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रविवार, 18 जून 2017

फालतूपन (Redundancy by Purwa Bharadwaj)


रोजाना लगभग 50 किलोमीटर का सफ़र तय करते समय मेरा पसंदीदा काम है अपने दोस्तों को sms करना और उसके जरिए तार जोड़े रखना. चूँकि राह चलते शोर काफी रहता है, इसलिए फोन पर प्रायः बात नहीं करती हूँ. sms को बेहतर पाती हूँ कि अपनी कह दो और दूसरे को तत्काल परेशान भी न होना पड़े. हालाँकि उसमें भी तुरत जवाब पाने की उम्मीद रहती है और उत्साह बढ़ जाता है जब लगातार कुछ देर तक आदान-प्रदान चलता रहता है.

बुधवार, 31 मई 2017

आपबीती : JNU जैसी छवि और दिल्ली पुलिस ('JNU' type image and Delhi Police by Purwa Bharadwaj and Rizwana Fatima)



तारीख 26 मई, 2017. समय सुबह 11.30 बजे. जगह नई दिल्ली का केन्द्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन. यानी देश की राजधानी के राजपथ के करीब का इलाका. मामला नागरिक गरिमा का हनन, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का. मुज़रिम दिल्ली पुलिस.

हम तीन लोगों – रिज़वाना फ़ातिमा, वंदना राग और पूर्वा भारद्वाज को गाँधी पर शोध के सिलसिले में एक संस्थान में जाना था. हमारा छोटा सा समूह है रसचक्र. हमने उसके माध्यम से अलग अलग किस्म की रचनाओं की प्रस्तुति शुरू की है. रसचक्र की अगली प्रस्तुति गाँधी पर करने की योजना है. उसी सिलसिले में आपस में तय हुआ था कि आधी दूरी मेट्रो से नापेंगे और बाकी गाड़ी से. दिल्ली विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर हम दो लोग - रिज़वाना फ़ातिमा और पूर्वा भारद्वाज मिले.

शनिवार, 13 मई 2017

माँ के नाम (Mother's day by Purwa Bharadwaj)

आज सब माँ को याद कर रहे हैं. Ritual कहें या फैशन या भावना का सार्वजनिक प्रकटीकरण या भीड़ में शामिल होना कहें या प्रदर्शन - जो हो लेकिन माँ के साथ की तस्वीर खोज रही थी. मैंने महसूस किया कि बहुत कम तस्वीरें हैं. क्यों ?

पहले चलन नहीं था और मेरे बचपन में फोकस बच्चों की फोटो खिंचवाने या 'पेयर' फोटो खिंचवाने पर था. कभी कभी पूरे परिवार की फोटो शादी-ब्याह, होली-दिवाली या ईद-बकरीद, पिकनिक, मेला-ठेला, पूजा, तीर्थाटन, देश-विदेश भ्रमण, (हमारे संदर्भ में) सभा-सेमिनार वगैरह के मौके की मिल जाती थी. साधन संपन्न होना इस शौक और इच्छा से जुड़ा हुआ था और अभी भी है. बाद के दिनों में मैंने याद करके माँ के साथ कुछ तस्वीरें खिंचवाई हैं. शादी के पहले की तस्वीरें इक्का-दुक्का ही हैं. उनमें से एक यह कॉलेज के दिनों की है. साथ तो साथ है और उसकी खुशी छलकनी चाहिए !

रविवार, 23 अप्रैल 2017

पंडिता रमाबाई सरस्वती 23.4.1858-5.4.1922 ( Pandita Ramabai Saraswati By Purwa Bharadwaj)


रमाबाई की जीवन-यात्रा विलक्षण रही है. इसका बीज तभी पड़ गया था जब महाराष्ट्र के सबसे ऊँचे माने जानेवाले कोंकणस्थ चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे ने समाज की प्रताड़ना की परवाह नहीं करके अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई को संस्कृत पढ़ाना शुरू किया था. उनके इस कदम के खिलाफ उडिपी में धर्मसभा हुई थी. उसमें लगभग चार सौ विद्वानों की मौजूदगी में उन्होंने साबित कर दिया था कि स्त्रियों को संस्कृत की शिक्षा देना धर्मविरुद्ध नहीं है, लोकविरुद्ध भले हो. फिर उन दोनों ने मिलकर गंगामूल प्रदेश में एक संस्कृत केंद्र स्थापित किया - कोलाहल से दूर पश्चिमी घाट की चोटी पर स्थित जंगल में. वहीं रमाबाई का जन्म हुआ था. उनकी एक बड़ी बहन थी कृष्णाबाई और बड़ा भाई था श्रीनिवास.

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

कड़वा मन (By Purwa Bharadwaj)

मन कड़वा होता है। खट्टा होता है। यह सच्चाई है। (यकीनन मीठा भी होता है, लेकिन अभी उसका भाव पटल पर नहीं है।)  कितना भी यह समझाओ अपने आप को कि यह क्षणिक है, आवेग है, आवेश है, समय के साथ तकलीफ चली जाएगी, तो भी मन में फाँस रह जाती है। अक्सर करीबी या परिचित के संदर्भ में यह अटक रह जाती है।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

सैर और दस्तरख़्वान (By Purwa Bharadwaj)

इन दिनों सुबह की सैर को नियमित करने का भरपूर प्रयास कर रही हूँ। पहली वजह अपना स्वास्थ्य ठीक रखने का दबाव है और दूसरी वजह है प्रिंगल रानी के लिए हवाखोरी की ज़रूरत। तीसरी वजह भी है और वह है अपने साथ होने का अहसास।

यह सिलसिला कितने दिन तक चलेगा उसे लेकर चिंता है, मगर ना से हाँ सही मानकर खुश हूँ। आज काफी देर तक मैं कल रात के खाने के बारे में सोचती रही। कल इरादा किया था कि फ्रिज को पूरा खाली कर देना है। कोने-कोने में, छोटे-बड़े डिब्बे में जो कुछ पड़ा है, उसे निपटा देना है। जिम्मेदारी अकेले मेरी नहीं थी, पूरा घर शामिल था। अपूर्व बिना ना-नुकुर के कुछ भी खा लेते हैं। बासी को लेकर नखरा मेरा भले हो, घर में और किसी का नहीं है। बेटी तो खाती ही रहती है। तीन दिन पहले का पिज़्ज़ा और चार दिन पुरानी कढ़ी वह चाव से खा लेती है। उसके लिए गर्म केवल भात होना चाहिए।

गुरुवार, 2 मार्च 2017

बादशाह अकबर की कविता (Mughal emperor Akbar's Poem)

कान्हाते अब घर झगरो पसारो 
कैसे होय निरवारो। 
यह सब घेरो करत है तेरो रस 
अनरस कौन मंत्र पढ़ डारो।।
मुरली बजाय कीनी सब वोरि 
लाज दई तज अपने अपने में बिसारो। 
तानसेन के प्रभु कहत तुमहिं सों तुम जितो हम हारो।।