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रविवार, 9 दिसंबर 2012

तुम (Tum by Shankho Ghosh)


दूर-दूर तक खूब घूमता
दिन-दिन-भर मैं तिरता फिरता
रस्ते-रस्ते
लेकिन घर पर लौट ढूँढ़ती आँखें तुमको
यदि न दिखीं तुम,
तुम !
मन बुझ जाता l 



कवि - शंख घोष 
बांग्ला से हिन्दी अनुवाद - प्रयाग शुक्ल 
संकलन - शंख घोष और शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1987

रविवार, 4 नवंबर 2012

घर (Ghar by Shankho Ghosh)



मन-ही-मन 
रहा हूँ खोज घर 
एक, बहुत दिनों से l
जाऊँगा जाने कब 
डूब मैं 
प्रकाश की तरलता में !

घर क्या मिला तुम्हें ?
घर तो लिया है ढूँढ़ 
बहुत दिन पहले - 
मन-ही-मन,
चाहिए घर - दुनिया के बाहर l


कवि - शंख घोष 
बांग्ला से हिन्दी अनुवाद - प्रयाग शुक्ल 
संकलन - शंख घोष और शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1987

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

हिसाब (Hisab by Taslima Nasreen)



कितना दिया प्रेम,
कितने गुलाब-गुच्छ,
कितना समय, कितना सुमद्र,
कितनी रातें काटीं निद्राहीन मेरे लिए
कितने बहाए अश्रु -
यह सब जिस दिन घनघोर आवेग में 
सुना रहे थे मुझे,
समझाना चाह रहे थे कि कितना
प्रेम करते हो मुझे, उसी दिन
लिया था समझ मैंने कि अब
तुम रत्ती भर प्यार नहीं करते मुझे.
प्रेम ख़त्म होने पर ही मनुष्य बैठता है
करने हिसाब, तुम भी बैठे हो.
प्रेम तभी तक प्रेम है
जब तक वह रहता है अंधा, बधिर,
जब तक वह रहता है बेहिसाब.


कवयित्री - तसलीमा नसरीन 
बाँगला भाषा से हिन्दी अनुवाद - प्रयाग शुक्ल 
संकलन - मुझे देना और प्रेम
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2012