क्या फ़ायदा फ़िक्रे-बेशो-कम से होगा
हम क्या हैं जो कोई काम हम से होगा
जो कुछ कि हुआ हुआ 'करम' से तेरे
जो कुछ होगा तेरे करम से होगा
दिल को सरे-बाज़ारे-जहां कर न उचाट
जिस तरह बने सूदो-ज़ियां में दिन काट
ऐ 'ज़ौक़' फ़लक के जब हैं बारह हिस्से
सौदा न हो क्यों ज़ेरे-फ़लक बारह-बाट
आंख उसकी नशे में जब गुलाबी हो जाय
सूफ़ी उसे देखे तो शराबी हो जाय
दिखलाये जो वह रूए-किताबी ऐ 'ज़ौक़'
सब मदरसा काफ़िरे-किताबी हो जाय
जिन दांतों से हंसते थे हमेशा खिल-खिल
अब दर्द से हैं वही रुलाते हिल-हिल
पीरी में कहां अब वे जवानी के मज़े
ऐ 'ज़ौक़' बुढ़ापे से हैं दांता-किल-किल
करम = कृपा सूदो-ज़ियां = हानि-लाभ
रूए-किताबी = किताबी चेहरा पीरी = बुढ़ापा
शायर : ज़ौक़
संकलन : ज़ौक़ (प्रकाश पंडित द्वारा संपादित लोकप्रिय शायर और उनकी शायरी शृंखला, नया संस्करण)
सह-संपादन : सुरेश सलिल
प्रकाशन : राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, 2017
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