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शुक्रवार, 28 मार्च 2014

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था (Hatasha se ek vyakti baith gaya tha by Vinod Kumar Shukla)



हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था 
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था 
हताशा को जानता था 
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया 
मैंने हाथ बढ़ाया 
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ 
मुझे वह नहीं जानता था 
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था 
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे 
साथ चलने को जानते थे l




कवि -  विनोदकुमार शुक्ल
संकलन - अतिरिक्त नहीं
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

वसन्त का स्वागत (Vasant ka swagat by Hynne)

परियों के मंजीर लगे फिर बोलने,
किरण लगी जल में फिर केसर घोलने l 

मधुऋतु आयी, स्यात, गन्ध छाने लगी,
फूलों का सन्देश वायु लाने लगी l 

पत्ती-पत्ती लगी मस्त हो झूमने l 
जाओ मेरे गीत ! जंगल में घूमने l 

हरियाली हो जहाँ वहाँ वन्दन करो,
मधुऋतु की सुषमा का अभिनन्दन करो l 

सभी समागत फूलों को सत्कार दो l 
मिले कहीं पाटल तो उसको प्यार दो l


जर्मन कवि - हेनरिक हाइने (1799-1856)
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - रामधारी सिंह दिनकर
संकलन - सीपी और शंख 
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, दूसरा संस्करण - 1997