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शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

इक-इक पल हम पर भारी है (by Habeeb 'Jalib')

लोगों ही का ख़ूँ बह जाता है, होता नहीं कुछ सुल्तानों को 
तूफ़ां भी नहीं ज़हमत देते उनके संगीं ऐवानों को 

हर रोज़ क़यामत ढाते हैं तेरे बेबस इनसानों पर 
ऐ ख़ालिक़े-इनसाँ, तू समझा अपने ख़ूनी इनसानों को 

दीवारों में सहमे बैठे हैं, क्या ख़ूब मिली है आज़ादी 
अपनों ने बहाया ख़ूँ इतना, हम भूल गए बेगानों को 

इक-इक पल हम पर भारी है, दहशत तक़दीर हमारी है 
घर में भी नहीं महफ़ूज़ कोई, बाहर भी है ख़तरा जानों को 

ग़म अपना भुलाएँ जाके कहाँ,  हम हैं और शहरे-आहो-फ़ुग़ाँ 
हैं शाम से पहले लोग रवाँ अपने-अपने ग़मख़ानों  को 

निकलें कि न निकलें इनकी रज़ा, बंदूक़ है इनके हाथों में 
सादा थे बुज़ुर्ग अपने 'जालिब', घर सौंप गए दरबानों को  

संगीं ऐवानों को = पथरीले महलों को 
ख़ालिक़े-इनसाँ = इनसान को बनानेवाला 
शहरे-आहो-फ़ुग़ाँ = रुदन का नगर 
रवाँ = गतिमान 

शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

सोमवार, 9 मार्च 2015

जी देखा है, मर देखा है (Jee dekha hai, mar dekha hai by Habeeb 'Jalib')

जी देखा है, मर देखा है
हमने सब कुछ कर देखा है

बर्गे-आवारा की सूरत 
रेंज-ख़ुश्को-तर देखा है

ठंडी आहें भरनेवालों 
ठंडी आहें भर देखा है

तिरी ज़ुल्फ़ों का अफ़साना 
रात के होंटों पर देखा है

अपने दीवानों का आलम 
तुमने कब आकर देखा है !

अंजुम की ख़ामोश फ़िज़ा में 
मैंने तुम्हें अकसर देखा है

हमने बस्ती में 'जालिब'
झूठ का ऊँचा सर देखा है। 



शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'
संपादक - नरेश नदीम 
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010 

शनिवार, 26 जुलाई 2014

बगिया लहूलुहान (Bagiya lahuluhan by Habeeb 'Jalib)


हरियाली  को  आँखें  तरसें,  बगिया  लहूलुहान 
प्यार के गीत  सुनाऊँ किसको, शहर हुए वीरान 
                                           बगिया लहूलुहान 

डसती  हैं  सूरज  की  किरनें,  चाँद  जलाए जान 
पग-पग मौत के गहरे साये, जीवन मौत समान 
चारों  ओर  हवा  फिरती  है लेकर  तीर - कमान 
                                           बगिया लहूलुहान 

छलनी हैं कलियों के सीने, ख़ून में लतपत पात 
और न  जाने कब तक होगी  अश्कों की बरसात 
दुनियावालो  कब  बीतेंगे  दुख  के ये दिन - रात 
ख़ून  से  होली  खेल   रहे  हैं  धरती  के  बलवान 
                                           बगिया लहूलुहान 




शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'
संपादक - नरेश नदीम 
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010 

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

दहशत के साये में (Dahshat ke saaye mein by Habeeb 'Jalib)


ज़िन्दा हैं एक उम्र से दहशत के साये में 
दम घुट रहा है अह्ले-इबादत के साये में 

हमको कहाँ तसव्वरे-जानाँ हुआ नसीब 
बैठे हैं हम कहाँ कभी फुरसत के साये में 

छोड़ा न हमने नक़्श कोई राहे-इश्क़ में 
गुज़री तमाम उम्र नदामत के साये में 

बिछड़े हुए दयारे-दिलो-जाँ के दोस्तो 
पूछो न दुख सहे हैं जो ग़ुरबत के साये में 

ऐ रहरवाने-राहे-सेहर, हमको दाद हो 
लेते हैं साँस ज़ुल्म की ज़ुल्मत के साये में 

हम आएँगे तो आएगा वो अह्दे-ख़ुशगवार 
गुज़रेगी जब हयात मुहब्ब्त के साये में 


अह्ले-इबादत = धार्मिक लोग  
तसव्वरे-जानाँ = प्रियजन की कल्पना 
नक़्श = चिह्न 
नदामत = शर्मिन्दगी 
दयारे-दिलो-जाँ = हृदय और प्राण की बस्ती 
ग़ुरबत = परदेस 
रहरवाने-राहे-सेहर = सुब्ह की राह के राहगीर 
ज़ुल्मत = अन्धकार 
अह्दे-ख़ुशगवार = सुन्दर युग 
हयात = जीवन 


शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

बुधवार, 21 अगस्त 2013

नज़रों से गिरानेवाले (Nazron se giranewale by Habeeb 'Jalib')

हमको नज़रों से गिरानेवाले 
ढूँढ़ अब नाज़ उठानेवाले 

छोड़ जाएँगे कुछ ऐसी यादें 
रोएँगे हमको ज़मानेवाले 

रह गए नक़्श हमारे बाक़ी 
मिट गए हमको मिटानेवाले 

मंज़िले-गुल का पता देते हैं 
राह में ख़ार बिछानेवाले

इन ज़मीनों पे गुहर बरसेंगे 
ऐसे कुछ अब्र हैं छानेवाले

देख वो सुब्ह का सूरज निकला 
मुस्कुरा अश्क बहानेवाले !

आस में बैठे हैं जिनकी 'जालिब'
वो ज़माने भी हैं आनेवाले 

ख़ार = काँटे    गुहर = मोती  अब्र = बादल


शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

शनिवार, 20 जुलाई 2013

तेरी गली के लोग (Teri gali ke log by Habeeb 'Jalib')



तू रंग है, ग़ुबार हैं तेरी गली के लोग
तू फूल है, शरार हैं तेरी गली के लोग
शरार = चिंगारी 

तू रौनके-हयात है, तू हुस्ने कायनात
उजड़ा हुआ दयार हैं तेरी गली के लोग
रौनके-हयात = जीवन की रौनक

हुस्ने कायनात = सृष्टि का सौन्दर्य

तू पैकरे-वफ़ा है, मुजस्सम ख़ुलूस है
बदनामे-रोज़गार हैं तेरी गली के लोग
पैकरे-वफ़ा = वफ़ा की साकार मूर्ति

बदनामे-रोज़गार = दुनिया भर में बदनाम

रौशन तेरे जमाल से हैं मेह्रो-माह भी
लेकिन नज़र पे बार हैं तेरी गली के लोग
मेह्रो-माह = सूरज-चाँद    बार = बोझ

देखो जो गौर से तो ज़मीं से भी पस्त हैं
यूँ आसमाँ-शिकार हैं तेरी गली के लोग

फिर जा रहा हूँ तेरे तबस्सुम को लूट कर
हरचंद होशियार हैं तेरी गली के लोग
तबस्सुम = मुस्कान   हरचंद = हालाँकि    

खो जाएँगे सेहर के उजालों में आख़िरश
शमए-सरे-मज़ार हैं तेरी गली के लोग
सेहर = सुबह    आख़िरश = आख़िरकार

शमए-सारे-मज़ार = क़ब्र पर जल रही शमा

शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

मंगलवार, 25 जून 2013

जुल्म रहे और अम्न भी हो (Julm rahe aur amn bhi ho by Habeeb 'Jalib')


जुल्म रहे और अम्न भी हो,
क्या मुमकिन है, तुम ही कहो ! 

हँसती गाती रौशन वादी 
तारीकी में डूब गई 
बीते दिन की लाश पे ऐ दिल 
मैं रोता हूँ, तू भी रो l 

जुल्म रहे और अम्न भी हो,
क्या मुमकिन है, तुम ही कहो ! 

हर धड़कन पर खौफ़ के पहरे 
हर आंसू पर पाबन्दी 
ये जीवन भी क्या जीवन है 
आग लगे इस जीवन को l 

जुल्म रहे और अम्न भी हो,
क्या मुमकिन है, तुम ही कहो ! 

अपने  होंठ सिए हैं तुमने 
मेरी ज़बाँ को मत रोको 
तुमको अगर तौफ़ीक़ नहीं तो 
मुझको ही सच कहने दो l 

जुल्म रहे और अम्न भी हो,
क्या मुमकिन है, तुम ही कहो ! 


तारीकी = अन्धकार        तौफ़ीक़ = सामर्थ्य



शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

रविवार, 19 मई 2013

सहाफ़ी से (Sahafi se by Habeeb 'Jalib')


क़ौम की बेहतरी का छोड़ ख़याल 
फ़िक्रे-तामीरे-मुल्क दिल से निकाल 
तेरा परचम है तेरा दस्ते-सवाल 
बेज़मीरी का और क्या हो मआल !
             अब क़लम से इज़ारबन्द ही डाल !

सहाफ़ी = पत्रकार              फ़िक्रे-तामीरे-मुल्क = राष्ट्र-निर्माण की चिन्ता 
दस्ते-सवाल = याचना का हाथ        मआल = परिणाम 

तंग कर दे ग़रीब पर ये ज़मीं 
ख़म ही रख आस्ताने-ज़र पे जबीं 
ऐब का दौर है, हुनर का नहीं 
आज हुस्ने-कमाल को है ज़वाल 
              अब क़लम से इज़ारबन्द ही डाल !

ख़म = नत                                    आस्ताने-ज़र = धनदौलत के आस्ताने पर 
हुस्ने-कमाल = कौशल का सौन्दर्य      ज़वाल = पतन                          

क्यों यहाँ सुब्हे-नौ की बात चले 
क्यों सितम की सियाह रात ढले 
सब बराबर हैं आसमाँ के तले 
सबको रजअतपसन्द कहकर टाल 
              अब क़लम से इज़ारबन्द ही डाल !

सुब्हे-नौ = नई सुब्ह           रजअतपसन्द = प्रतिक्रियावादी 

नाम से पेशतर लगा के अमीर 
हर मुसलमान को बनाके फ़क़ीर 
क़स्रो-ऐवाँ में हो क़यामपज़ीर 
और ख़ुत्बों में दे उमर की मिसाल 
              अब क़लम से इज़ारबन्द ही डाल !

पेशतर = पहले        क़स्रो-ऐवाँ में हो क़यामपज़ीर = महलों में निवासकर 
ख़ुत्बों = प्रवचन     उमर = इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा जिनकी सादगी मशहूर है 

आमरीयत की हमनवाई में 
तेरा हमसर नहीं ख़ुदाई में 
बादशाहों की रहनुमाई में 
रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल 
               अब क़लम से इज़ारबन्द ही डाल !

आमरीयत = निरंकुशता           हमनवाई = समर्थन 
हमसर = बराबरी का               ख़ुदाई = सृष्टि 

लाख होठों पे दम हमारा हो 
और दिल सुब्ह का सितारा हो 
सामने मौत का नज़ारा हो 
लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल 
                अब क़लम से इज़ारबन्द ही डाल ! 





शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010