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सोमवार, 5 अगस्त 2013

मेघ मल्लार (Megh mallar by Nirala)

श्याम घटा घन घिर आयी l
पुरवाई फिर फिर आयी l 

बिजली कौंध रही है छन-छन,
काँप रहा है उपवन-उपवन,
चिड़ियाँ नीड़-नीड़ में निःस्वन,
सरित-सजलता तिर आयी l 

गृहमुख बूँदों के दल टूटे,
जल के विपुल स्रोत थल छूटे,
नव-नव सौरभ के दव फूटे,
श्री जग-तरु के सर आयी l 
(संगम, साप्ताहिक, इलाहाबाद, 7 अगस्त, 1949)


कवि - निराला
संग्रह - असंकलित कविताएँ : निराला 
संपादक - नन्दकिशोर नवल 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1981

शनिवार, 18 मई 2013

विरहिणी पर व्यंग (Virahini par vyang by Nirala)


(घनाक्षरी)
हार  मन  मार मार  की  बहू ललाट ठोंक 
काजल  बहा  कपोल  कुत्सित किया करें l 
अंचल ? लजी मशालची की लालटेन काली 
नेत्र  जल  से  प्रबल  नासिका  सदा   झरे l 
कल्पना  ललाम  की लगाम थाम कविदल 
मुख तुलना  न  कभी  चन्द्र  के बिना करे l 
चाँद  आइने  में  चारु  चित्र  देख  चुप  वह 
तकिया  सहारे  पड़ी  तारे  ही  गिना  करे l 

[आदर्श, मासिक, कलकत्ता, वर्ष 1, अंक 2-4, पौष-माघ, 1979 (1922ई.)]

कवि - निराला
संग्रह - असंकलित कविताएँ : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला में 
रामविलास शर्मा की 'निराला की साहित्य साधना - 1' से 
संपादक - नन्दकिशोर नवल 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1981

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

वासन्ती (Vaasanti by Nirala)

अति ही मृदु गति ऋतुपति की
प्रिय डालों पर, प्रिय, आओ,
पिक के पावन पंचम में
गाओ, वन्दन-ध्वनि गाओ !

प्रिय, नील-गगन-सागर तिर,
चिर, काट तिमिर के बन्धन,
उतरो जग में, उतरो फिर,
भर दो, पग-पग नव स्पन्दन !

सिहरे द्रुम-दल, नव पल्लव
फूटें डालों पर कोमल,
लहरे मलयानिल, कलरव
भर लहरों में मृदु-चंचल !

मुद्रित-नयना कलिकाएँ
फिर खोल नयन निज हेरें,
पर मार प्रेम के आयें,
अलि, बालाएँ मुँह फेरें !

फागुन का फाग मचे फिर,
गावें अलि गुञ्जन -होली,
हँसती नव हास रहें घिर,
बालाएँ डालें रोरी !

मञ्जरियों के मुकुटों में
नव नीलम आम-दलों के
जोड़ो मञ्जुल घड़ियों में
ऋतुपति को पहनाने को
झुक डालों की लड़ियों में l

अयि, पल्लव के पखनों पर
पालो कोमल तन पालो,
आलोक-नग्न पलकों पर
प्रिय की छवि खींच उठा लो l

भर रेणु-रेणु में नभ की,
फैला दो जग की आशा,
खुल जाय खिली कलियों में
नव-नव जीवन की आशा l

प्रिय, केशर के रञ्जन की,
मसि से पत्रों पर लिख दो -
"जग, है लिपि यह नूतन की
सिख लो, तुम भी कुछ सिख लो !

"अति गहन विपिन में जैसे
गिरि के तट काट रही हैं
नव-जल-धाराएँ, वैसे
भाषाएँ सतत बही हैं l"

फिर वर्ष सहस्र पथों से,
आया हँसता-मुख आया,
ऋतुओं के बदल रथों से
लाया तुमको हर लाया !

हाँ, मेरे नभ की तारा
रहना प्रिय, प्रति निशि रहना,
मेरे पथ की ध्रुव धारा
कहना इंगित से कहना !

मैं और न कुछ देखूँगा
इस जग से मौन रहूँगा,
बस नयनों की किरणों में
लख लूँगा, कुछ लख लूँगा !

नव किरणों के तारों से
जग की यह वीणा बाँधो,
प्रिय, व्याकुल झंकारों से,
साधो, अपनी गत साधो !

फिर उर-उर के पथ बन्धुर,
पग-द्रवित मसृण ऋजु कर दो,
खर नव युग की कर-धारा
भर दो द्रुत जग में, भर दो !

फिर नवल कमल-वन फूलें
फिर नयन वहाँ पथ भूलें,
फिर झूलें नव वृन्तों पर
अनुकूलें अलि अनुकूलें l


कवि - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
किताब - निराला रचनावली, भाग - 1
संपादक - नन्दकिशोर नवल
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1983

बुधवार, 19 सितंबर 2012

कालेज का बचुआ (College ka bachua by Nirala)



जब से  एफ. ए. फेल हुआ,
हमारा कालेज का बचुआ l 
                
                 नाक  दाबकर  सम्पुट साधै,
                 महादेवजी    को    आराधै,
                 भंग  छानकर रोज़ रात को
                             खाना मालपुआ l

                वाल्मीकि   को  बाबा  मानै,
                नाना   व्यासदेव  को   जानै,
                चाचा  महिषासुर  को, दुर्गा
                            जी को सगी बुआ l

                 हिन्दी का लिक्खाड़ बड़ा वह,
                 जब देखो  तब अड़ा पड़ा वह,
                 छायावाद    रहस्यवाद     के
                               भावों का बटुआ l

                  धीरे-धीरे   रगड़-रगड़   कर
                  श्रीगणेश से झगड़-झगड़ कर,
                  नत्थाराम  बन  गया  है अब
                               पहले का नथुआ l

                  हमारे  कालेज  का  बचुआ l



कवि - निराला
संग्रह - असंकलित कविताएँ : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला में 
रामविलास शर्मा की 'निराला की साहित्य साधना - 1' से 
संपादक - नन्दकिशोर नवल 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1981

किताब की भूमिका के मुताबिक डॉ. रामविलास शर्मा ने जो विवरण दिया है उससे लगता है कि 'कालेज का बचुआ' कविता " 'सुधा' में निकली थी, जब निराला उसमें काम करने लगे थे और वह आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पर निराला पर उनके द्वारा किये जानेवाले आक्षेपों के उत्तर में लिखी गयी थी. डॉ. शर्मा ने इस कविता का शीर्षक नहीं दिया है."