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मंगलवार, 6 मार्च 2018

नीलाभ की मुद्रा (Neelabh ki mudra by Purwa Bharadwaj)



2018 का दो महीना बीत गया. दिल्ली का हमारा प्रवास 2000 से शुरू हुआ था. इस तरह यहाँ 18 साल पूरे हो गए. अब चाहूँ भी तो अजनबीपन की शिकायत नहीं कर सकती हूँ. दिल्ली उतरने पर लगने लगा है कि अपनी जगह आ गई हूँ. इसका यह मतलब कतई नहीं है कि पटना छूट गया है. पटना के साथ साथ दिल्ली से लगाव हो गया है. लेकिन सोच रही हूँ कि यह लगाव क्या है ? क्या आत्मीयता से इसका रिश्ता है ? मगर ऐसा संभव है कि जो आत्मीय न हो उससे भी लगाव महसूस किया जाए और कोई आत्मीय भले कहलाए, पर उससे लगाव का रिश्ता न हो. दोनों पर्यायवाची भाव नहीं हैं. पूरक भी नहीं, विरोधी भी नहीं. संभवतः लगाव और आत्मीयता दोनों समानांतर चल सकते हैं और कहीं चलकर एकमेक हो जा सकते हैं.

आत्मीय संबंध, आत्मीय लोग, आत्मीयता किसे कहते हैं ? इसको लेकर मैं संशय में हूँ. सोच रही हूँ कि इसका पैमाना क्या है ? न साथ गुज़ारा गया समय, न परिभाषित रिश्ता, न मिलने-जुलने की अवधि, न भौगोलिक निकटता, न वैचारिक संगति, न भावनात्मक सहारा देनेवाला कंधा और न सुख-दुख में भागीदारी. ऐसा सोचने का कारण यह है कि अपने कईआत्मीय रिश्तों को मैंने इनसे परे पाया है. दिलचस्प यह है कि आत्मीयता का पैमाना भले ये सब न हों, मगर इनकी मौजूदगी से आत्मीयता प्रगाढ़ होती है.

और अभी याद आ रहे हैं नीलाभ. नीलाभ से परिचय पटना के दिनों का है, जब वे नवभारत टाइम्स में थे. छात्र आन्दोलन, प्रगतिशील लेखक संघ, इप्टा आदि की सक्रियता ने पत्रकार समूह से हमलोगों को ख़ासा परिचित करा दिया था. नीलाभ से दोस्ती दिल्ली में हुई. उनसे और कविता दोनों से. दोस्ती भी अधिक अपूर्व से थी, लेकिन कब वे इतने आत्मीय बन गए पता नहीं चला. दिल्ली में जो कुछ हासिल किया उसमें नीलाभ की आत्मीयता भी है. हम टिक सके यहाँ उसमें उनका भी योगदान है.

दिल्ली के शुरुआती दिनों में हमलोग दो महीने अमर कॉलोनी में थे. एक चक्करदार और फिर एकदम खड़ी सीढ़ियोंवाले घर में. जल्दी ही हम वहाँ से भाग खड़े हुए थे. बेटी छोटी थी और दो महीने में अड़ोसी-पड़ोसी की सूरत देखने तक को मैं तरस गई थी. हमारा अगला ठिकाना बना शाहपुर जाट. उस मोहल्ले में ही बाद में नीलाभ भी आ गए थे. किराए पर मकान दिलानेवाले एजेंट ने सहायता की और हम पड़ोसी हो गए. अपूर्व को यह जो अच्छा लगा तो उसके कारण अलग थे, मगर मेरे लिए दिल्ली के एक मोहल्ले में पटना के पूर्व परिचित व्यक्ति - नीलाभ के बहाने पटना की मौजूदगी थी वह.

