मुझे कर्णाभूषण पसंद हैं। शब्द सुनते
ही लगता है कान में पहननेवाले स्वर्णाभूषण - सोने के आभूषण। लेकिन मेरे पास दो-चार
छोड़कर ज़्यादातर मिट्टी, लकड़ी, ताँबे, पीतल, धागे, मोती आदि के
कर्णाभूषण हैं। लोग कहते हैं कि सोना पहनो तो कान पकता नहीं है, मगर मेरा हमेशा पक जाता रहा है। खासकर tops पहनो तो।
उसकी तल्ली चाहे सोने की हो या चाँदी की, चाहे चूड़ी वाला
पेंच हो या सीधे दबानेवाली तल्ली हो, पक्का है कि मेरा कान
पक जाएगा। आलस में या बनने-ठनने के चक्कर में यदि मैंने उसे चार-पाँच दिन पहने रखा
तो शर्तिया कान की लौ सूज जाएगी और मवाद आने लगेगा। इसका तोड़ है हुक वाला
कर्णाभूषण जो दबाता नहीं है। इसने कान पकने की आफ़त से मुझे छुटकारा दिला दिया है।
अब दूसरी परेशानी खड़ी हो गई है। मेरे हुक वाले कर्णाभूषण अक्सर गुम हो जाते हैं, वो भी एक। वजह है कि शौक के मारे भारी-भरकम हुक वाले कर्णाभूषण पहनती रही और धीरे-धीरे कान का छेद काफ़ी बड़ा हो गया जिससे एक न एक कान से कर्णाभूषण फिसल जाता है। उनको लेकर सावधान रहने लगी हूँ, फिर भी यह दुर्घटना घट ही जाती है। कर्णाभूषण के वज़नदार होने का बोझ आखिर कान बेचारा कितना सहे! कइयों ने कहा कि कान में टाँका लगवा लो यानी उसे सिलवा लो। तोबा तोबा ! बचपन में माँ ने मेरा कान छिदवा दिया था और मैंने भी बेटी का छिदवा दिया था, लेकिन अब यह गवारा नहीं। जब बेटी ने दो-चार और छेद करवाए थे तब भी मैं गनगना गई थी। इसलिए अपने कान के छेद की मरम्मत करवाने से रही मैं ! बावजूद इसके मेरा कर्णाभूषण प्रेम बरकरार है।
एक बार का किस्सा सुनाती हूँ। अपूर्व शांति निकेतन गए थे। वहाँ वे एक दुकान पर गए जहाँ चाँदी के आभूषण थे। उन्होंने मेरे लिए उपहार देखना शुरू किया। जो पसंद आया वह एक-डेढ़ हज़ार का कर्णाभूषण था। यह बात तकरीबन 15-17 साल पुरानी होगी। मतलब अभी की तरह चाँदी में आग नहीं लगी थी, फिर भी महँगा था। अपूर्व ने मुझे वहीं से फ़ोन पर हँसते हुए सुनाया कि मैं आगे बढ़ गया यह कहते हुए कि मेरी बीवी का कान ऐसे ही सुंदर है, ऐसे कर्णाभूषण की ज़रूरत नहीं :) बाद में बगल की किसी दुकान से वे 80 रुपए में नारियल के खोल से बना एक कर्णाभूषण लेकर आए। बड़ा अलग-सा था। आकार में बड़ा और एकदम हल्का। अभी भी मैं उसे पहनती हूँ और हर बार मुस्कुराती हूँ वह प्रसंग याद कर।
कई बार मुझे ‘फट पड़े वो सोना जिससे टूटें कान’ लेख याद आ जाता है जिसकी लेखिका थीं आलिया बेगम बिन्त मुजीब अहमद तमन्नाई और जो 1911 में ‘ख़ातून’ में छपा था। इसकी झलक देखिए -
अगरचे कानों को छेदकर उनमें ज़ेवर लादने का दस्तूर उठ चला है, मगर फिर भी अक्सर बहनें बावजूद तालीमयाफ़्ता होने के पुरानी लकीर की फ़क़ीर बनी रहती हैं और हद से ज़्यादा ज़ेवर में लदे हुए कानों पर निहायत फ़ख़्र करती हैं।
वे कानों में इस क़दर जे़वर लाद लेती है कि बेचारे कमज़ोर व क़ाबिले रहम कान इस क़दर भारी ज़ेवर का वज़न नहीं सहार सकते और ज़ेवर के बोझ से बिल्कुल झुक जाते हैं। जो निहायत बदनुमा मालूम होते हैं। देखने वालों को ये मालूम होता है कि अब कोई दम में वज़न के मारे कान टूट के गिर पड़ेंगे।
