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शनिवार, 20 सितंबर 2014

रोशनी (Roshni by Amrita Pritam)


हिज्र की इस रात में 
कुछ रोशनी-सी आ रही है 
शायद याद की बत्ती 
कुछ और ऊँची हो गयी है … 

एक हादसा, एक जख्म 
और एक टीस दिल के पास थी 
रात को सितारों की रक़म 
इन्हें जरब दे गयी … 

नज़र के आसमान से 
सूरज कहीं दूर चला गया 
पर अब भी चाँद में 
उसकी खुशबू आ रही है … 

तेरे इश्क़ की एक बूँद 
इसमें मिल गयी थी 
इसलिए मैंने उम्र की 
सारी कड़वाहट पी ली … 



कवयित्री - अमृता प्रीतम 
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : अमृता प्रीतम 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983 

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

एक दृष्टिकोण (Ek drishtikon by Amrita Pritam)


सूरज को सारे खून माफ़ हैं l 
दुनिया के हर इन्सान का 
वह रोज़ 'एक दिन' का क़तल करता है 
और हर एक उम्र का एक टुकड़ा 
रोज़ ज़िबह होता है 
इन्सान के इख्तियार में सिर्फ़ इतना है -
कि जिबह हुए टुकड़े को 
वह घबरा के फेंक दे, और डरे,
या निडर उसे कबाब की तरह भूने, खाये 
और साँसों की शराब पीता 
वह अगले टुकड़े का इंतज़ार करे ... 


यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

दोस्त (Dost by Amrita Pritam)


दोस्त ! तुमने ख़त तो लिखा था 
पर दुनिया की मार्फ़त डाला 
और दोस्त ! मोहब्बत का ख़त 
जो धरती के नाप का होता है 
जो अम्बर के नाप का होता है 
वह दुनियावालों ने पकड़कर 
एक क़ौम जितना कतर कर 
क़ौम के नाप का कर डाला … 

और फिर शहरों में चर्चा हुई 
वह तेरा ख़त जो मेरे नाम था 
लोग कहते हैं 
कि मज़हब के बदन पर 
वह बहुत ढीला लगता 
सो ख़त की इबारत को उन्होंने 
कई जगह से फाड़ लिया था … 

और आगे तू जानता 
कि वे कैसे माथे 
जिनकी समझ के नाप 
हर अक्षर ही खुला आता 
सो उन्होंने अपने माथे 
अक्षरों पर पटके 
और हर अक्षर उधेड़ डाला था … 

और मुझे जो ख़त नहीं मिला 
पर जिसकी मार्फ़त आया 
वह दुनिया दुखी है - कि मैं 
उस ख़त के जवाब जैसी हूँ … 

यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

दृश्य 1919 (Drishya 1919 by Amrita Pritam)

जीवन की ये दुश्वारियाँ 
मजबूरियाँ, लाचारियाँ 
ये ज़िल्लतें, ये ख़्वारियाँ
ये रेंगती-सी हसरतें 
ये दासता की लानतें 
ये गुलामों की किस्मतें 
इक क़हर था 
जो जर लिया   
इक सबर था 
जो कर लिया 
इक ज़हर था 
जो पी लिया 
इक मौत को भी 
जी लिया 

छाती में आग जल रही 
आँखों से पानी बह रहा 
सुनो सुनो सुनो सुनो 
यह वक़्त क्या कुछ कह रहा 
यह वक़्त क्या कुछ सह रहा 
यह वक़्त क्या कुछ कह रहा 
मैं वक़्त एक सवाल हूँ -
ये गोलियों से छलनी 
दीवारों का सवाल 
ये हज़ारों आत्माओं की 
पुकारों का सवाल 
ये ज़र्द चेहरे, ये सर्द लाशें 
अँधेरा, अँधेरा 
और होठों पर लगा 
संगीनों का पहरा 
ये घायल उम्मीदें,
ये ज़ख़्मी आवाज़ें  
ये खूनी सवेरे,
ये काली दुपहरें 
आओ, अब आओ 
ये अँधेरा जलाओ 
बादशाहियत के आगे,
शहंशाहियत के आगे 
ये सर नहीं झुकेगा, 
नहीं झुकेगा 
ये जवानी का दावा 
ये छाती का लावा 
ये अब नहीं रुकेगा 
नहीं रुकेगा 
ये दीवारें, ये कूचे,
ये बरबाद गलियाँ 
ये गलियाँ 
जो दुखों में पली हैं, दुखों में ढली हैं 
और देखो ये गलियाँ -
गुलामी की दुनिया जलाने चली हैं l 




यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

One Billion Rising - उमड़ते सौ करोड़ में एक स्वर यह भी !

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

मेरा पता (Mera pata by Amrita Pritam)

आज मैंने
अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है
तो हर देश के, हर शहर की,
हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है, एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रूह की झलक पड़े
             - समझना वह मेरा घर है।

यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

हादसा (Hadsa by Amrita Pritam)

बरसों की आरी हँस रही थी
घटनाओं के दाँत नुकीले थे

अकस्मात् एक पाया टूटा
आसमान की चौकी पर से
शीशे का सूरज फिसल गया

आँखों में कंकड़ छितरा गये
और नज़र ज़ख्मी हो गयी
कुछ दिखायी नहीं देता
दुनिया शायद अब भी बसती होगी !

यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

कुफ्र (Kufra by Amrita Pritam)


आज हमने एक दुनिया बेची 
और एक दीन ख़रीद लिया  
हमने कुफ्र की बात की

सपनों का एक थान बुना था
एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया
और उम्र की चोली सी ली 

आज हमने आसमान के घड़े से 
बादल का ढकना उतारा
और एक घूँट चाँदनी पी ली

यह जो एक घड़ी हमने 
मौत से उधार ली है
गीतों से इसका दाम चुका देंगे 


यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983