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मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

आओ (Aao by Makhdoom Mohiuddin)

उसी अदा से उसी बाँकपन के साथ आओ। 
फिर एक बार उसी अन्जुमन के साथ आओ। 
हम अपने एक दिल -ए बेख़ता के साथ आएँ। 
तुम अपने महशरे दारो रसन के साथ आओ। 


महशरे  - प्रलय 


शायर - मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संकलन - सरमाया : मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संपादक - स्वाधीन, नुसरत मोहिउद्दीन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 2004 


बुधवार, 16 अप्रैल 2014

ख़्वाहिशें (Khwahishein by Makhdoom Mohiuddin)


ख़्वाहिशें 
लाल, पीली, हरी, चादरें ओढ़ कर 
थरथराती, थिरकती हुई जाग उठीं 
जाग उठी दिल की इन्दर सभा 
दिल की नीलम परी, जाग उठी 
दिल की पुखराज 
लेती है अंगड़ाइयाँ जाम में 
जाम में तेरे माथे का साया गिरा 
घुल गया 
चाँदनी घुल गई 
तेरे होठों की लाली 
तेरी नरमियाँ घुल गईं 
रात की, अनकही, अनसुनी दास्तां 
घुल गई जाम में 
ख़्वाहिशें 
लाल, पीली, हरी, चादरें ओढ़ कर 
थरथराती, थिरकती हुई जाग उठीं l 

 
शायर - मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संकलन - सरमाया : मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संपादक - स्वाधीन, नुसरत मोहिउद्दीन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 2004

रविवार, 12 जनवरी 2014

मुस्तक़बिल (Mustaqbil by Makhdoom Mohiuddin)

चला आ रहा है चला आ रहा है l 
चला आ रहा है चला आ रहा है l 
 
         धड़कते दिलों की सदा आ रही है
         अन्धेरे में आवाज़े पा आ रही है 
         बुलाता है कोई निदा आ रही है l  
चला आ रहा है चला आ रहा है l 
चला आ रहा है चला आ रहा है l 

          न सुल्तानी-ए तीरगी है ज़ारी 
          न तख्ते सुलेमां न सरमायादारी 
          गरीबों की चीख़ें न शाही सवारी l
चला आ रहा है चला आ रहा है l 
चला आ रहा है चला आ रहा है l 

           उड़ाता हुआ परचमे ज़िन्दगानी 
           सुनाता हुआ एहदे नौ की कहानी 
           जिलू में ज़फ़रमन्दिया शादमानी
चला आ रहा है चला आ रहा है l 
चला आ रहा है चला आ रहा है l 
           
           सफीना मसावत का खे रहा है
           जवानों से कुर्बानियाँ ले रहा है 
           गुलामों को आज़ादियाँ दे रहा है l 
चला आ रहा है चला आ रहा है l 
चला आ रहा है चला आ रहा है l
 
 
मुस्तक़बिल = भविष्य 
आवाज़े पा = पैर की आवाज़ 
निदा = आह्वान 
एहदे नौ = नवयुग 
जिलू = सामने
ज़फ़रमन्दिया = सफलताएँ 
शादमानी = खुशी से भरी हुई 
सफीना = नाव 
मसावात = समानता
 
शायर - मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संकलन - सरमाया : मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संपादक - स्वाधीन, नुसरत मोहिउद्दीन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 2004

शनिवार, 16 नवंबर 2013

नेहरु (Nehru by Makhdoom Mohiuddin)


हज़ार रंग मिले, इक सुबू की गरदिश में 
हज़ार पैरहन आए गए ज़माने में 
मगर वो सन्दल-ओ-गुल का गुबार, मुश्ते बहार 
हुआ है वादिए जन्नत निशां में आवारा 
अज़ल के हाथ से छूटा हुआ हयात का तीर 
वो शश जेहत का असीर 
निकल गया है बहुत दूर जुस्तजू बनकर l

मुश्ते बहार = मुट्ठी भर बहार 
वादिए जन्नत निशां  = स्वर्ग के चिह्नों की घाटी में 
अज़ल = अनादि काल
शश जेहत का असीर = छः दिशाओं का बन्दी


शायर - मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संकलन - सरमाया : मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संपादक - स्वाधीन, नुसरत मोहिउद्दीन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2004

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

फूल खिलते ही रहे (Phool khilte hi rahe by Makhdoom Mohiuddin)

फूल खिलते ही रहे, कलियाँ चटकती ही रहीं 
दिल धड़क जाए तो हासिल ? आँख भर आई तो क्या l 

शाम सुलगाती चली आती है, ज़ख़्मों के चिराग़ 
कोई जाम आया तो क्या, कोई घटा छाई तो क्या l 

