, 14 दिसंबर 2014

बच्चा और उसका सोने का कमरा (Bachcha aur uska sone ka kamra by Eliseo Diego)


तुम आज रात डरे हुए हो :
चोर बाहर हैं 
पत्तियों में छिपे 
खिड़की में झाँकते। 
           शीशे से सोना फैलता है 
परछाईं में। 
           और चोर 
पत्तियों में हैं,
एक भीड़, एक अनंतता,
दूसरी ओर के 
नम निभृत स्थान में। 

क्यूबाई कवि - एलिसेओ दिएगो ( 2.7.1920 – 1.3.1994)
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 


दिसंबर आ गया है।  खुर्शीद से अंतिम बातचीत इन्हीं दिनों में हुई थी, यह बात बार-बार कौंध रही है। अभी जो भी कविता पढ़ रही हूँ उसके अर्थ में खुर्शीद झाँक रहे हैं। लगता है कि जीवन पर एक छाया सी पड़ गई है। 

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

छाया-राज (Chhaya-raaj by Hans Magnus Enzensberger)


यहाँ अभी भी मुझे दीखती है एक जगह,
एक आज़ाद जगह,
यहाँ इस छाया तले। 

यह छाया
बिकाऊ नहीं है। 

समुद्र की भी 
पड़ती है छाया शायद,
और इसी तरह काल की भी। 

छायाओं की लड़ाइयाँ 
खेल हैं :
कोई छाया
दूसरे के प्रकाश में थिर नहीं रहती। 

जो इस छाया में रहते हैं 
उन्हें मारना कठिन होता है। 

एक क्षण को 
मैं अपनी छाया से बाहर आता हूँ,
एक क्षण को। 

जो प्रकाश देखना चाहते हैं 
जैसा कि वह है 
उन्हें चले जाना चाहिए 
छाया में। 

छाया
सूर्य से अधिक दीप्तमान 
आज़ादी की शीतल छाया। 

पूरी तरह से इस छाया में 
मेरी छाया विलीन हो जाती है। 

इस छाया में 
अभी भी जगह है। 


जर्मन कवि - हैंस मैगनस ऐंसेंसबर्गर  (11.11.1929)
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

तेज़ी से जाती हुई (Tezi se jati hui by Sarveshvar Dayal Saxena)

तेज़ी से जाती हुई कार के पीछे 
पथ पर गिर पड़े 
निर्जीव, सूखे, पीले पत्तों ने भी 
कुछ दूर दौड़कर गर्व से कहा - 

           'हममें भी गति है 
            सुनो, हममें भी जीवन है,
            रुको, रुको,
            हम भी साथ चलते हैं -
            हम भी प्रगतिशील हैं !'

लेकिन उनसे कौन कहे :
प्रगति पिछलग्गूपन नहीं है 
और जीवन आगे बढ़ने के लिए 
दूसरों का मुँह नहीं ताकता। 



कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - कविताएँ - 1 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1978 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

अपने को सलाह (Apne ko salah by Ho Chi Minh)

बिना शरद की ठिठुरन और सन्नाटे के 
वसंत की ऊष्मा और भव्यता 
नहीं मिल सकती,
मुसीबतों ने मुझे पनिया कर 
सख्त कर दिया है 
और मेरे मन को इस्पात बना दिया है। 

बिना आज़ादी के जीना दरअस्ल 
घिनौनी स्थिति है 


कवि - हो ची मिह्न (19.5.1890 - 2.9.1969) 
संकलन - धूप की लपेट 
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन-संपादन - वीरेन्द्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

बेड़ियाँ (Bediyan by Ho Chi Minh)

एक विकराल राक्षस की तरह 
अपना भूखा मुँह खोले 
हर रात बेड़ियाँ लोगों के पैर निगल लेती हैं 
उनके जबड़े हर कैदी का दाहिना पैर दबोच लेते हैं 
केवल बायाँ पैर 
मुड़ने और फैलने के लिए मुक्त रह जाता है l 
 
