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मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

शरत्पूर्णिमा (Sharatpurnima by Ajneya)


चाँद चितेरा 
आँक रहा है शारद नभ में 
एक चीड़ का खाका l 



कवि - अज्ञेय 
संकलन - अरी ओ करुणा प्रभामय 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, प्रथम संस्करण -1959 

रविवार, 31 अगस्त 2014

कहो राम, कबीर (Kaho Ram, Kabeer by Ajneya)


न कहीं से 
न कहीं को
         पुल  
न किसी का 
न किसी पे 
         दिल 
न कहीं गेह 
न कहीं द्वार 
         सके जो खुल 
न कहीं नेह 
न नया नीर 
         पड़े जो ढुल … 
यहाँ गर्द-गुबार 
न कहीं गाँव 
न रूख 
न तनिक छाँव 
न ठौर 
यहाँ धुन्ध 
यहाँ गैर सभी 
          गुमनाम 
यहाँ गुमराह 
          सभी पैर 
यहाँ अन्ध 
यहाँ - न कहीं - यहाँ दूर … 
कहो राम,
            कबीर !


कवि - अज्ञेय 
संकलन - नदी की बाँक पर छाया 
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, 1981  

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

प्रथम किरण (Pratham kiran by Ajneya)

भोर की 
प्रथम किरण 
          फीकी :
अनजाने 
जागी हो 
याद 
         किसी की -

अपनी
मीठी 
        नीकी !
धीरे-धीरे 
उदित 
रवि का 
लाल-लाल 
        गोला 
चौंक कहीं पर 
छिपा 
मुदित 
बन-पाखी 
        बोला 
दिन है 
जय है 
यह बहु-जन की :

प्रणति 
लाल रवि,
ओ जन-जीवन 
लो यह 
मेरी 
सकल साधना 
         तन की 
         मन की -

वह बन-पाखी 
जाने गरिमा 
महिमा 
मेरे छोटे 
चेतन 
         छन की !



कवि - अज्ञेय 
संकलन - चुनी हुई कविताएं 
प्रकाशक - राजपाल एंड सन्ज, दिल्ली, 1987 



शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

चुप-चाप (Chup-chap by Ajneya)

         चुप-चाप   चुप-चाप 
झरने का स्वर 
         हम में भर जाय,
चुप-चाप    चुप-चाप 
शरद की चाँदनी 
        झील की लहरों पर तिर आय,
चुप-चाप   चुप-चाप 
जीवन का रहस्य 
जो कहा न जाय, हमारी 
        ठहरी आँखों में गहराय,
चुप-चाप   चुप-चाप 
हम पुलकित विराट में डूबें 
         पर विराट हम में मिल जाय _

चुप-चाप     चुप-चाS S प …  


कवि -  अज्ञेय     
संकलन - चुनी हुई कविताएं     
प्रकाशक - राजपाल एंड सन्ज, दिल्ली, 1987

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

सोन-मछली (Son-machhalee by Ajneya)



           हम निहारते रूप,
काँच के पीछे 
हाँप रही है मछली l 
रूप-तृषा भी 
(और काँच के पीछे)
है जिजीविषा l 

कवि -  अज्ञेय   
संकलन - चुनी हुई कविताएं   
प्रकाशक - राजपाल एंड सन्ज, दिल्ली, 1987

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

देहरी पर दिया (Dehri par diya by Ajneya)

देहरी पर दिया 
बाँट गया प्रकाश
कुछ भीतर कुछ बाहर :
बँट गया हिया -
कुछ गेही कुछ यायावर l
हवा का हल्का झोंका 
कुछ सिमट, कुछ बिखर गया 
लौ काँप कर फिर थिर हुई :
मैं सिहर गया l

कवि - अज्ञेय  संकलन - ऐसा कोई घर आपने देखा है  प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

अलस (Alas by Ajneya)


