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मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

बोलने में कम से कम बोलूँ (Bolane mein kam se kam bolun by Vinod Kumar Shukla)


बोलने में कम से कम बोलूँ 

कभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँ 

इतना कम कि किसी दिन एक बात 

बार-बार बोलूँ 

जैसे कोयल की बार-बार की कूक फिर चुप। 


मेरे अधिकतम चुप को सब जान लें 

जो कहा नहीं गया, सब कह दिया गया का चुप। 

पहाड़, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा के बरक्स 

एक छोटा सा टिमटिमाता 

मेरा भी शाश्वत छोटा सा चुप.। 


गलत पर घात लगाकर हमला करने के सन्नाटे में 

मेरा एक चुप - 

चलने के पहले एक बन्दूक का चुप 

और बन्दूक जो कभी नहीं चली 

इतनी शान्ति का 

हमेशा की मेरी उम्मीद का चुप। 


बरगद के विशाल एकान्त के नीचे 

सम्हाल कर रखा हुआ 

जलते दीये का चुप। 


भीड़ के हल्ले में 

कुचलने से बचा यह मेरा चुप,

अपनों के जुलूस में बोलूँ 

कि बोलने को सम्हाल कर रखूँ का चुप। 


कवि - विनोदकुमार शुक्ल 

संकलन - कभी के बाद अभी 

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2012 

शनिवार, 1 नवंबर 2025

खुश होऊँ क्या ! नाखुश भी क्या !! (Khush houn kya by Ramgopal Sharma 'Rudra')


खुश होऊँ क्या ! नाखुश भी क्या !!


फिर आज गगन भर आया है,

स्वाती का मन ढर आया है;

पर कौन करे स्वागत इनका ?

पिंजड़े का बोल पराया है!

पथराई आँखों को घन क्या,

बिजली क्या, इंद्रधनुष भी क्या !!

 

जिनकी सुध ही से मोर मगन 

चलते थे नाच किये बन-बन ,

जब टूट गए नुपुर के सुर,

तब आए तो क्या आए घन ! 

पंखिल चाँदों की पतझड़ को

दल क्या, दूर्वा क्या, कुछ भी क्या !!



कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र में संकलित '
मूर्च्छना' संग्रह से 
संपादक - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

 

 


शनिवार, 6 सितंबर 2025

झाड़ू वाली (Jhadoo walee by Om Prakash Valmiki)

सुबह पाँच बजे 

हाथ में थामे झाड़ू 

घर से निकल पड़ती है 

रामेसरी 

लोहे की हाथ गाड़ी धकेलते हुए 

खड़ंग-खड़ांग की कर्कश आवाज 

टकराती है 

शहर की उनींदी दीवारों से 

गुजरती है 

सुनसान पड़े चौराहों से 

करती हुई ऐलान 

जागो!