काकुलें लहराईं, रातें महकीं, पैराहन उड़े 
एक उनकी याद ऐसी थी, नहीं आई तो क्या l 

दूरियाँ बढ़ती भी हैं, घटती भी हैं, मिटती भी हैं 
साअतें आईं, यही साअत नहीं आई तो क्या l 


साअतें = क्षण 


शायर - मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संकलन - सरमाया : मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संपादक - स्वाधीन, नुसरत मोहिउद्दीन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 2004

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

आहिस्ता (Aahista by Makhdoom Mohiuddin)


साज़ आहिस्ता ज़रा गरदिशे जाम आहिस्ता 
जाने क्या आए निगाहों का पयाम आहिस्ता l 

चाँद उतरा के उतर आए सितारे दिल में 
ख़्वाब में होठों पे आया तेरा नाम आहिस्ता l 
 
कू-ए-जानां में क़दम पड़ते हैं हल्के-हल्के 
आशियाने की तरफ़ तायर-ए-बाम आहिस्ता l 

उनके पहलू के महकते हुए शादां झोंके 
यूं चले जैसे शराबी का ख़राम आहिस्ता l 
 
और भी बैठे हैं ऐ दिल ज़रा आहिस्ता धड़क 
बज़्म है पहलू-ब-पहलू है कलाम आहिस्ता l 
 
                 ये तमन्ना है के उड़ती हुई मंज़िल का गुबार      
                 सुबह के पर्दे में या आ गई शाम आहिस्ता l 


कू-ए-जानां = प्रेमिका की गली 
तायर-ए-बाम = मुंडेर का पक्षी 
शादां  = सुख पहुँचानेवाले 
ख़राम = चाल 
कलाम = काव्य
 
शायर - मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संकलन - सरमाया : मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संपादक - स्वाधीन, नुसरत मोहिउद्दीन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2004 

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

तेलंगन (Telangan by Makhdoom Mohiuddin)



फिरने वाली खेत की मेंड़ों पे बल खाती हुई l
नर्मो शीरीं क़हक़हों के फूल बरसाती हुई l
कंगनों से खेलती औरों से शरमाती हुई l
          अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा 
          हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा l

तेलंगन = तेलंगाना की स्त्री, शीरीं = मीठा

अरज़ यकसरगोश है खामोश हैं सब आसमां
राग सुनने रुक गए हैं बादलों के कारवां 
हाँ तराना छेड़, जंगल का मेरी गुन्चा दहां l  
           अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा
           हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा l

अरज़ = धरती, यकसरगोश = सुनने के लिए तैयार, गुन्चा दहां = कली-सा चेहरा

देखने आते हैं तारे शब में सुन कर तेरा नाम
जलवे सुबह-ओ-शाम के होते हैं तुझसे हमकलाम
देख फितरत कर रही है तुझको झुकझुक कर सलाम l
           अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा
           हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा l

हमकलाम = बातचीत

दुख्तरे पाकीज़गी नाआशनाए सीम-ओ ज़र,
दश्त की खुद रौ कली तहज़ीबेनौ से बेखबर
तेरी ख़स की झोंपड़ी पर झुक पड़े सब बामो दर l
           अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा
           हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा l


 दुख्तरे पाकीज़गी = पवित्रता की बेटी, नाआशनाए = अनजान, सीम-ओ ज़र = चाँदी-सोना, दश्त = जंगल, खुद रौ कली = अपने आप उगने वाली कली,
तहज़ीबेनौ = नई सभ्यता, बामो दर = छत और दरवाज़े

ले चला जाता हूँ आँखों में लिए तस्वीर को
ले चला जाता हूँ पहलू में छिपाए तीर को
ले चला जाता हूँ फैला राग की तनवीर को l
           अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा
           हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा l

तनवीर = ज्योति 




शायर - मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संकलन - सरमाया : मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संपादक - स्वाधीन, नुसरत मोहिउद्दीन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2004

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

सन्नाटा (Sannaataa by Makhdoom Mohiuddin)


कोई धड़कन
न कोई चाप
न संचल (हलचल?)
न कोई मौज
न हलचल
न किसी साँस की गर्मी
न बदन
ऐसे सन्नाटे में इक आध तो पत्ता खड़के
कोई पिघला हुआ मोती
कोई आँसू
कोई दिल
कुछ भी नहीं
कितनी सुनसान है ये राहगुज़र
कोई रुखसार तो चमके, कोई बिजली तो गिरे l


शायर - मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संकलन - सरमाया : मख़्दूम मोहिउद्दीन 
संपादक - स्वाधीन, नुसरत मोहिउद्दीन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 2004

ख़्वाज़ा अहमद अब्बास ने ठीक ही कहा था कि "मख़्दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूँदें भी...वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी."