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रविवार, 23 अप्रैल 2017

पंडिता रमाबाई सरस्वती 23.4.1858-5.4.1922 ( Pandita Ramabai Saraswati By Purwa Bharadwaj)


रमाबाई की जीवन-यात्रा विलक्षण रही है. इसका बीज तभी पड़ गया था जब महाराष्ट्र के सबसे ऊँचे माने जानेवाले कोंकणस्थ चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे ने समाज की प्रताड़ना की परवाह नहीं करके अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई को संस्कृत पढ़ाना शुरू किया था. उनके इस कदम के खिलाफ उडिपी में धर्मसभा हुई थी. उसमें लगभग चार सौ विद्वानों की मौजूदगी में उन्होंने साबित कर दिया था कि स्त्रियों को संस्कृत की शिक्षा देना धर्मविरुद्ध नहीं है, लोकविरुद्ध भले हो. फिर उन दोनों ने मिलकर गंगामूल प्रदेश में एक संस्कृत केंद्र स्थापित किया - कोलाहल से दूर पश्चिमी घाट की चोटी पर स्थित जंगल में. वहीं रमाबाई का जन्म हुआ था. उनकी एक बड़ी बहन थी कृष्णाबाई और बड़ा भाई था श्रीनिवास.

आर्थिक स्थिति जर्जर होने पर उनके पिता ने पुराणवाचन शुरू किया और सपरिवार तीर्थयात्रा पर निकल पड़े. उसी में रमाबाई को उनकी माँ लक्ष्मीबाई ने पढ़ाना शुरू किया. कर्मकांडों को पूरी निष्ठा से करते हुए उनका जीवन चल रहा था कि 1874 के भयंकर अकाल ने छः महीने के भीतर रमाबाई के माता-पिता और बड़ी बहन तीनों को छीन लिया. बच गए श्रीनिवास और रमाबाई जो तबतक अविवाहित थीं क्योंकि माता-पिता कृष्णाबाई के बालविवाह को असफल होते हुए देख चुके थे और वे रमाबाई को खूब पढ़ाना चाहते थे.

अब भाई-बहन दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर बढ़े. हिमाचल और कश्मीर होते हुए बंगाल और आसाम तक गए. 6 जुलाई, 1878 को जब रमाबाई श्रीनिवास के साथ कलकत्ता पहुँचीं तो वहाँ के भद्रलोक में हलचल मच गई. सीनेट हॉल में संस्कृत के देशी-विदेशी विद्वानों ने उनकी परीक्षा ली. संस्कृत में सवाल-जवाब का क्रम शुरू हुआ. रमाबाई ने सारे सवालों का आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया और सभा के अंत में उन्हें सरस्वतीकी उपाधि से नवाज़ा गया. कुछ समय बाद बंगाल के चर्चित नेता ज्योतींद्र मोहन टैगोर ने एक आयोजन में रमाबाई को पंडिताकी उपाधि दी. इस तरह वे बनीं पंडिता रमाबाई सरस्वती !

यात्राएँ रमाबाई के लिए ज्ञान का बड़ा ज़रिया थीं जिन्होंने उन्हें लोगों और खासकर औरतों के जीवन को करीब से देखने का मौक़ा दिया था. धीरे-धीरे उनके मन में धार्मिक नियमों के औचित्य पर सवाल उठने लगे थे. स्त्री को स्त्री रूप में मोक्ष नहीं मिल सकता, धर्म का यह विधान उनको मंजूर नहीं था. उनकी आलोचनात्मक दृष्टि को गढ़ने में ब्रह्मोसमाज के केशवचंद्र सेन का भी योगदान रहा.

1880 में अपने भाई की मृत्यु के बाद रमाबाई ने भाई के मित्र और ब्रह्मोसमाजी रह चुके बिपिन बिहारी दास मेधावी के साथ बाँकीपुर कोर्ट में शादी की. वे आसाम के शाहा जाति के थे जिसे शूद्र का दर्जा दिया जाता था. ऊपर से अपनी मर्जी की शादी ! इस पर बहुत तूफ़ान मचा. यह थमने भी नहीं पाया था कि 1882 में हैजे से बिपिन बिहारी चल बसे और अपनी इकलौती बेटी मनोरमा को गोद में लेकर रमाबाई फिर से सार्वजानिक जीवन के मैदान में कूद पड़ीं. वे महाराष्ट्र लौट आईं. 1 मई, 1882 को उन्होंने पूना में आर्य महिला समाज की स्थापना की और इस तरह औरतों को शिक्षा, धर्म आदि विषयों पर चर्चा करने का एक मंच दिया.

रमाबाई के विचारों के केंद्र में स्त्रियाँ थीं. अपनी पहली मराठी किताब ‘स्त्री-धर्मनीति’ (1882) में उन्होंने गृहिणी और पत्नी के कर्त्तव्यों की बात मानते हुए भी स्त्रियों के हक की बात उठाई थी. उन्होंने लिखा कि सिर्फ अतीत के गौरव की खोखली बातों से कुछ नहीं होता. स्त्रियों की प्रगति की नींव है आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता. उनकी सबसे बड़ी दौलत है शिक्षा. उनको धर्मशास्त्र, गणित, भूगोल, अर्थशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, भौतिक विज्ञान सबका ज्ञान होना चाहिए. 1883 में हंटर शिक्षा आयोग के सामने अपनी बात रखते हुए रमाबाई ने लड़कियों के स्कूल के लिए अध्यापिकाओं, निरीक्षिकाओं के अलावा स्त्री-चिकित्सकों की ज़रूरत पर भी बल दिया था.

