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गुरुवार, 30 जून 2022

मन (Mann by Bhawaniprasad Mishra)

मन 

हल्का करने वाले सुख 

चाहे पल या दो पल के हों 

पर उनका मिलना 

रोज जरूरी लगता है 

यह क्षणिक सुखों का जादू है 

जो बड़े-बड़े दुख ठगता है। 

                              - 7 जून, 1953 


कवि - भवानीप्रसाद मिश्र 

संकलन - भवानीप्रसाद मिश्र रचनावली 

संपादन - विजय बहादुर सिंह 

प्रकाशन - अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, नई दिल्ली 

                 प्रथम संस्करण, 2002 

शनिवार, 17 मई 2014

जंगलके राजा ! ( Jungle ke raja by Bhawaniprasad Mishra)

जंगलके राजा, सावधान !
ओ मेरे राजा, सावधान !
                     कुछ अशुभ शकुन हो रहे आज l 
           जो दूर शब्द सुन पड़ता है,
           वह मेरे जीमें गड़ता है,
                     रे इस हलचलपर पड़े गाज l 
           ये यात्री या कि किसान नहीं,
           उनकी-सी इनकी बान नहीं,
                      चुपके चुपके यह बोल रहे। 
           यात्री होते तो गाते तो,
           आगी थोड़ी सुलगाते तो,
                       ये तो कुछ विष-सा बोल रहे। 
           वे एक एक कर बढ़ते हैं,
           लो सब झाड़ोंपर चढ़ते हैं,
                        राजा ! झाड़ों पर है मचान। 
           जंगलके राजा, सावधान !
                        ओ मेरे राजा, सावधान !
           राजा गुस्सेमें मत आना,
           तुम उन लोगोंतक मत जाना ;
                         वे सब-के-सब हत्यारे हैं। 
          वे दूर बैठकर मारेंगे,
          तुमसे कैसे वे हारेंगे,
                         माना, नख तेज़ तुम्हारे हैं। 
           "ये मुझको खाते नहीं कभी,
            फिर क्यों मारेंगे मुझे अभी ?"
                         तुम सोच नहीं सकते राजा। 
            तुम बहुत वीर हो, भोले हो,
            तुम इसीलिये यह बोले हो,
                           तुम कहीं सोच सकते राजा। 
            ये भूखे नहीं पियासे हैं,
            वैसे ये अच्छे खासे हैं,
                            है 'वाह वाह' की प्यास इन्हें। 
            ये शूर कहे जायँगे तब,
            और कुछके मन भायेंगे तब,
                             है चमड़ेकी अभिलाष इन्हें,
             ये जगके, सर्व-श्रेष्ठ प्राणी,
             इनके दिमाग़, इनके वाणी,
                              फिर अनाचार यह मनमाना !
             राजा, गुस्सेमें मत आना,
                               तुम उन लोगोंतक मत जाना।
       

कवि - भवानीप्रसाद मिश्र 
किताब - सितारे (हिन्दुस्तानी पद्योंका सुन्दर चुनाव)
संकलनकर्ता - अमृतलाल नाणावटी, श्रीमननारायण अग्रवाल, घनश्याम 'सीमाब'
प्रकाशक - हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा, तीसरी बार, अप्रैल, 1952

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

वाणी की दीनता (Vani ki deenata by Bhawaniprasad Mishra)


वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l
कहने में अर्थ नहीं 
कहना पर व्यर्थ नहीं 
मिलती है कहने में 
एक तल्लीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

आस-पास भूलता हूँ 
जग भर में झूलता हूँ ;
सिन्धु के किनारे, कंकर 
जैसे शिशु बीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

कंकर निराले नीले 
लाल सतरंगी पीले 
शिशु की सजावट अपनी,
शिशु की प्रवीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

भीतर की आहट भर 
सजती है सजावट पर 
नित्य नया कंकर क्रम,
क्रम की नवीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

वाणी को बुनने में ;
कंकर के चुनने में 
कोई उत्कर्ष नहीं 
कोई नहीं हीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

केवल स्वभाव है 
चुनने का चाव है 
जीने की क्षमता है 
मरने की क्षीणता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

कवि - भवानीप्रसाद मिश्र 
संकलन - दूसरा सप्तक 
संपादक - अज्ञेय 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, दूसरा पेपरबैक संस्करण - 2002


सोमवार, 3 सितंबर 2012

बेदर्द (Bedard by Bhawani Prasad Mishra)



मैंने निचोड़कर दर्द
मन को 
मानो सूखने के ख़याल से
रस्सी पर डाल दिया है

और मन
सूख रहा है

बचा-खुचा दर्द
जब उड़ जायेगा
तब फिर पहन लूँगा मैं उसे

माँग जो रहा है मेरा 
बेवकूफ़ तन
बिना दर्द का मन !


कवि - भवानीप्रसाद मिश्र
संचयन - मन एक मैली कमीज़ है
संपादक - नन्दकिशोर आचार्य 
प्रकाशक -  वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, 1998