2005 की फरवरी ही थी वह. रात के करीब 3 बजे होंगे जब मुझे फोन पर अपने सबसे छोटे चाचा से खबर मिली कि हमने कनु को खो दिया है. कनु मेरे चाचा की छोटी बेटी. 21 साल की. महज़ दो महीने पहले पता चला था कि उसे कैंसर है. खबर ने सुन्न कर दिया था. फिर होश आया कि बाकी भाई-बहनों को बताने का जिम्मा चाचा ने दिया है. उस वक्त हमारे पास मोबाइल न था. लैंडलाइन था और हमारी लापरवाही से फोन का बिल समय पर चुकता न किए जाने के कारण वह 'वन वे' हो गया था. फोन आ सकता था, जा नहीं सकता था. अब क्या करें ? कनु के बारे में घर के बाकी लोगों को खबर करनी थी. ढाई महीने पहले ही शाहपुर जाट में हमने फिर मकान बदला था और नए मकान मालिक से उतनी नज़दीकी कायम नहीं हुई थी कि आधी रात में उनको उठाकर उनका फोन इस्तेमाल करें. उससे भी बड़ी बात यह थी कि अगले दिन उनके इकलौते बेटे की शादी थी और शादी के घर के फोन से मृत्यु का समाचार देने के लिए कहना भारी महसूस हो रहा था. लगा कि अशुभ मानकर उन्होंने मना कर दिया तो क्या होगा ! तब याद आए नीलाभ.

अपूर्व ने कहा कि नीलाभ से मदद मिलेगी. उनका घर 200-250 मीटर की दूरी पर था.मुझे संकोच हुआ कि वे देर से दफ्तर से आते हैं और पढ़ने-लिखने के बाद सोते भी देर से हैं तो उनकी नींद कैसे ख़राब की जाए. यह भी हिचकिचाहट थी कि नीलाभ से उतनी निकटता नहीं है तो किस हक से उनको तकलीफ दी जाए. उस समय अपूर्व ने कहा कि तुम नीलाभ को नहीं जानती हो, वे अलग किस्म के इंसान हैं. इसका विस्तार मुझे पता नहीं था तब तक.

बिना झिझके अपूर्व ने करीब साढ़े तीन बजे भोर में नीलाभ का दरवाज़ा खटखटाया. हमने सोचा था कि उनके घर से फोन करके रिश्तेदारों को सूचना देकर अपूर्व लौट आएँगे. मसला जानकार नीलाभ ने अपना मोबाइल ही अपूर्व को दे दिया ताकि आगे भी संपर्क करने में हमें सुविधा हो. यह वह समय था जब मोबाइल पर फोन करना बहुत सस्ता न था. नीलाभ के मोबाइल के साथ जब अपूर्व लौटे तो मुझे लगा कि सहृदयता बची हुई है (उदारता, सहायता - जैसे भारी भरकम शब्द नहीं हैं इसके लिए). यह छोटी सी घटना मेरे लिए बहुत गहरी थी.

बाद में हमदोनों ने शाहपुर जाट में ही दुबारा मकान बदला और फिर एकदम अगल-बगल आ गए. हमारे तीनमंज़िला-चरमंज़िला मकानों के मकान मालिक भाई थे और उनके मकानों की निकटता ने हमारी अड्डेबाज़ी को हवा दी. नीलाभ बिहार की मिट्टी में इतना रचे-बसे थे कि पटने की ज़ोरदार सुगंध मुझे अगल-बगल से आने लगी. उसमें कविता राजस्थानी छौंक लगाती रहती थीं.

चूँकि ज़मीन के इंच-इंच का सदुपयोग करने में जाट लोग भी माहिर हैं, हमारे नए मकान की एक दीवार थी. मैं अपने टेरेस से और नीलाभ-कविता अपनी बालकनी से खाने के डोंगों, चाय की केतली वगैरह का आदान-प्रदान कर लेते थे. मेहमानों की अदला-बदली में भी हममें से किसी को कोई संकोच न था. वहीं पी.साईनाथ, अरुणा राय जैसे नामचीन लोगों से लेकर ज़मीनी कार्यकर्ता तक के साथ खाने की बारीकियों और विविधताओं पर गपशप करते मैंने नीलाभ को देखा था.

पटना में जैसे साहित्य, पत्रकारिता और आंदोलन के मुद्दों और लोगों को मैंने घुलते-मिलते देखा था वह मुझे नीलाभ और कविता के घर में वापस दिखा. मेरा जीवन में यकीन मज़बूत हुआ. दिल्ली से जो विराग सा था वह धीरे-धीरे घुलने लगा. उनके घर को देखकर मुझे लगा कि वाकई किसी भी तरह की boundries का धुँधलाना नकारात्मक नहीं है. व्यक्तिगत और राजनीतिक के बीच के दोतरफा रिश्ते की तरह. ज्ञान हो या अध्ययन, काम हो या निजी जीवन उनके बीच कठोर सीमारेखा हो नहीं सकती. इंसान खरा वही है जो व्यक्तित्व की सम-विषम धाराओं को अपने और दूसरों के भीतर एक साथ रहने दे और सुकून के साथ उसे स्वीकार करे. तभी तो नीलाभ की मुस्कुराहट की सौम्यता, चाल की मंथरता और मस्तिष्क की तीक्ष्णता एक साथ मौजूद थी.

