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गुरुवार, 2 मई 2013

एक तिनका (Ek tinka by Ayodhya Singh Upadhyaay 'Hariaudh')


मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,
एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा l 
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा l 

            मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,
            लाल होकर आँख भी दुखने लगी l 
            मूँठ देने लोग कपड़े की लगे,
            ऐंठ बेचारी दबे पाँव भगी l 

                             जब किसी ढब से निकल तिनका गया,
                             तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए l 
                             ऐंठता तू किसलिए  रहा,
                             एक तिनका है बहुत तेरे लिए l 




कवि - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'