भोर
अगर थोड़ा और अलसाया रहे,
मन पर
छाया रहे
थोड़ी देर और
यह तन्द्रालस चिकना कोहरा ;
कली
थोड़ी देर और
डाल पर अटकी रहे,
ओस की बूँद
दूब पर टटकी रहे ;
और मेरी चेतना अकेन्द्रित भटकी रहे
इस सपने में जो मैंने गढ़ा है
और फिर अधखुली आँखों से
तुम्हारी मुँदी पलकों पर पढ़ा है
तो -
तो किसी का क्या जाये ?
कुछ नहीं l
चलो, इस बात पर
अब उठा जाये l


कवि - अज्ञेय
संकलन - सागर-मुद्रा (1967-1969 की कविताएँ)
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली, 1970

रविवार, 29 सितंबर 2013

अलाव (Alaav by Ajneya)


           माघ : कोहरे में अंगार की सुलगन 
अलाव के ताव के घेरे के पार 
सियार की आँखों की जलन 
सन्नाटे में जब-तब चिनगी की चटकन 
सब मुझे याद है ! मैं थकता हूँ 
पर चुकती नहीं मेरे भीतर की भटकन !


कवि -  अज्ञेय 
संकलन - चुनी हुई कविताएं 
प्रकाशक - राजपाल एंड सन्ज, दिल्ली, 1987

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

ओ साँइयाँ (O saniyan by Ajneya)


झील पर अनलिखी 
लम्बी हो गयीं परछाइयाँ
गहन तल में 
कँपी यादों की सुलगती झाँइयाँ 
आह ! ये अविराम अनेकरूप विदाइयाँ !
इस व्यथा से ओट दे ओ साँइयाँ !


कवि - अज्ञेय 
संकलन - ऐसा कोई घर आपने देखा है 
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986

आज विनोद रैना को भी विदा कर आए हम !

शनिवार, 13 जुलाई 2013

साँझ के सारस (Sanjh ke saaras by Ajneya)

घिर रही है साँझ 
हो रहा अब समय 
घर कर ले उदासी l 

तौल अपने पंख, सारस दूर के 
इस देश में तू है प्रवासी l 

रात ! तारे हों न हों 
रवहीनता को सघनतर कर दे अँधेरा 
तू अदीन, लिये हिये में 
चित्र ज्योति प्रकाश का 
करना जहाँ तुझ को सवेरा l 

थिर गयी जो लहर, वह सो जाय 
तीर-तरु का बिम्ब भी अव्यक्त में खो जाय 
मेघ, मरू, मारुत, मरुण अब आय जो सो आय !

कर नमन बीते दिवस को, धीर !
दे उसी को सौंप 
यह अवसाद का लघु पल 
निकल चल ! सारस अकेले !


कवि - अज्ञेय संकलन - ऐसा कोई घर आपने देखा है प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986


सोमवार, 8 अप्रैल 2013

गान्धारी (Gandhari by Ajneya)


कितने प्रसन्न रहते आये हैं
युग-युग के धृतराष्ट्र, सोच कर
गान्धारी ने पट्टी बाँधी थी
होने को सुहागिन
     उन के अभाग की l
आह ! देख पाते वे -
मगर यही तो था उन का असली अन्धापन ! -
गान्धारी ने लगातार उन के अन्याय सहे जाने से
अत्याचारों के प्रति उन के
उदासीन स्वीकार भाव के
लगातार साक्षी होने से
अच्छा समझा था अन्धे हो जाना !

वह अन्धापन
नहीं वशंवद
पुरुष मात्र के अन्ध अहं का
उस का तिरस्कार है :
नारी की नकार मुद्रा
ज्वाला ढँकी हुई
यों अनबुझ l


कवि - अज्ञेय
संकलन - ऐसा कोई घर आपने देखा है
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986

शनिवार, 16 मार्च 2013

भाषा : पहचान (Bhasha : Pahchan by Ajneya)

एक भिखारी ने 
दूसरे भिखारी को सूचना दी :
उस द्वार जाओ, वहाँ भिक्षा ज़रूर मिलेगी l 

बड़े काम की चीज़ है भाषा : उस के सहारे 
एक से दूसरे तक 
जानकारी पहुँचायी जा सकती है l 
वह सामाजिक उपकरण है l 

पर नहीं l उस से भी बड़ी बात है यह
कि भाषा है तो 
एक भिखारी जानता है कि वह दूसरे से जुड़ा हुआ है 
क्यों कि वह उस जानकारी का 
साझा करने की स्थिति में है l 
वह मानवीय उपलब्धि है l 

हम सभी भिखारी हैं l 
भाषा की शक्ति 
यह नहीं कि उस के सहारे 
सम्प्रेषण होता है :
शक्ति इस में है कि उस के सहारे 
पहचान का वह सम्बन्ध बनता है जिस में 
सम्प्रेषण सार्थक होता है l 


कवि - अज्ञेय 
संकलन - नदी की बाँक पर छाया (कविताएँ 1977-81)
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली,  1981
 

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

एक छाप (Ek chhaap by Ajneya)

एक छाप रंगों की एक छाप ध्वनि की 
एक सुख स्मृति का - एक व्यथा मन की l 


कवि - अज्ञेय 
संग्रह - सदानीरा, संपूर्ण कविताएं - 1
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1986


आज के दिन  - एक व्यथा मन की !

शनिवार, 17 नवंबर 2012

सागर-मुद्रा (Sagar-mudra by Ajneya)


यों मत छोड़ दो मुझे, सागर,
कहीं मुझे तोड़ दो, सागर,
                     कहीं मुझे तोड़ दो !
मेरी दीठ को और मेरे हिये को,
मेरी वासना को और मेरे मन को,
मेरे कर्म को और मेरे मर्म को,
मेरे चाहे को और मेरे जिये को
मुझ को और मुझ को और मुझ को
                      कहीं मुझ से जोड़ दो !
यों मत छोड़ दो मुझे, सागर,
                       यों मत छोड़ दो !





कवि - अज्ञेय
संकलन - सागर-मुद्रा (1967-1969 की कविताएँ)
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली, 1970

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

जहाँ सुख है (Jahan sukh hai by Ajneya)


जहाँ सुख है 
वहीं हम चटक कर 
टूट जाते हैं बारम्बार
जहाँ दुखता है
वहाँ पर एक सुलगन   
पिघला कर हमें 
फिर जोड़ देती है 


कवि - अज्ञेय 
संकलन - ऐसा कोई घर आपने देखा है  
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस,दिल्ली, 1986

सोमवार, 6 अगस्त 2012

हिरोशिमा (Hiroshima by Ajneya)



एक दिन सहसा
सूरज निकला 
अरे क्षितिज पर नहीं,
नगर के चौक :
धूप बरसी
पर अंतरिक्ष से नहीं,
फटी मिट्टी से.

छायाएँ मानव-जन की 
दिशाहीन
सब ओर पड़ीं - वह सूरज
नहीं उगा था पूरब में, वह 
बरसा सहसा
बीचो-बीच नगर के :
काल-सूर्य के रथ के
पहियों के ज्यों अरे टूट कर
बिखर गये हों
दसों दिशा में.

कुछ क्षण का वह उदय-अस्त !
केवल एक प्रज्वलित क्षण की
दृश्य सोख लेने वाली दोपहरी.
फिर ?
छायाएँ मानव जन की 
नहीं मिटीं लम्बी हो-होकर
मानव ही सब भाप हो गये.
छायाएँ तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्थरों पर 
उजड़ी सड़कों की गच पर.

मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बना कर सोख गया.
पत्थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है.
               

कवि - अज्ञेय 
संकलन - सदानीरा, संपूर्ण कविताएँ-2
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986

दिल्ली-इलाहाबाद-कलकत्ता (रेल में) 10 -12 जनवरी, 1959 को लिखी गई कविता.

रविवार, 5 अगस्त 2012

धड़कन-धड़कन (Dhadakan-dhadakan by Ajneya)



धड़कन-धड़कन-धड़कन -
दायीं, बायीं, कौन आँख की फड़कन -
मीठी कड़वी तीखी सीठी
कसक-किरकिरी किन यादों की रड़कन ? 
उंह ? कुछ नहीं, नशे के झोंके-से में 
स्मृति के शीशे की तड़कन ?
                         -अगस्त 1964



कवि - अज्ञेय 
संकलन - सदानीरा, संपूर्ण कविताएँ-2
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986