पूरब दिशा में लाल-लाल सूर्य 

उगने वाला है। 


नगरपालिका की सुनसान सड़कें 

धुँधलकों की जमात में 

टिमटिमाते इक्का-दुक्का तारे 

कान पर जनेऊ लपेटे 

गुनगुनाते स्वर में 

श्लोक रटता हुआ पास से गुजरता पंडित 

चाय की दुकान के फट्टे पर 

चीकट मटमैली चादर में लिपटा ऊँघता नौकर 

भट्ठी के पास लेटा कुनमुनाता झबरा कुत्ता 

चौंकते हैं 

पास से गुजरती 

लोहे की हाथ गाड़ी की आवाज़ पर 

कोसते हैं जी भर कर। 


रामेसरी के हाथ में थमी बाँस की मोटी  झाड़ू 

सड़क के ऊबड़-खाबड़ सीने पर 

श्च-श्च की ध्वनि से तैरती है 

उड़ाती है धूल का गुबार। 

धूल : जो सैंकड़ों वर्षों से 

जम रही है पर्त-दर-पर्त 

फेफड़ों में रामेसरी के 

रँग रही है श्वास नली को 

चिमनी-सा 

कारखाने-से उठते धुएँ-सा 


सब कुछ मिलाकर 

एक खाका उभरता है 

जो जिन्दगी की क्रूरता का नमूना है 

जिसमें छोटे-छोटे बच्चों का 

अनवरत सिलसिला है 

जिन्हें लील जाती है 

गन्दगी से उठती दुर्गन्ध 

और, वे न जाने कब बड़े होकर 

गन्दगी के इस शहर में दुर्गन्ध बन जाते हैं। 


फिर एक दिन, जब 

रामेसरी की खुरदरी हथेली हो जाती है असमर्थ 

हाथ गाड़ी को धकेलने में 

छोटे-छोटे हाथ 

सड़क तक लाते हैं 

धकेलकर गाड़ी को,

बदले में पाकर असंख्य जख्म भी 

खामोश रह जाते हैं 

ढोते हैं 

जिन्दगी का भार उसी तरह 

जैसे ढोते रहे हैं इनके पुरखे 

चेहरे पर कुछ लकीरें हैं 

जो वक्त ने उकेरी है। 


साल-दर-साल गुजरते हैं  

दीवारों पर चिपके चुनावी पोस्टर 

मुँह चिढ़ाते हैं। 

जब तक रामेसरी के हाथ में 

खड़ांग-खांग घिसटती लौह गाड़ी है 

मेरे देश का लोकतंत्र 

एक गाली है!

                    - सितम्बर, 1988 


कवि - ओमप्रकाश वाल्मीकि 

संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 2024  


किसी किसी कविता-कहानी या लेख में वर्तनी की असमानता देखकर मुझे उलझन होने लगती है। अनुस्वार से 'लोकतंत्र' लिखा है तो 'सितम्बर' ऐसे,  वहीं 'आवाज़' है, मगर गुजरना है! किताब में जहाँ 'ओमप्रकाश' एक साथ है और अंग्रेज़ी में 'Om Prakash' अलग अलग तो वैसा मैंने कई जगह देखा है। जैसे पापा भी हिन्दी में 'नंदकिशोर' नवल लिखते थे और अंग्रेज़ी में 'N. K.' Nawal, इसलिए वो समझ में आता है। मगर अक्सर वर्तनी को लेकर दिमाग चकराता है। सबसे ऊपर विवक्षा भी है - कहने वाली की इच्छा। फिर भी कई किताबें पलटती हूँ। उसमें भी कई बार अलग अलग प्रकाशन में अलग अलग वर्तनी मिलती है। मेरी कोशिश रहती है कि टाइप करते समय सामने की किताब की वर्तनी का पालन करूँ।  



चन्द्रविन्दु की चिन्ता (Chandravindu ki chinta by Gyanendrapati(


मुझे चन्द्रविन्दु की चिन्ता है 
चन्द्रविन्दु नहीं नभ का 
भाषा का 
लिपि का 
देवनागरी लिपि का 
एक मानव-समाज की ऊर्जा का एक अर्थचित्र 
नयनाभिराम 
लिपि के नभ का चन्द्रविन्दु
लिपि जो एक मानव-सभ्यता का आँगन है 

मुझे चन्द्रविन्दु की चिन्ता है 
लिपि को सुदूर जन तक पसारने वाले ये छापाखाने 
रौंद जाएँगे क्या 
देवनागरी लिपि की सर्वाधिक सुन्दर सुघड़ कोमल आकृति 
यन्त्र-वक्ष में 
न रहेगी चन्द्रविन्दु के लिए जगह 
सूरज की पीठ पर छपनेवाले अखबार 
छपेंगे चन्द्रविन्दु के बगैर 

बड़ी होगी जो पीढ़ी बेटे-बेटियों की 
अनुस्वार के उदित गोलाकार में चन्द्रविन्दु की अस्ताभा नहीं पहचानेगी 

कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशन - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

गोबरैले (Gobraile by Sarveshvar Dayal Saxena)

