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रविवार, 3 मार्च 2013

राधेश्याम बहार (Radheshyam bahar by Bhikhari Thakur)


सुनिलहमार कहल, मन बा तोहार दहल ;
                 उमिर मोहन के नादान बा हो गोरिया !
कइसे हेराइल बूध, बोलत नइखू बोली सूध ;
                 नखऊ बिचार बड़-छोट के हो गोरिया !
बबुआ नादान बाटे, लगलू कसीदा काटे ;
                 झूठहूँ के लहरा लगवलू हो गोरिया !
झगरे के हऊ मन, कतिना बा तोरा धन ;
                 हन-हन झन-झन छोड़ि दऽ हो गोरिया !
नाहीं त जुलुम होई, राजाजी से कही कोई ;
                 तब नाहीं बसबू नगर में हो गोरिया !
लगन हमार लखि, जरत-मरत बाडू सखी ;
                 अनभल(अशुभ) छोड़ि दऽ मनावल हो गोरिया !
परल बाडू हाथवा में, चलऽ हमरा साथवा में ;
                 कहब तोहरा भाई-भउजाई से हो गोरिया !
चलऽ बबुआ दूनों भइया, जहँवाँ इनिकर हवहिन मइया ;
                 नीके पुरवासाठ करिके छोड़ब हम हो गोरिया !
मुँहवाँ के राखऽ लाली, काली कलकत्ता वाली ;                              

                 कहत 'भिखारी' नाई गाइ के हो गोरिया ! 

कवि - भिखारी ठाकुर
किताब - भिखारी ठाकुर रचनावली
प्रकाशक - बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 2005

यह गीत 'राधेश्याम बहार' (कृष्ण-लीला या रास-लीला) संगीत-नृत्य रूपक से लिया गया है और यशोदा का कथन है। गोकुल की युवतियाँ माँ यशोदा से कृष्ण की छेड़छाड़ की शिकायत करती हैं तो यशोदा कृष्ण से पूछती हैं कि "बबुआ सुनहु बात, डगर आवत-जात ; केकरो से बोले के गरज का दुलरुआ?" इस पर कृष्ण अपनी सफाई देते हैं कि सखी ही उन्हें तंग कर रही थीं और "केहू हाथ धइल कसि के, केहू बोलल हँसि-हँसि के ; उटुकी-खुटुकिया (उकसानेवाली) चलावल केहू हो मइया !" इतना सुनना था कि "यशोदाजी बेटा का कहला में आ गइली आ लगली सखी लोग के सुनावे" !

रविवार, 13 जनवरी 2013

एक औरत हिपेशिया भी थी (Ek aurat Hipeshiya bhee thee by Habib Tanvir)

हिपेशिया की  तक़रीर - "वो लोग जो मिर्गी के मरीज़ हैं, बस उन्हीं लोगों के अंदर चाँद अपने ठंडे असरात पैदा करता है। इसके बरअक्स वो लोग, जिनके दिमाग़ के अंदर से फूटी हुई किरनें उनके दिल तक उतर जाती हैं, वो बरगज़ीदा हैं, ऐसे ही लोगों के दिलों में वो चिनगारी होती है जिसे अक्ल कहते हैं. यही वो रौशनी है, जो दिमाग़ वाले के लिए इल्म का सबब बनती है। और जानने के लायक़ चीज़ों के लिए उनके पहचाने जाने का सबब बनती है। उसी तरह जिस तरह मामूली रौशनी हमारी नज़र में रंगों को उजागर कर देती है। रौशनी हटा लीजिए, बस फिर अँधेरे के सिवा और कुछ नहीं रह जाएगा। ...
मैं यह मानती हूँ कि कोई भी ऐसा ख़याल, जो दूसरी दुनिया का डर दिल में बिठाकर या किसी और तरीके से हुक्म लगाकर आदमी के दिमाग़ को ज़ंजीरों में जकड़ ले, वो गलत है। इससे ख़याल में बंदिश आ जाती है, तरक्क़ी के रास्ते मसदूद हो जाते हैं, रुक जाते हैं। कोई नया ख़याल पैदा होने की गुंजाइश नहीं रह जाती। नया ख़याल कहता है : अपने आपको जानो। बस नया ख़याल आज़ाद होता है। लेकिन इसका नतीजा होता है ज़िम्मेदारी। नया ख़याल अपने साथ एक ज़िम्मेदारी का अहसास पैदा करता है। या तो आप अपने ख़याल के मुताबिक़ जिएँ, और या फिर उसे खो दें, और ख़मियाज़ा भुगतें। और अगर आप अपने ख़याल के मुताबिक़ जीते हैं, तो गोया आप आज़ाद हैं। सही मायनों में आज़ाद। फिर आपको मौत भी नहीं डरा सकती, जहन्नुम भी नहीं डरा सकता, फिर दुनिया की कोई ताक़त आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।"


