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मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

बोलने में कम से कम बोलूँ (Bolane mein kam se kam bolun by Vinod Kumar Shukla)


बोलने में कम से कम बोलूँ 

कभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँ 

इतना कम कि किसी दिन एक बात 

बार-बार बोलूँ 

जैसे कोयल की बार-बार की कूक फिर चुप। 


मेरे अधिकतम चुप को सब जान लें 

जो कहा नहीं गया, सब कह दिया गया का चुप। 

पहाड़, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा के बरक्स 

एक छोटा सा टिमटिमाता 

मेरा भी शाश्वत छोटा सा चुप.। 


गलत पर घात लगाकर हमला करने के सन्नाटे में 

मेरा एक चुप - 

चलने के पहले एक बन्दूक का चुप 

और बन्दूक जो कभी नहीं चली 

इतनी शान्ति का 

हमेशा की मेरी उम्मीद का चुप। 


बरगद के विशाल एकान्त के नीचे 

सम्हाल कर रखा हुआ 

जलते दीये का चुप। 


भीड़ के हल्ले में 

कुचलने से बचा यह मेरा चुप,

अपनों के जुलूस में बोलूँ 

कि बोलने को सम्हाल कर रखूँ का चुप। 


कवि - विनोदकुमार शुक्ल 

संकलन - कभी के बाद अभी 

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2012 

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

लड़की हरे भरे पेड़ देखती है (Ladki Hare Bhare Ped Dekhati Hai by Vinod Kumar Shukla)

लड़की हरे भरे पेड़ देखती है 

तो उसे आकाश दिख जाता है। 

ऊंचे ऊंचे मिले जुले मकान देखती है 

तो आकाश दिख जाता है। 

लड़की चाहे पेड़ न देखे 

पेड़ पर बैठी चिड़िया देखे 

उसे आकाश दिख जाता है। 

घर की खिड़की घंटों बंद रखे 

बस थोड़ी सी खोले 

या भूल से 

सड़क पर निकल आये 

दांये जाये या बांये 

उसे आकाश दिख जाता है। 


लड़की बहुत परेशान है। 

                                - 1964 


कवि - विनोदकुमार शुक्ल 

संकलन - वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह 

प्रकाशन - आधार प्रकाशन, पंचकूला, 1996 (प्रथम संस्करण 1981)

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

यह अनंत अंत का दौर (Yah anant ant ka daur by Vinod Kumar Shukla)

यह अनंत अंत का दौर
आत्मसात के गाँव में 
आत्मसात का ठौर !

आत्मसात का बारबार 
अबकी बार, अगली बार 
इसबार 
हरबार का दौर 
हरबार के इस गाँव में 
हरबार का ठौर l 

मिलने और बिछड़ने के पहले 
बस इतना जीवन 
इस जीवन का और 
एक साथ के इस गाँव में 
एक साथ का ठौर l 


कवि -  विनोदकुमार शुक्ल
संकलन - अतिरिक्त नहीं
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था (Hatasha se ek vyakti baith gaya tha by Vinod Kumar Shukla)



हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था 
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था 
हताशा को जानता था 
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया 
मैंने हाथ बढ़ाया 
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ 
मुझे वह नहीं जानता था 
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था 
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे 
साथ चलने को जानते थे l




कवि -  विनोदकुमार शुक्ल
संकलन - अतिरिक्त नहीं
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

पिंजड़े में (Pinjade mein by Vinod Kumar Shukla)

पिंजड़े में 
लिपिक ! लिपिक !!
बोलने वाला तोता 
साहब के घर में था l 

बहुत प्राचीन पक्षी लिपि है 
सांध्य आकाश में पक्षियों की पंक्ति 
संदर्भ लौटने का, वाक्य है 
यह विषय भी लौटने का  इतना है 
कि वाक्य भी लौटता है l 
अपने कार्यालय की खिड़की से 
उन उड़ते हुए पक्षियों से 
मैंने कहा आभार l

आभार पक्षियों की ओर उड़ गया 
पहले एक मेरा आभार था
और बाकी सब सारस थे 
फिर उसका भी आभार था 
और सब सारस थे l


कवि -  विनोदकुमार शुक्ल
संकलन - अतिरिक्त नहीं
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

सोमवार, 14 जनवरी 2013

आम का पेड़ (Aam ka ped by Vinod Kumar Shukla)

आम का पेड़ उस जगह निष्प्रयोजन था
परंतु आम का पेड़ होने से प्रयोजन था
घोंसला था
गिलहरी शाखों की गलियों में
आते-जाते दिखती थी
कोई योजना नहीं थी
और बहुत कुछ था -
पेड़ पर ऋतुएँ होतीं
ग्रीष्म, पतझड़ होती 

धूप होती और छाया
वह एक ऐसी जगह थी
जहाँ किसी भी दिन
मेरा आना निष्प्रयोजन था
परंतु आम का पेड़ होने से
मेरा वहाँ पहली बार का आना
आये दिन का
पहला दिन हुआ था।

कवि -  विनोदकुमार शुक्ल
संकलन - अतिरिक्त नहीं
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

रविवार, 2 दिसंबर 2012

कुछ-कुछ याद करते (Kuchh-kuchh yaad karate by Vinod Kumar Shukl)

कुछ-कुछ याद करते 
जीवन रोज बीतता रहा 
सब भुला नहीं सका 
जो याद रहता है 
उसी से कुछ भुला देता हूँ 
जो भुला देता हूँ 
उसमें से याद कर लेता हूँ 
और अपने होने को 
काम की तरह सोचता हूँ 
सोमवार से इतवार तक 
एक तारीख से इकतीस तारीख तक 
अगर बत्तीस होगी तो भी l 


कवि - विनोद कुमार शुक्ल 
संकलन - कभी के बाद अभी 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2012

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

गेंद का पड़ोस (Geind ka pados by Vinod Kumar Shukl)


गेंद का पड़ोस -
उछाल आकाश की तरफ 
किसी भी दिशा में 
जा सकने के कारण 
सभी दिशाएँ गेंद के पड़ोस में 
धरती पड़ोस 
और गेंद का घर 
हमारा घर l 

कितनी गेंदें पड़ोस में खो चुकी थीं 
गेंद ढूँढ़ने हम 
किसी के भी घर घुस जाते 
घरों में जाना और खो जाना 

हमने गेंद से सीखा l 


कवि  - विनोद कुमार शुक्ल 
संकलन - कभी के बाद अभी 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2012

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

हवा के झरोखे से झोंका आया (Hawa ke jharokhe se jhonka aaya by Vinod Kumar Shukla)



हवा के झरोखे से झोंका आया
ढूँढ़कर आया l

आँधी में खो गया झोंका
कितनी बयार, पुरवाई से होकर
पछ्वाकर, हवा की सड़क पर
हवा का रिक्शा 
हवा ने चलाया
रिक्शे में बैठ झोंका आया l

घंटी बजाकर नहीं
हवा की हेंडिल पर घंटी की जगह
उड़ता पपीहा
पियू ! पियू ! से 
दूरी को सामने से हटाता
थोड़ा सा स्पर्श आया l


कवि -  विनोदकुमार शुक्ल
संकलन - अतिरिक्त नहीं
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000