यह क्या हुआ 

देखते-देखते 

चारों तरफ गोबरैले छा गए। 


गोबरैले - 

काली चमकदार पीठ लिए 

गंदगी से अपनी-अपनी दुनिया रचते 

ढकेलते आगे बढ़ रहे हैं 

कितने आत्मविश्वास के साथ। 


जितनी विष्ठा 

उतनी निष्ठा। 

कितनी तेज़ी से 

हर कोई यहाँ रच रहा है 

एक गोल-मटोल संसार 

और फिर उसे 

तीखी चढ़ाइयों 

और ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर 

ठेलता जा रहा है। 


देखने-सुनने और समझने के लिए 

अब यहाँ कुछ नहीं रहा - 

सत्ताधारी, बुद्धिजीवी, 

जननायक, कलाकार,

सभी की एक जैसी पीठ 

कालई चमकदार,

एक जैसी रचना 

एक जैसा संसार। 


पच्चीस वर्षों से लगातार 

यही देखते-देखते 

लगता है हम सब 

गोबरैलों में बदल गए हैं,

यह दूसरी बात है 

कि अपना संसार रचने के प्रयास में 

हम औंधें गिर पड़े हैं ;

हमारे नन्हें-नन्हें पैर 

इस शून्य में निरंतर चल रहे हैं 

और चलते जा रहे हैं 

जब तक यह विराट आकाश 

एक गंदी गोली में न बदल जाए। 

                   2 

अच्छे से अच्छा शब्द फूलकर 

गोबरैले में बदल जाता है 

और बड़े से बड़े विचार को 

गंदी गोली की तरह ठेलने लगता है - 

चाहे वह ईश्वर हो या लोकतंत्र । 


गोबरैले चढ़ रहे हैं 

गोबरैले बढ़ रहे हैं 

और हम सब 

ग़लीज़ इश्तहारों से लदी 

दीवार की तरह निर्लज्ज खड़े हैं। 


क्रांति के नाम पर 

यदि ये कभी कुचल भी गये 

तो कहीं खून नहीं होगा 

एक लिजलिजे पीले मवाद-सा 

चारों तरफ़ कुछ फैल जायेगा। 

                3 

हरे हैं जंगल 

हरे हैं घाव 

हरे हैं दुख 

लेकिन सब काला-काला दीखता है 

(इन्हीं गोबरैलों के कारण)


काली हैं आँधियाँ 

काले हैं खून 

काले हैं मन 

लेकिन सब हरा-हरा दीखता है 

(इन्हीं गोबरैलों के कारण)  

                                       (दिसंबर, 1969) 


कवि - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 

संकलन - कुआनो नदी 

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1973 


यह किताब पापा की है। पहले पन्ने  पर उनके दस्तखत के नीचे तारीख 20.2.74 की है। 'गोबरैले' कविता के अंत में उनकी लिखावट में टिप्पणी दर्ज है - "बेचैनी, घनघोर अनास्था की कविता"। पहले पन्ने पर "जितनी विष्ठा/उतनी निष्ठा।" जहाँ है उस पर निशान लगा कर उन्होंने लिख रखा है - "धूमिल - 'भाषा की नाक पर रूमाल रखकर निष्ठा की तुक विष्ठा से मिला दूँ।' यह तुक सर्वेश्वर ने मिलाई।" आज सालों बाद उनकी लिखावट देखकर बहुत अच्छा लगा। ऐसा लगा कि वे हैं, पटना में हैं, डुब्बी मारकर लिख-पढ़ रहे हैं। 


गुज़रना (Guzarana by Vyomesh Shukl)

इतनी बीहड़ क्रूरता के साथ बसे देश में सिर्फ़ तुम्हारे घर के नीचे, अफ़सोस, कभी ट्रैफिक जाम नहीं लगता जिसमें फँसा जा सके। वहाँ से खयाल की तरह गुज़रना होता है। 


कवि - व्योमेश शुक्ल 

संकलन - काजल लगाना भूलना 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 2020  

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

आह्वान (Ahvaan by Ramgopal Sharma 'Rudra')


कोड़ते चलो जमीन कोड़ते चलो! --
                           कोड़ते चलो !!

इस जमीन में हजारों धन-भरे घड़े 
व्यर्थ हैं पड़े, समाज-पाप से गड़े :
बन्द हैं विकास, कोप-कैद में पड़े :
लाखों-लाख गुल शराब के लिए सड़े :
      वे गड़े लहू के घड़े फोड़ते चलो !
                                 कोड़ते चलो !!

सूख गई धार वहाँ धूर हुई रेत :
एक बियावाँ, जहाँ जिंदगी अचेत,
आते नहीं मेह, मधुर भूल गये हेत :
टाँड़-टाँड़ कास हँसे : बाग-बाग बेंत !
     मेह बनो, धार नई छोड़ते चलो !
                               कोड़ते चलो !!

