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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

ख़ुशी भी है (Khushi bhi hai by 'Akhtar' Sheerani)

ख़यालिस्ताने-हस्ती में अगर ग़म है, ख़ुशी भी है
कभी आँखों में आँसू हैं, कभी लब पर हँसी भी है 
इन्हीं ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा 
अँधेरी  रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है
यूँ ही तकमील होगी हश्र तक तस्वीरे-हस्ती की 
हरेक तकमील आख़िर में पयामे-नेस्ती भी है 
ये वो सागर है, सहबा-ए-ख़ुदी से पुर नहीं होता 
हमारे जामे-हस्ती में सरश्के-बेख़ुदी भी है 


तकमील = पूर्ण
हश्र = क़यामत 
तस्वीरे-हस्ती = जीवन के चित्र की
पयामे-नेस्ती = मृत्यु का संदेश 
सहबा-ए-ख़ुदी = अहं की शराब
पुर नहीं होता = नहीं भरता
जामे-हस्ती = जीवन के प्याले में  
सरश्के-बेख़ुदी = आत्मविस्मृति का आँसू



शायर - 'अख़्तर' शीरानी  
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : 'अख़्तर' शीरानी

संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - राधाकृष्ण पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 2010

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

भुला दें (Bhula dein by 'Akhtar' Sheerani)

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें 
मुहब्ब्त करें, ख़ुश रहें, मुस्कुरा दें 


ग़ुरूर और हमारा ग़ुरूरे-मुहब्ब्त 
महो-मेह्र को उनको दर पर झुका दें 


जवानी हो गर जाविदानी तो या रब 
तिरी सादा दुनिया को जन्नत बना दें 


शबे-वस्ल की बेख़ुदी छा रही है 
कहो तो सितारों की शमएँ बुझा दें 


इबादत है इक बेख़ुदी से इबारत 
हरम को मए-मुश्कबू से बसा दें 


बनाता है मुँह तल्ख़ि-ए-मै से ज़ाहिद 
तुझे बाग़े-रिज्वाँ से कौसर मँगा दें !

तुम अफ़सान-ए-क़ैस क्या पूछते हो !
इधर आओ, हम तुमको लैला बना दें

ये बेदर्दियाँ कब तक ऐ दर्दे-ग़ुरबत !
बुतों को फिर अर्ज़े-हरम में बसा दें 

उन्हें अपनी सूरत पे यूँ नाज़ कब था !
मिरे इश्क़े-रुसवा को 'अख़्तर' दुआ दें

महो-मेह्र = चाँद-सूरज 
जाविदानी = अनश्वर 
शबे-वस्ल = मिलन की रात
हरम = मस्जिद या काबा 
मए-मुश्कबू = सुगन्धित मदिरा 
तल्ख़ि-ए-मै = शराब की कड़वाहट 
बाग़े-रिज्वाँ = स्वर्ग का बाग़ 
कौसर = स्वर्ग की शराब की एक नदी
अफ़सान-ए-क़ैस = मजनूँ की कहानी
दर्दे-ग़ुरबत = परदेस का दर्द 
अर्ज़े-हरम= काबे की धरती पर
इश्क़े-रुसवा = बदनाम प्रेम

शायर - 'अख़्तर' शीरानी संकलन - प्रतिनिधि शायरी : 'अख़्तर' शीरानी
संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - राधाकृष्ण पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 2010

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

कोई दिन और (Koi din aur by 'Akhtar' Sheerani)

ग़मख़ान-ए- हस्ती में हैं मेहमाँ कोई दिन और 
कर ले हमें तक़दीर परीशाँ कोई दिन और 

तुरबत वो जगह है की जहाँ ग़म है न हैरत 
हैरतकद-ए-ग़म में हैं हैराँ कोई दिन और 

यारों से गिला है न अज़ीज़ों से शिकायत 
तक़दीर में है हसरतो-हिरमाँ कोई दिन और 

पामाले-ख़िजाँ होने को हैं मस्त बहारें 
है सैरे-गुलो-हुस्ने-गुलिस्ताँ कोई दिन और 

मर जाएँगे जब हम तो बहुत याद करेगी 
जी भर के सता ले शबे-हिजराँ कोई दिन और 

आज़ाद हूँ आलम से तो आज़ाद हूँ ग़म से 
दुनिया है हमारे लिए ज़िन्दाँ कोई दिन और 

हस्ती कभी क़ुदरत का इक एहसान थी हम पर
अब हम पे है क़ुदरत का ये एहसाँ कोई दिन और 

लानत थी गुनाहों की नदामत मिरे हक़ में 
है शुक्र की इसमें हैं पशेमाँ कोई दिन और 


'शेवन' को कोई ख़ुल्दे-बरीं में ये ख़बर दे 
दुनिया में अब 'अख़्तर' भी है मेहमाँ कोई दिन और 


ग़मख़ान-ए- हस्ती  = जीवन रूपी दुखों का आगार  ; तुरबत = क़ब्र ; हैरतकद-ए-ग़म = दुखों का आश्चर्यलोक ; हसरतों-हिरमाँ = अधूरी इच्छाएँ और दुख ; पामाले-ख़िजाँ = पतझड़ से पामाल ; सैरे-गुलो-हुस्ने-गुलिस्ताँ= फूलों की सैर और उपवन की सुन्दरता ; शबे-हिजराँ= वियोग की रात ; ज़िन्दाँ = क़ैदखाना ; नदामत = शर्मिन्दगी ; पशेमाँ = शर्मिन्दा ; शेवन = एक शायर का उपनाम ; ख़ुल्दे-बरीं = सबसे ऊँचे स्वर्ग में


शायर - 'अख़्तर' शीरानी संकलन - प्रतिनिधि शायरी : 'अख़्तर' शीरानी
संपादक - नरेश 'नदीम'

प्रकाशक - राधाकृष्ण पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 2010

रविवार, 1 सितंबर 2013

ग़ज़ल (Ghazal by 'Akhtar' Sheerani)

ग़मे-ज़माना नहीं, इक अज़ाब है साक़ी 
शराब ला, मिरी हालत ख़राब है साक़ी

शबाब के लिए तौबा अज़ाब है साक़ी 
शराब ला, मुझे पासे-शबाब है साक़ी 

उठा पियाला कि गुलशन पे फिर बरसने लगी 
वो मै कि जिसका क़दह माहताब है साक़ी 

निकाल पर्द-ए-मीना से दुख़्तरे-रज़ को 
घटा में किसलिए ये माहताब है साक़ी 

तू वाइज़ों की न सुन, मैकशों की ख़िदमत कर 
गुनह सवाब की ख़ातिर सवाब है साक़ी 

ज़माने भर के ग़मों को है दावते-ग़र्रा
कि एक जाम में सबका जवाब है साक़ी 

कलाम जिसका है मेराजे-हाफ़िजो-ख़य्याम 
यही वो अख़्तरे-ख़ानाख़राब है साक़ी 

अज़ाब = मुसीबत 
पासे-शबाब = जवानी का ख़याल 
क़दह = शराब का घड़ा 
पर्द-ए-मीना = शराब की सुराही के पर्दे से 
दुख़्तरे-रज़ = अंगूर की बेटी यानी शराब
दावते-ग़र्रा = खुली दावत
मेराजे-हाफ़िजो-ख़य्याम = हाफ़िज़ और ख़य्याम नामक शायरों का     पैमाना  
अख़्तरे-ख़ानाख़राब = घर का बरबाद
अख़्तर



शायर - 'अख़्तर' शीरानी संकलन - प्रतिनिधि शायरी : 'अख़्तर' शीरानी

संपादक - नरेश 'नदीम'

प्रकाशक - राधाकृष्ण पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 2010

रविवार, 28 जुलाई 2013

ग़ज़ल (Ghazal by 'Akhtar' Sheerani)

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए !
रात-दिन सूरत को देखा कीजिए 
चाँदनी रातों में इक-इक फूल को 
बेख़ुदी कहती है : सज्दा कीजिए 
जो तमन्ना बर न आए उम्र भर 
उम्र भर उसकी तमन्ना कीजिए ! 
इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर 
चाँदनी रातों में रोया कीजिए 
पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो 
बेख़ुदी, तू ही बता क्या कीजिए ! 
हम ही उसके इश्क़ के क़ाबिल न थे 
क्यों किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए ! 
आप ही ने दर्दे-दिल बख़्शा हमें 
आप ही इसका मुदावा कीजिए 
कहते हैं 'अख़्तर' वो सुनकर मेरे शे'र 
इस तरह हमको न रुसवा कीजिए ! 
 
बर न आए = पूरी न हो           मुदावा = इलाज 
 
शायर - 'अख़्तर' शीरानी
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : 'अख़्तर' शीरानी

संपादक - नरेश 'नदीम'

प्रकाशक - राधाकृष्ण पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 2010

सोमवार, 15 जुलाई 2013

युअर हाइनेस (Your Highness by 'Akhtar' Sheerani)

मैं जब कमसिन था और तू अपने सीने लगाती थी 
तिरी हँसती हुई नज़रों से मुझको शर्म आती थी 
कमसिन = कम उम्र 

मचलता था मैं तेरी गोद से बाहर निकलने को 
मगर तू इक अदा-ए-मुतमइन से मुस्कुराती थी
अदा-ए-मुतमइन = इत्मीनान की अदा  

तिरे वो गीत अब तक गूँजते हैं मेरे कानों में 
जिन्हें मेरे लिए गाती थी तू और गुनगुनाती थी 

समझता था बहुत कम मतलब उन गीतों का मैं लेकिन 
तिरी उस शोख़ि-ए-गोया से मुझको शर्म आती थी
शोख़ि-ए-गोया = बोलती हुई शोख़ी 

तिरा वो मख़मली बिस्तर अभी तक याद है मुझ को 
मुझे सर्दी के डर से जिसमें तू अकसर सुलाती थी 

वो बिस्तर, यासमीं बिस्तर, सरासर अंबरीं बिस्तर 
महक से जिनकी हूराने-जिनाँ को नींद आती थी 
यासमीं = चमेली जैसी     अंबरीं = ख़ुशबूदार                               हूराने-जिनाँ = स्वर्ग की अप्सराओं   

मैं सो जाता था जब रंगीं दुलाई ओढ़कर तेरी 
तू अपने मरमरीं हाथों से मुझको गुदगुदाती थी 
मरमरीं = संगमरमर     

वो तेरी ख़्वाबगह के नीलगूँ अबरेशमीं पर्दे 
सरे-शाम आके नरगिस जिनको चुपके से गिराती थी
ख़्वाबगह = शयन कक्ष      नीलगूँ = नीले रंग के                                अबरेशमीं = रेशमी  
                                 
दिमाग़ अब तक मुअत्तर है तिरी मस्ताना ख़ुशबू से 
तिरे गजरे की कलियों को भी जो बेखुद बनाती थी 
मुअत्तर = सुगन्धित     

तिरा मुश्कीं तनफ़्फ़ुस बस रहा है अब भी होटों में 
असर से जिसके इक लरज़िश सी दिल में तैर जाती थी
तनफ़्फ़ुस = महकती साँस     लरज़िश = कम्पन  
                               
तिरी रंगीं जवानी नक़्श है अब तक मिरे दिल पर 
जो तेरे फूल से पैकर के अन्दर लहलहाती थी
पैकर = काया     

तिरी वो महफ़िलें आबाद हैं अब तक तसव्वर में 
तू जिनमें अपनी गुड़िया से मिरी शादी रचाती थी
तसव्वर = कल्पना   

तिरी आँखें, वो शोख़ आँखें नहीं भूलीं अभी मुझको 
की जिनमें इक रसीली मुस्कुराहट झिलमिलाती थी 

मगर ऐ शाहज़ादी, आज कुछ तुझको ख़बर भी है 
कि वो कमसिन जिसे तू अपने सीने से लगाती थी 

वो शायर है कि दुनिया में कहानी उसकी रुसवा है 
वो रुसवा, उसका दिल रुसवा, जवानी उसकी रुसवा है !
रुसवा = बदनाम


शायर - 'अख़्तर' शीरानी
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : 'अख़्तर' शीरानी

संपादक - नरेश 'नदीम'

प्रकाशक - राधाकृष्ण पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 2010