अपने लेखन और भाषण को आय का स्रोत बनाकर रमाबाई ने भारत के बौद्धिक इतिहास में नया अध्याय जोड़ा था. इसके पहले व्यवस्थित रूप में किसी भारतीय स्त्री ने इसे नहीं आजमाया था. उन्होंने स्त्री-धर्मनीति की बिक्री से आगे की पढ़ाई के लिए अपने इंग्लैंड जाने का खर्चा निकाला था. इंग्लैंड के बाद वे 1886 में अमेरिका गईं जहाँ अपने भाषणों के ज़रिए उन्होंने लाखों की रकम चंदे के रूप में इकट्ठा की. यह विधवा और निराश्रित औरतों के लिए आश्रम खोलने की योजना का अंग था. 1889 में भारत लौटते ही उन्होंने बंबई (फिर पूना) में विधवाओं के लिए ‘शारदा सदन’ शुरू किया. पुरुष सुधारकों की तरह उनका ज़ोर विधवा पुनर्विवाह पर न होकर शिक्षा पर था.

दरअसल रमाबाई सशक्तीकरण के ठोस ज़रिए के रूप में शिक्षा को देख रही थीं. उन्हें पता था कि स्त्रियों का ज़मीन-जायदाद, रुपया-पैसा, शिक्षा – किसी संसाधन पर अधिकार नहीं होता. इसलिए उन्होंने 1898 में पूना के पास केडगाँव में ‘मुक्ति’ नाम से ऐसे आश्रम की स्थापना की जहाँ औरतें स्वतंत्र तरीके से अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें. वहाँ औरतों ने मिलकर अपने लिए अनाज उगाया, लकड़ी के सामान बनाए, चीज़ों को बाज़ार में बेचने की कला सीखी, किताबें बनाईं और छापीं भी. यह वास्तव में पूरी वैकल्पिक जीवन-व्यवस्था थी. इसे रमाबाई ने गुरु-शिष्य के रिश्तों से निकालकर एक आधुनिक केंद्र के रूप में चलाया था.

उन्हें मालूम था कि औरतों की हालत के लिए आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था जवाबदेह होती है. 1896-1897 में जब अकाल का दूसरा दौर आया तो उन्होंने अपने बूते पर करीब 2500-3000 औरतों और बच्चों को अकालग्रस्त इलाकों से निकालकर केडगाँव के अपने आश्रम में रखा. उनके पढने-लिखने और हुनर सीखने की व्यवस्था की ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवन बिता सकें. राहत कार्य के ज़रिए वे वंचित वर्ग के एक हिस्से को शिक्षा से जोड़ने में कामयाब हुई थीं.

रमाबाई ने सार्वजनिक मंचों का बहुत सकारात्मक इस्तेमाल किया, लेकिन उनकी बेलाग बातों को पचाना आसान नहीं था. 1887 में प्रकाशित अपनी अंग्रेज़ी की किताब ‘High Caste Hindu Woman’ में उन्होंने स्त्री होने के नाते जो दमन-शोषण होता है, उसका समाजशास्त्रीय दृष्टि से विश्लेषण किया और स्त्री के अधिकार की बात की. अमेरिका-प्रवास पर केंद्रित अपनी मराठी किताब युनाइटेड् स्टेट्स्ची लोकस्थिति आणि प्रवासवृत्तमें अफ्रीकी लोगों की गुलामी से औरतों की गुलामी की तुलना करते हुए रमाबाई अपने समय से बहुत आगे नजर आती हैं. वे कहती हैं कि गुलामी आत्मसम्मान और आज़ाद होने की तमन्ना को भी कुचल डालती है. दरअसल यह मानसिक गुलामी है, इसीलिए औरतों तक को यह लगता है कि उनकी स्थिति जैसी होनी चाहिए वैसी ही है.  
                 
रमाबाई ने जिस साफ़गोई से सामाजिक ढाँचे का विश्लेषण किया था और जो उनका तेवर था, उसने उनको ख़ासा विवादास्पद बना दिया था. उसमें 1883 में उनके ईसाई बन जाने के फैसले ने और इजाफ़ा कर दिया. महाराष्ट्र के सारे बड़े अख़बारों ने उनके धर्मान्तरण को राष्ट्र के साथ घात के रूप में देखा था. उस समय एकमात्र ज्योतिबा फुले ने उनका साथ दिया था. एक वक्त ऐसा भी आया  कि रमाबाई ने अपने विचारों से दयानंद और लोकमान्य तिलक-जैसे राष्ट्रवादियों, महादेव गोविंद रानडे और रामकृष्ण गोपाल भंडारकर-जैसे सुधारकों सबको रुष्ट कर दिया जो कभी उनके मुरीद हुआ करते थे. सबको रमाबाई में गार्गी और मैत्रेयी की झलक मिल रही थी, लेकिन अपनी मर्जी का रास्ता चुननेवाली रमाबाई सबके लिए असुविधाजनक थीं. वे कभी किसी खाँचे में फिट नहीं हुईं. जहाँ पर उन्होंने चर्च या ब्रिटिश सरकार को स्त्री-विरोधी निर्णय लेते देखा वहाँ उनकी आलोचना करने से वे बाज न आईं. इसीलिए उनको भुला देना ही सबके हित में था.




शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

कड़वा मन (By Purwa Bharadwaj)

मन कड़वा होता है। खट्टा होता है। यह सच्चाई है। (यकीनन मीठा भी होता है, लेकिन अभी उसका भाव पटल पर नहीं है।)  कितना भी यह समझाओ अपने आप को कि यह क्षणिक है, आवेग है, आवेश है, समय के साथ तकलीफ चली जाएगी, तो भी मन में फाँस रह जाती है। अक्सर करीबी या परिचित के संदर्भ में यह अटक रह जाती है।

सबसे ज़्यादा चुभता है नकली व्यवहार। जब आपको पता चले कि अगले ने हमेशा अपने को केंद्र में रखकर ही व्यवहार किया है तो मन दुखता है। ऐसे में स्वाभाविक सदाशयता, सामान्य व्यवहार को भी हम शक के घेरे में ला खड़ा करते हैं। हर अच्छी बात से भरोसा उठने लगता है। अपने छले जाने, बेवकूफ बनाए जाने का अहसास इतना प्रबल हो जाता है कि इंसान क्षुद्र तरीके से सोचने लगता है। मैं इस क्षुद्रता से लड़ने की कोशिश करती हूँ। अपने को टोकती हूँ, अगले की सीमाओं और उसके संदर्भों को समझने की भरसक कोशिश करती हूँ, फिर भी कई बार अपनी सहजता लौटा नहीं पाती हूँ। व्यवहार के अनुपात का हिसाब-किताब बेमानी हो जाता है।

बात नफा-नुकसान की नहीं है। हैरानी होती है कि आप कैसे किसी को समझ नहीं पाते हैं। आज मैंने किसी दूसरे के लिए किसी तीसरे की ऐसी गलाज़त भरी ज़बान सुनी कि दंग रह गई। कोई शिक्षित होने का दावा करनेवाला इंसान कैसे यह ज़बान बोल सकता है ! 'पीड़ित' या 'पीड़िता' होने के बावजूद किसी को गलाज़त पर उतरने का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता है। हिंसा के चक्र को झेलनेवाले और उसकी शुरुआत करनेवाले सबकी मनोवैज्ञानिक स्थिति का लाख विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन फौरी और सबसे अहम सवाल रहता है कि इन सबको झेला कैसे जाए ! मुझे याद है कि आज से तकरीबन बारह साल पहले एक प्रेम संबंध को लहूलुहान होते हुए मैंने देखा था। बरसों उस बंदे के सामने खड़े रहना तक मुझे गवारा नहीं था। लेकिन अपनी चोट पर मेरी परिचिता ने मरहम पट्टी कर ली और धीरे-धीरे मैंने भी 'शिष्टाचार' के लिए अपने को तैयार कर लिया। उसको लेकर शर्म आती है।

जेंडर, यौनिकता, विवाह, हिंसा, कानून, परिवार, दायित्व-कर्त्तव्य, भागीदारी, अधिकार, संपत्ति में हिस्सा, ससुराल-नैहर के द्वैत, रिश्तों की परत, स्वार्थ-चतुराई, पारंपरिकता-आधुनिकता, शिक्षा की भूमिका वगैरह की बहसों को मन ही मन दोहराती हूँ। तरह तरह की सत्ता के लाभ की स्थिति में रहकर विश्लेषण करते हुए 'स्टैंडप्वाइंट' यानी दृष्टिबिन्दु सिद्धांत को याद करती हूँ। जब सिद्धांत और जीवन की खाई और चौड़ी दिखने लगती है तो घबराहट होती है। संतुलन कैसे बैठाऊँ ! अपूर्व की उस बात में इत्मीनान खोजना चाहती हूँ जब वे कहते हैं कि धोखा खा जाना धोखा देने से बेहतर है। खुद को अरक्षित छोड़ देना चाहिए, लेकिन हम अपनी किलेबंदी करना कहाँ और कितना छोड़ पाते हैं !

मुझे एकमात्र उपाय उदासीनता में दिखता है। न उधो का लेना न माधो का देना। मन कड़वा हो तो निरपेक्ष होने की कोशिश करो। रिश्तों में निवेश करना मत छोड़ो, निराशावादी मत बनो। दूसरों में धँसो नहीं। थोड़ी दूरी बनाए रखो। खुद से भी। ताकि अपनी सीमाओं और गलतियों को जान सको। गहराई में जाओ, मगर 'फेस वैल्यू' पर चीज़ों को लेना एकदम मत छोड़ दो। वरना जीना कठिन हो जाएगा।  दूसरे से पारदर्शी और ईमानदार और सुसंगत होने की अपेक्षा छोड़ दो। जितना हो सके खुद को पारदर्शी बनाओ। गीता के वचन पर फिस्स से हँसो नहीं, नास्तिक की दूसरे किस्म की आस्तिकता होती है। 

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

सैर और दस्तरख़्वान (By Purwa Bharadwaj)

