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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

अब क्या देखें राह तुम्हारी (Ab ky dekhein raah tumhari by Faiz Ahmad Faiz)

अब  क्या देखें राह तुम्हारी 
बीत चली है रात 
छोड़ो 
छोड़ो ग़म की बात 
थम गये आँसू 
थक गईं अँखियाँ 
गुज़र गई बरसात 
बीत चली है रात 

छोड़ो 
छोड़ो ग़म की बात 
कब से आस लगी दर्शन की 
कोई न जाने बात 
बीत चली है रात 
छोड़ो ग़म की बात 

तुम आओ तो मन में उतरे 
फूलों की बारात 
बीत चली है रात 
अब  क्या देखें राह तुम्हारी 
बीत चली है रात 


शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1984 



सोमवार, 9 जून 2014

पास रहो (Paas raho by Faiz Ahmad Faiz)

तुम मेरे पास रहो 
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो 
जिस घड़ी रात चले 
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले 
मर्हम-ए-मुश्क लिये नश्तर-ए-अल्मास लिये 
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले 
दर्द की कासनी पाज़ेब बजाती निकले 
जिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिल 
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगे 
आस लिये 
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुलक़ुल-ए-मय
बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न: मने 
जब कोई बात बनाये न: बने 
जब न कोई बात चले 
जिस घड़ी रात चले 
जिस घड़ी मातमी सुनसान, सियह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
 
              मर्हम-ए-मुश्क = सुगंध का मरहम  
              नश्तर-ए-अल्मास = हीरे का नश्तर 
              निहाँ = छिपे हुए 
              क़ुलक़ुल-ए-मय = शराब ढलने का स्वर 
              बहर-ए-नासूदगी = निराशा के कारण 
  
शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1984

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

कोई आशिक़ किसी महबूबा से (Koi ashique kisi mahbooba se by Faiz Ahmad Faiz)

गुलशने-याद में गर आज दमे-बादे-सबा 
फिर से चाहे तो गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दो 
उम्रे-रफ़्ता के किसी ताक़ पे बिसरा हुआ दर्द 
फिर से चाहे कि फ़रोज़ाँ हो तो हो जाने दो 

जैसे बेगाने से अब मिलते हो वैसे ही सही 
आओ दो-चार घड़ी मेरे मुक़ाबिल बैठो 
गरचे मिल बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बाद 
अपना एहसासे-ज़ियाँ और ज़ियादा होगा 
हमसुखन होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीच 
अनकही बात का मौहूम-सा पर्दा होगा 
कोई इक़रार न मैं याद दिलाऊँगा न तुम 
कोई मज़्मून वफ़ा का न ज़फ़ा का होगा 

गर्दे-अय्याम की तहरीर को धोने के लिए 
तुम से गोया हों दमे-दीद जो मेरी पलकें 
तुम जो चाहो वो सुनो 
और जो न चाहो न सुनो 
और जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ाँ आँखें 
तुम जो चाहो तो कहो 
और जो न चाहो न कहो 
                            - लंदन, 1978


दमे-बादे-सबा = हवा का झोंका                 गुल-अफ़शाँ= फूल बिखराना 
उम्रे-रफ़्ता = बीती हुई उम्र                        फ़रोज़ाँ = उज्ज्वल, रौशन 
एहसासे-ज़ियाँ = खोने की अनुभूति          हमसुखन = दूसरे से बात करते हुए 
मौहूम = आशंकित, हल्का                       गर्दे-अय्याम = युग 
तहरीर = लिखावट                                  दमे-दीद= देखते समय 
गुरेज़ाँ = बचते हुए  


शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - सारे सुख़न हमारे 
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण - 1987

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

इन्तिसाब (Intisab by Faiz Ahmad Faiz)


आज के नाम 
और 
आज के ग़म के नाम 
आज का ग़म के: है ज़िन्दगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा 
ज़र्द पत्तों का बन 
ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है 
दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है 
किलर्कों की अफ़सुर्दा जानों के नाम 
किर्मख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम 
पोस्टमैनों के नाम 
ताँगेवालों के नाम 
रेलवानों के नाम 
कारख़ानों के भोले जियालों के नाम 
बादशाहे-जहाँ, वालिए-मासिवा, नायबुल्लाहे-फ़िल-अर्ज़,
                                                         दहकाँ के नाम 
जिसके ढोरों को ज़ालिम हँका ले गए 
जिसकी बेटी को डाकू उठा ले गए 
हाथ-भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है 
दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली है 
जिसकी पग ज़ोरवालों के पाँवों तले 
धज्जियाँ हो गई हैं 
उन दुखी माओं के नाम 
रात में जिनके बच्चे बिलखते हैं और 
नींद की मार खाए हुए बाजुओं से सँभलते नहीं 
दुःख बताते नहीं 
मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं 

उन हसीनाओं के नाम 
जिनकी आँखों के गुल 
चिलमनों और दरीचों की बेलों पे बेकार खिल-खिल के 
मुरझा गये हैं 

उन ब्याहताओं के नाम 
जिनके बदन 
बेमुहब्बत रियाकार सेजों पे सज-सज के उकता गये हैं 
बेवाओं के नाम 
कटड़ियों और गलियों, मुहल्लों के नाम 
जिनकी नापाक ख़ाशाक से चाँद रातों 
को आ-आ के करता है अक्सर वज़ू 
जिनके सायों में करती हैं आहो-बुका 
आँचलों की हिना 
चूड़ियों की खनक 
काकुलों की महक 
आरज़ूमंद सीनों की अपने पसीने में जलने की बू 

तालिबे इल्मों के नाम 
वो जो असहाबे-तब्लो-अलम 
के दरों पर किताब और क़लम 
का तक़ाज़ा लिये, हाथ फैलाये 
पहुँचे, मगर लौटकर घर न आये 
वो मासूम जो भोलेपन में 
वहाँ अपने नन्हें चिराग़ों में लौ की लगन 
ले के पहुँचे, जहाँ 
बँट रहे थे घटाटोप, बेअंत रातों के साये 

उन असीरों के नाम 
जिनके सीनों में फ़र्दा के शबताब गौहर 
जेलख़ानों की शोरीद: रातों की सरसर में 
जल-जल के अंजुम-नुमाँ हो गये हैं 

आनेवाले दिनों के सफ़ीरों के नाम 
वो जो ख़ुशबू-ए-गुल की तरह 
अपने पैग़ाम पर ख़ुद फ़िदा हो गये हैं l 


शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - सारे सुख़न हमारे 
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण - 1987

फ़ैज़ अक्सरहा याद आते हैं l आज के दौर में तो और भी l उनके जन्मदिन पर उनका यह इन्तिसाब (समर्पण) कितना मौजूँ है ! बहुपठित और बहुचर्चित होने पर भी हर बार यह ज़माने की नई से नई तस्वीर से मेल खाता नज़र आता है l 


मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

तनहाई (Tanhai by Faiz Ahmad Faiz)


फिर कोई आया दिले-ज़ार नहीं कोई नहीं
राहरौ होगा, कहीं और चला जायेगा
ढल चुकी रात, बिखरने लगा तारों का ग़ुबार 
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीद: चिराग़ 
सो गई रास्त: तक-तक के हरइक राहगुज़ार 
अजनबी ख़ाक ने धुँदला दिये क़दमों के सुराग़ 
गुल करो शम्एँ, बढ़ा दो मयो-मीना-ओ-अयाग़ 
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो 
अब यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं आयेगा 

राहरौ - पथिक,       ऐवानों - महलों
मयो-मीना-ओ-अयाग़ - शराब, सुराही और प्याला, 
मुक़फ़्फ़ल -  ताला लगाना 

शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - सारे सुख़न हमारे 
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण - 1987

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

शोपेन का नग़मा बजता है (Shopen ka nagma bajta hai by Faiz Ahmad Faiz)

छलनी है अँधेरे का सीना, बरखा के भाले बरसे हैं 
दीवारों के आँसू हैं रवाँ, घर ख़ामोशी में डूबे हैं 
पानी में नहाये हैं बूटे,
गलियों में हू का फेरा है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 
शोपेन = Chopin, पोलैंड का प्रसिद्ध संगीतकार 

इक ग़मगीं लड़की के चेहरे पर चाँद की ज़र्दी छाई है
जो बर्फ़ गिरी थी इस पे लहू के छीटों की रुशनाई है
खूँ का हर दाग़ दमकता है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 

कुछ आज़ादी के मतवाले, जाँ कफ़ पे लिये मैदाँ में गये 
हर सू दुश्मन का नर्ग़ा था, कुछ बच निकले, कुछ खेत रहे 
आलम में उनका शोहरा है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 
कफ़ = हथेली, नर्ग़ा = घेरा 

इक कूँज को सखियाँ छोड़ गयीं आकाश की नीली राहों में 
वो याद में तन्हा रोती थी, लिपटाये अपनी बाँहों में 
इक शाहीं उस पर झपटा है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 
शाहीं = बाज़ की तरह का एक पक्षी 

ग़म ने साँचे में ढाला है 
इक बाप के पत्थर चेहरे को 
मुर्दा बेटे के माथे को 
इक माँ ने रोकर चूमा है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 

फिर फूलों की रुत लौट आई 
और चाहने वालों की गर्दन में झूले डाले बाँहों ने 
फिर झरने नाचे छन छन छन 
अब बादल है न बरखा है 
शोपेन का नग़मा बजता है 




शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - सारे सुख़न हमारे 
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण - 1987

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

ग़ज़ल (Ghazal by Faiz Ahmad Faiz)



कब तक दिल की ख़ैर मनायें, कब तक  रह  दिखलाओगे 
कब तक चैन की मोहलत दोगे, कब तक  याद  न आओगे 

बीता दीद-उमीद का मौसम, ख़ाक  उड़ती  है आँखों  में 
कब   भेजोगे  दर्द   का  बादल, कब  बरखा  बरसाओगे 

अह्दे-वफ़ा  या  तर्के-मुहब्बत, जो  चाहो  सो  आप करो 
अपने बस की बात  ही  क्या  है, हमसे  क्या  मनवाओगे 

किसने वस्ल का सूरज देखा, किस पर हिज्र की रात ढली 
गेसुओंवाले  कौन  थे  क्या  थे,  उनको  क्या  जतलाओगे 

'फ़ैज़' दिलों के भाग में है घर  बसना भी,  लुट जाना भी 
तुम उस हुस्न के लुत्फ़ो-करम  पर कितने  दिन इतराओगे 

                                             - अक्टूबर,1968 

दीद-उमीद = देखने की आशा,  अह्दे-वफ़ा = वफ़ादारी का प्रण,  तर्के-मुहब्बत =  प्रेम- संबंध का विच्छेद,  गेसुओंवाले = जुल्फ़ोंवाले,  लुत्फ़ो-करम = कृपाओं 

शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - सारे सुख़न हमारे 
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण - 1987



बुधवार, 20 जून 2012

मेरे मिलनेवाले (Mere milnewale by Faiz Ahmad Faiz)




वो दर खुला मेरे गमकदे का
वो  आ गए  मेरे मिलनेवाले
वो आ गयी शाम, अपनी राहों में  
फ़र्शे-अफ़सुर्दगी (उदासी का फ़र्श) बिछाने  
वो आ गयी रात चाँद-तारों को   
अपनी आज़ुर्दगी (उदासी) सुनाने 
वो सुब्ह आयी दमकते नश्तर से  
याद के ज़ख्म को मनाने  
वो दोपहर आयी, आस्तीं में 
छुपाये शोलों के ताज़याने   
ये आये  सब मेरे मिलनेवाले 
कि जिन से दिन-रात वास्ता है  
ये कौन कब आया, कब गया है 
निगाहो-दिल को खबर कहाँ है 
ख़याल सू-ए-वतन रवाँ है 
समन्दरों की अयाल थामे   
हज़ार वहमो-गुमाँ सँभाले 
कई तरह के सवाल थामे 
                         - 

बेरूत, 1980




शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संग्रह -'सारे सुखन हमारे'
              


प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण, 1987