सैंकड़ों पसार शाख, फैल सभी ओर,
भूमि में हजारों गोड़-गोड़ सूँड़-सोर,
लाखों-लाख पौधों के आधार छीन-छोर 
फैले सात-पाँच बड़े रख भूमि-चोर :
      भूमि के लिए इन्हें मरोड़ते चलो !
                                 कोड़ते चलो !!

राह बँधी, चाह बँधी, आह भी बँधी :
कोटि-कोटि बेपनाह जिंदगी बँधी :
कोठियाँ खुली, कि मुक्ति की मही बँधी :
सड़ गई वहाँ बयार तक बँधी-बँधी :
      वे सड़ाँध के तिलिस्म तोड़ते चलो ! 
                                    कोड़ते चलो !!
                                                 - 1951 (हिमशिखर)


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र' (1.11.1912 -19.8.1991)
किताब - रुद्र समग्र
संपादक - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

नानाजी 19 अगस्त, 1991 की रात कंधे पर बिजली का नंगा तार गिरने की वजह से चले गए थे, वरना कुछ और साल जरूर रहते। साहित्य को लेकर उनकी दीवानगी यह थी कि उसी शाम आयोजित कवि सम्मेलन में उनकी कविता की डायरी छूट गई थी तो रात को अपनी साइकिल से दुबारा उसे लाने निकल पड़े थे। पटना में अपने घर से थोड़ी ही दूर गए थे कि यह हादसा हो गया। 

आज अपूर्व ने नानाजी की यह कविता चुनी। सुनाई भी और बोले कि कितने शब्द हैं और उनका कैसा निस्संकोच इस्तेमाल है! 

सोमवार, 28 जुलाई 2025

हवा (By Mukesh Pratyush)

 (1) 

हवा मेरे खिलाफ होती 

तो सोचता - बहुत कठिन है इसके बीच से गुजरना 

किन्तु खिलाफ 

तो 

मैं हूँ - हवा के 

क्योंकि निर्विघ्न बहती इस हवा में 

बहुत कुछ है ऐसा, जरूरी है जिसका रोका जाना 


अब हवा है कि टकरा रही है मुझसे 

चोट-पर-चोट-पर-चोट करती मेरे सीने पर 

चाहती है : कर लूँ पीठ मैं भी उसकी ओर 

और उकड़ूँ बैठ जाऊँ औरों की तरह उसके सम्मान में 

और, यही मुझे मंजूर नहीं 

मंजूर नहीं मुझे - बिना छने हवा को अपने पास से गुजरने देना 


(2)

यह जो हवा को बीच राह रोक कर खड़ा हूँ मैं 

- सहता उसकी हुंकार 

- झेलता उसके दंश 

खिलाफ नहीं हूँ उसके बहाव के 

चाहता हूँ - बहे 

पूरे वेग से, निर्विघ्न बहे 

लेकिन यह नहीं कि 

उसके बहाव के कारण 

कोई तरुवर झुक जाए इतना कि चूमने लगे धरती 

कोई आदमी रख ले आँखों पर हाथ, उकड़ू बैठकर फेर ले पीठ 

और जैसे चाहे वैसे गुजर जाने दे उसे 


या किसी सागर का गहरा नीला जल 

लाँघ जाए तट की मर्यादा 

और भूल जाए 

कि जिधर से गुजरेगा उधर भी जीवन है : पूरा-का-पूरा जीवन 


(3)

सच कहती है हवा

वह कभी नहीं रही खिलाफ मेरे 


खिलाफ तो मैं ही चलता रहा उसके 


जानती है हवा

जहाँ-जहाँ से गुजरती है वह 

ऋणी हो जाता है सारा-का-सारा जीवन  

अब चाहे तो सब कुछ ज्यों-का-त्यों छोड़ चुपचाप गुजर जाए 

या कुछ उलट-पुलट दे : कुछ तहस-नहस कर दे 


ऐसे में कैसे बर्दाश्त करे हवा

एक अकेले, निहत्थे 

किन्तु सिर उठाए आदमी को 


कवि - मुकेश प्रत्यूष

संकलन - हाशिये के लिए जगह 

प्रकाशन - अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, द्वितीय संस्करण, 2022 

शनिवार, 26 जुलाई 2025

नूपुर आज बजाओ ना (Nupur aaj bajao na by Gopal Singh 'Nepali')


इतनी भी क्या देर कर रही, 

झटपट साज सजाओ ना !