फिर भी एक अजीब बात इस दुनिया में है 
लोग बेड़ियों में अपने पैर डालने के लिए दौड़ते हैं l 
 
एक बार बेड़ी पड़ जाने पर 
वे शांति से सो पाते हैं 
अन्यथा सिर छुपाने की जगह भी 
उन्हें नहीं मिलती   
 
 
कवि – हो ची मिह्न (19. 5. 1890 - 2. 9. 1969)
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना  
किताब - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेन्द्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

बसन्त -राग (Basant-raag by Sarveshvar Dayal Saxena)



पेड़ों के साथ-साथ 
हिलता है सिर 
यह मौसम अब नहीं 
आयेगा फिर l 



कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
संकलन - कविताएँ-2 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1978

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

ख़ाली समय में (Khali samay mein by Sarveshvar Dayal Saxena)

बैठकर ब्लेड से नाख़ून काटें,
बढ़ी हुई दाढ़ी में बालों के बीच की 
ख़ाली जगह छाटें,
सर खुजलायें, जम्हुआयें,
कभी धूप में आयें,
कभी छाँह में जायें,
इधर-उधर लेटें,
हाथ पैर फैलायें,
करवट बदलें 
दायें-बायें,
ख़ाली कागज़ पर कलम से
भोंड़ी नाक, गोल आँख, टेढ़े मुँह 
की तसवीरें खींचें,
बार-बार आँख खोलें 
बार-बार मींचें,
खाँसें, खखारें 
थोड़ा-बहुत गुनगुनायें,
भोंड़ी आवाज़ में 
अख़बार की ख़बरें गायें,
तरह-तरह की आवाज़ 
गले से निकालें,
अपनी हथेली की रेखाएँ 
देखें-भालें,
गालियाँ दे-दे कर मक्खियाँ उड़ायें,
आँगन के कौओं को भाषण पिलायें,
कुत्ते के पिल्ले से हाल-चाल पूछें,
चित्रों में लड़कियों की बनायें मूंछें,
धूप पर राय दें, हवा की वकालत करें,
दुमड़-दुमड़ तकिये की जो कहिए हालत करें,

ख़ाली समय में भी बहुत-सा काम है 
क़िस्मत में भला कहाँ लिखा आराम है l 


कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
संकलन - कविताएँ-1 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1978


शनिवार, 14 सितंबर 2013

आहिस्ता मत चलो (Aahista mat chalo by Sarveshvar Dayal Saxena)

 
आहिस्ता मत चलो 
दौड़ो l 
 
अब कुछ भी सोचने का समय नहीं रहा l 
 
अनाज से भरी मालगाड़ी 
साँप-सी सिगनल पर खड़ी है 
उसकी पूँछ पकड़कर 
जोर से घुमाओ और पटक दो l 
 
साहस और तेज गति -
बिना हथियारों के भी 
इसी के सहारे तुम विषधर मारते रहे हो l 
 
आहिस्ता मत चलो
दौड़ो l 
 
ज्यादा सोचना भय को निमन्त्रण देना है 
और धीरे चलना अवसर चूक जाना l 
मैं जानता हूँ तुम्हारे हाथों में 
अभी कोई झण्डा नहीं है,
भूखे और असहाय आदमी को 
किसी झण्डे की जरूरत भी नहीं होती l 
अपने उस साथी की 
तार-तार फटी, खून से रँगी कमीज को 
एक बाँस में लपेट ऊँचा उठा लो 
जिसे कल अकेले वैगन लूटते समय 
गोली मार दी गयी थी l 
 
आहिस्ता मत चलो
दौड़ो l 
सब एक साथ मिलकर 
दौड़ो l 
 
नहीं तो मालगाड़ी राजधानी पहुँच जायेगी 
और लौटने पर तुम्हें अपनी झोंपड़ियों में 
बच्चों और वृद्धों की लाशें ही मिलेंगी l
 
 
 
 
कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - खूँटियों पर टँगे लोग
प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1982

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

पढ़ी-लिखी मुर्गियाँ (Padhi-likhi murgiyan by Sarveshvar Dayal Saxena)

