Translate

ज्ञानेन्द्रपति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ज्ञानेन्द्रपति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 6 सितंबर 2025

चन्द्रविन्दु की चिन्ता (Chandravindu ki chinta by Gyanendrapati(


मुझे चन्द्रविन्दु की चिन्ता है 
चन्द्रविन्दु नहीं नभ का 
भाषा का 
लिपि का 
देवनागरी लिपि का 
एक मानव-समाज की ऊर्जा का एक अर्थचित्र 
नयनाभिराम 
लिपि के नभ का चन्द्रविन्दु
लिपि जो एक मानव-सभ्यता का आँगन है 

मुझे चन्द्रविन्दु की चिन्ता है 
लिपि को सुदूर जन तक पसारने वाले ये छापाखाने 
रौंद जाएँगे क्या 
देवनागरी लिपि की सर्वाधिक सुन्दर सुघड़ कोमल आकृति 
यन्त्र-वक्ष में 
न रहेगी चन्द्रविन्दु के लिए जगह 
सूरज की पीठ पर छपनेवाले अखबार 
छपेंगे चन्द्रविन्दु के बगैर 

बड़ी होगी जो पीढ़ी बेटे-बेटियों की 
अनुस्वार के उदित गोलाकार में चन्द्रविन्दु की अस्ताभा नहीं पहचानेगी 

कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशन - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

धुरी पर (Dhuree par by Gyanendrapati)

धर्म की धुरी पर 

घूम रही है पृथ्वी 

मर्म की धुरी पर 

जीवन की परिक्रमा कर रहा है कवि। 


कवि - ज्ञानेन्द्रपति 

संग्रह - कविता भविता 

प्रकाशन - सेतु प्रकाशन, दिल्ली, 2020 

रविवार, 22 मार्च 2015

दिनान्त पर आलू (Dinant par aaloo by Gyanendrapati)


सुबह सब्जी-मण्डी से गुजरते हुए 
बाजार में नए-नए आए 
ललछौंह आलुओं को देखा था 
सट्टी से सड़क तक उमड़े पड़ रहे थे 
नए-नए आए ललछौंह आलू 
घर-घर तक फ़ैल जाने को अधीर 
डलियों की चौड़ी अंजलियों में भरे लबालब 
पेटू झोलों के दन्तहीन मुँह में झाँकते उत्सुक 

दिन बिताकर 
उधर से लौटते हुए 
सँवलाए हुए दिखते हैं बचे हुए आलू 
उठ जाने से पहले उठे जाते हुए पैठ के साथ 
दिखते हैं मटैले धुमैले 
दिन-भर में ही जाने कितनी दुनिया देखे 
बाजार के रंग-ढंग 

ममतालु किसान-हाथों की मेहनती मजूर उँगलियों से 
ज़मीन की रात से उखाड़कर लाए हुए वे 
दिखते हैं 
रात की ज़मीन को छूते हुए 
थकी निदासी देह की कनपटी से 
और मैं देखता हूँ. आलुओं की देह के 
कार्बोहाइड्रेट में कहाँ से घुलती-मिलती है करुणा 
करुणा - जिसे छिलके के साथ छुड़ाकर 
शेष कार्बोहाइड्रेट को कतर-कतर 
चिप्स में बदलती हैं पैकेटबन्द खाद्यनिर्माता बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ 
उन्हें भरतीं पारदर्शी प्लास्टिक-कारागार में 
लाभ-लोभ के सर्वग्रासी जबड़ों के बीच लपलपाती जीभ को सौंपने 



कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

रविवार, 9 मार्च 2014

अधरात घास-गन्ध (Adhraat ghaas-gandh by Gyanendrapati)

अचानक आधी रात 
खुल जाती है नींद 
हवा में भीनी-भीनी-सी गन्ध 
मन में उमंग 
कि दबे पाँव छत पर जा 
देखा जाए, कहाँ हैं सप्तर्षि 
नथुनों को फुला 
खींचता हूँ एक लम्बी साँस 
अरे ! यह तो घास काटने की ताज़ा गन्ध
क्या यह मेरे बचपन का भिनसार 
ओढ़ना हटा, नींद में चलता 
देखूँगा क्या गोहाल के पास 
काट रहे घास की कुट्टी बाबा 
सधे हाथों खट् खट् खट्
बैठूँगा सामने ही उन-सा उकडूँ 
नींद से मुँदी आँखें 
बस खुले नथुने घास की गन्ध से नहाते 
फेफड़े 
हरी गन्ध से पुलकित रँगे जाते 
अचानक आधी रात
खुल जाती है नींद 
हवा में भीनी-भीनी-सी गन्ध 
मन में उमंग 
पैर उतरना चाहते बिस्तर से 
हाथ खोलना चाहते खिड़की 
कि तभी खयाल अचानक 
कि भूचाल 
अरे ! कहीं यह फास्जीन गैस तो नहीं 
जो महकती ताज़ा कटी घास की तरह 
या मिथाइल आइसोसाइनेट या साइनाइड या क्लोरिन 
या इन-सा ही कोई नाम 
औद्योगिक सभ्यता का जटिल बार्बडवायर शब्द कोई 
खींचता खरोंच 
जन-मन पर 