मेरे सूने से आँगन में

नूपुर आज बजाओ ना !

यों तो वन-उपवन में उड़ती

है फूलों की धूल,

उपवन की क्यारी-क्यारी में

बिछे हुए हैं शूल

पर जब आता नव वसन्त है,

खिल उठते वनफूल,

सजती डाल, पवन चलता है

डाल-डाल पर झूल !

तुम भी जीवन की तरंग में

झूलो और झुलाओ ना!

गा-गाकर मधुगान कोकिले,

सरस वसंत बुलाओ ना !


2. 

यों तो पहले से टूटे हैं 

जग-वीणा के तार,

उत्सव बिना जगत सूना है,

लगता जीवन भार, 

पर जब आता पावस, होती 

फुहियों की बौछार,

सुन संगीत झमक उठता है 

मन्त्रमुग्ध संसार। 

प्यासे मेरे प्राण, प्रेम से 

जीवन-सुधा पिलाओ ना!

पढ़कर मन्त्र, छिड़क ममता-जल 

आओ आज जिलाओ ना!


3. 

शैल-शिखर पर उड़ते फिरते 

हैं मेघों के यान;

गूँजा करते हैं जंगल में 

निर्झरिणी के गान;

तिमिर-गहन निस्तब्ध रात्रि में 

कोकिल की मृदु तान,

निद्रा में, सपने में गूँजा 

करती है अनजान !

मेरे मन में, जीवन-वन में 

गूँजो और गुँजाओ ना!

जीवन की इस अर्द्ध-रात्रि में 

आओ, राह सुझाओ ना!


4. 

नियति-व्यंग्य से, प्रकृति रोष से 

मानव है भयभीत,

आँखों में आँसू भर कर वह

गाता दुःख के गीत

कठिन विरह अनुकूल जगत में

मधुर मिलन विपरीत,

जन्म-जन्म की हार और यह

दो-दो क्षण की जीत!

युग-युगव्यापी उत्पीड़न से

मेरे प्राण छुड़ाओ ना !

मेरे उर की दीप-शिखा में

आओ, नयन जुड़ाओ ना !


5. 

जग का गहर तिमिर हरता है – 

नव प्रभात रवि बाल,

डाल दिया करती मुट्ठी भर

संध्या अबिर गुलाल,

ज्योति तिमिर की वय:संधि में

जग का यौवन लाल,

चन्द्रकिरण बुनती है जलथल

दिग-दिगंत छवि जाल !

मेरे जीवन के निकुंज में

चन्द्रकिरण बन जाओ ना !

मेरी आंखों की पलकों पर

मधुर स्वप्न बन छाओ ना !


6. 

क्षणिक जगत, जीवन क्षण भंगुर, 

किंतु अमर है पीर!

सुख है चंचल, दुख है चंचल

प्राण-स्रोत गंभीर !

खेल रहे हैं हम-तुम दोनों

जन्म-मरण के तीर !

दोनों जग के बीच खिंची है

लंबी एक लकीर !

बहुत पुरानी इस लकीर को

आओ आज मिटाओ ना !

जन्म-ज्योति से मृत्यु-तिमिर की - 

सीमा दूर हटाओ ना!

प्यासे मेरे प्राण, प्रेम से

जीवन-सुधा पिलाओ न !


कवि - गोपाल सिंह 'नेपाली'

संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, दूसरी आवृत्ति - 2014 

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

नोटबन्दी (Demonetisation by Shruti Kushwaha)