किड़-किड़ -किड़ कियाँ कियाँ 
किड़-किड़ -किड़ कियाँ कियाँ 
दरबे से निकली हैं,
पढ़ी-लिखी मुर्गियाँ l 

बड़े-बड़े घरों के कचरे पर डोल रहीं,
पता  नहीं कहाँ-कहाँ गंदे पर खोल रहीं,
हर अपाच्य पाच्य इन्हें,
ऐसी हैं प्रचुरगियाँ l 

किड़-किड़ -किड़ कियाँ कियाँ 
किड़-किड़ -किड़ कियाँ कियाँ 
दरबे से निकली हैं,
पढ़ी-लिखी मुर्गियाँ l 

साहस  है, आपस में लड़ना हैं जानतीं,
हैं स्वतन्त्र, दरबे को मात्र कवच मानतीं,
गूदा सब उतर गया,
दीख रही चियाँ-चियाँ l 

किड़-किड़ -किड़ कियाँ कियाँ 
किड़-किड़ -किड़ कियाँ कियाँ 
दरबे से निकली हैं,
पढ़ी-लिखी मुर्गियाँ l 

जिसकी ऊँची कलगी सब उसके साथ लगीं,
उसकी ही चमक-दमक के हैं अनुराग-रँगी,
अंडे कितने देंगी 
जोड़ रहे बैठ मियाँ l 

किड़-किड़ -किड़ कियाँ कियाँ 
किड़-किड़ -किड़ कियाँ कियाँ 
दरबे से निकली हैं,
पढ़ी-लिखी मुर्गियाँ l 

कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

संकलन - कविताएँ-2 

प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1978


शुक्रवार, 28 जून 2013

राग डींग कल्याण (Raag deeng kalyan by Sarveshvar Dayal Saxena)

तेरी भैंस को डंडा कब मारा 
मैंने भैंस को डंडा कब मारा ! 

       तेरी भैंस है प्रज्ञा पारमिता 
       उसने मेरी खेती खाई थी l 
       तेरी भैंस है जनता की प्रतिनिधि 
       उसने मेरी छान गिरायी थी l 
       तेरी भैंस ने खाया कामसूत्र 
       तेरी भैंसी ने खा डाली गीता 
       तेरी भैंस से अब क्या शेष रहा 
       तेरी भैंस से ही यह युग बीता l 

तेरी भैंस के संग सब भैंस हुए 
तेरी भैंस को होवे पौबारा l
तेरी भैंस को डंडा कब मारा 
मैंने भैंस को डंडा कब मारा ! 

       तेरी भैंस का होगा अभिनंदन 
       तेरी भैंस का मैं करता वंदन 
       तेरी भैंस शांति की सूत्रधार 
       तेरी भैंस आत्मा की क्रंदन 
       तेरी भैंस के पागुर में भविष्य 
       तेरी भैंस के पागुर में अतीत 
       तेरी भैंस के आगे शीश झुका 
       तेरी भैंस  सभी से रही जीत !

तेरी भैंस ही है मेरा जीवन 
तेरी भैंस  ही है मेरा नारा !
तेरी भैंस को डंडा कब मारा ?
मैंने भैंस को डंडा कब मारा ?

       तेरी भैंस के आगे बीन बजी 
       तेरी भैंस के आगे शहनाई
       तेरी भैंस घुस गयी संसद में 
       सब संविधान चट कर आयी
       तेरी भैंस की भैंस में भैंस रहे 
       तेरी भैंस की भैंस में भैंस बहे 
       तेरी भैंस करे जो जी चाहे 
       तेरी भैंस से अब क्या कौन कहे ?

तेरी भैंस मेरे सर-माथे पर 
तेरी भैंस पे यह तन-मन वारा !
तेरी भैंस को डंडा कब मारा ?
मैंने भैंस को डंडा कब मारा ?


कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
संकलन - कविताएँ-2 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1978




शुक्रवार, 14 जून 2013

ये तानाशाह ( Ye tanashah by Che Guevara)



उन गन्नों में अभी भी एक बू बसी हुई है
खून और जिस्म का घोल,
एक पंखुरी बेधती, उबकाई आती है l
नारियल के दरख्तों के नीचे
कब्रें भरी हुई हैं तबाह हड्डियों और
ख़ामोश बेज़बान मौत की सरसराहटों से l
नाजुक तानाशाह बात कर रहा है
जहन्नुम से, सुनहरे फ़ीते और पट्टे लगाए
यह पिद्दी महल घड़ी की तरह चमकता है
और दस्ताने पहने तेज़ कहकहे
अक्सर गलियारे पार कर
मृत आवाज़ों
और ताज़े दफ़न नीले चेहरों में जा मिलते हैं l
वह रोना नहीं दिखाई देता, उस पौधे
की तरह जिसके बीज धरती पर
बेहिसाब गिरते जाते हैं
जिसकी बड़ी अंधी पत्तियाँ
बिना रोशनी के भी उगती बढ़ती जाती हैं l
एक एक क़दम करके नफ़रत बढ़ती है
चोट पर चोट करती
ख़ामोश चुचुआता थूथन लिए
इस दलदल के बदबूदार भयावह पानी में l
-                                                                      - नेरूदा का निधन 24.9.1973 

कवि – अर्नेस्तो चे ग्वेरा (June 14, 1928 - October 9, 1967)
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना  
किताब - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेन्द्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000



(लातीनी अमेरिकी क्रांतिकारी ; जन्म आर्जेंतीना l क्यूबाई क्रांति को सैद्धांतिक प्रेरणा दी और वहाँ की क्रांतिकारी सरकार में शामिल होने के बाद, बोलिविया में छापामार कार्यवाही संगठित करने चले गए l वहीं गोली के शिकार बने l अपनी मृत्यु के बाद सारे संसार में युवा क्रांतिकारियों के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं l)

बुधवार, 5 जून 2013

मुड़वाँ कुर्सियाँ (Folding chairs by Günter Grass)


कितने अजीब हैं ये परिवर्तन l 
लोग दरवाज़ों से नामों की तख्तियाँ खोलते हैं l 
करमकल्ले का भगौना उठाते हैं 
और उसे फिर गरमाते हैं, किसी और जगह जा कर l

किस तरह का असबाब है यह 
जो प्रस्थान का एलान करता रहता है ?
लोग अपनी-अपनी मुड़वाँ कुर्सियाँ उठाते हैं 
और कहीं और चले जाते हैं l 

घरों की बेचैन याद और उबकाइयों से लदे जहाज़
ले जाते हैं जुगत से बनी बैठने की निश्चित जगहों को 
और उनके अनिश्चित बदलते मालिकों को 
इधर से उधर l 

अब इस महासागर के दोनों तरफ़ 
मुड़वाँ कुर्सियाँ हैं ;
कितने अजीब हैं ये परिवर्तन l 


कवि - गुंटर ग्रास 
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना  
किताब - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेन्द्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने कई विदेशी रचनाकारों की कविताओं से हिन्दी पाठकों को परिचित कराया है. 'धूप की लपेट' में  उनकी असंकलित कविताएँ हैं और उनके द्वारा अनूदित कविताएँ भी . उनमें से यहाँ जर्मन रचनाकार गुंटर ग्रास (जन्म-16-10-1927) की एक कविता प्रस्तुत है जो मुख्यतः अपने उपन्यासों के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं .

बुधवार, 1 मई 2013

शुद्ध-बुद्ध (Shuddh-buddh by Sarveshvar Dayal Saxena)


शुद्ध हवा औ' पानी शुद्ध
खा-पी बन गये गौतम बुद्ध l 
बोले - 'सभी प्रेम से रहो 
नहीं चाहिये हमको युद्ध !'
किन्तु मिलावट का घी खा 
हम सबने यह ही सीखा 
बात-बात पर होना क्रुद्ध 
बात-बात पर करना युद्ध l 
शुद्ध हवा दो पानी शुद्ध 
हम भी बन जाएं गौतम बुद्ध l 




कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - महके सारी गली गली (बाल-कविताएं)
संपादक - निरंकार देव सेवक, कृष्ण कुमार 
प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, पहला संस्करण, 1996

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

अब कुछ ठीक नहीं (Ab kuchh theek nahin by Sarveshwar Dayal Saxena)

अब कुछ  ठीक नहीं l 

मैं कब हँस पडूँ 
कब चीखकर 
अपना गला दबा लूँ 
कब छुरा उठाकर 
सामने वार कर बैठूँ 
अब कुछ  ठीक नहीं l 

मेरे चारों तरफ 
कुएँ का यह घेरा 
सँकरा होता होता 
मेरे जिस्म को ही नहीं 
मेरी आत्मा को छूने लगा है 
अब कुचला जाना मेरी नियति बनता जा रहा है l 

मुझे धरती दरक जाने का डर नहीं था 
न आसमान फटने का 
उनमें से रास्ता निकालना 
मैं जानता था 
युगों से मैं यही करता आ रहा हूँ l 
लेकिन अब 
जिस सिकुड़ते घेरे में मैं पड़ गया हूँ 
उसकी हर ईंट का 
मुझे दबोचने का तरीका अजीब है -
वह या तो 
देखते ही पीछे हट जाती है,
छूते ही आकार खो देती है,
या कुछ कहते ही 
पिघलकर पानी बन जाती है l 
कायरों, ढोंगियों और मूर्खों का यह घेरा 
बनता जा रहा है इतिहास मेरा l 

मैं सोचता था 
इन्हें पहचानकर 
इन्हें सही-सही समझकर 
मैं इस कुएँ के बाहर 
निकल आऊँगा 
और इसी के सहारे 
एक व्यापक हरा-भरा संसार रचूँगा l 

लेकिन अब किसी की 
कोई पहचान नहीं 
और इनसे घिरकर 
मैं अपनी पहचान भी 
        खोता जा रहा हूँ l 
अब कुछ  ठीक नहीं 
मैं कब क्या हो जाऊँ ?

कब हँस पडूँ 
कब चीखकर 
अपना गला दबा लूँ 
कब छुरा उठाकर 
सामने वार कर बैठूँ 

अब कुछ  ठीक नहीं l 




कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - खूँटियों पर टँगे लोग
प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1982


बुधवार, 29 अगस्त 2012

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट (Postmortem ki report by Sarveshwar Dayal Saxena)



गोली खाकर
एक के मुँह से निकला -
'राम' l

दूसरे के मुँह से निकला - 
'माओ' l

लेकिन
तीसरे के मुँह से निकला -
'आलू' l

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे l


कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - खूँटियों पर टँगे लोग
प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1982

बुधवार, 22 अगस्त 2012

प्यार : एक छाता (Pyar : Ek Chhata by Sarveshwar Dayal Saxena)



विपदायें आते ही,
खुलकर तन जाता है ;
हटते ही
चुपचाप सिमट ढीला होता है ;
वर्षा से बचकर
कोने में कहीं टिका दो,
प्यार एक छाता है
आश्रय देता है, गीला होता है.

कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
संकलन - कविताएँ-2 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1978

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की 'कुआनो नदी' और 'जंगल का दर्द' से पहले की सारी कविताएँ दो खण्डों में उपलब्ध हैं. प्रस्तुत कविता सर्वेश्वरदयाल के 'एक सूनी नाव' (1963 -1966) नामक संग्रह से लेकर कविताओं के दूसरे खंड में संकलित की गई है. 


बुधवार, 4 जुलाई 2012

इल्ली-उल्ला (Illi-Ulla by Sarveshwar Dayal Saxena)


खा के रसगुल्ला
हमने किया कुल्ला
पानी में उठा बुल्ला
देख रहे मुल्ला
इल्ली-उल्ला

                           कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
                           संकलन - महके सारी गली गली (बाल कविताएँ)
                           सम्पादक - निरंकार देव सेवक, कृष्ण कुमार
                           प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, 1996