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सोमवार, 11 नवंबर 2013

इस एक बूँद आँसू में (Is ek boond aansoo mein by Mahadevi Verma)


इस एक बूँद आँसू में 
         चाहे साम्राज्य बहा दो,
वरदानों की वर्षा से 
         यह सूनापन बिखरा दो ;

         इच्छाओं के कम्पन से 
                     सोता एकान्त जगा दो,
         आशा की मुस्काहट पर 
                     मेरा नैराश्य लुटा दो l 

चाहे जर्जर तारों में 
          अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालों में 
          सुख का आसव छलका दो ;

           मेरे बिखरे प्राणों में    
                      सारी करुणा ढुलका दो,
           मेरी छोटी सीमा में 
                      अपना अस्तित्व मिटा दो !

पर शेष नहीं होगी यह 
           मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढ़ा ,
           तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !



कवयित्री - महादेवी 
संकलन - सन्धिनी
प्रकाशक - लोकभारती, इलाहाबाद, 2005

गुरुवार, 23 मई 2013

प्राणपिक (Pranpik by Mahadevi Verma)


प्राणपिक प्रिय-नाम रे कह ! 

मैं मिटी निस्सीम प्रिय में, 
वह गया बँध लघु ह्रदय में 
         अब विरह की रात को तू 
                  चिर मिलन की प्रात रे कह !

दुख-अतिथि का धो चरणतल, 
विश्व रसमय कर रहा जल ; 
          यह नहीं क्रन्दन हठीले ! 
                  सजल पावसमास रे कह ! 

ले गया जिसको लुभा दिन, 
लौटती वह स्वप्न बन बन, 
          है न मेरी नींद, जागृति 
                 का इसे उत्पात रे कह ! 

एक प्रिय-दृग-श्यामला सा, 
दूसरा स्मित की विभा-सा, 
         यह नहीं निशिदिन इन्हें  
                प्रिय का मधुर उपहार रे कह ! 

श्वास से स्पन्दन रहे झर, 
लोचनों से रिस रहा उर ;
         दान क्या प्रिय ने दिया 
               निर्वाण का वरदान रे कह ! 

चल क्षणों का खनिक-संचय, 
बालुका से बिन्दु-परिचय, 
         कह न जीवन तू इसे 
               प्रिय का निठुर उपहार रे कह !


कवयित्री - महादेवी 
संकलन - सन्धिनी
प्रकाशक - लोकभारती, इलाहाबाद, 2005





शुक्रवार, 8 मार्च 2013

आँसू का मोल न लूँगी मैं (Aansoo ka mol na loongi main by Mahadevi Verma)


आँसू का मोल न लूँगी मैं !

यह क्षण क्या ? द्रुत मेरा स्पंदन ;
यह रज क्या ? नव मेरा मृदु तन ;
यह जग क्या ? लघु मेरा दर्पण ;
प्रिय तुम क्या ? चिर मेरे जीवन ;

                     मेरे सब सब में प्रिय तुम,
                     किससे व्यापार करूँगी मैं ?

आँसू का मोल न लूँगी मैं !

निर्जल हो जाने दो बादल ;
मधु से रीते सुमनों के दल ;
करुणा बिन जगती का अंचल ;
मधुर व्यथा बिन जीवन के पल ;

                     मेरे दृग में अक्षय जल,
                     रहने दो विश्व भरूँगी मैं !

आँसू का मोल न लूँगी मैं !

मिथ्या, प्रिय मेरा अवगुण्ठन 
पाप शाप, मेरा भोलापन !
चरम सत्य, यह सुधि का दंशन,
अंतहीन, मेरा करुणा-कण ;

                     युग युग के बंधन को प्रिय !
                     पल में हँस 'मुक्ति' करूँगी मैं !

आँसू का मोल न लूँगी मैं !


कवयित्री - महादेवी वर्मा 
संकलन - महादेवी साहित्य समग्र, भाग 1 
संपादन - निर्मला जैन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली,  2000
         

सोमवार, 4 मार्च 2013

अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ? (Geet by Mahadevi Verma)

         मुस्काता संकेत-भरा नभ
              अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ?
विद्युत के चल स्वर्णपाश में बँध हँस देता रोता जलधर ;
अपने  मृदु  मानस की ज्वाला गीतों से  नहलाता सागर ;

         दिन निशि को, देती निशि दिन को
               कनक-रजत   के   मधु-प्याले  हैं !
                     अलि  क्या  प्रिय  आनेवाले हैं ?

मोती  बिखरातीं  नूपुर  के   छिप   तारक-परियाँ   नर्तन  कर ;
हिमकण पर आता जाता, मलयानिल परिमल से अंजलि भर ;

         भ्रान्त पथिक से फिर-फिर आते
               विस्मित  पल  क्षण  मतवाले हैं !
                      अलि  क्या  प्रिय  आनेवाले हैं ?

सघन वेदना के तम में, सुधि जाती सुख-सोने के कण भर ;
सुरधनु नव रचतीं निश्वासें, स्मित का इन भीगे अधरों पर ;

        आज  आँसुओं  के  कोषों  पर,
                स्वप्न  बने  पहरे  वाले हैं !
                       अलि  क्या  प्रिय आनेवाले हैं ?

नयन श्रवणमय श्रवण नयनमय आज हो रही कैसी उलझन !
रोम  रोम  में  होता  री  सखी  एक नया उर का-सा  स्पन्दन !
        
         
          पुलकों  से  भर  फूल  बन  गये
                 जितने   प्राणों   के   छाले  हैं !
                        अलि  क्या  प्रिय  आनेवाले हैं ?


कवयित्री - महादेवी वर्मा
संकलन - सन्धिनी
प्रकाशक - लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2005