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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025
मुझे अपने बूट दो (Mourid Barghouti's poem 'Give me your boots' translated into Hindi)
मुझे अपने बूट दो
मुझे अपनी बेल्ट दो
मुझे अपना ख़ाली फ़्लास्क दो
मुझे पसीने से लथपथ अपने मोज़े दो
अपनी प्रेमिका को लिखे अपने ख़त का बाक़ी आधा पेज दो
मुझे लाल से भीगे अपने कपड़े दो
मुझे अपनी पिघली हुई मशीन गन दो
मुझे पानी आख़िरी नज़र दो, तुम्हारे आख़िरी शुबहे दो
तुम्हारी हिम्मत, तुम्हारा अनिश्चय, तुम्हारे अफ़सोस,
भाग निकलने की तुम्हारी क्षणिक इच्छा,
टिके रहने का तुम्हारा फ़ैसला,
दो मुझे तुम्हारी कंपकपाहट जब जहाज़ निशाना बनाता है तुम्हारे जिगरी को
दो मुझे तुम्हारे आँसू जो अनदेखे रह गए
दो मुझे शरणार्थी शिविर का अपना पता
मैं खोजूँगा बचे हुए मकान
बचे हुए लोग
तुम्हारे परिवार के बाक़ी लोग
मैं उन्हें बताऊँगा कि तुम कितने अकेले थे
मैं उनसे तुम्हारे बारे में बात करूँगा
मैं उन्हें तुम्हारा आसरा सामान दूँगा
अगर वे क़त्लेआम में मारे नहीं गए हों
मृत शरीरों का ढेर
दिलों का ढेर
मलबे का ढेर
आकांक्षाओं का ढेर
गर्द का ढेर
सपनों का ढेर
जलकर राख हुई औरतों, बच्चों, बूढ़ों का ढेर
उस घोड़े की मृत देह जो पानी पीने की कोशिश कर रहा था,
छतों का ढेर,
खो गए पुराने रिश्तेदारों का ढेर
बच्चों की चड्ढियों का ढेर
इस मलबे में बच्चे की देह कहाँ है?
माँ कहाँ है
जिसने उसका नाम चुना, उसके पहले हफ़्ते का जन्मदिन मनाया
और उसे अपने दूध से चुप कराया?
रसोई के बर्तनों का ढेर
ख़ाक कर दी गई ख़ुशियों का ढेर
निर्माण के लिए लोहे की छड़ें
पिछवाड़े में एक सैंडल
वह औरत कहाँ है जिसने इसका साइज़, रंग और डिज़ाइन तय किया था
दुकान दुकान मोलभाव करके?
वह अहाते में गिरी और उसकी सैंडल आसमान की तरफ़ उछली ।
चीख़ों का एक ढेर
ख़ामोशी का एक ढेर
ढहे हुए मकानों का एक ढेर
कुर्सियों का एक ढेर
वह आदमी कहाँ है जिसने मेहमानों के लिए स्वागतभरी मुस्कुराहट के साथ दरवाज़ा खोला
और उन्हें खाने के बाद कॉफ़ी दी?
दवाओं का एक ढेर
वह नानी कहाँ है जो नातियों से पूछती थकती नहीं कि क्या वे रात के खाने के बाद ली जानेवाली दवाएँ हैं,
और हमेशा उसे वही जवाब मिला:
"हाँ! नानी, ये वही हैं जो तुम खाने के बाद लेती हो"
जाली हुई कॉपियों का एक ढेर
खिलौनों का एक ढेर
थकान का एक ढेर
रोष का एक ढेर
खजूरों का एक ढेर
सब के सब अब
मौत की
खामोशी के बूटे वाली सफ़ेद चादर से ढँके हुए
फ़िलिस्तीनी कवि : मुरीद बरगूती
अरबी से अंग्रेज़ी: रदवा अशूर (Radwa Ashour)
हिंदी अनुवाद : अपूर्वानंद
स्रोत : Midnight and Other poems Arc Publications, UK,2008
गुरुवार, 25 सितंबर 2025
खामोशी (Mourid Barghouti's poem translated into Hindi)
खामोशी ने कहा:
सच को वाग्मिता की ज़रूरत नहीं।
घुड़सवार की मौत के बाद
घर को मुख़ातिब घोड़ा
सब कुछ कह देता है
बिना कुछ कहे हुए।
फ़िलिस्तीनी कवि : मुरीद बरगूती
अरबी से अंग्रेज़ी: रदवा अशूर (Radwa Ashour)
हिंदी अनुवाद : अपूर्वानंद
स्रोत : Midnight and Other poems Arc Publications, UK,2008
सोमवार, 22 सितंबर 2025
छटपटाहट (Mourid Barghouti's poem 'Eagerness' translated into Hindi)
चौखट ने कहा:
काश! मैं हॉल में जा पाती।
हॉल ने कहा:
काश! मैं बाहर बालकनी में जा पाता।
बालकनी ने कहा:
काश! मैं उड़ पाती!