हाथ, पाँव, गले में जितना जी चाहे ज़ेवर पहनें, उसका कुछ मुज़ायक़ा नहीं है, मगर कानों में उनकी बिसात से बढ़कर ज़ेवर पहनना सरासर बेरहमी, वहशीपन की अलामत और नन्हीं सी जान पर सख़्त ज़ुल्म करना है। इनकी हैसियत इस क़ाबिल नहीं है कि इन पर हद से ज़्यादा जे़वर लादा जाए। बल्कि इनको इनकी बिसात के माफ़िक़ जे़वर ही ज़ेब देता है।
जिस तरह तस्वीरों में वहशी क़ौम की औरतों को तांबे, लोहे, लकड़ी वग़ैरह के जे़वर पहने हुए देखा है, उसी तरह हमारे यहाँ भी जे़वर इज़्ज़त की निगाह से देखा जाता है। ख़ुसूसन हमारे मुल्क की मस्तूरात तो माशाअल्लाह ज़ेवर में सिर से पाँवों तक लदी रहती हैं। वो सबसे ज़्यादा ज़ुल्म कानों ही पर रवाँ करती हैं, चाहे घर में और जे़वर न पहनें मगर कानों को किसी हालत में नंगा रखना गवारा नहीं करतीं। घर में हों या बाहर कान हर वक़्त ज़ेवर में लदे हुए नज़र आते हैं।
हालाँकि कान तमाम जिस्म में सबसे छोटे होते हैं। इस हालत पर भी इनमें बालियाँ, पत्ते और और क़िस्म का ज़ेवर पहनना फ़र्ज़ समझा जाता है। अगर खु़दा ना ख़्वास्ता किसी को सोने चाँदी का ज़ेवर मयस्सर न हुआ तो जर्मन सिल्वर वग़ैरह ही का ज़ेवर सही, मगर पहनेंगी ज़रूर।
ग़रज़ सबसे ज़्यादा क़ाबिले रहम हमारे मुल्क की मस्तूरात ही के कान होते हैं। यहाँ नंगे कान रखना बहुत बड़ा ऐब और बदशगुनी समझी जाती है और अगर कोई बीबी कभी भूले बिसरे कानों में ज़ेवर पहने बग़ैर किसी महफ़िल में शरीक हो जाती है तो इस पर चारों तरफ़ से अंगुश्तनुमाई होने लगती है। सब औरतें उसकी जान को आ जाती हैं और वो अंगे्रज़ी ख़यालात की औरत तसव्वुर की जाती है। उसको इस क़दर शर्मिंदगी उठानी पड़ती है कि फिर कभी भूले से भी कानों में जे़वर पहने बग़ैर किसी महफ़िल में जाने का नाम नहीं लेती। हाँ, जिसके कान ज़ेवर में लदे हुए हों उसकी बड़ी इज़्ज़त और तारीफ़ की जाती है।
2015 में रसचक्र की तरफ़ से जब हम पाठात्मक प्रस्तुति की तैयारी शुरू करने जा रहे थे तब इस लेख को हमने शामिल किया था। 2016 में हम ख़वातीन नाम से लगभग 100 साल पुरानी मुसलमान औरतों की गैर-कथात्मक रचनाओं की प्रस्तुति हुई थी और उसमें दर्शकों-श्रोताओं को ‘फट पड़े वो सोना जिससे टूटें कान’ याद रह गया था। क्यों न हो ? रिज़वाना ने इसका बहुत अच्छा पाठ किया था। लोगों को खूब मज़ा आया था, पाठ के दौरान हँसी का फ़व्वारा छूट रहा था। यह लेख 19 वीं सदी में औरत के बाहरी रंग-रूप को किस तरह नए साँचे में ढाला जा रहा था, इसकी बात करता है। धर्म की पहचान के साथ औरत अपना औरतपना न छोड़ दे - इसका खतरा हर वक्त सर पर सवार था। पितृसत्तात्मक समाज के ढाँचे को बिना हिलाए-डुलाए यह लेख माहौल में हौले हौले बदलाव की बात करता है। दिलचस्प यह था कि कान के ज़ेवर की बात आज भी वहीं थी।
मुझे याद है कि जब हम ख़वातीन की प्रस्तुति के लिए न्यूनतम ही सही, पर कॉस्टयूम और शृंगार की बात आई थी तो कान के हल्के आभूषण की खोज हुई थी। उस समय मेरा मोतियों का झुमका काम आया था। वैसे यह अंगूर के दानों के गुच्छे जैसा था, कायदे से पारंपरिक झुमके की बनावट से अलग। इसकी खासियत थी कि यह हल्का था और लेखिका आलिया बेगम के मुताबिक कान की बिसात माफ़िक ही था जिसे पहनने पर कान लटकते नहीं। भारी होने और लेखिका की बात पर अमल न करने के तर्क के आधार पर हमने कई मोतियों के झुमके को खारिज़ कर दिया था। कान की नन्हीं सी जान पर जुल्म नहीं करना था हमें। ऊपर से मेरा झुमकानुमा आभूषण नकली मोतियों का था तो उसके लिए विशेष हिफ़ाज़त की दरकार भी नहीं थी। अभी याद कर रही हूँ कि उसे खरीदा कहाँ से था तो याद नहीं आ रहा। शायद घर के करीब कमला नगर के फुटपाथ से या उदयपुर के बाज़ार से या जयपुर की बड़ी चौपड़ से।
बहरहाल, बाद के दिनों में उस झुमकानुमा आभूषण को मैंने प्रस्तुति के लिए सहेजकर अलग रख दिया था। बीच में वह मिला ही नहीं और जब मिला तो पाया कि उसके मोती आपस में उलझ गए हैं। एकाध बार सुलझाने के क्रम में एक-दो मोती छिटक गए। मुझे लगा कि वज़न के कारण तो नहीं, मगर टूट-फूट के कारण अब वे बदनुमा लगेंगे। तब भी इधर कई सालों बाद मैंने फिर उसे पहनना शुरू किया है क्योंकि ज़माने से वह प्रस्तुति हुई नहीं है।
इधर मेरा खजाना तेज़ी से खाली हो गया है। हाँ जी, मेरी कर्णाभूषण पेटिका है - ढेर सारे खाने वाला आयताकार प्लास्टिक का डब्बा। अपूर्व के सुझाव पर ही मैंने इसे खरीदा था क्योंकि घर में यहाँ-वहाँ पड़े रहने वाले कर्णाभूषण से वे भी परेशान हो जाते थे। मैं कहीं बाहर से आकर पहला काम करती हूँ उसे उतारना। फिर भूल जाती हूँ कि कहाँ रखा और ढूँढती फिरती हूँ। यह समस्या अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, मगर कम हो गई है। अब एक निश्चित ठिकाना है कर्णाभूषण पेटिका, जिसे कम से कम हफ्ते भर में एक बार सँभाल देती हूँ। उसमें नई आमद कम है। दूसरा दुख यह है कि उसके चार खानों में टूटा और खो जाने के कारण अवशेष मात्र बचा एक एक कर्णाभूषण पड़ा मेरा मुँह चिढ़ा रहा है। मोह के मारे मैंने उन्हें फेंका नहीं है। क्या पता किस्मत से कोई बिछुड़ा हुआ मिल जाए!
मेरी किस्मत बुरी नहीं है। कई बार भूले-भटके किसी कर्णाभूषण का जोड़ा घर के अलग अलग कोनों में मिल जाता है। कई बार दोस्त-परिचित ध्यान दिला देते हैं कि देखो अब फिसला तो तब फिसला, सँभाल लो। एक बार मैं एक जगह गई और आधे घंटे बाद कान पर हाथ गया तो एक नदारद था। मैं भागकर लिफ़्ट के पास गई। दसवीं मंज़िल पर लिफ़्ट के बाहर गुमशुदा मिल गया, हालाँकि उसका एक नग गिर गया था। मैंने दूसरे वाले का भी एक नग और एक लटकन निकाल कर दोनों को बराबर कर लिया और दबने से थोड़े टेढ़े हो गए उस बैंगनी चाँदी के कर्णाभूषण को अभी भी पहनती हूँ। अम्मी ने चाव से उसे मेरे लिए चंडीगढ़ से लिया था।
अब नई लटकन-फटकन चाहिए। जाकर तलाशना
है, हल्के और नए डिज़ाइन के। अपूर्व को कहा तो मुस्कुरा कर बोले चलो चलकर
तुम्हारे लिए गहना खरीदते हैं, जनपथ पर। मैंने उनको ताना
दिया कि अम्मी रहतीं तो आपको डाँट लगातीं। उनको मेरा 'अंट
शंट' पहनना कतई पसंद नहीं था। हीरा, सोना
या चाँदी उनके लिए ही नहीं, बहुतों के लिए सौभाग्य की निशानी
है। अब सब पहुँच से दूर हैं। इस बार उड़ीसा में फ़िलिग्री के चाँदी के कर्णाभूषण
देखकर बिना खरीदे लौट आई। लकड़ी और दूसरे धातुओं के कर्णाभूषण खोजने हैं जो बहुत
चमकदार और भड़कीले न हों। नकली हो, पर नकली न लगे - यह चाह
कितनी अटपटी है!