यह खयाल 
कि दम घुटता है 
आँखें सुलगती-गलती हैं 
ग्रसती है चिन्ता, कहाँ दूसरे 
अपने घर में या घर से बाहर 
दुबले हड़ियल बच्चे-बूढ़े 
चिन्ताकुल ममता-मूर्तियाँ 
उमगते युवक 
जिन्हें साथ होना था 
जिनके साथ होना था 
इस पल 
अपनी नींद में ही जो निरापद 
भोले-भाले 
निश्शंक निढाल 
लेते निश्वास 
कि तभी 
लहक-लपक पड़ने को उद्यत मन को 
फुसलाता है 
तन के साथ सोया रहना चाहनेवाला मन-खण्ड 
पाखण्ड 
अरे ! अरे ! 
व्यर्थ घबराहट ! निरर्थक चिन्ता !
यहाँ कहाँ यूनियन कार्बाइड का कारखाना 
कोई कीटनाशक संयन्त्र
भोपाल नहीं यह, पटना है पटना 
गंगा तीरे 
दूर बहुत कैंची छोला से 
क्या सचमुच ?
इस झाँसा-पट्टी से 
बच सकती है नींद ?
भोपाल से पटना को 
या कि वियतनाम से भारत को 
अलग कर सोया जा सकता है ?
जब वियतनाम की वनस्पति पर 
एजेण्ट आरेन्ज का कहर टूटता 
सघन जंगल जब 
झाड़-झंखाड़ होते हैं 
निष्कवच होते हैं जन-योद्धा 
क्या केवल वियतनामी गुरिल्ला ही नहीं 
हम भी होते हैं 
हम सब जो दुनिया के तीन चौथाई देशों में अलग-अलग 
अपने देश की माटी को गूँथ
बनाना चाहते देश की प्रतिमा नई
देश की माटी खनिजोर्वर
लगी जिसमें साम्राज्यवाद की सेन्ध 
जिसके वक्ष के अमृतकुण्ड में 
गहरे धँसा शोषण का अदृश्य साइफन 
अमरीकी अर्थपिशाच की आक्टोपसी सूँड

हाँ, हम सब 
गरीब मुल्कों के वासी 
पिछड़े अनपढ़ 
हमारे दलिद्दर पर घड़ियालों के आँसू बहते 
करुणा उमड़ती 
बढ़ते कर 
बघनखे छुपाए 
सन्धियों समझौतों सहयोगों में 
हाँ, हम सब 
गरीब मुल्कों के वासी 
आदमी से नीचे 
रासायनिक युद्धों के पूर्वाभ्यास के लिए 
गिनीपिग 

अरे नहीं ! नहीं !
तोबा ! तोबा !
मुण्ड हिलाता जीभ काटता है दुनिया का सबसे पुराना लोकतन्त्र

मुण्ड झुकाता जीभ चलाता है दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र 
चच्चा सैम को कनखियों से ताकता भतीजा सैमसन :
दुर्घटना है यह 
दुखद दुर्घटना 
विकास के रस्ते में 
तेज़ रफ़्तार गाड़ी बस ज़रा फिसल गई 
लेकिन क्या निदान !
जाना तो है गन्तव्य तक 
आओ ! ब्रेक-टायर दुरुस्त करें हम 
होश न खोयें, नए जोश से 
बढ़ें, चाल न अपनी सुस्त करें हम 