इन दिनों सुबह की सैर को नियमित करने का भरपूर प्रयास कर रही हूँ। पहली वजह अपना स्वास्थ्य ठीक रखने का दबाव है और दूसरी वजह है प्रिंगल रानी के लिए हवाखोरी की ज़रूरत। तीसरी वजह भी है और वह है अपने साथ होने का अहसास।

यह सिलसिला कितने दिन तक चलेगा उसे लेकर चिंता है, मगर ना से हाँ सही मानकर खुश हूँ। आज काफी देर तक मैं कल रात के खाने के बारे में सोचती रही। कल इरादा किया था कि फ्रिज को पूरा खाली कर देना है। कोने-कोने में, छोटे-बड़े डिब्बे में जो कुछ पड़ा है, उसे निपटा देना है। जिम्मेदारी अकेले मेरी नहीं थी, पूरा घर शामिल था। अपूर्व बिना ना-नुकुर के कुछ भी खा लेते हैं। बासी को लेकर नखरा मेरा भले हो, घर में और किसी का नहीं है। बेटी तो खाती ही रहती है। तीन दिन पहले का पिज़्ज़ा और चार दिन पुरानी कढ़ी वह चाव से खा लेती है। उसके लिए गर्म केवल भात होना चाहिए।

बहरहाल कल के दस्तरख़्वान का दृश्य बड़ा अच्छा था। पहले मैंने सुबह का नमकीन दलिया निकाला और दिन में बना राजमा, चावल के साथ। ताज़ा सादी रोटी रहने दी और उसकी जगह दो दिन पहले की सत्तू भरी रोटी घी चुपड़कर और करारा सेंक कर परोस दी मैंने। उसका सूखापन फिर भी गया नहीं। पिछले दिन की पोस्ता दाना की चटनी बची थी तो आग्रह करके उसे अपूर्व को खिला दिया। जितना मजेदार वह लगता है, उतना लगा नहीं क्योंकि उसमें हरी मिर्च नहीं थी और 'कॉम्बिनेशन' गलत था। साथ में पिछले दिन रेस्तरां से लाए गए लेबनानी खाने के साथ दिया गया सिरका में डूबा सलाद निकाला - गोभी, गाजर, जैतून और टमाटर का। ताज़गी का रोगन डालने के लिए भरवाँ शिमला मिर्च था। वैसे सब्ज़ी के नाम पर लौकी को हटाकर वे दो फाँक जो परसों की आलू-गोभी की सब्ज़ी थी वह ले चुके थे।

अपने लिए मैंने दलिया से काम चलाना चाहा, मगर इतना भी सात्त्विक क्या ! सत्तू की रोटी का एक टुकड़ा ले लिया, मगर बड़ा सूखा लग रहा था। लगा कि गर्रा लग जाएगा। मेरे लिए लौकी की सब्ज़ी भरपूर थी, लेकिन उसमें लज़्ज़त नहीं थी। मैंने फ्रिज की पूरी तलाशी ले ली, लेकिन खीरे के रायते का अवशेष मिला ही नहीं। एक कटोरी में जो निकला वह दूध की मलाई थी जिसमें पता नहीं क्यों मिठास थी। मुझे वह खीरे के रायते के अंश का आभास दे रहा था, परंतु पतिदेव ने बरज दिया कि कुछ भी खाकर तबीयत मत बिगाड़ो। मन मारकर अपने सामने से मैंने कटोरी सरका दी। माँ के नुस्खे पर इमली की चटनी पाँच दिन पहले दही बड़े के लिए बनाई थी, उसे लेने का कल मन नहीं हुआ। (यों भी वह जल्दी खराब नहीं होती है। फ्रिज में पड़ी रहेगी तो खराब नहीं होगी।) समापन के लिए मैंने अमेरिकन चौप्सी निकाली जो तीन कौर से अधिक न थी।

भांजे ने राजमा-चावल चुना और साथ में भरवाँ शिमला मिर्च। उसने दलिया सुबह ही नाश्ते में खाई थी, इसलिए सधाने के लिए उसे कहना अन्याय होता। उसका मन चटपटा नहीं हुआ तो चुपचाप अपने पसंदीदा 'वेज' मोमो से उसने भरपाई की। यह उसका नित्य चलता है। मुखशुद्धि उसकी मोमो या चाउमिन से होती है जो वह बाहर से गरमागरम ले आता है। कभी दिन, कभी शाम और कभी देर रात भी। उसे मैं धोखला खिला सकती थी क्योंकि धोखला शाम को ही आया था, परंतु खाने की मेज़ पर कुछ न कुछ भूलना भी एक नियम ही है। और धोखला नाश्ते में तो चलता है, खाने में नहीं। वैसे कल फ्रिज और रसोई की बाकी चीज़ें बच्चों के लिए तो अखाद्य ही थीं। मीठे के नाम पर मुझे छोड़कर बाकियों के लिए चीज़ केक था (मनाही के बावजूद पिछले दिन इनायत फरमाते हुए बेटी मुझे खिला चुकी थी, इसलिए दुबारा उधर नज़र डालना भी लालच होता)। मैंने तरबूज़ की फाँक से संतोष कर लिया था। सूजी का हलवा सबके द्वारा अगली सुबह के लिए छोड़ दिया गया था। दही केवल अपूर्व ने खाया। फ्रीज़र में पड़ी आइसक्रीम की तो मुझे आज याद आई। उसे मैं हफ़्तों पहले रखकर भूल चुकी थी।