मैं तितलियों का मुरीद था 

मेरा रंगो-बू से क़रार था

मेरे हौसले थे हवाओं में 

मुझे मछलियों से प्यार था

ये हाल ही की तो बात है 

कि तभी निज़ाम बदल गया 


मेरी ज़िन्दगी में सुकून था

मेरे मुँह में मेरी ज़बान थी

इसी मेज़ पर अख़बार था

यहीं जुगनुओं की दुकान थी 

ये हाल ही की तो बात है 

कि तभी निज़ाम बदल गया 


तेरा हुस्न था मेरा इश्क़ था

दुनिया में बस ये बवाल था

तेरे होंठ जैसे गुलाब हों 

उन्हें चूमने का ख़याल था

ये हाल ही की तो बात है 

कि तभी निज़ाम बदल गया 


न तो जाम से कोई ख़ौफ़ था

न चाय में कोई खोट था

मेरी जेब में वो हसीन सा 

उफ़्फ़ इक हज़ार का नोट था

ये हाल ही की तो बात है 

कि तभी निज़ाम बदल गया 


कवयित्री : श्रुति कुशवाहा 

संकलन : सुख को भी दुख होता है 

प्रकाशन: राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2025

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

फ़र्क़ पड़ता है (Farq padta hai by Krishna Mohan Jha)

सिर्फ़ बस्ती के उजड़ने से नहीं 

सिर्फ़ आदमी के मरने से नहीं 

सिर्फ़ गाछ के उखड़ने से नहीं 

एक पत्ती के झरने से भी फ़र्क़ पड़ता है

                                     - 2005 


कवि - कृष्णमोहन झा 

संकलन - तारों की धूल 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2025  

रविवार, 20 जुलाई 2025

लाल कार्ड (Laal card by Anuj Lugun)

 पगदण्डियों पर चलते हुए 

आँखों से उगता है लाल कार्ड

गरीबी और भूख का पहचान-पत्र 

हमारे झोले से झाँकता है 


बिना पहचान-पत्र के 

कोई काम नहीं होता है 

भूख को भी 

चाहिए होता है एक कार्ड


एटीएम कार्ड

क्रेडिट कार्ड

डेबिट कार्ड

उनकी शोभा है

जो भूख को 

विज्ञापन से पहचानते हैं 


हमारा तो है लाल कार्ड

पगदण्डियों पर चलते हुए 

सपनों में लहराता है 

किसी झण्डे की तरह 

किसी आवाज़ की तरह 

अपना दम ठोंकता है 

महाजन बहुत बिगड़ता है इससे। 

                                   - 16.03.2020 



कवि - अनुज लुगुन 

संकलन - पत्थलगड़ी 

प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, 2021 


प्याज एक संरचना है (Pyaaj ek sanrachana hai by Rajesh Joshi)


एक संरचना है प्याज। 
सैंकड़ों पत्तियाँ 
एक-दूसरे से गुँथी हुई 
एक संघटित घटना 
एक हलचल 
ज़मीन में फैलती हुई। 

एक संरचना है प्याज
जैसे अलाव के इर्द-गिर्द हमारे लोग 
जैसे दुपहर की छुट्टी में रोटी खाते 
खेतिहर मजूरों के टोले 
एक-दूसरे से बाँटते हुए 
रोटी, नमक और तकलीफ 

एक संरचना है प्याज
गुस्से और निश्चय में कसी हुई मुट्ठी 
एक गुँथी-बुनी 
संगठित रचना है
               प्याज।  

अपनी जड़ें 
और बीज 
अपने पेट में साथ लेकर 
पैदा होते हैं 
प्याज। 

कहीं भी रोप दो 
उग आएँगे 
और फैलेंगे 
झुंड-के-झुंड 
इकट्ठे जनमते हैं वे 
ज़मीन के भीतर,
नन्हे-नन्हे सफेद फूल 
और नाजुक हरी पत्तियाँ 
हवा में हिलाते हुए। 

पलक झपकते 
एक से दो 
और दो से दस होते हुए 
एक सघन समूह हो जाते हैं 
                             प्याज। 

एक संरचना अहै प्याज
ज़मीन के भीतर-भीतर 
एक मोर्चाबन्द कार्यवाही। 
कत्थई देह में रस भरी आत्मा 
और मिट्टी की गन्ध लिये 

जो 
अचानक 
फूट पड़ेगी 
एक दिन 
और फैल जाएगी 
सारे बाजार पर। 

एक संरचना है प्याज। 


कवि - राजेश जोशी 
संकलन - धूप घड़ी
प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2002

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

दीये सब बुझ चुके हैं (Deeye sab bujh chuke hain By Ashok Vajpeyi)

