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शनिवार, 21 मार्च 2015

केवल यही (It's not more by Eliseo Diego translated in Hindi)


कविता कुछ नहीं है 
सिवा एक प्राचीन स्टोव की चढ़ती 
परछाईं में बातचीत के 
जब सब चले गए हों,
और दरवाज़े के बाहर 
अभेद्य वन सरसरा रहे हों। 

कविता केवल कुछ भ्रम है 
जिनसे किसी को प्यार हो,
और जिनका क्रम समय ने बदल दिया हो,
जिनमें कि अब 
केवल एक संकेत,
एक अनभिव्यक्त आशा,
वास करती हो। 

कविता और कुछ नहीं है 
सिवा आनंद के, परछाइयों में 
बातचीत के,
जबकि और सब कुछ विदा ले चुका हो 
और केवल खामोशी हो। 



क्यूबाई कवि - एलिसेओ दिएगो (2.7.1920 - 1.3.1994)
स्पैनिश से अंग्रेज़ी अनुवाद - एलिसेओ दिएगो
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 

रविवार, 14 दिसंबर 2014

बच्चा और उसका सोने का कमरा (Bachcha aur uska sone ka kamra by Eliseo Diego)


तुम आज रात डरे हुए हो :
चोर बाहर हैं 
पत्तियों में छिपे 
खिड़की में झाँकते। 
           शीशे से सोना फैलता है 
परछाईं में। 
           और चोर 
पत्तियों में हैं,
एक भीड़, एक अनंतता,
दूसरी ओर के 
नम निभृत स्थान में। 

क्यूबाई कवि - एलिसेओ दिएगो ( 2.7.1920 – 1.3.1994)
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 


दिसंबर आ गया है।  खुर्शीद से अंतिम बातचीत इन्हीं दिनों में हुई थी, यह बात बार-बार कौंध रही है। अभी जो भी कविता पढ़ रही हूँ उसके अर्थ में खुर्शीद झाँक रहे हैं। लगता है कि जीवन पर एक छाया सी पड़ गई है।