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मंगलवार, 18 जून 2013

पीढ़ा (Peedha by Shakti Chattopadhyay)



वहाँ आँगन के कोने में
प्यार ने सजाकर
रखा था एक पीढ़ा

छाया थी
माया थी
छाजन तले उगी थी हरी-हरी घास
और धरती पर खुंदे थे
वर्षा की बूँदों के गिरने के निशान
और ठीक वहीं
आँगन के उस कोने में
प्यार ने सजाकर रखा था एक पीढ़ा
पर आया नहीं वह
जिसे आना था बैठने
आया नहीं जल्दी
आया नहीं धीरे-धीरे
आया नहीं वह
जिसे आना था
बैठने
रात धीरे-धीरे
होती गयी गहरी
रात धीरे-धीरे
होती गयी शेष
वहाँ
आँगन के उस कोने में
उसी तरह पड़ा रहा
खाली पीढ़ा
पर आया नहीं वह
जिसे आना था
बैठने l


कवि - शक्ति चट्टोपाध्याय 
बांग्ला से हिन्दी अनुवाद - केदारनाथ सिंह 
संकलन - शंख घोष और शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1987

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

अँधेरे में (Andhere mein by Shakti Chattopadhyay)


हाथ पर 
हाथ !
अँधेरे में अचानक 
यह किसने रख दिया 
मेरे हाथ पर हाथ !

कौन है यह ?
बताओ बताओ 

शब्द नहीं 
कोई भी शब्द नहीं 
शब्द नहीं 
कोई भी शब्द नहीं l

कवि - शक्ति चट्टोपाध्याय 
बांग्ला से हिन्दी अनुवाद - केदारनाथ सिंह 
संकलन - शंख घोष और शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1987

रविवार, 25 नवंबर 2012

पुराना दुख, नया दुख (Purana dukh, naya dukh by Shakti Chattopadhyay)



वह जो अपना एक दुख है पुराना 
क्या उससे आज कहूँ कि आओ 
और थोड़ी देर बैठो मेरे पास 

यहाँ मैं हूँ 
वहाँ, मेरी परछाईं 
कितना अच्छा हो कि इसी बीच वह भी आ जाय 
और बैठ जाय मेरी बगल में 

तब मैं अपने नये दुख से कहूँगा 
जाओ 
थोड़ी देर घूम-फिर आओ 
झुलसा दो कहीं कोई और हरियाली 
झकझोर दो किसी और वृक्ष के फूल और पत्ते 
हाँ, जब थक जाना 
तब लौट आना 
पर अभी तो जाओ 
बस थोड़ी-सी जगह दो मेरे पुराने दुख के लिए 
वह आया है न जाने कितने पेड़ों 
और घरों को फलाँगता हुआ 
वह आया है 
और बैठ जाना चाहता है बिल्कुल मुझसे सटकर 

बस उसे कुछ देर सुस्ताने दो 
पाने दो कुछ देर उसे साथ और सुकून 
ओ मेरे नये दुख 
बस थोड़ी-सी जगह दो 
थोड़ा-सा अवकाश 
जाओ 
जाओ 
फिर आ जाना बाद में l 


कवि - शक्ति चट्टोपाध्याय 
बांग्ला से हिन्दी अनुवाद - केदारनाथ सिंह 
संकलन - शंख घोष और शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1987

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

चिट्ठी नहीं आयी (Chitthee nahin aayee by Shakti Chattopadhyay)


अभी सन्तरे के आने में देर है
वहाँ प्लेट में रखा है छुरी-काँटा
पनीर
मक्खन
सूप
काली मिर्च
और इन सबके साथ
खूब सिंका हुआ लाल टोस्ट 
जब मैं उसे काटता हूँ 
कच्ची लकड़ी की एक अजीब-सी गंध
भर जाती है मेरे नासा-पुटों में

चीनिया केले-सा 
वहाँ बैठा है चौखट पर
एक गुमसुम विडाल
बँगले की खिड़की से आती हुई हवा
ढकेल रही है धूप को
बँगले के बाहर
धूप वहाँ हिल रही है खिड़की पर
जैसे कोई झीना वस्त्र

सुन्दर 
चमकता हुआ स्क्वैश 
रखा है बरामदे में
अभी सन्तरे के आने में देर है
कोई दो हफ्ते बाद 
हल्दी के रंगवाला सुन्दर सन्तरा
शान से पाँव रखेगा
घरों की मेजों पर 

लेकिन अभी !
अभी तो देर है
अभी कोई चिट्ठी आयी नहीं उसकी l


कवि - शक्ति चट्टोपाध्याय 
संकलन - शंख घोष और शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएं
अनुवाद - केदारनाथ सिंह
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1987