फ़िलिस्तीनी कवि : मुरीद बरगूती
अरबी से अंग्रेज़ी: रदवा अशूर (Radwa Ashour)
हिंदी अनुवाद : अपूर्वानंद
स्रोत : Midnight and Other poems Arc Publications, UK,2008
गुरुवार, 18 सितंबर 2025
यह मेरा नसीब था बेथलहम में होना (Poem by Dareen Tatour translated into Hindi)
यह मेरा नसीब था बेथलहम में होना
- पूरब में ख़ासकर
उन सड़कों पर चलना जिन्हें मैं नहीं जानती
और दीवारों से पूछना
बिलबोर्ड की
कहानी के बारे में,
मैं तस्वीर को देखती हूँ
जो राज़फाश करती है
और छिपे हुए घरों के प्रेतों को उघाड़ देती है
मैं बेचैन रही
दो दिनों तक…और ज़्यादा नहीं
बच्चों ने मुझे हर तरफ़ खींचा
यह नाम …यह क्वार्टर
आवाज़ और नग़मा
और आधे ध्वस्त मकान
छेददार छतें और जलावन
मेरी देह की स्याही को जगा देते हैं …
फ़िलिस्तीनी कवयित्री : दारीन तातूर
अरबी से अंग्रेज़ी: जोनाथन राइट
हिंदी अनुवाद : अपूर्वानंद
संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहींप्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023
स्रोत : https://www.newarab.com/opinion/palestinian-woman-detained-israel-over-poem
रविवार, 7 सितंबर 2025
पीड़ित नं. 48 ((Mahmoud Darwish translated into Hindi)
वह मरा पड़ा था एक पत्थर पर।
उन्हें उसके सीने में मिला चाँद और एक गुलाबी लालटेन।
उन्हें उसकी जेब में मिले सिक्के।
एक माचिस की डिबिया और एक ट्रैवल परमिट।
उसकी बाँहों पर गुदने थे।
उसका भाई बड़ा हुआ
और शहर गया काम खोजने।
उसे जेल में डाल दिया गया
क्योंकि उसके पास ट्रैवल परमिट नहीं था।
वह सड़क पर एक डस्टबिन
और बक्से ले जा रहा था।
मेरे देश के बच्चो,
इस तरह चाँद की मौत हुई।
अरबी से अंग्रेज़ी: अब्दुल्लाह अल-उज़री
हिंदी अनुवाद : अशोक वाजपेयी
स्रोत : मॉडर्न पोइट्री ऑफ़ द अरब वर्ल्ड, पेंगुइन बुक्स, 1986
संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहींप्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023
शनिवार, 19 जुलाई 2025
आया जो अपने घर से, वो शोख पान खाकर (By Meer Taqi Meer)
आया जो अपने घर से, वो शोख पान खाकर
की बात उन ने कोई, सो क्या चबा-चबा कर
शायद कि मुँह फिरा है, बंदों से कुछ खुदा का
निकले है काम अपना कोई खुदा-खुदा कर
कान इस तरफ़ न रक्खे, इस हर्फ़-नाशनो ने
कहते रहे बहुत हम उसको सुना-सुना कर
कहते थे हम कि उसको देखा करो न इतना
दिल खूँ किया न अपना आँखें लड़ा-लड़ा कर
आगे ही मर रहे हैं, हम इश्क़ में बुताँ के
तलवार खींचते हो, हमको दिखा-दिखा कर
वो बे-वफ़ा न आया बाली पे वक़्त-ए-रफ़्तन
सौ बार हमने देखा सर को उठा-उठा कर
जलते थे होले होले हम यूँ तो आशिक़ी में
पर उन ने जी ही मारा आखिर जला-जला कर
हर्फ़-नाशनो - बात न सुननेवाला
बुताँ - माशूक़
बाली - सिरहाना, तकिया
वक़्त-ए-रफ़्तन - जाने के वक़्त, मरने के समय
शायर - मीर तक़ी मीर
संकलन - चलो टुक मीर को सुनने
संपादन - विपिन गर्ग