एक-एक कर 

दीये सब बुझ चुके हैं

एक मोमबत्ती कहीं बची थी 

जो अब ढूँढ़े नहीं मिल रही है। 


अँधेरा अपनी लम्बी असमाप्य गाथा का 

एक और पृष्ठ पलट रहा है 

जिसमें बुझे हुए दीयों का कोई ज़िक्र नहीं है। 


जब रोशनी थी, हम उसे दर्ज करना भूल गये 

और उसकी याद 

थोड़ी-सी उजास ला देती है 

जिसे अँधेरा फ़ौरन ही निगल जाता है। 

खिड़की से बाहर दिखाई नहीं देती 

पर हो सकता है 

भोर हो रही हो। 


हमारे हिस्से रोशनी भी आयी 

बहुत सारे अँधेरों के साथ-साथ 

और लग रहा है 

कि अँधेरा ही बचेगा आखिर में 

सारी रोशनियाँ बुझ जाएँगी। 


कवि - अशोक वाजपेयी 

संकलन - अपना समय नहीं 

प्रकाशन - सेतु प्रकाशन, नोएडा (उत्तर प्रदेश), 2023   

रविवार, 12 मई 2024

टेबुल क्लॉथ : एक भेंट (Tablecloth by Nandkishore Nawal)



आज से कई वर्ष पूर्व

तुमने मुझे जो टेबुल क्लॉथ भेंट किया था,

वह आज भी मेरी टेबुल पर ज्यों का त्यों बिछा है,


गंदा होने पर

न मैंने इसे धोबी को दिया,

न स्वयं ही साबुन से साफ किया -

यह सोचकर

कि इससे कहीं तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श धुल न जाय,

कि इससे कहीं तुनहारे अधरों का चिह्न न मिट जाय,

जिसे तुमने सुई से धागा काटते समय इस पर अंकित किया होगा ...


आज यह 'क्लॉथ' निःसंदेह कुछ म्लान पड़ गया है,

लेकिन कौन देखता है यह म्लानता ?

इस म्लानता से ऊपर,

मेरे मन पर चाँदनी-सा बिछा है

तुम्हारा यह टेबुल क्लॉथ,

जिसमें तुम्हारी उँगलियों और अधरों के तारक-चिह्न अंकित हैं ...

                                                                                - 10.01.59


कवि - नंदकिशोर नवल
संकलन - उदय-वेला
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2014


एक ऐसी कविता जिसमें माँ और पापा दोनों हैं। वह भी तब जब दोनों नहीं हैं। पापा को गए ठीक चार साल हुए। लगभग यही वक्त रहा होगा। माँ को गए तीन महीने होने को आए। सोच रही हूँ कि क्या वही टेबुल क्लॉथ बिछाकर दोनों आमने-सामने बैठे होंगे - पापा हमेशा की तरह लिखते-पढ़ते हुए और माँ उनका डिक्टेशन लेती हुई या उनका लिखा सुनती हुई! माँ हमारे सामने पापा की प्रेम कविताओं का ज़िक्र भी नहीं करती थी, मगर कभी कभी कुछ घटनाओं के बारे में बताती थी जो कविताओं में दर्ज मिलते थे। किशोरावस्था में मुझे यह सब देखकर बहुत मज़ा आता था। आज जब संग्रह उठाया तो देखा कि पापा का समर्पण जीवन-संगिनी को ही है। इस संग्रह में संजय शांडिल्य और पापा की कविताएँ हैं।

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

रोज शाम को (Roj shaam ko by Ramgopal Sharma 'Rudra')

रोज शाम को मन थकान से भर जाता है !!

बस मरु ही मरु, आँख जहाँ तक जाए :

कोई छाँव नहीं कि जहाँ सुस्ताए :

उड़ता ही रह जाता है जो पंछी,

क्या लेकर अपने खोंते में आए !

रोज  शाम को मन उफान से भर जाता है !!


रोज-रोज  एक ही बात होती है - 

रोज पाँख से आँख मात होती है!

लेकिन, इतनी दूर निकल जाता हूँ -

आते-आते साँझ रात होती है !

रोज शाम को मन उड़ान से भर जाता है !

