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शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

छठ का गीत (Chhath song)


केरवा फरए घौंदसए ऊपर सुग्गा मंड़राय 
मारवउ रे सुगवा धनुख सए सुगा खँसु मुरछाय
उजे केरवा जनु कोइ छुवय छठी माता ला 
छठी माइ के जएतइन सनेस अरग देवय ला 
उजे काँचए बाँस केर बंहिया रेशमक लागल डोर 
भरिया होयतन कओन भइया भर लय पहुँचाय
बाटहिं पुछथिन बटोहिया भइया ई भार केकर जाय  
आहे छठि अइसन ठकुराइन ई भार हुनकर जाय
नेमुआ फरए घौंदसए ऊपर सुग्गा मंड़राय 
मारवउ रे सुगवा धनुख सए सुगा खँसु मुरछाय
उजे नेमुआ जनु कोइ छुवय छठी माता ला 
छठी माइ के जएतइन सनेस अरग देवय ला 
उजे काँचए बाँस केर बंहिया रेशमक लागल डोर 
भरिया होयतन कओन भइया भर लय पहुँचाय
बाटहिं पुछथिन बटोहिया भइया ई भार केकर जाय 
आहे छठि अइसन ठकुराइन ई भार हुनकर जाय


घौंद के घौंद केला फला है. उसे चखने के लिए सुग्गा मंडरा रहा है. रे सुग्गे, मैं तुम्हें तीर से मारूँगी और तुम्हें मूर्च्छा आ जाएगी. केले के घौंद को कोई नहीं छूये. वह छठी माँ के लिए सुरक्षित है. अर्घ्य देने के लिए वह छठी माँ को सौगात जायगा. काँच बाँस की बहँगी है और उसमें रेशम की डोर लगी है. मेरे अमुक भाई भरिया होंगे और छठी माँ को सौगात पहुँचायेंगे. रास्ते में पथिक पूछेंगे कि यह भार किसका है. तब मेरे अमुक भाई कहेंगे - "छठी-सी यशस्विनी हैं. उन्हीं का यह भार है." ...इसी तरह केला, नींबू आदि फलों का नाम लेकर गीत आगे बढ़ता है. गीत में बारी-बारी से भाइयों और बहनों का नाम लेते जाते हैं.

यह गीत तो मैथिली का है. इसको और इसके जैसे बीसियों गीत माँ बज्जिका में गाती थी. आज मेरा मन कर रहा था कि माँ से कहूँ कि फोन पर ही छठ का गीत सुना दो, लेकिन उसकी खाँसी सुनकर मैंने कहा नहीं.

संग्रह - मैथिली लोकगीत

संग्रहकर्ता और संपादक - राम इकबाल सिंह 'राकेश'

प्रकाशक - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग


शनिवार, 21 सितंबर 2013

तिरहुति (Tirhuti, Maithili folksong)

कमल नयन मनमोहन रे 
कहि गेलाह अनेके 
कतेक दिवस हम खेपब रे 
हुनि वचनक टेके
जहँ-जहँ हरिक सिंहासन रे 
आसन तेहि ठामे 
तहाँ कते व्रजनागरि रे 
लय-लय हरिनामे 
आँगन मोर लेखे विजुवन रे 
भेल दिवस अन्हारे 
सेज लोटय कारि नागिन रे 
कोना सहु दुख-भारे 
मलिन वसन तन भूषण रे 
शिर फूजल केशे 
नागरि पुछथि पथिक सँ रे 
कहु हरिक उदेशे 
के पाती लै जायत रे 
जहाँ बसे नन्दलाले 
लोचन हमर विकल भेल रे 
छाती देल शाले 
'साहेबराम' रमाओल रे 
सपना संसारे 
फेरि नहिं एहि जग जनमब रे 
मानुष अवतारे 

कमलनयन मनमोहन अनेक प्रकार की सांत्वना दे कर चले गए l 
उनके वचन पर निर्भर रह कर मैं अब और कितने दिन उनके पथ पर आँखें बिछाऊँ l जहाँ-जहाँ हरि का सिंहासन है, वहाँ-वहाँ मेरा आसन भी है और वहाँ ही अनेक व्रजांगनाएँ हरि का नाम ले-लेकर वास करती हैं l 
मेरे लिए मेरा आँगन निर्जन वन है, और श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति में मेरे लिए दिन का प्रकाश भी अन्धकार-सा प्रतीत होता है l 
उनके विरह में मेरे बिखरे हुए कुन्तल-कलाप काली नागिन की तरह बल खा रहे हैं l 
हाय ! मैं इस दुख का भार किस प्रकार वहन करूँ ? मेरे शरीर के वसन और भूषण मलिन हो चले और मेरे शिर के बाल भी अस्त-व्यस्त हो गए l 
उस ओर से आये हुए पथिकों से सुन्दरी जिज्ञासा करती है कि कहो मेरे प्राणाधार श्रीकृष्ण कैसे हैं ?
हाय ! जहाँ नन्द-नन्दन रहते हैं, वहाँ उनके पास मेरा सन्देश कौन ले जाय ? उन्हें देखने के लिए मेरी आँखें तरस रही हैं, और उनकी याद कलेजे में शूल पैदा करती है l 
'साहेबराम' कवि कहते हैं कि यह संसार स्वप्नमय है l इस संसार में नरतन धारण कर फिर नहीं जन्म लूँगा l
संग्रह - मैथिली लोकगीत 