बच गई थीं बिटिया रानी। उसकी कोल्ड कॉफ़ी दोपहर से पड़ी थी। उसके हिस्से का थोड़ा देवघरिया शैली में बना मटन पड़ा था जिसे लेकर मैं निश्चिन्त थी। मगर सोचा हुआ किसका पूरा होता है जो मेरा होगा ! उन्होंने सीधे एलान किया कि मटन अच्छा नहीं था और अब मैं दुबारा-तिबारा नहीं खाऊँगी। विकल्प आया पास्ता का। मैंने सारे डिब्बे टटोल लिए। राशन में पास्ता आया था, लेकिन किसी खाने में उसका डिब्बा नहीं दिखा। स्टीलवाले टिन में होगा, यह सोचकर झख मारकर मैंने उसमें हाथ डाला। किस्मत अच्छी थी कि तुरत मिल गया।  फरमान के मुताबिक़ कुड़कुड़ करते हुए मैंने पास्ता उबलने को डाला।  रात के ग्यारह बजने को आए थे और मुझपर चिंता सवार होने लगी थी कि देर होगी तो सुबह की सैर मारी जाएगी। रहम बरता गया कि पास्ता बेटी खुद बनाएँगी। वैसे सच्चाई यह है कि पास्ता-स्पैगेटी हमेशा वही बनाती है। खैर, मेरी छुट्टी हुई। सैर के बारे में सोचते हुए मैंने खाने का मैदान छोड़ा।

आज जब पलटकर सोच रही थी तो कल के असंतोष, ऊब, तिश्नगी का भाव जा चुका था। बच गया था रंग, खाने का रंग और खाने का ढंग। पटनिया, देवघरिया, बिहारी, झारखंडी, मराठी, उत्तर-पूर्व, चाइनीज़, इटैलियन, लेबनानी - कैसा कैसा व्यंजन ! मोहल्ला, शहर, राज्य, देश, विदेश सब एक मेज़ पर ! मैंने सोचा कि चार जन के परिवार में इतना वैविध्यपूर्ण खाना ! और क्या चाहिए जीवन में !

गुरुवार, 2 मार्च 2017

बादशाह अकबर की कविता (Mughal emperor Akbar's Poem)

कान्हाते अब घर झगरो पसारो 
कैसे होय निरवारो। 
यह सब घेरो करत है तेरो रस 
अनरस कौन मंत्र पढ़ डारो।।
मुरली बजाय कीनी सब वोरि 
लाज दई तज अपने अपने में बिसारो। 
तानसेन के प्रभु कहत तुमहिं सों तुम जितो हम हारो।।





कवि - अकबर 
किताब  - मुग़ल बादशाहों की हिन्दी कविता 
संकलन एवं संपादन - मैनेजर पाण्डेय 
प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 2016 


शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

गर्दन एक कुएँ जैसी (Gardan ek kuyein jaisi by Prakriti Kargeti)

गर्दन एक कुएँ जैसी है 
कोई न कोई
रिश्ते की रस्सी से 
खाली बाल्टी बाँध
फेंक देता है गहरा 
फाँस पड़ती है 
साँस रुकती है,
पर कुआँ
बाल्टी भरने नहीं देता 
अपना ही पानी निगल जाता है.



कवयित्री - प्रकृति करगेती 
संकलन - शहर और शिकायतें 
प्रकाशन - राधाकृष्ण, दिल्ली, 2017

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

यात्रा (Yatra by Purwa Bharadwaj)

यात्रा के लिए मैं प्रस्तुत रहती हूँ. रेल यात्रा हो या हवाई यात्रा. बस यात्रा नहीं. वह शुरू से मजबूरी का सौदा रही है और स्टीमर या नाव की यात्रा तो भूली बिसरी बात है.

बचपन में पापा के साथ अपने गाँव चाँदपुरा जाने का एकमात्र ज़रिया पानीवाला जहाज़ ही था. पहले स्टीमर लो और उसके बाद गंगा नदी पार करके पहलेजा घाट उतरो. घाट पर उतरकर थोड़ी दूर बालू में चलो. ककड़ी बिकती थी तो हड़बड़ी में उसे खरीदवाओ और फिर रेलगाड़ी पकड़कर चाँदपुरा पहुँचो. मुझे याद है एकबार पापा के साथ अकेले गाँव जाने का कार्यक्रम बना यानी माँ और भैया के बिना. भोर में उठकर माँ ने मुझे मुँह धुलाया था और हिदायतों के साथ यात्रा पर जाने की तैयारी करवाई थी.

चाँदपुरा मेरे गाँव का नाम है, स्टेशन का नाम नहीं है, यह उसी दौरान समझा था. (हालाँकि लंबे समय तक इसकी गुत्थी नहीं सुलझी थी कि गाँव का नाम और स्टेशन का नाम अलग अलग क्यों है या गाँव का नाम स्टेशन पर क्यों नहीं लिखा है.) हमारे स्टेशन का नाम चकमकरंद हॉल्ट है, माँ ने दिमाग में बिठाने का प्रयास किया था. वह नाम मज़ेदार लगा था, लेकिन भारी भी लगा था बोलने में. यह भी हिदायत मिली थी कि हाजीपुर स्टेशन आते ही तैयार हो जाना है क्योंकि हमारे स्टेशन पर गाड़ी बमुश्किल एक या दो मिनट रुकती थी. चकमकरंद हॉल्ट है, जंक्शन नहीं, यह अंतर हमारे लिए परिभाषा का अंतर नहीं था. यह गाड़ी रुकने के समय का अंतर था.

गाँव की यात्रा में पहले जब माँ साथ होती थी और पापा कॉलेज खुला होने के कारण साथ नहीं होते थे तो चकमकरंद हॉल्ट पर चचेरे चाचा लोग तैनात रहते थे. (उस समय चचेरा नहीं जोड़ा जाता था और चाचा का मतलब चाचा था. यह शब्दावली अलगाववाली थी या छोटे परिवार की ज़रूरत से उपजी थी, इस शब्दावली की यात्रा की पड़ताल नहीं की है मैंने. न ही रिश्तों की यात्रा पर गौर किया है मैंने. कभी कभी लगता है कि जैसे जगह की दूरी मील, कोस या किलोमीटर में नापते हैं तो क्या रिश्तों की दूरी मापने के लिए चचेरा, ममेरा, मौसेरा, फुफेरा शब्द हैं ?) हाजीपुर से निकलने के साथ ही माँ हमलोगों का सामान लेकर दरवाज़े के पास आ जाती थी. अपने सर पर आँचल सँभालती हुई (जो हमारे लिए नया होता था क्योंकि वह पालन-पोषण, मन-मिजाज़ पूरी तरह से शहरी थी और पर्दा नहीं करती थी). हमदोनों भाई-बहन को अपनी ओट में रखकर ताकि खुले दरवाज़े का आकर्षण हमें खतरे में न डाल दे. भैया माँ को लोहे का बक्सा घसीटकर लाने में मदद करता था. उस समय कुली का न रहना अखरता नहीं था. चाचा गाड़ी के चकमकरंद हॉल्ट पर आते ही साथ-साथ भागते हुए हर डिब्बे पर निगाह गड़ाए रखते थे. उन दिनों कोच नंबर या आरक्षित सीट के चक्कर से हमसब दूर थे. माँ डिब्बे का डंडा पकड़कर सर निकालकर हाथ से इशारा करती थी और चाचा भौजी-भौजी कहते हुए हमारे डिब्बे के समानांतर दौड़ने लगते थे. गाड़ी की दिशा और गति के मुताबिक़. पहले बक्सा उतारा जाता था और फिर गोद में टंगकर हमदोनों भाई-बहन. अंत में माँ सावधानी से पाँव जमाती हुई उतरती थी क्योंकि नीचे सीमेंट का प्लेटफ़ॉर्म नहीं था, पत्थर के टुकड़े थे.

हाँ, याद आया कि गाँव में घूमते हुए अक्सर हम बच्चे हॉल्ट की तरफ आ निकलते थे. पास में लगा हटिया, रास्ते की लगभग टखने भर धूल, आम की गाछी, बड़हर का पेड़, भुसुल्ला और करीब का स्कूल पार करके हॉल्ट पर आकर रेलगाड़ी की सीटी सुनना मन लगाने का साधन था. गार्ड का झंडी हिलाना, लालटेन जैसी बत्ती को देखना नया अनुभव था. पटरी गंदी नहीं लगती थी. करीने से सजे पत्थरों के टुकड़ों के बीच लोहे की पटरी माँग की तरह लगती थी – सीधी-सख्त और सादी भी. (अब शायद यह बिम्ब न उभरे क्योंकि बिम्बों की गढ़न को समझने लगी हूँ.) उन्हीं पत्थरों में से चिकने-चिकने गोलाई लिए हुए पत्थर गाना-गोटी खेलने के लिए मैं चुन लेती थी. कई बार वह गाना-गोटी मेरे साथ यात्रा करके पटना आया. 

वापसी यात्रा में जल्दबाज़ी रहती थी. मन के अंदर भी और बाहर भी. जब स्टीमर महेन्द्रू घाट पर लगने को होता था तो लंगर डालते ही कुली धड़ाधड़ कूदने लगते थे. घाट से सटने के पहले ही कुली फाँद-फाँद कर स्टीमर पर आ जाते थे. उनको सब्र नहीं था क्योंकि सबको एक अदद असामी चाहिए था. मुझको हमेशा डर लगता था कि कहीं कोई पानी में न गिर जाए. बहुत कुली अधेड़ होते थे और अक्सर धोती-कुर्ता पहनते थे, मगर वज़न उठाने तक में जवान कुलियों को मात देते थे. उस समय उनकी लाल वर्दी जितनी आकर्षक लगती थी, फिर कभी नहीं लगी. अब तो कुली भी कम हो गए हैं और उनकी मौजूदगी पर ध्यान कम जाता है. सूटकेस में लगे चक्के और कम सामान लेकर चलने के सबक ने कुलियों से मेल-जोल भुला दिया है. वरना बहुत बार एक ही कुली मिल जाता था और माँ उसको पहचानकर हालचाल भी पूछ लेती थी. उन यात्राओं के हर चरण पर उत्साह था और आज भी वह उत्साह कमोबेश बरकरार है.

फिर भी बहुत कुछ बदला है. वह क्या है ? यात्रा संबंधी अनुभवों को पलटकर देख रही हूँ तो लगता है कि अव्वल तो सुविधाएँ बदली हैं. आय के अनुपात में, उम्र के मुताबिक, काम के हिसाब से, व्यस्तता को देखते हुए. यातायात के साधनों में तकनीकी तरक्की ने भी असर डाला है.
हमारे जैसे मध्यवर्गीय लोगों के लिए पहले हवाई यात्रा विकल्प नहीं थी. अब वह पहला विकल्प बनती जा रही है. यदि निजी काम से जाना हो तब भी एक बार हवाई जहाज़ के टिकट का दाम ज़रूर देख लेते हैं. बहुत ज़्यादा महँगा हुआ तो रेल यात्रा की तरफ आते हैं. हाँ, रात में सोकर जानेवाली यात्रा है तो हवाई यात्रा से बेहतर है रेल यात्रा. मुँह अँधेरे उठकर या देर शाम के घंटे-डेढ़ घंटे के हवाई सफर से अच्छा लगता है कि जाओ ट्रेन में बिस्तर बिछाओ और सो जाओ. अगली सुबह एक नए शहर में हो तो बहुत सुकून मिलता है. जब गाड़ी गंतव्य पर अलस्सुबह न पहुँचे तो हमलोग बड़े स्टेशन का इंतज़ार करते थे जहाँ 10 मिनट गाड़ी रुके और पानी की व्यवस्था हो. ताकि स्टेशन के नल पर जल्दी-जल्दी ब्रश किया जा सके, जिभ्भी की जा सके. जब सूखा नल, गंदा पानी, थूक-खखार दिखता था तो चिढ़ होती थी, मगर शायद आज की तरह उतनी घिन नहीं आती थी. आगे चलकर नागार्जुन की कविता जब पढ़ी तो घिन का समाजशास्त्र अधिक समझ में आया. खैर, स्टेशन पर मुँह धोकर साथ लाए गए खजूर-निमकी खाकर देर सुबह भी कहीं पहुँचना यात्रा को सार्थक कर देता था. दोपहर या शाम को यात्रा करके कहीं पहुँचो तो बासी-बासी लगता है. इसीलिए हवाई यात्रा में भले आराम ज़्यादा हो, मगर ताज़गी कम लगती है.

मुझे बार-बार रामगढ़ या नैनीताल जाते समय काठगोदाम स्टेशन पर उतरना याद आता है. वह भी बाघ एक्सप्रेस से J इतनी ताज़गी रहती है हवा में कि मन खुश हो जाता है. खासकर तब जब आप गर्मीवाली जगह से आए हों और यात्रा का अंतिम पड़ाव आपको उससे निज़ात दिलानेवाला हो तो पूरी यात्रा मुक्तिदायक लगने लगती है. वैसे ही कड़कड़ाती ठंड से गरम बयार की यात्रा तन-मन को उष्णता प्रदान करती है. वाकई यात्रा के दो छोर यदि विपरीत प्रकृति के हों तो भावों का उद्रेक तीव्र होता है.

मौसम ही नहीं, जगह किससे जुड़ी है, यह भी यात्रा को अलग अलग मायने देता है. आप कहीं नौकरी करते हों और वहाँ से घर लौट रहे हों तो यात्रा जितना सुकूनदेह कुछ नहीं. आजीविका कमाने की आपाधापी में यदि आपके कंधे छिल गए हों, देह और दिल पर जख्म हों तो उससे दूर ले जानेवाली किसी भी तरह की यात्रा का आप दिल खोलकर स्वागत करते हैं. मायके से ससुराल और ससुराल से मायके जानेवाली यात्राओं के मूड में तो साफ़ फर्क होता है. लड़की की ससुराल यात्रा है या लड़के की, यह आपको भावमुद्रा, शरीर की मुद्रा से लेकर अर्थमुद्रा खर्च करने के तरीके सबसे झलक जाएगा J दूसरी तरफ अपनी जगह से बाहर निकलनेवाली यात्रा रोमांच, उत्साह, नयापन, चुनौती, उदासी, अकेलापन, मजबूरी हर तरह का भाव लाती है. दरअसल किसी भी तरह की यात्रा के मूल में यात्री का संदर्भ और स्थान से उसका रिश्ता ही यात्री के अनुभवों को गढ़ता है. यात्रा का केंद्र क्या है और केंद्र की ओर या केंद्र से दूर यात्रा हो रही है या आप परिधि में ही चक्कर काट रहे हैं, यह महत्त्वपूर्ण है.

यात्रा को समझना हो तो कौन कहाँ कैसे कब और क्यों का प्रश्न समझना होगा. ऐसा नहीं होता तो मेरे बाबा की हाजीपुर से पटना तक की पैदल यात्रा या नानाजी की शहर के भीतर की साइकिल यात्रा, मेरी बेटी की जर्मनी यात्रा, मेरी मदद करनेवाली जेवंती की सालाना पहाड़ यात्रा या बनारसी की सीतामढ़ी यात्रा, ननदोई की मणिपुर की बस यात्रा और अपने आसपास के लोगों की असंख्य यात्राओं को मैं एक ही तरीके से समझ पाती. जितने अनुभव उतने समझने के औजार होने चाहिए. पंडिता रमाबाई की समुद्री यात्रा पर हुए बवाल को समझने के लिए मुझे 19वीं सदी के महाराष्ट्र के समाज के गठन, उसकी राजनीति से लेकर सुधारकों के व्यक्तित्व और धर्मशास्त्र तक को समझना पड़ा था. इसी तरह अभी रुकैया सखावत हुसैन की कल्पना यात्रा ‘सुल्ताना का सपना’ समझने के लिए तत्कालीन बंगाल, मुसलमान और औरत की दुनिया को जानने के अलावा मैं फैंटेसी के आधार को पकड़ने की जद्दोजहद कर रही हूँ.

