Translate

नज़ीर अकबराबादी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नज़ीर अकबराबादी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 25 जनवरी 2015

आटे-दाल का भाव (Aate-daal ka bhaav by Nazeer Akabarabadi)


आटे के वास्ते हैं हविस मुल्क-ओ-माल की 
आटा जो पालकी है तो है दाल नाल की 
आटे ही दाल से है दुरुस्ती ये हाल की 
इसे ही सबकी ख़ूबी जो है हाल क़ाल की 
सब छोड़ो बात तूति-ओ-पिदड़ी व लाल की 
यारो कुछ अपनी फ़िक्र करो आटे-दाल की 

इस आटे-दाल ही का जो आलम में है ज़हूर 
इससे ही मुँहप नूर है और पेट में सरूर 
इससे ही आके चढ़ता है चेहरे पे सबके नूर 
शाह-ओ-गदा अमीर इसी के हैं सब मजूर 
सब छोड़ो बात तूति-ओ-पिदड़ी व लाल की 
यारो कुछ अपनी फ़िक्र करो आटे-दाल की 

क़ुमरी ने क्या हुआ जो कहा "हक़्क़े-सर्रहू"
और फ़ाख़्ता भी बैठके कहती है "क़हक़हू"
वो खेल खेलो जिससे हो तुम जग में सुर्ख़रू 
सुनते हो ए अज़ीज़ो इसी से है आबरू 
सब छोड़ो बात तूति-ओ-पिदड़ी व लाल की 
यारो कुछ अपनी फ़िक्र करो आटे-दाल की … 




शायर - नज़ीर अकबराबादी 
संकलन - नज़ीर की बानी 
संपादक - फ़िराक़ गोरखपुरी
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1999

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

ऊमस (Oomas by Nazeer Akabarabadi)



क्या अब्र की गर्मी में घड़ी पह्र है ऊमस
गर्मी के बढ़ाने की अजब  लह्र है ऊमस
पानी से पसीनों की बड़ी नह्र है ऊमस
हर बाग़ में हर दश्त में हर शह्र है ऊमस
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

कितने तो इस ऊमस के तईं कहते हैं गर्माव
यानी कि घिरा अब्र हो और आके रुकी बाव
उस वक़्त तो पड़ता है ग़ज़ब जान में घबराव
दिल सीने में बेकल हो यही कहता है खा ताव  
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

बदली के जो घिर आने से होती है हवा बंद
फिर बंद-सी गर्मी वो ग़ज़ब पड़ती है यक चंद
पंखे कोई पकड़े कोई खोले हैं खड़ा बंद
दम रुक के घुला जाता है करने से हर इक बंद 
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

ईधर तो पसीनों से पड़ी भीगी हैं खाटें
गर्मी से ऊधर मैल की कुछ चियूटियाँ काटें
कपड़ा जो पहनिये तो पसीने उसे आटें
नंगा जो बदन रखिये तो फिर मक्खियाँ चाटें
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

रुकने से हवा के जो बुरा होता है अहवाल
पंखा कोई आँचल कोई दामन कोई रूमाल
दम धौंकने लगता है लोहारों की गोया खाल
कुछ रूह को बेताबियाँ कुछ जान को जंजाल
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

घबरा के दम आता है कभी जाता है फूला
आराम जो दिल का है सभी जाता है भूला
आता है कभी होश कभी जाता है भूला
कपड़े भी बुरे लगते हैं जी जाता है भूला 
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

होती है ऊमस जो कभी इक रात को आकर
कर डालती है फिर तो क़यामत ही मुक़र्रर 
ईधर तो हवा बंद ऊधर पिस्सू व मच्छर 
पानी कोई पीवे तो वो अदहन से भी बदतर
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

जिस वक़्त हवा बंद हो और आके घटा छाए
फिर कहिए दिल उस गर्मी में किस तरह न घबराए
ओढ़ो तो पसीना जो न ओढ़ो तो ग़ज़ब आए
पिस्सू कभी मच्छर कभी खटमल है लिपट जाए
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

गर इसमें हवा खुल गई और पानी भी लाई
तो जी में जी और जान में कुछ जान-सी आई 
और इसमें जो फिर हो गई ऊमस की चढ़ाई 
तो फिर वही रोना वही गुल शोर दुहाई 
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

ऊमस में तो लाज़िम है कि पंखा न हवा हो
इक कोठरी हो जिसमें धुवाँ आके भरा हो
और मक्खियों के वास्ते गुड़ तन से मला हो
उस वक़्त मज़ा देखिए ऊमस का कि क्या हो
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 

इस रुत में तो वल्लाह अजब ऐश है दिल ख़्वाह  
मेंह बरसे है और सर्द हवा आती है हर गाह
जंगल भी हरे गुल भी खिले सब्ज़ा चरागाह
ऊमस है मगर दिल को सताती है 'नज़ीर' आह 
बरसात के मौसम में निपट ज़ह्र है ऊमस
सब चीज़ तो अच्छी है पर इक क़ह्र है ऊमस 


शायर - नज़ीर अकबराबादी 
संकलन - नज़ीर की बानी 
संपादक - फ़िराक़ गोरखपुरी
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1999

बाव का अर्थ है वायु और उल्लेखनीय है कि नज़ीर ने इसमें 'ऊमस' (उमस),'ईधर' (इधर), 'ऊधर' (उधर) या 'ज़ह्र' (ज़हर), 'नह्र' (नहर) आदि का ही प्रयोग किया है. फ़िराक़ गोरखपुरी ने संकलन की भूमिका में पहले ही बता दिया है कि "जब इनमें से कोई कविता पढ़ना शुरू करें तो उसके छंद के ताल-सम और झंकार और छंद की लय को पकड़िए."

बुधवार, 25 जुलाई 2012

समधिन (Samdhin by Nazeer Akabarabadi)


सराप हुस्ने-समधिन गोया गुलशन की क्यारी है
परी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधिन से हारी है
खिंची कंघी गुँथी चोटी जमी पट्टी लगा काजल
कमाँ अब्रू नज़र जादू निगाह हर एक दुलारी है
जबीं महताब आँखें शोख़ शीरीं ब गोहर-दन्दाँ
बदन मोती दहन गुंचा अदा हँसने की प्यारी है
नया किमख़्वाब का लहँगा झमकते ताश की अँगिया
कुचें तसवीर-सी जिन पर लगा गोटा किनारी है
मुलायम पेट मख़मल-सा कली-सी नाफ़की सूरत 
उठा सीना सफ़ा पेडू अजब जोबन की नारी है
लटकती चाल मदमाता चले बिच्छू को झनकाती 
अदा में दिल लिये जाती अजब समधिन हमारी है
भरे जोबन पै इतराती झमक अँगिया की दिखलाती
कमर लहँगे से बल खाती लटक घूँघट की भारी है  

सराप- सर से पैर तक, अब्रू - भवें कमान की तरह, जबीं - ललाट, महताब - चाँद, गोहर - मोती, दन्दाँ - दाँत यानी मोती की तरह दाँत, नाफ़की - नाभि, बिच्छू - पैर की अँगुली में पहननेवाला जेवर, बिछुवा 

कवि - नजीर अकबराबादी 
संग्रह - नज़ीर की बानी 
प्रस्तुतकर्ता - फ़िराक़ गोरखपुरी
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1999