संग्रहकर्ता और संपादक - राम इकबाल सिंह 'राकेश' 

प्रकाशक - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग

सोमवार, 10 जून 2013

लग्न-गीत (Maithili folksong)


पिपरक पात झलामलि हे 
बहि गेल तितल बतास 
ताहि तर कोण बाबा पलंगा ओछाओल 
बाबा क आयल सुख नींद हे 
चलइत-चलइत अइलि बेटी कोन बेटी 
खटिआ के पउआ धयले ठाढ़ि हे 
जाहि घर आहे बाबा धिआ हे कुमारि 
से ही कोना सुतथि निचिंत हे 
अतना बचनिया जब सुनलन्हि कोन बाबा 
घोड़ा चढ़ि भेला असवार हे 
चलि भेल मगह मुंगेर हे 
पुरूब खोजल बेटी पछिम खोजल 
खोजल में मगह मुंगेर हे 
तोहरा जुगुति बेटि वर नहिं भेटल 
खोजि अएलौं तपसि भिखार हे 
निरधन तपसिया हमें न बिआहव 
मरी जएवौं जहर चबाय हे 


पीपल के झिलमिल पत्ते हैं मंद-मंद शीतल हवा बह रही है . उस पीपल की ठंडी छाँह में अमुक पिता पलंग बिछा कर बैठा और ठंडी हवा के झोंके से गाढ़ी नींद में सो गया . यह देख कर अमुक बेटी वहाँ पलंग का डांड़ पकड़ कर खड़ी हुई और बोली - हे पिता, जिसके घर में कुँआरी कन्या है, भला वह किस तरह सुख की नींद सोयेगा ?'
यह सुन कर उसका पिता घोड़े पर सवार हुआ, और दूल्हा की तलाश में निकला . उसने पूरब ढूँढा, पछिम ढूँढा, मगध और मुंगेर भी ढूँढ डाला ;लेकिन उसकी कन्या के उपयुक्त वर नहीं मिला. 
अंत में उसने लौट कर अपनी कन्या से कहा - 'हे बेटी, तुम्हारे उपयुक्त आर नहीं मिला. अतः मैंने तुम्हारे लिए एक निर्धन वर तलाश किया है. 
कन्या ने कहा - 'हे पिता, निर्धन तपस्वी को मैं नहीं ब्याहूँगी . (निर्धन को ब्याहने के पूर्व ही) मैं गरल-पान कर मर जाऊँगी .'



संग्रह - मैथिली लोकगीत 
संग्रहकर्ता और संपादक - राम इकबाल सिंह 'राकेश' 
प्रकाशक - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग

शुक्रवार, 22 जून 2012

वटगमनी (Vatgamni, Maithili folksong)



जनमल लौंग दुपत भेल सजनि गे   
फर फूल लुबधल जाय 
साजी भरि-भरि लोढ़ल सजनि गे 
सेजहीं दे छिरिआय 
फुलुक गमक पहुँ जागल सजनि गे 
छाड़ि चलल परदेश 
बारह बरिस पर आयल सजनि गे 
ककवा लय सन्देश
ताहीं सें लट झारल सजनि गे 
रचि-रचि कयल श्रृंगार 

हे सखी, लौंग के बीज अंकुरित हुए, और उसमें दो पत्ते उग आये.
काल पाकर वह फल-फूल से लद गया.
तब मैंने डाली भर-भर कर उसके फूल इकट्ठे किये और फिर उन्हें प्रियतम की सेज पर बिखेर दिया. 
उन फूलों की गंध से मेरे प्रियतम की नींद टूट गई, और वह मुझे छोड़कर परदेश चले गये.
हे सखी, वह पुनः बारह वर्ष पर वापिस आये, और मेरे लिए अपने साथ कंघी उपहार में लाए.
मैंने उसीसे अपने उलझे हुए बालों को सँवारा, और रच-रच कर श्रृंगार किया.


                           संग्रह - मैथिली लोकगीत 
                           संग्रहकर्ता और सम्पादक - राम इकबाल सिंह 'राकेश'
                           प्रकाशक - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग