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शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

नोटबन्दी (Demonetisation by Shruti Kushwaha)

मैं तितलियों का मुरीद था 

मेरा रंगो-बू से क़रार था

मेरे हौसले थे हवाओं में 

मुझे मछलियों से प्यार था

ये हाल ही की तो बात है 

कि तभी निज़ाम बदल गया 


मेरी ज़िन्दगी में सुकून था

मेरे मुँह में मेरी ज़बान थी

इसी मेज़ पर अख़बार था

यहीं जुगनुओं की दुकान थी 

ये हाल ही की तो बात है 

कि तभी निज़ाम बदल गया 


तेरा हुस्न था मेरा इश्क़ था

दुनिया में बस ये बवाल था

तेरे होंठ जैसे गुलाब हों 

उन्हें चूमने का ख़याल था

ये हाल ही की तो बात है 

कि तभी निज़ाम बदल गया 


न तो जाम से कोई ख़ौफ़ था

न चाय में कोई खोट था

मेरी जेब में वो हसीन सा 

उफ़्फ़ इक हज़ार का नोट था

ये हाल ही की तो बात है 

कि तभी निज़ाम बदल गया 


कवयित्री : श्रुति कुशवाहा 

संकलन : सुख को भी दुख होता है 

प्रकाशन: राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2025

रविवार, 8 अक्टूबर 2023

काफ़ी है मेरे लिए (Enough for Me by Fadwa Tuqan, Hindi translation by Apoorvanand)

काफ़ी है मेरे लिए

काफ़ी है उसकी ज़मीन पर मरना

उसमें दफ़्न होना

घुलना और ग़ायब हो जाना उसकी मिट्टी में

और फिर खिल पड़ना एक फूल की शक्ल में

जिससे एक बच्चा खेले मेरे वतन का।

काफ़ी है मेरे लिए रहना

अपने मुल्क के आग़ोश में

उसमें रहना करीब मुट्ठी भर मिट्टी की तरह

घास के एक गुच्छे की तरह

एक फूल की तरह।




फ़िलिस्तीनी कवयित्री - फ़दवा तुक़ान (Fadwa Tuqan, 1917-2003)

स्रोत - https://www.milleworld.com/palestinian-poems-resistance/

अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद

शुक्रवार, 24 जून 2022

गवाची लकीर (Sara Shagufta translated in Hindi)

 सारी चीज़ें खो गई हैं 

आसमान के पास भी काँटा तक नहीं रहा 

जभी तो मिट्टी में बोलने वाले बोलते नहीं 

गूँज भी गूँगी हो गई है

रब भी नहीं बोलता  

सारी चीज़ें खो गई हैं 

मेरे बर्तन 

मेरी हँसी  

मेरे आँसू 

मेरे मक्र 

सारी चीज़ें खाली हैं और खो गई हैं 

बच्चों के खिलौने 

और मेरे श्टापू का कोयला वक़्त लकीर गया है 

आँखों में कोई शक्ल नहीं रह गई है 

सारी चीज़ें खो गई हैं 

मेरे चेहरे 

मेरे रंग 

मेरे इन्साफ़ 

जाने कहाँ खो गए हैं 

दिल का चेहरा आँख हुआ जाता है 


मज़ाक पुराने हो गए हैं 

हँसी चारपाई कस रही है 

चाँद की रूनुमाई के लिए सूरज आया है 

तो आसमान खो गया है 

सुलूक भी खो गए हैं 

वो भी कभी नहीं आए 

जिनके लिए आँखें रखी थीं 

और दिल खत्म किए थे 

आँखों को रसूल  कहा था 

और दिल को रब कहा था 

सारी चीज़ें खो गई हैं 


मक्र = छल, बहाना 

रूनुमाई = मुँहदिखाई 


पाकिस्तानी शायरा - सारा शगुफ़्ता 

संग्रह - नींद का रंग 

लिप्यंतरण और संपादन - अर्जुमंद आरा 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2022  


कुछ रोज़ पहले मैंने भोपाल की यात्रा में इस किताब को उठाया। शीर्षक ने ही अपनी तरफ ध्यान खींचा था। तब तक मुझे सारा शगुफ़्ता के बारे में कुछ खास मालूम नहीं था। अर्जुमंद आरा ने जो परिचय दिया है उसने काफी उत्सुकता जगा दी। "पाकिस्तान में नारीवादी उर्दू शायरी की एक उत्कृष्ट लेकिन बहिष्कृत सारा शगुफ़्ता" यह पहला ही वाक्य पर्याप्त था संग्रह को पढ़ जाने के लिए। ईमानदारी की बात है कि एक साँस में यह छोटा-सा संग्रह नहीं पढ़ पाई। साँस टूटती रही कविताओं में से झाँकती सारा शगुफ़्ता की ज़िंदगी का अंदाजा लगाकर। भाषा की दिक्कत भी बीच बीच में आड़े आई। यात्रा से लौटकर हिन्दी और उर्दू के शब्दकोशों को पलटा तो भी कुछ अर्थ हाथ न आए, जैसे 'गवाची' या 'श्टापू' का। सारा खुद बहुत जगह उखड़ी उखड़ी नज़र आती हैं तो तारतम्यता खोजने का मेरा प्रयास भी व्यर्थ जा रहा था। बातों का सिरा कई बार पकड़ में नहीं आया मेरे, फिर भी जो कशिश है उनमें वह दूसरी शायरी से जुदा है। बानगी के तौर पर यह ! हाँ, एक बात जो बड़ी देर तक मेरे मन में चक्कर काटती रही, वह है आँखों को लेकर सारा शगुफ़्ता के प्रयोग। उनकी फ़ेहरिस्त बनाने का मन किया। वैसे अनोखे और अजीबोगरीब वाक्य देखकर सारा की तड़प ही नहीं, ताकत का भी पता चलता है। 

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

पहाड़ी ढलान (By Nina Cassian)



कितने तुच्छ हैं हम
और कितने उतावले
और कितना कड़वा बोलते हैं हम

जबकि सिर्फ़ एक मकड़ा
पूरी रात टंगा रहा उसी एक जगह,
गुसलखाने के एक कोने में

हे आठ टांगों वाले धैर्यवान !
ख़ामोश गवाह
‘गुड मोर्निंग’

हम गिरते हैं
और खिरते हैं,
जब भी कोई शिखर प्रतिमान होता है भ्रष्ट I


कवि – निना कास्सिआन
संकलन- सच लेता है आकार, समकालीन रोमानियाई कविता
संपादन – आन्दीआ देलेतान्त, ब्रेंडा वाकर
हिंदी अनुवाद – रणजीत साहा
प्रकाशन – साहित्य आकादमी, 2002

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

गर्दन एक कुएँ जैसी (Gardan ek kuyein jaisi by Prakriti Kargeti)

गर्दन एक कुएँ जैसी है 
कोई न कोई
रिश्ते की रस्सी से 
खाली बाल्टी बाँध
फेंक देता है गहरा 
फाँस पड़ती है 
साँस रुकती है,
पर कुआँ
बाल्टी भरने नहीं देता 
अपना ही पानी निगल जाता है.

शनिवार, 27 सितंबर 2014

गौरैए का बच्चा (Gauraiye ka bachcha by Charlotte Perkins Gilman in Bhagat Singh's Jail notebook

गौरैए का बच्चा गौरैए को दाना नहीं चुगाता,
                चूजा मुर्गी को चुग्गा नहीं कराता,
बिल्ली का बच्चा बिल्ली के लिए चूहे नहीं मारता -
                यह महानता तो सिर्फ मनुष्य को नसीब है। 
हम सबसे बुद्धिमान, सबसे बलवान नस्ल हैं -
                हम काबिले तारीफ हैं। 
एकमात्र जिन्दा प्राणी 
                जो जीता है अपने बच्चों की मेहनत पर। 


अमरीकी कवयित्री  - शार्लोट पर्किन्स गिलमैन (1860-1935) 
किताब - भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज
संकलन और संपादन - चमन लाल 
प्रकाशक - आधार प्रकाशन, पंचकूला, 2004


मूलतः 'एक शहीद की जेल नोटबुक' के पृष्ठ 33 (30) से ये पंक्तियाँ ली गई हैं. इसमें भगत सिंह द्वारा जेल में (1929-31) अध्ययन के दौरान लिए गए नोट्स और उद्धरण  हैं. इनका मूल अंग्रेज़ी में संपादन भूपेंद्र हूजा ने किया है.  'भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज' में यह नोटबुक मौजूद है. 

शनिवार, 20 सितंबर 2014

रोशनी (Roshni by Amrita Pritam)


हिज्र की इस रात में 
कुछ रोशनी-सी आ रही है 
शायद याद की बत्ती 
कुछ और ऊँची हो गयी है … 

एक हादसा, एक जख्म 
और एक टीस दिल के पास थी 
रात को सितारों की रक़म 
इन्हें जरब दे गयी … 

नज़र के आसमान से 
सूरज कहीं दूर चला गया 
पर अब भी चाँद में 
उसकी खुशबू आ रही है … 

तेरे इश्क़ की एक बूँद 
इसमें मिल गयी थी 
इसलिए मैंने उम्र की 
सारी कड़वाहट पी ली … 



कवयित्री - अमृता प्रीतम 
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : अमृता प्रीतम 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983 

रविवार, 6 जुलाई 2014

चांद (Chand by Parveen Shakir)

पूरा दुख और आधा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद

दिन में वहशत बदल गयी थी
रात हुई और निकला चांद

किस मक़तल से गुज़रा होगा
इतना सहमा सहमा चांद

यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तन्हा चांद

मेरी करवट पर जाग उठे
नींद का कितना कच्चा चांद

मेरे मुंह को किस हैरत से
देख रहा है भोला चांद

इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चांद

आंसू रोके नूर नहाए
दिल दरिया, तन सहरा चांद

इतने रौशन चेहरे पर भी
सूरज का है साया चांद

जब पानी में चेहरा देखा
तूने किसको सोचा चांद

बरगद की एक शाख़ हटा कर 
जाने किसको झांका चांद

बादल के रेशम झूले में 
भोर समय तक सोया चांद

रात के शानों पर सर रक्खे 
देख रहा है सपना चांद

सूखे पत्तों के झुरमुट में 
शबनम थी या नन्हां चांद

हाथ हिला कर रुख़सत होगा 
उसकी सूरत हिज्र का चांद

सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चांद

रात को शायद एक बजे हैं 
सोता होगा मेरा चांद !


शायरा - परवीन शाकिर
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1994

रविवार, 8 जून 2014

नारंगी (Narangee by Sudha Chauhan)

नारंगी रंग की नारंगी 
बेच रहा फलवाला गाकर 
और बजाता है सारंगी 

चमक रहा है छिलका पीला 
सुन्दर फल है बड़ा रसीला 
प्यास बुझे मन खुश हो जाता 
ढीली तबियत होती चंगी



कवयित्री - सुधा चौहान 
संकलन - महके सारी गली गली (बाल-कविताएं)
संपादक - निरंकार देव सेवक, कृष्ण कुमार 
प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, पहला संस्करण, 1996

रविवार, 13 अप्रैल 2014

सच रेडीमेड नहीं मिलता (Sach readymade nahin milta by Anamika)


सच रेडीमेड नहीं मिलता,
सबको बुनना पड़ता है 
अपने-अपने नाप का !
कभी किसी पिछले जनम में 
सच एक ऊनी दुशाला था 
कबीर के ताने-बाने से बुना हुआ !
एक साथ सब उसमें 
गुड़ी-मुड़ी हो बैठ जाते 
और तापते सिगरी किस्सों की !
बाबा बाहर जाते तो तहाते उसको 
ऐसे कौशल से कंधे पर कि 
चिप्पियाँ दिखाई नहीं देतीं,
अम्मा ताकीद लगातार किया करतीं 
कि पाँव उतने पसारिए 
जितनी लंबी सौर हो !
सपनों के पाँव मगर हरदम ही 
सच की चदरी के बाहर झाँक जाते !
स्कूल के रास्ते में बाजार पड़ता !
रोज हमें दीखते 
लाल-हरे-नीले लेसों से सजे 
झीने-झीने झूठ झमकदार 
कचकाड़े की औरतों पर सजे !
कचकाड़े की औरतें 
शीशे के शो-केसों में बंद 
हरदम मुस्कातीं,
वे 'विचित्र किंतु सत्य' शृंखला का सच थीं !
थोड़ा-सा वे हमें डरातीं !
ठंड में ठिठुरते हुए हम आगे बढ़ते,
पूरी नहीं पड़ती हमको चमड़ी हमारी !
एक दिन हमने पड़ोसिन से सीखा 
एक बमपिलार ऊन के गोले से 
बुनना कैसे चाहिए 
ब्लाउज भर सच 
अपने नाप का !
और मुझे उसने सिखाया बड़े मन से 
कैसे उलटे फँदों में डालते हैं सीधा फँदा 
कैसे घटता और कटता है सच का गला,
कैसे घटती हैं और कटती है 
दो बाजुएँ सच की -
आपकी फिटिंग का हो जाने तक !
तब से लगातार बुन रही हूँ मैं 
सपनों में स्मृतियाँ !
गिरे जा रहे हैं 'घर'
'काँटों में फँसे हुए !'
घर गिर रहे हैं धीरे-धीरे 
और एक घाटी-सी उभर रही है 
मेरे स्वेटर पर !
अच्छा है, सच रेडीमेड नहीं मिलता 
सबको बुनना पड़ता है अपने-अपने नाप का !


कवयित्री - अनामिका  किताब - अनामिका : पचास कविताएँ, नयी सदी के लिए चयन  
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 2012

शनिवार, 15 मार्च 2014

सफ़ेद पंख (Safed pankh by Savita Singh)

जाओ उन्हीं आलिंगनों में 
जो तुम्हारे थे 
उड़ेल दिया था जिनमें तुमने 
सारा प्रेम अपना 

जाओ अब तक वहीं पड़ा है वह चुंबन
जिसे छोड़ गयी थी लाल आँखों वाली चिड़िया 

उठा लाओ वह सफ़ेद पंख 
जिसे गिरा गयी थी वह किसी और के लिए 


कवयित्री - सविता सिंह 
संकलन - स्वप्न समय 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2013

मंगलवार, 11 मार्च 2014

मक्कार के नाम इनाम ( The naive rewarding of one who lies by Constanta Buzea)


वही पुरानी यात्राएँ और वही पुराने गंतव्य 
और मसूर के कटोरे पर वही पुराने कबूतर 
किसी मक्कार के नाम इनाम l 

भटक रहा हूँ मैं आराम और पवित्र वस्तुओं की तलाश में,
भरपूर और तिक्ततर आँसुओं के लिए,
विनम्रता और प्रार्थनाओं के लिए,
माताओं की समाधियों के विषाद के लिए l 

चूँकि लाद दिए गए हैं मुझ पर कुछ शब्द
औ जो लटके हुए हैं मेरी गर्दन से 
जबकि मेरा दिमाग चाह रहा है 
देना ईँट का जवाब पत्थर से 
और निकाल लेना एक दाँत के बदले पूरी की पूरी बत्तीसी l 



रोमानियाई कवयित्री - कोन्स्तान्ता बूज़ेआ  
(जन्म 29 मार्च, 1941, बुख़ारेस्त)  
संकलन - सच लेता है आकार, समकालीन रोमानियाई कविता  चयन/सम्पादन - आन्द्रीआ देलेतान्त, ब्रेण्डा वाकर   
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - रणजीत साहा   
प्रकाशक - साहित्य अकादेमी, दिल्ली, 2002

अनुवादक के मुताबिक कवयित्री का नाम कोन्स्तांत्सा बूज़ेआ है। 

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

शल्यक्रिया (Shalyakriya by Mamta Kalia)


मोह की यह फाँस 
अक्सर बहुत जाती आँस 
एक झटके में निकाली फेंक 
हो गयी मैं अब 
पुनः आजाद 


कवयित्री - ममता कालिया   
किताब - ममता कालिया : पचास कविताएँ, नयी सदी के लिए चयन  प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2012

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

फिर (Phir by Parveen Shakir)


सुकूं भी ख़्वाब हुआ नींद भी है कम कम फिर 
क़रीब आने लगा दूरियों का मौसम फिर

बना रही है तेरी याद मुझको सलके-गुहर 
पिरो गयी मेरी पलकों में आज शबनम फिर 

वो नर्म लहजे में कुछ कह रहा है फिर मुझसे 
छिड़ा है प्यार के कोमल सुरों में मद्धम फिर 

