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शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

बाँसुरी की फूँक (Bansuri ki foonk by Nandkishore Nawal)


जिस छिद्र में फूँक भरने से 
मेरी बाँसुरी बजती है,
तुमने उसी में फूँक भरी है। 

उस फूँक से जो स्वर निकलेगा,
उससे सारा जंगल हिल उठेगा। 
पक्षी बोल उठेंगे,
हवा चल पड़ेगी,
फूल खिल उठेगा। 
                    - 7. 3. 1976 



कवि - नंदकिशोर नवल 
किताब - पथ यहाँ से अलग होता है 
संपादक - राकेश रंजन 
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2014 

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

जो नाथेगा नाग (Jo nathega naag by Rakesh Ranjan)

आसमाँ उगलता है भर-भर मुँह आग 
घोड़ों के जबड़ों से झड़ता है झाग 

ऊब है, थकावट है, गुस्सा है, पस्ती है 
लुटे-पिटे लोगों से पटी पड़ी बस्ती है 
बस्ती का नूर हुआ बस्ती से दूर 
बस्ती में कोई मैदान है न बाग !

बस्ती में बच्चे हैं, सच्चे हैं छलियों में 
उछल-उछल खेल रहे गेंद तंग गलियों में 
वे हैं, तो वह भी होगा कहीं जरूर 
होगा ही होगा, जो नाथेगा नाग !



कवि - राकेश रंजन
संकलन - जनपद : विशिष्ट कवि  
संपादक - नंदकिशोर नवल, संजय शांडिल्य
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2006

बुधवार, 15 मई 2013

गामा और लामा (Gama aur Lama by Rakesh Ranjan)


गामा आए गाम पर !

जन-गण जय-जयकार मचाते 
भारत-भाग्य-विधाता गाते 
पत्रकारगण धाते आते 
फोकस देते चाम पर !

लामा उतरे लाम पर ! 

हन-हन-हन हथियार चलाते  
विरोधियों के किले ढहाते 
ह्त्या करते, खून बहाते 
धरम-करम के नाम पर ! 

लहू दामनेदाम पर !
लहू दामनेबाम पर !
कवि-कोकिल-कुल चाय चुसकते 
कविता करते शाम पर ! 



कवि - राकेश रंजन
संकलन - अभी-अभी जनमा है कवि 
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2007

सोमवार, 27 अगस्त 2012

हल्लो राजा (Hello Raja by Rakesh Ranjan)



हल्लो राजा !
कभी-कभी तो कठिन धूप में
चल्लो राजा !
कभी-कभी तो चिन्ता-भय से 
गल्लो राजा !
कभी-कभी तो जठरागिन में
जल्लो राजा !

जब तिनके-भर सुख की खातिर
स्याह जंगलों-जैसे दुक्खों से जुज्झोगे
तब बुज्झोगे 
परजा होना खेल नहीं है
किसी जनम में
इसका सुख से मेल नहीं है !

मैंने पूछा :
राजा, कैसी है तुकबन्दी ?
राजा बोले :
बेहद गन्दी !



        कवि - राकेश रंजन
        संकलन - अभी-अभी जनमा है कवि 
        प्रकाश - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2007


शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

गुरु कौ बचन (Guru kau bachan by Rakesh Ranjan)


आ बचवा, चल चिलम लगा दे !

रात भई, जी अकुलाता है
कैसा तो होता जाता है
ऊ ससुरा रमदसवा सरवा
अब तक रामचरित गाता है

रमदसवा जल्दी सो जाए
ऐसा कोई इलम लगा दे !  

आ बचवा, अन्दरवा आजा
हौले से जड़ दे दरवाजा
रामझरोखे पे लटका दे
तब तक यह बजरंगी धाजा

हाँ, अब सब कुछ बहुत सही है
फट से फायर फिलम लगा दे !


                             कवि - राकेश रंजन
                             संग्रह - अभी-अभी जनमा है कवि
                             प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2007