विकास !
हाँ, ठीक सुना हमने 
विनाश नहीं विकास 
टूटते हैं अब भी 
प्रकृति के प्रकोप हम पर 
सूखा बाढ़ शीतलहर 
पारा-पारी 
अब यह टूटता है 
औद्योगिक प्रकोप 
प्रकोप क्या, प्रलय का पूर्वाभ्यास 
क्या हम सब 
अपने-अपने घर में बन्द
दरवाजों की सेंधों गोखों बच्चों की चीत्कारों में 
जहाँ-जहाँ चमकता आकाश 
धड़कती छाती बहती आँखों कँपती उँगलियों से 
ठूँसते रहेंगे चिथड़े
चिथड़े-चिथड़े कर 
फटेहाल ज़िन्दगी अपनी 
कब तक 
या तो मरेंगे 
या बस बचे रहेंगे 
हाँफते खाँसते
गर्भवती माताओं के सिरहाने 
जो भविष्य को रचने से पहले 
उघड़ा हुआ पाने लगी हैं 

क्या हम सब 
अपने-अपने घर में बन्द
अधरात अचानक 
हवा में घास की गन्ध आने से 
सिहरते रहेंगे चुपचाप 
स्तब्ध 
कि अब सुनाई देगा कोई साइरन 
बजेगी कोई ख़तरे की घण्टी 
कि हम कहेंगे 
बहुत बज चुकी ख़तरे की घण्टी 
अपने-अपने घर से बाहर आ 
यह एक मुट्ठी की तरह कसने का वक़्त है 
विषबेलमुण्ड से चिकने चमकीले 
इस लोकतन्त्र नहीं लोभतन्त्र को फोड़ने का वक़्त है 
सृजन और शान्ति के लिए 
कसना ही होगा मानव-समुदायों को 
एक संकल्पित मुट्ठी में 
युद्ध और विनाश की तिजारत के विरुद्ध 
मौत के आढ़तियों की दुकानों के शटर
गिराने ही होंगे 
देश-देश में 
जनमत के बल से 

कहना ही होगा हमें 
हम प्रलय होने न देंगे 
इस सौरमण्डल में 
जीवन-ज्योतित पृथ्वी का गोलक 
घूमता रहेगा अनन्तकाल 
मानव की जययात्रा 
शवयात्रा में बदलेगी नहीं


कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

फज़िर की अज़ान (Fazir ki azaan by Gyanendrapati)


फज़िर की अज़ान
लाने चली सूरज को 
आकाशलंघी आलाप की लम्बी रस्सी से खींच 
खिंचा चला आता है नलकों में पानी 
करता तर, खुली टोंटियोंवाले, देर से सन्नाते, नलकों के ख़ुश्क हलक 
और जग उठती हैं हलक में फँसी 
दमदार बूढ़ी देहों की दमादार खाँसियाँ
और खड़क उठती हैं खाली बाल्टियाँ बेसाख़्ता 
और भरी बची रात छलक उठती है 
उनके भीतर से बाहर, गोलार्ध के बाहर 


यह एक भारतीय भोर है 
एक मँझोले नगर का 
झंगोले पर लेटा 
प्रत्यूष को सुनता हूँ 
पृथ्वी पर प्रतिध्वनित 
और लगता है 
कबसे सुनता ही आ रहा हूँ
अपने होने से भी पहले से 
भारतीय भोर की यह आहट 
सुनता हूँ 
और बड़ी भोरहरिया, बाबा जिसे कहते थे ब्राह्म वेला 
झलफलाह में जब दिशाएँ खुलने लगती हैं 
पुरुब में बलता हुआ भुरुकवा 
औचक और अजीब एक ख़याल बन उजलता है भीतर :
भारतीय आकाश से 
खदेड़ने न देंगे कभी किसी गिद्ध-दल को
फज़िर की अज़ान


कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

वजन (Vajan by Gyanendrapati)

यह जो
वजन तोलने की मशीन बैठी है
राह किनारे
'वजन जानें' का बड़ा-सा हस्तलिखित शीर्षक
                      गत्ते के एक टुकड़े पर लगाए
ऊँकड़ू बैठे एक बाबा के
पंजों के ऐन सामने
शरीर के वजन से नहीं
सिक्के के वजन से
हिलेगी इसकी सुई
जबकि वह सिक्का
एक बहुत हल्का सिक्का होगा
शरीर से पसीने की एक बूँद की तरह
राह चलते अलग हो जाने वाला

उस नन्हे सिक्के के वजन से
हिलेगी इसकी सुई
और शरीर का वजन बताएगी
शरीर का वजन
आदमी का नहीं
क्योंकि उसमें
शरीर का सुख-भार-भर शामिल होगा, मन का दुख-भार नहीं 


कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

सोमवार, 17 सितंबर 2012

मूर्धन्य ष के लिए एक विदा-गीत (Moordhanya sha ke liye ek vida-geet by Gyanendrapati)



बेचारा मूर्धन्य ष 
जो ऋषि-महर्षि में ही बचा हुआ है
और राष्ट्र में षड्यन्त्र में और षट्कोण में
और ऐसी ही दो-चार अजीबोगरीब जगहों में 
बेचारा मूर्धन्य ष
जिसकी आकृति-भर बची है 
एक तपस्वी आकृति
लिपि में
लिखित भाषा में

बेचारा मूर्धन्य ष
जिह्वा से जो गिर गया रास्ते में
बोली से बिछड़ गया
टोली से फिसल गया
डूब गया अँधेरे में
लिपि की झाड़ी में फँसा टिमटिमाता
डूब जाने दो
टूटा तारा है एक
दुख न करो
डूब जाने दो
ध्वनि के पीछे उसकी आकृति
डूब जाने दो
भाषा के अतल में
भाषा के जल में 
विस्मरण नहीं
अनन्त आकृतियों की स्मृति 


कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004


मुझे विदा नहीं करना है, फिर भी...

शनिवार, 30 जून 2012

मशरूम वल्द कुकुरमुत्ता (Mashroom wald kukurmutta by Gyanendrapati)


एक दिन 
बाजार से मेरे घर आता है
एक उच्च-भ्रू दुकान में के आदमकद फ्रिज में से निकल
पारदर्शी पोलिथिन पैकेट में बन्द
वह गौरांग

झोली उँडेलती हुई
पत्नी फरमाती हैं :
सवाद बदलने के लिए 
आज यह मशरूम

मैं देखता हूँ उसे 
और अचरज से चिहा उठता हूँ :
वाह ! बड़े दिनों बाद हुई भेंट 
कैसे हो भाई कुकुरमुत्ते ?
महाकवि के दुलारे, देते रहे बुत्ते
खाने से पहले तुम्हें देखूँ तो भरपेट !

कि मेरे भीतरी कानों में गूँजी एक डपट
छोड़ती लपट :
अशिष्ट !
देख ध्यान से अरे, मैं विशिष्ट
मैं नहीं वह, खुले में, सड़े पुआल पर उगा कुकुरमुत्ता 
कि ले जाए वह भी जिसके पाँव में नहीं जुत्ता
अरे, मैं तो वातानुकूलित कक्ष का वासी 
बारहमासी 
प्रोलेतेरियत नहीं, बूर्ज्वा
सर नवा
मैं खादखोर मशरूम
क्या जाने मुझे, तू हाड़तोड़ मजलूम
गरीबी से गर्वित
निवुध अपने चित्त को लिये चित्त !

दहलाती वाणी से नहलाए कानों में सहलाती उँगली दे
तब मैंने देखा ध्यान से
उस नवयुगी कुकुरमुत्ते को
कोमलांग हुरमुट्ठे को
बेशक, यह नहीं वह गँवई-गँवार
बचपन का यार
स्वयंभू सर्वहारा
बनाते जिसे गदा निराला
करने को ध्वस्त कुल और कूल बूर्ज्वाजी के 
गुलाब के बहाने परोपजीवी मूल्य बूर्ज्वाजी के

यह नहीं वह मुँहफट महामना
यह जो इतराता आज गुलाब का गोतिया बना
कुकुरमुत्ता नहीं, मशरूम
मुरव्वत से महरूम
सबाल्टर्न नहीं, अल्ट्रामाडर्न 
पंचतारा होटलों का डिश
फ्लाइंग किस
वायुयानों में भर विदेशगामी
अभिमानी
वर्गारोही स्वर्गारोही 
आधुनिक नव्वाबों का लाड़ला
गरीब के दुआरे आते लाज-गड़ा
अब कहाँ मयस्सर गोली और मोना बंगाली को
मालिन को और माली को
इसका कलिया-कबाब
उनका ख्वाब
खाते बस बहार और नव्वाब
एअरकंडीशंड जिन्दगी है
बड़े-बड़ों से बंदगी है
बाकी तो गरीबी है गन्दगी है

मैंने देखा उसे
जमीन से उठकर जिसका दिमाग सातवें आसमान चढ़ा
अमीरों का मुँहलगा
कहा पत्नी को :
सुनो, जल्द पकाओ इसे
नहीं तो जाऊँगा कच्चा चबा !

                                     कवि - ज्ञानेन्द्रपति 
                                     संग्रह - संशयात्मा 
                                     प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004