समय का सवाल बहुत मायने रखता है यात्रा में - यात्रा कब शुरू हो रही है, उसका मुहूर्त ठीक है या नहीं, उसकी अवधि क्या है, उसकी तैयारी में कितना समय लग रहा है, टुकड़ों में बँट हुई है यात्रा या एक साँस में लगातार चल रही है. घड़ी की सुई पर टकटकी लगी रहती है. समय से गुत्थमगुत्था रहने के कारण ही शायद तनाव पैदा होता है. हर यात्री के चेहरे पर हमें तनाव दिखता है. मेरे जानते असल में समस्या संक्रमण की प्रक्रिया से है. हमें कहीं से कहीं जाने के बीच की प्रक्रिया तनाव देती है. 

यात्रा अपने आप में घटना है और वह घटनापूर्ण हो जाए तब तो क्या बात है ! सहयात्रियों का उसमें बड़ा योगदान होता है. उनकी गप्पें, उनके खर्राटे, उनके कहकहे, उनके अचार का डिब्बा, उनकी रिश्तेदारों से होनेवाली अनबन के किस्से, उनकी राजनीति की दलीलें, सब मिल-मिलाकर यात्रा को या तो रोचक बना देते हैं या झेलाऊ. यों आजकल सहयात्रियों की उदासीनता यात्रा को सुखद बनानेवाली बात मानी जाती है. मुझे तो चुप्पा सहयात्री खलता है. रेल के ए.सी. डिब्बों में, मेट्रो में, हवाई जहाज़ में अधिकतर लोग फोन और लैपटॉप में लगे होते हैं. या अपनी नींद पूरी कर रहे होते हैं. (साधारण डिब्बों में हलचल बची हुई है, यह गनीमत है.) आज मेरे साथ भी ऐसा हुआ. बड़े दिनों बाद दिन भर की रेलयात्रा थी और मैं अपनी थकान मिटा रही थी. लगभग ढाई घंटे सोई मैं. सहयात्रियों का बीच में टोकना-टपकना नहीं हुआ और मुझे वह राहत देनेवाला लगा. लेकिन अब अधूरा अधूरा लग रहा है. चलते समय सामनेवाली सीट की लड़की अपनी माँ को फोन पर झिड़क रही थी कि सारी बात रोमिंग पर ही करोगी क्या, यह मैंने सुना और मुस्कुराई. हल्के से. उस मुस्कुराहट में छटाँक भर विदा लेनेवाला भाव भी छिपा था. बिना किसी से विदा लिए यात्रा ख़त्म कैसे होगी भला !  

रह गई बात दुर्घटना की जो यात्राओं में होती ही रहती है. हाल की रेल दुर्घटना के घाव ताज़ा हैं. जीवन को आगे ले जानेवाली यात्राएँ जीवन लीला की समाप्ति की ओर भी ले जाती हैं. तब भी यात्रा तो रुकती नहीं...


रविवार, 18 सितंबर 2016

घरवाली (Gharwali in Sanskrit)

पोतानेतानपि गृहवति ग्रीष्ममासावसानं
यावन्निर्वाहयतु भवती येन वा केनचिद् वा l 
पश्चादम्भोधरजलपरीपातमासाद्य तुम्बी 
कूष्माण्डी छ प्रभवति तदा भूभुजः के वयं के ? ll


गर्मी के ये दिन बीत जायें बस
बच्चों को सँभाले रहो
ओ घरवाली,
जैसे भी बन पाये, वैसे
फिर आयेगी बरसात गिरेगा पानी
जिसको पाकर फल जायेगी कुम्हड़े और लौकी की बेलें
तब हम क्या
और राजा महाराजा क्या ?


क्षुत्क्षामाः शिशवः शवा इव तनुर्मन्दादरो बान्धवो 
लिप्ता जर्जरकर्करी जतुलवैर्नो मां तथा बाधते l 
गेहिन्या स्फुटितांशुकं घटयितुं कृत्वा सकाकुस्मितं 
कुप्यन्ती प्रतिवेशिनी प्रतिदिनं सूची यथा याचिता ll  


भूख से दुबलाये बच्चे मुर्दों की तरह हो गये हैं
कुछ ही बचे हैं रिश्तेदार
वे भी करते हैं तिरस्कार
जर्जर गगरी लाख से जिसे साधा गया है कितनी ही बार
ये सब नहीं सालते मन को उतना, जितना
घरवाली का फटा वस्त्र सीने को
सूई-धागा लेने पड़ोस में जाना
पड़ोसिन का मुँह बिचकाना, कुढ़ना, मुस्काना


कवि - अज्ञात 
मूलतः विद्याकर के सुभाषितरत्नकोश से संकलित (संपादन दामोदर धर्मानंद कौसांबी) 
पुस्तक - संस्कृत कविता में लोकजीवन 
चयन और अनुवाद - डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी 
प्रकाशन - यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 2010