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सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

तबादले और तबदीलियाँ (Tabadale aur tabdiliyan by Kunwar Narayan)

तबदीली का मतलब तबदीली होता है, मेरे दोस्त 
सिर्फ़ तबादले नहीं,

वैसे, मुझे ख़ुशी है 
कि अबकी तबादले में तुम 
एक बहुत बड़े अफ़सर में तबदील हो गए :

             बाकी सब जिसे तबदील होना चाहिए था 
             पुरानी दरख़्वास्तें लिये 
             वही का वही 
             वहीं का वहीं। 


कवि - कुँवर नारायण 
संकलन - कोई दूसरा नहीं 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण - 1993 

शनिवार, 6 सितंबर 2014

गाय (Gaay by Kunwar Narain)

सब से डरती गाय। 
घास चरती गाय। 
दूध देती गाय। 
                
               दूध पीता बच्चा। 
               दूध पीती बिल्ली। 
               दूध पीता साँप। 

                             माँ, मुझको डर लगता :
                             मेरा घर 
                             कैसे कैसे जीवों का घर लगता !


कवि - कुँवर नारायण 
संकलन - अपने सामने 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण, 1979 

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

अंक और अक्षर (Ank aur akshar by Kunwar Narayan)


हवा में उड़ रहे थे अंक ही अंक 
        चिड़ियों की तरह चहचहाते 
        कभी मकानों पर बैठ जाते
        कभी दुकानों पर 
        कभी मोटरों पर
        कभी बिजली के तारों पर 

सब पकड़ रहे थे उन्हें 
        अपनी अपनी तरह 
        अपनी अपनी ज़मीन पर l

किसी के हाथ लगा … 1
किसी के हाथ … 2 
किसी के हाथ … 3 

          जिसके जो हाथ लगा 
          वह उसी से बैठाने लगा 
          अपनी ज़िंदगी का जोड़ तोड़ l 

जिनके हाथ आया … 0 
          उनमें से कुछ 
चले गए अंकों से अक्षरों की दुनिया में l


कवि - कुँवर नारायण
संकलन - इन दिनों
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2002

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

एक अदद कविता (Ek adad kavita by Kunwar Narayan)


जैसे एक जंगली फूल की आकस्मिकता 
मुझमें कौंधकर मुझसे अलग हो गयी हो कविता 

और मैं छूट गया हूँ कहीं 
जहन्नुम के खिलाफ़ 
एक अदद जुलूस 
एक अदद हड़ताल 
एक अदद नारा 
एक अदद वोट 
और अपने को अपने ही 
देश की फटी जेब में सँभाले 
एक अवमूल्यित नोट 
सोचता हुआ कि प्रभो 
अब कौन किसे किसके-किसके नरक से निकाले ?



कवि - कुँवर नारायण
संग्रह - अपने सामने 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1979

गुरुवार, 6 जून 2013

लापता का हुलिया (Lapata ka huliya by Kunwar Narayan)


रंग गेहुआ ढंग खेतिहर 
         उसके माथे पर चोट का निशान 
क़द ५ फुट से कम नहीं 
         ऐसी बात करता कि उसे कोई ग़म नहीं l 
         तुतलाता है l 
         उम्र पूछो तो हज़ारों साल से कुछ ज़्यादा बतलाता है l 
         देखने में पागल-सा लगता - है नहीं l 
         कई बार ऊँचाइयों से गिर कर टूट चुका है 
 
         इसलिए देखने पर जुड़ा हुआ लगेगा 
                   हिन्दुस्तान के नक़्शे की तरह l 
 
 
कवि - कुँवर नारायण
संग्रह - अपने सामने 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1979

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

रंगों की हिफाज़त (Rangon ki hifazat by Kunwar Narayan)


रंग के विशेषज्ञों को डर है 
कि आगामी वर्षों में 
कुछ रंगों की भारी कमी मुमकिन है l 
उनका अकाल तक पड़ सकता है 
अगर इसी रफ्तार से हम उन्हें नष्ट करते रहे :

                                   जैसे लाल और हरा, जो या तो 
                                   आसमान की तरह नीले पड़ जाएँगे 
                                   या कोयले की तरह काले l 

एहतियात ज़रूरी है 
कि जहाँ भी वे मिलें 
उन्हें यत्न से बचाया जाए :

                                   लाल को चाहे रक्त कहें 
                                   चाहे हरे को हरियाली 
                                   वे केवल फर्क रंग हैं 
                                   दुश्मन रंग नहीं l 

और दोनों ही को बचाना ज़रूरी है 
एक दूसरे की ज़िंदगी के लिए l 



कवि - कुँवर नारायण 

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

समझदार स्त्री (Samajhdar stree by Kunwar Narayan)


वह एक समझदार स्त्री है
        जो उन लोगों को समझती है
        जो घर के कमरे में बैठे
        स्त्रियों के बहाने
        उसके बारे में बात कर रहे हैं

उनके मन में नक़ली हमदर्दी
और असली कौतूहल है,
        कि देखें उसमें कितना आत्मबल है.




कवि - कुँवर नारायण
संकलन - इन दिनों
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2002




बुधवार, 28 नवंबर 2012

चार ईमानदार (Char imandar by Kunwar Narayan)


चार ईमानदार मिलकर
बेईमानी पर बहस कर रहे थे

उनमें से एक
बेमानी का सरकारी वक़ील नियुक्त किया गया

उसने बेमानी के पक्ष में
हर सम्भव दलील दी

लेकिन मुक़द्दमा बहुमत से हार गया l

दरअसल
चारों में से कोई भी
बेमानी के पक्ष में न था

चारों ने मिलकर
बेमानी को शुद्ध बहुमत से हरा दिया था

और चारों ईमानदार एकमत थे
कि बेमानी को हराने का
यही एक तरीक़ा है
कि उसे अल्पमत में ला दिया जाए l


कवि - कुँवर नारायण
संकलन - इन दिनों
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2002

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

घंटी (Ghantee by kunwar Narayan)


फ़ोन की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूँ
          और करवट बदलकर सो गया l

दरवाज़े की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूँ
          और करवट बदलकर सो गया l

अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूँ
          और करवट बदलकर सो गया l

एक दिन 
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा - 
मैं हूँ - मैं हूँ - मैं हूँ 
          मौत ने कहा -
          करवट बदलकर सो जाओ l

       
कवि - कुँवर नारायण 
संकलन - इन दिनों 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2002

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

घर पहुँचना (Ghar pahunchana by Kunwar Narayan)



हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर
अपने अपने घर पहुँचना चाहते 

हम सब ट्रेनें बदलने की 
झंझटों से बचना चाहते

हम सब चाहते एक चरम यात्रा
और एक परम धाम

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं
और घर उनसे मुक्ति

सचाई यूँ भी हो सकती है
कि यात्रा एक अवसर हो
और घर एक संभावना

ट्रेनें बदलना
विचार बदलने की तरह हो
और हम जब जहाँ जिनके बीच हों
वही हो
घर पहुँचना


कवि - कुँवर नारायण
संग्रह - कोई दूसरा नहीं
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1993