मुझको बल देनेवाली बात एक और थी. मेरे घर को लेकर अक्सर जो टिप्पणी की जाती है (और यह भी सही है कि कई बार मेरी खुद उससे सहमति होती है) कि हमारे यहाँ 'निजी' बहुत कुछ नहीं होता, सबको सबकुछ पता होता है - वह बात नीलाभ-कविता के घर में अतिरेक के साथ मौजूद थी. मुझे अच्छा लगा कि chaos बहुतों की ज़िन्दगी का हिस्सा है और उसको लेकर ज़रूरत से ज़्यादा तनावग्रस्त होने की ज़रूरत नहीं है. दिन भर धरना-जुलूस या कोर्ट की उबाऊ प्रक्रियाओं पसीना बहाने के बाद या पत्रिका के दफ्तर में हिन्दी का हिज्जे सुधारने की खिचखिच के बाद कैसे रच-रचकर खाना बनाया जा सकता है और कैसे उसका जातीय-क्षेत्रीय विश्लेषण करने के बाद चटखारे लेकर समूह में उसका भोग किया जा सकता है - यह नीलाभ-कविता के घर से कोई सीखे !

नीलाभ-कविता कहूँ या कविता-नीलाभ - कोई फर्क नहीं पड़ता है. इस युग्म में गजब की ऊर्जा है (थी...कैसे लिखूँ !) धैर्य और लगातार 10000 वोल्ट की रोशनी का कमाल का संयोग है यह. खीझ का नामोनिशान नहीं. नीलाभ की आँख चुँधियाती भी नहीं थी क्योंकि उसमें अथाह प्यार था. मैंने ऐसा रोमांस नहीं देखा. चारों तरफ के शोरोगुल के बीच नीलाभ जिस मोहब्बत और इत्मीनान से कविता को निहारते थे वह रश्क करने लायक है. मुझे अभी अपनी किशोरावस्था में पढ़ा हुआ एदिता मोरिस का 'हिरोशिमा के फूल और वियतनाम को प्यार' याद आ रहा है. युद्ध की पृष्ठभूमि में दान और शिंजो की उत्कट प्रेम कहानी ने उस वक्त बहुत हैरान किया था मुझे, मगर वह असंभव नहीं था, यह दावे से कह सकती हूँ.

इस जोड़े ने पहली बार मुझे यह बतलाया कि साहचर्य का असल मतलब क्या है और शादी नामक संस्था का ठप्पा कितना बेमानी है. दिल से मैंने ऐसे रिश्तों को सम्मान देना सीखा. कह सकती हूँ कि दिल्ली आकर पढ़ाई-लिखाई, आंदोलनों में भागीदारी से अधिक लोगों की असली ज़िन्दगी को देखकर मैंने सीखा. मेरी कई धारणाएँ टूटीं और वैकल्पिक जीवन की विविधताओं को, यौनिकता के रंगारंग आयामों को मैंने खुले मन से स्वीकार किया. साहचर्य नियंत्रण की भाषा नहीं बोलता है, बहस और विपरीत ख़याल की गुंजाइश रहने देता है, इसे गहराई से मैंने महसूस किया.

कम लोग हैं जो इतना ज़िंदगी से लगाव रखते हैं. नीलाभ के लिए ज़िंदगी का मतलब था - काम, पत्रकारिता, भाषा का कार्य-व्यापार, कविता श्रीवास्तव, खाना-पीना, साहित्य, राजनीति, अड्डेबाजी सबकुछ ! वे इतने चाव से सबकुछ करते थे कि अचरज होता था. इतना चाव कहाँ से आया ? जब उनका आउटलुक से विदाई लेते हुए लिखा गया संपादकीय मैंने पढ़ा तो उनकी जड़ों को महसूस किया. कविता-कहानी, इतिहास-पुराण, विश्व साहित्य-भारतीय साहित्य, कला-विज्ञान सबमें उनकी व्याप्ति दिखी. काव्यात्मक भाषा, जीवन के हर अंग से लगाव और निस्पृहता का विचित्र मेल है उसमें.

आज के समय में बड़बोलेपन के बिना हिन्दी में लिखना और उसको सम्मान देना दुर्लभ है. इसलिए भी नीलाभ मुझे अच्छे लगते हैं. उनकी सहजता भूलेगी नहीं, उनका गप्पी मिजाज़ याद रहेगा. उनकी ठहाकेदार हँसी ज्वार-भाटा की तरह थी जो अंत आते आते बेआवाज़ हो जाती थी. मुद्रा ठहाके की बनी रहती थी, मगर स्वर विलीन होता जाता था. अभी उनका भौतिक स्वर हमारे बीच नहीं है, मगर उनकी मुद्रा जीवंत है. मार्क्वेज़ की कथा में कहीं उसका सिरा मिले शायद !



शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

इक-इक पल हम पर भारी है (by Habeeb 'Jalib')

लोगों ही का ख़ूँ बह जाता है, होता नहीं कुछ सुल्तानों को 
तूफ़ां भी नहीं ज़हमत देते उनके संगीं ऐवानों को 

हर रोज़ क़यामत ढाते हैं तेरे बेबस इनसानों पर 
ऐ ख़ालिक़े-इनसाँ, तू समझा अपने ख़ूनी इनसानों को 

दीवारों में सहमे बैठे हैं, क्या ख़ूब मिली है आज़ादी 
अपनों ने बहाया ख़ूँ इतना, हम भूल गए बेगानों को 

इक-इक पल हम पर भारी है, दहशत तक़दीर हमारी है 
घर में भी नहीं महफ़ूज़ कोई, बाहर भी है ख़तरा जानों को 

ग़म अपना भुलाएँ जाके कहाँ,  हम हैं और शहरे-आहो-फ़ुग़ाँ 
हैं शाम से पहले लोग रवाँ अपने-अपने ग़मख़ानों  को 

निकलें कि न निकलें इनकी रज़ा, बंदूक़ है इनके हाथों में 
सादा थे बुज़ुर्ग अपने 'जालिब', घर सौंप गए दरबानों को  

संगीं ऐवानों को = पथरीले महलों को 
ख़ालिक़े-इनसाँ = इनसान को बनानेवाला 
शहरे-आहो-फ़ुग़ाँ = रुदन का नगर 
रवाँ = गतिमान 

शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

"करिहा छमा छठी मैया भूल चूक गलती हमार ..." (Chhath video : Gender analysis by Purwa Bharadwaj)

https://www.youtube.com/watch?v=DG8F-csoRAQ


'पहिले पहिल छठी मैया' यह पिछले साल का वीडियो है, मगर मैंने अभी पिछले महीने देखा था. उसके बाद कई बार नज़र से गुज़रा.  इधर तो सोशल मीडिया में यह तेज़ी से घूमने लगा है. छठ जो नज़दीक है !

बिहार के महत्त्वपूर्ण त्योहार छठ पर केन्द्रित इस वीडियो से गैर-बिहारी भी अपने को जोड़ सकते हैं. अपने अपने प्रदेश की संस्कृति से दूर जाने की कसक सबको है. इसमें अतीत की खूबसूरत चीज़ों के छूट जाने का दर्द ऐसे पिरोया हुआ है कि उसका साधारणीकरण होने में देर नहीं लगती है.

यह कहना झूठ होगा कि इसे देखकर मैं भावुक नहीं हुई. माँ के छठ करने की पावन याद जग गई और तकलीफ हुई इसके छूट जाने पर. लेकिन जेंडर आधारित भूमिका, पितृसत्ता का जाल, पितृत्ववाद (Paternalism)की चिकनी-चुपड़ी गलियाँ अब एकदम अनजानी नहीं हैं. थोड़ी थोड़ी पहचान होने लगी है इनसे. इसलिए वीडियो का एक एक शॉट समझ में आने लगा. कितनी बारीकी से सारा सरो सामान जुटाया गया है.

सोमवार, 28 अगस्त 2017

दिन कैसा गुज़रा (By Purwa Bharadwaj)

आज का दिन कैसा गुज़रा, यह क्या हमलोग हमेशा सोचते हैं ? नहीं। जब दिन अच्छा बीतता है तब और जब बुरा बीतता है तब शायद अधिक इसका ख़याल आता है। जब पूरे दिन आपा-धापी रहती है तब और जब निठल्ले बैठे रहो तब भी यह दिमाग में चक्कर काटता है।

हाँ, बीच बीच में बेटी से या अपूर्व से बाहर से आने पर यह सवाल पूछ लेती हूँ। कभी तार जोड़ने के लिए, कभी बात छेड़ने के लिए, कभी जानने के लिए, कभी अपनी कुढ़न को सांकेतिक रूप से पहुँचाने के लिए, कभी ध्यान भटकाने के लिए तो कभी यों ही। मुझसे भी जब तब यह सवाल पूछा जाता है. अमूमन रुटीन की तरह जवाब दे देती हूँ, लेकिन कभी कभी यह पिटारा खोल देता है.

परसों की बात है. माँ ने पूछा कि आज क्या क्या किया। पता नहीं क्यों मैं जवाब नहीं दे पाई. मैंने टाल दिया. बात इधर-उधर करते हुए मैं सोचती जा रही थी कि आखिर कभी कभी सीधे से सवाल का सीधा जवाब देना क्यों मुश्किल हो जाता है. शायद बहुत बात होती है तो झटपट उसका सारांश बताना कठिन होता है. या इतनी मामूली बात होती है कि उल्लेखनीय नहीं लगती है. या नयापन नहीं होता है तो दोहराने की ऊब से बचने का जी करता है. अगले की दिलचस्पी होगी या नहीं, यह ख़याल भी कभी कभी रोक देता है. या बात करनेवाला माध्यम - फोन, Chat, वीडियो कॉल वगैरह बाधक बनता है. रूबरू होने पर सवाल करनेवाले और जवाब देनेवाले के रिश्ते का स्वरूप निर्णायक भूमिका निभा सकता है. दिलो दिमाग का तापमान भी मायने रखता है. जगह और समय तो है ही महत्त्वपूर्ण. कहना गलत न होगा कि अनगिनत variables होते हैं.

बात यह भी है कि किस काम को हम काम गिनते हैं और किसको करने से हमें संतोष होता है. अनचाहा या रुटीन वाला काम करने पर भी उसकी गिनती हम खुद नहीं करते. बेमन से अपना मनचाहा काम भी मशीनी हो जाता है. इसलिए हमें उसकी working memory भी नहीं रहती. उसमें किस किस तरह की प्रक्रियाएँ हुईं, शारीरिक-मानसिक ऊर्जा को कहाँ कहाँ हमने खर्च किया, यह याद नहीं रहता. क्यों ?

पिछले दिनों बच्चों के साथ कला के माध्यम से काम करनेवाले लोगों के प्रशिक्षण की तैयारी करने के क्रम में मैं Multitasking और Creativity के बारे में पढ़ रही थी. उसका एक शिरा मनोविज्ञान की गलियों में चला गया था. भारी भरकम पारिभाषिक पदों की गिरह खोलने की इच्छा बहुत हो रही थी, लेकिन मैंने अपने को थाम लिया. Cognitive fragmentation, Cognitive load, Cognitive resources को समझना बहुत ज़रूरी है, मगर वह डगर कहीं और जाती है. हाँ, अच्छा लगा कि इंटरमीडिएट में पढ़े हुए मनोविज्ञान की बुनियादी बातें स्मृति में कहीं दबी पड़ी थीं. आगे जाकर जेंडर के मुद्दे के तहत भावना और विवेक के द्वंद्व को समझने में इस मनोविज्ञान ने थोड़ी मदद की थी. उसके सहारे मैं दिन कैसा गुज़रा, इस सवाल की परतों को भी देखना चाह रही थी.

माँ का फोन रखते हुए मुझे अपने पर खीझ हुई कि कम से कम आज मेरे पास बताने को कितना कुछ था. पिछले कई महीनों से मैं गाँधी पर प्रस्तुति के लिए जिस स्क्रिप्ट पर काम कर रही थी उसने एक शक्ल आज ही ली थी. वंदना राग का अनुवाद आ गया था और उसकी लयात्मकता देखकर मैं खुश थी कि स्क्रिप्ट का एक अंश जम गया. बाकी रचनाओं की सॉफ्ट कॉपी रिज़वाना के सौजन्य से मिल चुकी थी और उन सबको जोड़ने के काम में मैं जुटी हुई थी, लेकिन खुद संतुष्ट नहीं हो पा रही थी.कई बार सीवन उधेड़ी, जोड़ा-घटाया, पर गाड़ी पटरी पर आई आज ही.

इस दौरान कुछ अंशों का अनुवाद करना मेरे जिम्मे था. भाषा के खेल में आनंद आता है मुझे और अनुवाद की चुनौतियों से अच्छी तरह वाकिफ हूँ. इसलिए अनुवाद शुरू करने के पहले चुनिंदा विदेशी महिलाओं की पृष्ठभूमि समझना ज़रूरी था. उस चक्कर में हुआ यह कि उनकीअंग्रेज़ी से जूझना छोड़कर मैं डेनमार्क, नॉर्वे, फ़िनलैंड से लेकर इंग्लैंड-अमेरिका में उनके कार्यक्षेत्रों का दौरा करने लगी थी. (गूगल के नक़्शे की मदद से)

इतिहास पलटने से मुझे यह समझ में आया कि फिनलैंड के स्कूलों में होम वर्क, परीक्षा जैसी अनिवार्य मानी जानेवाली चीज़ों को क्यों हटा दिया जाना संभव हुआ है. डेनमार्क के Nikolaj Frederik Severin Grundtvig या  N. F. S. Grundtvig  (17831872) जैसे क्रांतिकारी विचारक ने आसपास के देशों को ही नहीं, सुदूर देशों को भी प्रभावित किया था. राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक तरक्की की सीढ़ी चढ़ने में  Grundtvig के विचारों का बड़ा योगदान है. उसी में मुझे आज ऐनी मेरी पीटरसन द्वारा पंडिता रमाबाई के स्कूल पर टिप्पणी मिल गई थी. साथ ही, शांति निकेतन, गाँधी आश्रम सहित अनेक संस्थानों की शिक्षा पद्धतियों की संक्षिप्त समीक्षा थी. नेशनल क्रिश्चन गर्ल्स स्कूल खोलने की उनकी इच्छा से हाल-फिलहाल की धर्मांतरण की बहस याद आ गई थी.

अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस अखबार का पूरा पन्ना केरल की अखिला से हदिया की यात्रा पर देखा तो पंडिता रमाबाई के धर्मांतरण पर होनेवाले विवाद का पन्ना आँखों के आगे आ गया. सवा सौ साल पहले भी वह राष्ट्रीय मुद्दा बना था और खूब अखबारबाजी हुई थी और आज भी वही आलम है. एक लड़की, एक औरत किसी से असंतुष्ट होकर दूसरे का वरण कर सकती है, यह अकल्पनीय लगता है समाज को. उसमें भी वह व्यक्ति नहीं, धर्म को चुनने का मसला हो तो मामला और संगीन हो जाता है. मुझे मन किया कि अगले दिन ही सही माँ को फोन करूँ और उसको बताऊँ कि कल और आज मैंने कैसे गुज़ारा. वह मेरे मन को मेरे 'हैलो' कहने के अंदाज़ भर से पकड़ लेगी.

माँ को प्रिंगल की कारस्तानी भी बतानी थी जो नहीं बताई. मैडम को रोटी दी थी तो मुँह फेरकर चली गई थीं. थोड़ी देर बाद रसोई के स्लैब पर हाथ रखकर उचक रही थीं कि किसी कोने से चिकेन-मटन निकल आए. घर में था ही नहीं तो उनको मिलता कैसे. मैंने सोच रखा था कि शाम को पक्का मँगा दूँगी. फिलहाल चावल-अंडा और दही से काम चलाऊँ, यह योजना थी जो कि अमल में लाई गई. प्रिंगल ने करम फरमाया और चटपट चावल-अंडा और दही खा गई, लेकिन नीचे में रोटी के टुकड़े पड़े रह गए. फुसलाने का कोई असर न हुआ. दौड़ा-दौड़ी ने भी उसका मूड फ्रेश नहीं किया. दरवाज़े पर उदासीन सी वह लेट गई.

बेटी बाहर से आईं तो प्रिंगल मैडम की हरकत देखते बनती थी. ऐसे नाच रही थीं मानो बस वो हैं और उनकी प्यारी हैं. मेरी मौजूदगी का किसी को अहसास ही नहीं था. पास खड़ी होकर मैं इस बेमुरव्वती को देखकर मुस्कुरा रही थी. सोचा कि अपूर्व को सारा किस्सा बताऊँगी. इसमें दिमाग नहीं खपाया कि क्या क्या और कितना बताऊँगी. दिन गुज़रा, यह महत्त्वपूर्ण था. अच्छा-बुरा, उत्पादक-अनुत्पादक का लेबल लगाने के लिए हम क्यों तड़पते रहते हैं. Redundancy का भी अपना महत्त्व है. वह ज़रूरी है. जैसे भाषा में वैसे जीवन में, अपनी दिनचर्या में.



शनिवार, 19 अगस्त 2017

इतना तो बल दो (Itna to bal do by Trilochan)


यदि मैं तुम्हें बुलाऊँ तो तुम भले न आओ
                  मेरे पास, परन्तु मुझे इतना तो बल दो
                  समझ सकूँ यह, कहीं अकेले दो ही पल को
मुझको जब-तब लख लेती हो I नीरव गाओ


प्राणों के वे गीत जिन्हें मैं दुहराता हूँ I
                 सन्ध्या के गम्भीर क्षणों में शुक्र अकेला
                 बुझती लाली पर हँसता है I निशि का मेला
इसकी किरणों में छाया-कम्पित पाता हूँ


एकाकीपन हो तो जैसा इस तारे का
                 पाया जाता है वैसा हो I बास अनोखी
                 किसी फूल से उठती है, मादकता चोखी
भर जाती है, नीरव डण्ठल बेचारे का
                 पता किसे है, नामहीन किस जगह पड़ा है ?
                 आया फूल, गया, पौधा निर्वाक् खड़ा है I


कवि - त्रिलोचन (20 अगस्त, 1917 - 9 दिसंबर2007) 

संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
संपादन - केदारनाथ सिंह 
प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, प्रथम संस्करण - 1985

रविवार, 13 अगस्त 2017

अर्थी (By Purwa Bharadwaj)

कल दिन की बात है. एक कागज़ खोजने के चक्कर में मैंने सारी फ़ाइल खँगाल डाली. फिर बारी आई सिरहाने और पैताने रखे कागज़ात की. [परंपरा का निर्वाह करते हुए मैं भी अपने बिस्तर के नीचे कागज़-पत्तर रखती हूँ. आलमारी में सहेजने से ज़्यादा आसान है यह तरीका. तोशक उठाओ और फट से डाल दो.]  इक्का दुक्का कागज़ नहीं, पूरा ज़खीरा है वहाँ. उसमें बीमा की रसीद, पेट्रोल की पर्ची, एक्वा गार्ड का AMC, लैपटॉप की वारंटी, चेकबुक, पुरानी तस्वीर, बीसियों विजिटिंग कार्ड आदि से लेकर सफलसे खरीदी गई सब्ज़ियों का बिल तक था जिसे मैंने फुर्सत में मिलान करने और सब्ज़ियों का ताज़ा भाव जानने के लिहाज़ से रख छोड़ा था. एक रूलदार पन्ने पर एक सूची भी मिली. मैंने पढ़ना शुरू किया ताकि फालतू हो तो फेंक दूँ. पहला शब्द जो था उस पर मैं ठिठक गई. जानते हैं वह शब्द क्या था ? अर्थी. सही हिज्जे और साफ़ अक्षर. सामने दाम लिखा था. वह सूची 20 रुपए के गंगाजल और 30 रुपए की फुलमालापर ख़त्म होती थी.

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

हल्कापन (By Purwa Bharadwaj)


हल्कापन क्या बुरी चीज़ है ?

नहीं तो !

यह इस पर निर्भर करता है कि हम किस चीज़ के हल्केपन की बात कर रहे हैं.

हल्कापन भारहीनता का द्योतक है. इस अर्थ में मुझे याद है 'नैषधीयचरितम्' का वह श्लोक जिसमें दमयंती के सौंदर्य की पराकाष्ठा का वर्णन था. उसका भावार्थ था कि विधाता ने जब दमयंती के रूप को तौलना चाहा था तो वह इतना भारी था कि धरती पर आ गया और तुला के दूसरे पलड़े पर बटखरे के रूप में रखे गए तारे इतने हल्के थे कि ऊपर आसमान में टंग गए. यह हल्कापन तो अनमोल है.