तुझे मनाऊं कि अपनी अना की बात सुनूं 
उलझ रहा है मेरे फ़ैसलों का रेशम फिर 
 
न उसकी बात मैं समझूं न वो मेरी नज़रें 
मुआमलाते-ज़ुबां हो चले हैं मुबहम फिर 

ये आने वाला नया दुख भी उसके सर ही गया 
चटख़ गया मेरी अंगुश्तरी का नीलम फिर 
 
वो एक लम्हा कि जब सारे रंग एक हुए 
किसी बहार ने देखा न ऐसा संगम फिर 

बहुत अज़ीज़ हैं आंखें मेरी उसे लेकिन 
वो जाते जाते उन्हें कर गया है पुरनम फिर 
 
सलके-गुहर = मोतियों की लड़ी       
अना = स्वत्व 
मुआमलाते-ज़ुबां = बातचीत के मामले 
मुबहम = अस्पष्ट      अंगुश्तरी = अंगूठी 

शायरा - परवीन शाकिर 
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली,1994
 

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

एक दृष्टिकोण (Ek drishtikon by Amrita Pritam)


सूरज को सारे खून माफ़ हैं l 
दुनिया के हर इन्सान का 
वह रोज़ 'एक दिन' का क़तल करता है 
और हर एक उम्र का एक टुकड़ा 
रोज़ ज़िबह होता है 
इन्सान के इख्तियार में सिर्फ़ इतना है -
कि जिबह हुए टुकड़े को 
वह घबरा के फेंक दे, और डरे,
या निडर उसे कबाब की तरह भूने, खाये 
और साँसों की शराब पीता 
वह अगले टुकड़े का इंतज़ार करे ... 


यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

दोस्त (Dost by Amrita Pritam)


दोस्त ! तुमने ख़त तो लिखा था 
पर दुनिया की मार्फ़त डाला 
और दोस्त ! मोहब्बत का ख़त 
जो धरती के नाप का होता है 
जो अम्बर के नाप का होता है 
वह दुनियावालों ने पकड़कर 
एक क़ौम जितना कतर कर 
क़ौम के नाप का कर डाला … 

और फिर शहरों में चर्चा हुई 
वह तेरा ख़त जो मेरे नाम था 
लोग कहते हैं 
कि मज़हब के बदन पर 
वह बहुत ढीला लगता 
सो ख़त की इबारत को उन्होंने 
कई जगह से फाड़ लिया था … 

और आगे तू जानता 
कि वे कैसे माथे 
जिनकी समझ के नाप 
हर अक्षर ही खुला आता 
सो उन्होंने अपने माथे 
अक्षरों पर पटके 
और हर अक्षर उधेड़ डाला था … 

और मुझे जो ख़त नहीं मिला 
पर जिसकी मार्फ़त आया 
वह दुनिया दुखी है - कि मैं 
उस ख़त के जवाब जैसी हूँ … 

यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

प्यार (Pyar by Parveen Shakir)


अब्रे-बहार ने 
फूल का चेहरा 
अपने बनफ़शी हाथ में लेकर 
ऐसे चूमा 
फूल के सारे दुख 
ख़ुशबू बन कर बह निकले हैं 



शायरा - परवीन शाकिर 
संकलन - थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे 
संपादक - डॉ. विनोदानन्द झा 
प्रकाशक - किलकारी, बिहार बाल भवन, पटना, 2012

सोमवार, 11 नवंबर 2013

इस एक बूँद आँसू में (Is ek boond aansoo mein by Mahadevi Verma)


इस एक बूँद आँसू में 
         चाहे साम्राज्य बहा दो,
वरदानों की वर्षा से 
         यह सूनापन बिखरा दो ;

         इच्छाओं के कम्पन से 
                     सोता एकान्त जगा दो,
         आशा की मुस्काहट पर 
                     मेरा नैराश्य लुटा दो l 

चाहे जर्जर तारों में 
          अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालों में 
          सुख का आसव छलका दो ;

           मेरे बिखरे प्राणों में    
                      सारी करुणा ढुलका दो,
           मेरी छोटी सीमा में 
                      अपना अस्तित्व मिटा दो !

पर शेष नहीं होगी यह 
           मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढ़ा ,
           तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !



कवयित्री - महादेवी 
संकलन - सन्धिनी
प्रकाशक - लोकभारती, इलाहाबाद, 2005

रविवार, 10 नवंबर 2013

घुमन्तू टेलीफोन (Ghumantu telephone by Anamika)


हद्द चलै सो मानवा, बेहद चलै सो साध,
लेकिन न हद, न ही बेहद -
एक बन्द मुट्ठी मेरी सरहद !

जा तो कहीं भी सकती हूँ -
लेकिन इस आदमी की जेब में l 

तार जोड़ सकती हूँ 
अपने दिमाग का कहीं से -
लेकिन इसके अँगूठे के नीचे l 

जब यह सो भी जाएगा
तकिए के नीचे दबाएगा मुझको !
टिक्-टिक्-टिक् सुनती हुई 
इसकी कलाई-घड़ी की -
चुपचाप मैं दर्ज करती रहूँगी 
अपने सीने में इसकी खातिर 
एस.एम.एस. l 
जगह-जगह से आएँगे ये सारी रात,
दहकेंगे ये गुपचुप सन्देश 
भर-रात मेरे अँधेरों में 
सपनों-स्मृतियों की बिल्ली-आँखें बनकर :
अम्मा की हारी-बीमारी,
मौला की कोर्ट-कचहरी,
ऑफिस के सब रगड़े-झगड़े !
अफरा-तफरी के वे 
कितने अधूरे-से उत्तप्त चुम्बन !
कितनी घुटी-सी पुकारें !
हल्की रुलाई की 
अवरुद्ध, बेचैन कई सिहरनें 
करती रहेंगी मुझमें छटपट भर-रात l 
घायल कबूतर के पंख भरे हैं मुझमें 
जो बेखयाली में 
एक-एक कर नोंच फेंकेगा 
यह कल तक :
कहीं-कहीं कुछ रोएँ सहलाता 
कभी बीच में रुक भी जाएगा !

कितनी भी आधुनिक हो दुनिया -
प्राचीन रहती हैं अभिव्यक्तियाँ
प्यार की, नफरत की !
अमरीकी महाध्वंस के पहले 
होती थीं जैसी बगदाद की सड़कें :
हूँ मैं कुछ-कुछ वैसी
अधुनातन बाजारों के ही समानान्तर 
सजे हुए हैं मुझमें 
हाट पुराने - मीना बाजार,
जैसे कि भग्नावशेष पुरातात्त्विक 
महानगर की छाती पर l





कवयित्री - अनामिका 
किताब - अनामिका : पचास कविताएँ, नयी सदी के लिए चयन  
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 2012

सोमवार, 23 सितंबर 2013

चुटपुटिया बटन (Chutputiya button by Anamika)


मेरा भाई मुझे समझाकर कहता था – ‘जानती है, पूनम –
तारे हैं चुटपुटिया बटन
रात के अँगरखे में टंके हुए !’
मेरी तरफ ‘प्रेस’ बटन को
चुटपुटिया बटन कहा जाता था,
क्योंकि ‘चुट’ से केवल एक बार ‘पुट’ बजकर
एक-दूसरे में समा जाते थे वे l

वे तभी तक होते थे काम के
जब तक उनका साथी
चारों खूँटों से बराबर
उनके बिलकुल सामने रहे टंका हुआ !

ऊँच-नीच के दर्शन में उनका कोई विश्वास नहीं था !
बराबरी के वे कायल थे !
फँसते थे, न फँसाते थे-चुपचाप सट जाते थे l
मेरी तरफ प्रेस-बटन को चुटपुटिया बटन कहा जाता था,
लेकिन मेरी तरफ से लोग खुद भी थे
चुटपुटिया बटन
‘चुट’ से ‘पुट’ बजकर सट जाने वाले l

इस शहर में लेकिन ‘चुटपुटिया’ नजर ही नहीं आते –
सतपुतिया झिगुनी की तरह यहाँ एक सिरे से गायब हैं
चुटपुटिया जन और बटन l
ब्लाउज में भी दर्जी देते हैं टाँक यहाँ हुक ही हुक
हर हुक के आगे विराजमान होता है फँदा,
फँदे में फँसे हुए आपस में कितना सटेंगे –
कितना भी कीजिए जतन –
चुट से पुट नहीं ही बजेंगे !


कवयित्री - अनामिका
किताब - अनामिका : पचास कविताएँ, नयी सदी के लिए चयन  
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 2012