                                                       - 1955 


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र
संपादक - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

नानाजी के जन्मदिन पर उनको याद करते हुए उनकी कविताएँ पढ़ रही हूँ। लगभग 70-100 साल पुरानी रचनाओं के मूड को देखकर लग रहा है कि अभी का मूड है।  

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

धुरी पर (Dhuree par by Gyanendrapati)

धर्म की धुरी पर 

घूम रही है पृथ्वी 

मर्म की धुरी पर 

जीवन की परिक्रमा कर रहा है कवि। 


कवि - ज्ञानेन्द्रपति 

संग्रह - कविता भविता 

प्रकाशन - सेतु प्रकाशन, दिल्ली, 2020 

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

दोस्ती (Dosti by Sudhanshu Firdaus)

औंधे पड़े आकाश ने 

सीधे मुँह लेटे आदमी से कहा :

'कितने अकेले हो तुम'


एक फुसफुसाहट हुई 

तुम भी तो !

फिर दोनों हँसने लगे 



कवि - सुधांशु फ़िरदौस 

संग्रह - अधूरे स्वाँगों के दरमियान 

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2020 

शनिवार, 2 जुलाई 2022

राजनीतिक करवटें, 1948 (Rajneetik karvatein, 1948 by Shamsherbahadur Singh)

(बतर्ज़ कव्वाली)

हाय लीडर दुरंगी न कम गुम हुए !!

बीच धारा अगम थी - गुड़म् गुम हुए !!


'इन्क़लाबी' हमारे न कम गुम हुए :

लेके साइकिल हमारी निगम गुम हुए !!


हमने देखा था उनको इसी मोड़ पर !

एकदम आए वो ! एकदम गुम हुए !!


ऐसे खो गए जाके आफ़िस में हम :

अपने कानों पर रक्खे क़लम गुम हुए !!


बोली बरसात में इन्क़लाबी दुल्हन :

'ले के छाता हमारा बलम गुम हुए !'


रक्खो एक् सौ चवालिस दफ़ा फूँक फूँक !

वर्ना रक्खा जो अगला कदम, गुम हुए !!


जैसे होश आज बंगाल सरकार के :

हम तो ऐसे, तुम्हारी क़सम, गुम हुए !!


ऐसी आँधी चले ... हम भी पूछें - कहाँ,

वो जो ढाते थे जुल्मों-सितम, गुम हुए ??


आ रहे हैं मसीह्-ओ-खिज़र झींकते :

हे ! अब इन्क़लाबों में हम गुम हुए !!


क्या गुरुजी मनुSजी को ले आयेंगे ?

हो गए, जिनको लाखों जनम गुम हुए !! 


अपनी किस्मत को यों रो रहे हैं चियांग - 

रह गए हम लँडूरे, सनम गुम हुए !!


किस एटम् गर से पूछे कि - इन्सान के 

हीरोशिमा में कितने अदम गुम हुए !?


हमने ज़ेरे-ज़मीं, की तरक़्क़ी पसन्द :

ले के शमशेर अपनी क़लम गुम हुए !!


आज - सन् 1948-49 के ज़माने में 

चियांग - चियांग-काई-शेक, जिन्हें फ़ारमूसा (ताइवान) में शरण लेनी पड़ी  

ज़ेरे-ज़मीं - 'अंडर ग्राउंड'


शायर - शमशेरबहादुर सिंह 

संकलन - सुकून की तलाश 

संपादन - रंजना  अरगड़े 

प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1998 




शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

उक्ति (Ukti by Siddhinath Mishra)

छक-छककर पी 

फिर भी, 

भरा न जी;

वह तृषा - 

          वही तो तृषा। 

रंग, तान, रस, गंध, स्पर्श से 

जुड़ा गए मन-प्राण;

वह तृप्ति - 

           वही तो तृप्ति। 

हटें न आँखें,

जनम-अवधि-भर 

चाहे जितनी बार निहारूँ;

वह रूप - 

           वही तो रूप। 

सुख-दुख में 

समरूप भाव-

मृत्यु-भय से ं डरे;

वह जीवन -

             वही तो जीवन। 

बार-बार की पढ़ी हुई 

तो भी 

फिर-फिर पढ़ने को मन खींचे;

वह कविता - 

             वही तो कविता। 



कवि - सिद्धिनाथ मिश्र
संग्रह - द्वाभा
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2010