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गुरुवार, 1 जनवरी 2026

पुन्निका-ब्राह्मण संवाद (Punnika-brahman dialogue by Punnika Theri)


श्रावस्ती के धनी सेठ अनाथपिंडक के घर में पुन्निका काम करती थीं। कहा जाता है कि एक दिन पानी लाने जाते हुए रास्ते में बुद्ध के उपदेश पुन्निका के कानों में पड़े। बुद्ध कहते हैं कि निडरता और प्रश्न पूछना ही जीवन जीने का सही तरीका है। एक दिन की बात है पुन्निका पानी लाने नदी पर गईं तो उन्होंने एक ब्राह्मण को पानी में खड़े होकर स्नान-ध्यान करते हुए पाया। उसका नाम उदकसुद्धिका बताया जाता है। वे उस ब्राह्मण से पूछती हैं - 


मैं पानी ढोती हूँ

जब ठंढ होती है तब भी

मैं हमेशा पानी में उतरती हूँ

अपनी मालकिनों की मार के डर से

उनके क्रोध और कुवचन से परेशान

लेकिन अरे ब्राह्मण, तुम्हें क्या डर

कि तुम हमेशा पानी की तरफ़ जाते हो,

कँपकँपाते हाड़ के साथ,

खूब ठंड से डरते हुए?


ब्राह्मण जवाब देता है -

हालाँकि तुम मुझे जानती हो पुन्निका

फिर भी पूछती हो मैं क्यों

निपुणता वाला यह कार्य कर रहा हूँ,

जो बुरे कर्म किए हैं, उनके फल से बचने के लिए।

कोई भी जो बुरा कर्म करता है

चाहे बूढ़ा हो या जवान

उस बुरे कर्म के परिणाम से मुक्त हो जाता है

जल में उन्हें धो लेने से।

पुन्निका फिर सवाल करती हैं -

किसने तुमसे कहा

एक अबोध (कुछ न जानने वाले) जैसे दूसरे अबोध (कुछ न जाननेवाले) को बताता हो

कि किसी बुरे काम के परिणाम से कोई बच जाता है

जल में धो लेने से?
... ... ... 

तो क्या मेंढक और कछुए

सब स्वर्ग को जाएँगे?

और बिसख़ोपड़े और मगरमच्छ,

और जो कुछ भी पानी में रहता हो?... 



कवयित्री - पुन्निका थेरी 
संकलन - इतिहास रचती आवाज़ें 
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 
प्रकाशन - निरंतर ट्रस्ट, दिल्ली 

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