प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2024
नुक़्ते की परेशानी के लिए माफ़ी के साथ क्योंकि लाख कोशिश करके भी टाइप में कई जगह नहीं आया।
बुधवार, 20 मार्च 2024
इतनी सारी ख़ुशी (नाओमी शिहाब न्ये Naomi Shihab Nye)
मुश्किल है जान पाना कि क्या करें इतनी सारी ख़ुशी के साथ
दुख के साथ कुछ तो रहता है रगड़ने के लिए
मरहम और कपड़े से एक ज़ख़्म का ख़्याल रखना
जब आसपास की दुनिया गिर पड़े, तो उसके टुकड़े तुम्हें उठाने पड़ेंगे
अपने हाथों में पकड़ने के लिए कुछ…जैसे फाड़े गए टिकट या रेज़गारी।
पर ख़ुशी तैरती है।
उसे तुम्हारी ज़रूरत नहीं कि पकड़ और दबा कर रखो
उसे किसी बात की ज़रूरत नहीं।
ख़ुशी अगले मकान की छत पर चली जाती है गाती हुई
और ग़ायब हो जाती है, अगर चाहे तो।
तुम तो ऐसे भी खुश हो वैसे भी।
कि कभी तुम एक पेड़ पर बने शांत मकान में रहते थे
और अब शोर और धूल की खुली खदान के ऊपर
तुम्हें नाखुश नहीं कर सकती।
हर चीज़ की अपनी ज़िंदगी है
वह कॉफ़ी केक और पके आड़ुओं की संभावना के साथ जाग सकती है...
और उस फ़र्श से भी प्यार कर सकती है, जिसपर झाड़ू लगाई जानी है... दाग़दार कपड़ों और खरखराते रिकार्ड्स से भी
क्योंकि कोई भी जगह इतनी बड़ी नहीं कि
ख़ुशी को भर ले, तुम कंधे उचकाते हो,
हाथ फैलाते हो और वह तुमसे तैरती हुई निकल जाती है
हर उस चीज़ में जिसे तुम छूते हो,
उसके लिए तुम ज़िम्मेदार नहीं
कोई श्रेय तुम नहीं लेते, जैसे रात का आसमान श्रेय नहीं लेता
चाँद का, पर पकड़े रखता है और बाँटता रहता है
और इस तरह से जाना जाता है।
मूल अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद: निधीश त्यागी
संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं
प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023
सोमवार, 1 जनवरी 2024
आख़िरी बूँद तक ज़िंदगी (Mahmoud Darwish translated into Hindi)
फ़िलिस्तीनी कवि
अरबी से अंग्रेज़ी अनुवाद : कैथरीन कॉबम
हिंदी अनुवाद: अपूर्वानंद
संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं
प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023
रविवार, 31 दिसंबर 2023
आख़िरी ट्रेन रुक गई है (Mahmoud Darwish translated into Hindi)
आख़िरी ट्रेन आख़िरी प्लेटफ़ॉर्म पर रुक गई है। वहाँ कोई नहीं है
गुलाबों को बचाने के लिए, कोई कबूतर नहीं शब्दों से तामीर की गई औरत पर उतरने के लिए।
वक्त ख़त्म हो चुका है। गाना बेहतर नहीं है झाग के मुक़ाबले।
हमारी ट्रेनों पर भरोसा मत करो, प्यारे। भीड़ में किसी का भी इंतज़ार मत करो।
आख़िरी ट्रेन रुक गई है आख़िरी प्लेटफ़ॉर्म पर। लेकिन कोई भी
नारसीसस की छाया नहीं डाल सकता वापस रात के आईनों में।
मैं कहाँ लिख सकता हूँ देह के अवतार का अपना सबसे ताज़ा वृत्तांत?
यह अंत है उसका जिसका अंत होना ही था। वह कहाँ है जिसका अंत होता है?
मैं कहाँ ख़ुद को अपनी देह में अपने वतन से आज़ाद कर सकता हूँ?
हमारी ट्रेनों पर भरोसा मत करो, प्यारे! आख़िरी कबूतर उड़ गया है।
आख़िरी ट्रेन आख़िरी प्लेटफार्म पर रुक गई है। और वहाँ कोई नहीं था।
फ़िलिस्तीनी कवि : ग़स्सान ज़क़तान
अरबी से अंग्रेज़ी: मुनुर अकाश और कैरोलिन फ़ॉश
हिंदी में : अपूर्वानंद
संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं
प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023
शनिवार, 30 दिसंबर 2023
रूमाल (Ghassan Zaqtan translated into Hindi)
हमारे बीच कहने को कुछ न बचा
सब उस ट्रेन में चला गया जिसने अपनी सीटी
उस धुएँ में छुपा ली जो बादल न बन सका
उस चले जाने में जिसने तुम्हारे हाथ पाँव बटोरा किए
कुछ भी नहीं बचा कहने को हमारे बीच
इसलिए रहने देते हैं तुम्हारी मौत को
चमकती चाँदी की गहरी कौंध
और रहने देते हैं उन शहरों के सूरज को
तुम्हारे कंधों पर रखे गुलाब
के अक्स में।
फ़िलिस्तीनी कवि : ग़स्सान ज़क़तान
अरबी से अंग्रेज़ी: फ़ादी जूदा
हिंदी में : निधीश त्यागी
संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं
प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023
गुरुवार, 28 दिसंबर 2023
कविता का काम आँसू पोंछना नहीं है ('It is not poetry’s job to wipe away tears by Zakaria Mohammed Translated into Hindi)
वह रो रहा था, इसलिए उसे सँभालने के लिए मैंने उसका हाथ थामा और आँसू पोंछने के लिए
मैंने उसे कहा जब दुख से मेरा गला रुँध रहा था: मैं तुमसे वादा करता हूँ कि इंसाफ़
जीतेगा आख़िरकार, और अमन जल्दी ही क़ायम होगा।
ज़ाहिर है मैं उससे झूठ बोल रहा था। मुझे पता था कि इंसाफ़ नहीं मिलने वाला
और अमन जल्द नहीं आने वाला, पर मुझे उसके आँसू रोकने थे।
मेरी यह समझ ग़लत थी कि अगर हम किसी चमत्कार से
आँसुओं की नदी को रोक लें, तो सब कुछ ठीक ठाक तरह से चल निकलेगा।
फिर चीज़ों को हम वैसे ही मान लेंगे जैसी वे हैं। क्रूरता और इंसाफ़ एक साथ मैदान में
घास चरेंगे, ईश्वर शैतान का भाई निकलेगा, और शिकार हत्यारे का प्रेमी होगा।
पर आँसू रोकने का कोई तरीक़ा नहीं है। वे बाढ़ की तरह लगातार बहे जाते हैं और अमन की
रवायतों को तबाह कर देते हैं।
और इसलिए, आँसुओं की इस कसैली ज़िद की ख़ातिर, आइए, आँखों का अभिषेक करें
इस धरती के सबसे पवित्र संत के रूप में।
कविता का काम नहीं है आँसू पोंछना।
कविता को खाई खोदनी चाहिए जिसका बाँध वे तोड़ दें और इस ब्रह्मांड को डुबा दें।
फ़िलिस्तीनी कवि : ज़करिया मोहम्मद
अरबी से अंग्रेज़ी : लीना तुफ़्फ़ाहा
हिंदी अनुवाद : निधीश त्यागी और अपूर्वानंद
संकलन : कविता काम आँसू पोंछना नहीं
प्रकाशन : जिल्द प्रकाशन, दिल्ली, 2023
भजन (Mahmoud Darwish translated into Hindi)
जिस दिन मेरी कविताएँ मिट्टी से बनी थीं
मैं अनाज का दोस्त था।
जब मेरी कविताएँ शहद हो गईं
मक्खियाँ बस गईं
मेरे होठों पर।
फ़िलिस्तीनी कवि : महमूद दरवेश
अरबी से अंग्रेज़ी: अब्दुल्लाह अल-उज़री
हिंदी अनुवाद : अशोक वाजपेयी
संकलन : 'कविता का काम आँसू पोंछना नहीं' में मूल मॉडर्न पोइट्री ऑफ़ द अरब वर्ल्ड, पेंगुइन बुक्स, 1986 से
प्रकाशन - जिल्द बुक्स, 2023
रविवार, 8 अक्टूबर 2023
काफ़ी है मेरे लिए (Enough for Me by Fadwa Tuqan, Hindi translation by Apoorvanand)
काफ़ी है उसकी ज़मीन पर मरना
उसमें दफ़्न होना
घुलना और ग़ायब हो जाना उसकी मिट्टी में
और फिर खिल पड़ना एक फूल की शक्ल में
जिससे एक बच्चा खेले मेरे वतन का।
काफ़ी है मेरे लिए रहना
अपने मुल्क के आग़ोश में
उसमें रहना करीब मुट्ठी भर मिट्टी की तरह
घास के एक गुच्छे की तरह
एक फूल की तरह।
फ़िलिस्तीनी कवयित्री - फ़दवा तुक़ान (Fadwa Tuqan, 1917-2003)
स्रोत - https://www.milleworld.com/palestinian-poems-resistance/
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद
रविवार, 19 मार्च 2023
चीज़ें और हम (by Mahmoud Darwish, translated into Hindi)
गुरुवार, 25 अगस्त 2022
नारी ( Naari by Nagathihalli Ramesh translated from Kannada)
नारी ...
चुन लिया करती है बुरे से भले को
वह सब कुछ नहीं निगलती
जो भी मिलता है उसे तौलती है
परखती है तराशती है
लेकिन मर्द ? वह तो भोगी है
सबकुछ चाटनेवाला
किसी में न बाँटनेवाला
मर्द की इन्हीं ऐयाशी [भरी] आदतों के कारण
कई सभ्यताएँ उभरीं और डूब गयीं
कई राजपाट बने और ढह गये
दुनिया की छल-कपटों के बीच बैठी यह औरत
तसल्ली देती है मर्द के भरम, सपने [सपनों], उसूलों को
हाथ थामे रहती है अपनी आखरी [आखिरी] साँस तक
साथ-साथ चलती है सभ्यताओं से सभ्यताओं तक ...
कन्नड़ कवि - नागतिहल्ली रमेश
संग्रह - सागर और बारिश
हिन्दी अनुवाद - गिरीश जकापुरे
प्रकाशन - सृष्टि प्रकाशन, बंगलोर, 2015
काफी समय लगा इस कन्नड़ कवि की भाषा और लय को पकड़ने में। कई बार पढ़ा। बहुत अलग किस्म के अनुभव और अभिव्यक्तियाँ हैं। अनुवाद और किताब की सज्जा भी हिन्दी किताबों से भिन्न है। रसास्वादन के लिए रमना पड़ता है और मेहनत लगती है, यह इस बार भी महसूस हुआ। खोजकर और पढ़ना है नागतिहल्ली रमेश को तभी पूरा आनंद आएगा। अभी एक कविता इस संग्रह से जो सीधे सीधे अपनी बात कहती है और हम उत्तर भारतीयों के मन-मिजाज़ वाली भाषा में अनूदित है।
सोमवार, 22 अगस्त 2022
मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib in Hindi)
दिलज़ ताबे बला बिगुज़ाद-ओ-खूं कुन
ज़ि-दानिश का नक़शायद जुनूँ कुन
दिल को अपने
मुश्किलों की
आँच पर
पिघला के तुम
लोहू बना दो।
व्यर्थ शंकाएँ
कभी
दिल में न लाओ।
विवेक
और बुद्धि से जब
कुछ काम न निकले
तो फिर
दीवाने बन जाओ।
शायर - मिर्ज़ा ग़ालिब
मूल फ़ारसी से हिन्दी अनुवाद - सादिक़
संग्रह - चिराग़-ए-दैर, बनारस पर केन्द्रित कविताएँ
प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2018
रज़ा पुस्तक माला : कविता
शनिवार, 20 अगस्त 2022
जो बचा रह गया (The Survivor by Tadeusz Różewicz In Hindi)
मैं चौबीस का हूँ
क़त्ल को ले जाया गया
मैं बच गया।
जो आगे दिए जा रहे हैं वे खाली (अर्थहीन) पर्यायवाची हैं:
मनुष्य और पशु
प्रेम और घृणा
मित्र और शत्रु
अंधकार और प्रकाश।
मनुष्यों और पशुओं को मारने का तरीक़ा एक ही है
मैंने यह देखा है:
ट्रक काट डाले गए आदमियों से ठुँसे हुए
जो बचाए नहीं जाएँगे।
विचार मात्र शब्द हैं:
भलाई और अपराध
सच और झूठ
सुंदरता और कुरूपता
साहस और कायरता।
भलाई और अपराध एक ही बराबर हैं
मैंने यह देखा है:
उस आदमी में जो दोनों ही था
अपराधी और भला।
मैं खोज रहा हूँ एक अध्यापक और गुरु
काश वह मेरी दृष्टि सुनने की ताक़त और वाणी बहाल कर दे वापस
काश वह फिर से नाम दे वस्तुओं और विचारों को
काश वह अलग करे अंधकार को प्रकाश से।
मैं चौबीस का हूँ
क़त्ल को ले जाया गया
मैं बच गया।
पोलिश कवि - तादयूश रुज़ेविच
संग्रह - 'होलोकास्ट पोएट्री'
संकलन और प्रस्तावना - हिल्डा शिफ़
पोलिश से अंग्रेज़ी अनुवाद - ऐडम ज़ेर्निआव्स्की
प्रकाशक - सेंट मार्टिन्स ग्रिफिन, 1995
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद
सोमवार, 11 जुलाई 2022
यह क़ब्रिस्तान है (THIS IS A CEMETERY BY OLAF D. EYBE)
वह नन्हीं स्वीडिश लड़की
फूल चुन रही है
ऊँची घास में
बिरकेनाऊ कैम्प की
में उसे ऐसा करने से रोकना
चाहता हूँ
यह क़ब्रिस्तान है
लेकिन मैं ख़ामोश रह जाता
हूँ
यह क़ब्रिस्तान है
मैं क्या कहूँ उस अमरीकी से
जो अभी अभी पहुँचा है ऑश्वित्ज़
से
बिरकेनाऊ में और पूछ रहा है
क्या यह ऑश्वित्ज़ है?
मैं सोचता हूँ कि क्या उसे
मालूम है
मित्र देशों को मालूम था एकदम
शुरू में ही
लेकिन उन्होंने इसके बारे
में कुछ नहीं किया
यह क़ब्रिस्तान है
जर्मन कवि - OLAF D. EYBE (1963-2021)
जर्मन भाषा से अंग्रेज़ी अनुवाद - क्रिस्टोफ़र मुलर
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद
संग्रह - The Auschwitz Poems
संकलन और संपादन - Adam A. Zych
प्रकाशन - THE AUSCHWITZ-BIRKENAU STATE MUSEUM, 1999
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी के नियंत्रण वाले पोलैंड में ऑश्वित्ज़ नाज़ियों का बनाया यातना शिविर और क़त्लगाह था। उसके अनेकानेक यातना शिविरों में से बिरकेनाऊ सबसे अधिक बड़ा और कुख्यात था।
सोमवार, 27 जून 2022
विदूषक (Clowns by Miroslav Holub translated in Hindi)
विदूषक कहाँ जाते हैं?
विदूषक कहाँ सोते हैं?
विदूषक क्या खाते हैं?
विदूषक क्या करते हैं
जब कोई नहीं
कोई नहीं क़तई
हँसता है अब और
अम्माँ?
चेक कवि - मिरोस्लाव होलुब, 1961
संग्रह - पोएम्स : बिफोर एंड आफ्टर
चेक से अंग्रेज़ी अनुवाद - एवाल्ड (Ewald Osers)
प्रकाशन - ब्लडैक्स बुक्स, ग्रेट ब्रिटेन, 1990
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद
शनिवार, 25 जून 2022
उन्हें हड़प लो (Poem by Bhuchung D. Sonam translated in Hindi)
आपकी प्लेट में रखा बटर चिकेन
कल तक वह मुर्गी था
जिसके चूजे अंडों से निकले नहीं अभी
आप स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लीजिए
पिछली गर्मियों [में] मैंने जिस ऊँट की सवारी की थी
वह अब चमड़े का एक बैग बन चुका है
सजा है एक आधुनिक शोरूम में
कुबड़ा होना भी एक श्राप है
उस पर बहुत फबता है मस्कारा
पर उसकी आँखों तक आने से पहले
वह कितने ही चूहों की आँखें फोड़ चुका होता है
चूहे अब बिल्लियों से अधिक मसकारे से डरते हैं
बुद्ध की प्राचीन मूर्ति की नकल
उसके आलीशान स्नानगृह में खड़ी है
जनमानस की सामूहिक आस्था का प्रतीक
अब रोज़ उसे मूतते हुए घूरता है
वह दहाड़ता हुआ गर्वीला बाघ
जो बड़ी शान से बंगाल के जंगलों में
चहलकदमी किया करता था
अब तुम्हारी पोशाक का बॉर्डर है
लेकिन
उसे पहन कर भी तुम
बस एक भीगा हुआ कुत्ता दिखते हो।
तिब्बती कवि - भुचुंग डी. सोनम (जन्म 1972)
संग्रह - ल्हासा का लहू, निर्वासित तिब्बती कविता का प्रतिरोध
संकल्पना एवं अनुवाद - अनुराधा सिंह
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन और रज़ा फ़ाउण्डेशन, प्रथम संस्करण, 2021