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शनिवार, 1 मार्च 2014

पगला मल्लाह (Pagla mallah by Bachchan)

(उत्तर प्रदेश की एक लोकधुन पर आधारित)

                    डोंगा डोले,
          नित गंग-जमुन के तीर,
                    डोंगा डोले l 

                    आया डोला,
                   उड़न खटोला,
एक परी परदे से निकली पहने पंचरंग चीर l 
                    डोंगा डोले,
           नित गंग-जमुन के तीर,
                    डोंगा डोले l 

                    आँखें टक-टक,
                    छाती धक-धक,
कभी अचानक ही मिल जाता दिल का दामनगीर l 
                      डोंगा डोले,
            नित गंग-जमुन के तीर,
                      डोंगा डोले l 

                      नाव बिराजी,
                       केवट राजी,
डाँड़ छुई भर, बस आ पहुँची संगम पर की भीड़ l
                      डोंगा डोले,
             नित गंग-जमुन के तीर,
                      डोंगा डोले l 

                      मन मुसकाई,
                       उतर नहाई,
'आगे पाँव न देना, रानी, पानी अगम-गभीर'l 
                      डोंगा डोले,
           नित गंग-जमुन के तीर,
                     डोंगा डोले l 

                     बात न मानी,
                      होनी जानी,
बहुत थहाई, हाथ न आई जादू की तस्वीर l 
                      डोंगा डोले,
             नित गंग-जमुन के तीर,
                      डोंगा डोले l 

                     इस तट, उस तट,
                      पनघट, मरघट,
                        बानी अटपट ;
हाय, किसी ने कभी न जानी माँझी-मन की पीर l 
                          डोंगा डोले,
                नित गंग-जमुन के तीर,
         डोंगा डोले l डोंगा डोले l डोंगा डोले l …


कवि - हरिवंशराय बच्चन 
संकलन - कविता नदी 
संपादक - प्रयाग शुक्ल 
प्रकाशक - महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि.वि. के लिए 
                किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2002




मंगलवार, 7 जनवरी 2014

निशा-निमन्त्रण (Nisha-nimantran by Bachchan)

              साथी, सो न, कर कुछ बात !

              बोलते उडुगण परस्पर,
              तरु दलों में मन्द 'मरमर',
बात करतीं सरि-लहरियाँ कूल से जल-स्नात !
             साथी, सो न, कर कुछ बात !

             बात करते सो गया तू,
             स्वप्न में फिर खो गया तू,
रह गया मैं और आधी बात, आधी रात !
             साथी, सो न, कर कुछ बात !

             पूर्ण कर दे वह कहानी,
             जो शुरू की थी सुनानी,
आदि जिसका हर निशा में, अन्त चिर-अज्ञात !
             साथी, सो न, कर कुछ बात !

कवि - हरिवंशराय बच्चन
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : हरिवंशराय बच्चन
संपादक - मोहन गुप्त
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1986


मन है कि स्थिर ही नहीं हो रहा ! बच्चन की ये पंक्तियाँ  - "साथी, सो न, कर कुछ बात !" बार-बार याद आ रही हैं.

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

निशा-निमन्त्रण (Nisha-nimantran by Bachchan)

               रात आधी हो गयी है !

               जागता मैं आँख फाड़े,
               हाय, सुधियों के सहारे,
जबकि दुनिया स्वप्न के जादू-भवन में खो गयी है !
               रात आधी हो गयी है !

               सुन रहा हूँ, शान्ति इतनी,
               है टपकती बूँद जितनी,
ओस की जिनसे द्रुमों का गात रात भिगो गयी !
               रात आधी हो गयी है !

               दे रही कितना दिलासा,
               आ झरोखे से ज़रा-सा 
चाँदनी पिछले पहर की पास में जो सो गयी है !
               रात आधी हो गयी है !


कवि - हरिवंशराय बच्चन
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : हरिवंशराय बच्चन
संपादक - मोहन गुप्त
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1986

रविवार, 16 दिसंबर 2012

मुझे पुकार लो (Mujhe pukar lo by Harivansh Rai Bachchan)


इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो !

ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे नहीं ज़बान खोलता,
नहीं जगह कहीं जहाँ न अजनबी गिना गया,
कहाँ-कहाँ न फिर चुका दिमाग़-दिल टटोलता,
कहाँ मनुष्य है कि जो उम्मीद छोड़कर जिया,
इसीलिए अड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो ;
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो !

तिमिर-समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी,
विनष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी,
न कूल भूमि का मिला, न कोर भोर की मिली,
न कट सकी, न घट सकी विरह-घिरी विभावरी,
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे दुलार लो !
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो !

उजाड़ से लगा चुका उमीद मैं बहार की,
निदाघ से उमीद की बसन्त के बयार की,
मरुस्थली मरीचिका सुधामयी मुझे लगी,
अँगार से लगा चुका उमीद मैं तुषार की,
कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गड़ी,
इसीलिए खड़ा रहा कि भूल तुम सुधार लो !
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो !
पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो !


कवि - हरिवंशराय बच्चन
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : हरिवंशराय बच्चन
संपादक - मोहन गुप्त
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1986

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

एक नया अनुभव (Ek naya Anubhav by Bachchan)


मैंने चिड़िया से कहा, 'मैं तुम पर एक 
कविता लिखना चाहता हूँ ।'
चिड़िया ने मुझ से पूछा, 'तुम्हारे शब्दों में 
मेरे परों की रंगीनी है ?'
मैंने कहा, 'नहीं ।'
'तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है ?'
'नहीं ।'
'तुम्हारे शब्दों में मेरे डैनों की उड़ान है ?'
'नहीं ।'
'जान है ?'
'नहीं ।'
'तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे ?'
मैंने कहा, 'पर तुमसे मुझे प्यार है ।'
चिड़िया बोली, 'प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है ?'
एक अनुभव हुआ नया ।
मैं मौन हो गया !


कवि - हरिवंशराय बच्चन
संकलन - हरिवंशराय बच्चन : प्रतिनिधि कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1986