"दुनिया के मशहूर गणितज्ञ थियोन की बेटी हिपेशिया किसी परिचय की मोहताज नहीं है। आप जानते ही हैं कि थियो
ने गणित और खगोल के विषय  पर बहुत महत्त्वपूर्ण किताबें लिखीं। ये विद्या उन्होंने अपनी बेटी को भी सिखाई और कुछ किताबों पर साथ मिलकर भी काम किया। उनके गुजर जाने के बाद हिपेशिया ने उनसे भी ज़्यादा तरक्की की। किताबें लिखीं और अपना नाम रोशन किया। गणित, खगोल और फ़लसफ़े के सिलसिले में इस वक्त दुनिया में हिपेशिया का सानी मौजूद नहीं।"
अक्ल की दुनिया में जिस कदर भी थी
वो सब एक शख़्स में समाई थी
           एक औरत हिपेशिया भी थी।
शक्ल महताब हुस्न की पहली
जिससे दुनिया में रोशनी फैली
          एक औरत हिपेशिया भी थी।
अक्ल की वैसी दिल की भी वैसी
उसको हर शख़्स से थी हमदर्दी
आप अपनी मिसाल थी वैसी
          एक औरत हिपेशिया भी थी।
उसके क्या-क्या हुनर मैं गिनवाऊँ
कम हैं जितना भी उसके गुण गाऊँ
          एक औरत हिपेशिया भी थी।

नाटककार - हबीब तनवीर
किताब - एक औरत हिपेशिया भी थी
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2004

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

इन्द्रसभा (Indrasabha by Syed Agha Hasan 'Amanat')




श्रीगणेशायनमः 
अथ इन्द्रसभा अमानत 
प्रारम्भ :
 

सभा में दोस्तो इन्दर की आमद आमद है l  परीजमालों के अफ्सर की आमद आमद है 
ख़ुशी से चहचहे लाज़िम है सूरते बुलबुल l अब इस चमन में गुलेतर की आमद आमद है
फ़रोगे हुस्न से आँखों को अब करो रौशन l ज़मी पै मेहर मुनव्वर की आमद आमद है
दुजानू बैठो करीने के साथ महिफ़िल में ll परी की देव की लश्कर की आमद आमद है
ज़मीं पै आयेंगी राजा के साथ परियाँ ll सितारों के महे अनवर की आमद आमद है
ग़ज़ब का गाना है और नाच है क़यामत का l बहारे फ़ितूनए महिशर की आमद आमद है
बयाँ मैं राजा की आमद का क्या करूं उस्ताद l जिगर की जान की दिलबर की आमद आमद है 
            चौबोला अपने हस्बेहाल ज़बानी राजा इन्द्र के.
राजा हूं मैं कौम का और इन्दर मेरा नाम ll बिन परियों की दीद के मुझे नहीं आराम 
सुनो रे मेरे देव रे दिल को नहीं करार ll जल्दी मेरे वास्ते सभा करो तैयार 
तख़्त बिछाओ जगमगा जल्दी से इस आन l मुझ को शबभर बैठना महिफ़िल के दर्म्यान
मेरो सिंगल दीप में मुल्कों मुल्कों राज l जी मेरा है चाहता कि जलसा देखूं आज
लाओ परियों को अभी जल्दी जाकर हाँ l बारी बारी आन कर मुजरा करैं यहाँ 
            आमद पुखराज परी की बीच सभा के.
महिफ़िले राजा में पुखराज परी आती है l सारे माशूक़ों  की सिरताज परी आती है 
जिस का साया न कभी ख़्वाब में देखा होगा  आदमीज़ादों में वह आज परी आती है 
दौलते हुस्न से हो जायगा आलम मामूर ll करने इस बज़्म में अब राज परी आती है 
रंग हो ज़र्द हसीनों का न क्यों कर उस्ताद ll गुल है महिफ़िल में कि पुखराज परी आती है 
......


लेखक - सैयद आग़ा हसन 'अमानत'
स्रोत - नटरंग, खंड-23, अंक-91
संस्थापक संपादक - नेमिचंद्र जैन 
संपादक - अशोक वाजपेयी, रश्मि वाजपेयी  
अतिथि संपादक - पीयूष दईया 

सैयद आग़ा हसन अमानत (1815-1858) उर्दू के मशहूर शायर और नाटककार हैं. उनका संगीत नाटक इन्द्रसभा (या इन्दर सभा) 1852 में रचा गया था. महेश आनंद बताते हैं कि इसमें "मध्ययुगीन पारंपरिक नाट्यरूपों-रामलीला, रासलीला, भड़ैती, भगतबाजी और शहरी परम्परा में से दास्तानगोई की बैठकों, मरसियाख़्वानी और मुजरों की महफ़िलों के तत्त्व शामिल" किए गए हैं. इसके आधार पर 1932 में इसी नाम से फिल्म बनी थी. कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी किया गया है.