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गुरुवार, 15 अगस्त 2024

पुकार (Pukaar by Purwa Bharadwaj)

अपने लिए पुरवैय्या और कभी कभी छौंड़ी सुनना कितना सहज था। पापा ऐसे नहीं बोलते थे, यह माँ ही बोलती थी। पापा का प्रिय संबोधन था पूरब। उसका भी वे एक किस्सा सुनाते थे। मेरे घर में एक जो काम करनेवाली थीं (शायद लगनी ही नाम था। 'शायद' इसलिए कि मुझे ठीक से याद नहीं और माँ है नहीं जो उससे तस्दीक करूँ।) वे मुझे 'पुरुब' बुलाती थीं और मुझे उस पर थोड़ी बालसुलभ आपत्ति थी  - पापा यह सुनाकर खि खि करके हँसते थे। साथ में ताली बजाते हुए और उनकी उँगली में चमकती मून स्टोन की अँगूठी झिलमिलाती थी ऐसे मानो वह भी मुस्कुरा रही है! पापा की वैसी हँसी का हमलोग – माँ और हम दोनों भाई-बहन बाद में खूब आनंद लेते थे। कहाँ लुप्त हो गया सब !

पुकार का नाम यानी डाक नाम (बांग्ला भाषा में और अभी अभी मित्र सुतनु पाणिग्रही ने बताया कि उड़िया भाषा में भी डाक नाम ही कहते हैं) बच्चों के लिए तरह तरह का रखा जाता है। आत्मीयता से भरपूर और अक्सर स्वर वर्णों की मदद से खूब गोल-गोल, दीर्घाकार! कभी कभी किसी शब्द के एक हिस्से को लेकर जोड़-तोड़ करके डाक नाम होता है या ध्वनि साम्य के आधार पर कुछ गढ़ लिया जाता है। घर-परिवार में स्थिति और संस्कृति की झलक तो उससे मिलती ही है। कभी कभी सिर्फ़ दुलार-मलार या विवक्षा यानी कहनेवाले की इच्छा होती है डाक नाम के केंद्र में। स्वाती ‘सुरबत्तो’ हो गई, लीना ‘लीनचू’ हो गई, सुमंद्र मलखान सिंह और उसका भाई रसखान सिंह हो गया – कब कैसे क्यों, पता नहीं। हाँ, एक से अधिक डाक नाम होना प्यार और स्नेह का प्रमाण माना जाता है। सुतनु का ही देखिए – बापी, बापलू, कुनी यानी छोटा भाई। पसंदीदा ध्वनि का दोहराव और ऊटपटाँग होना भी एक तरीका था डाक नाम रखने का। भाषा वैज्ञानिक नियमों के मुताबिक उनका विश्लेषण किया जा सकता है और जेंडर व भाषा के intersection का भी। भाषा के खेल और मस्ती, तुकबंदी और हँसी-मज़ाक का पुट तो उसमें ज़ाहिरा तौर पर होता है। बहुत बार डाक नाम ऐसा ऐसा होता है कि बच्चे शर्माने लगते हैं और दूसरों से छुपाने लगते हैं। खासकर वयस्क होने पर डाक नाम से पीछा छुड़ाने की कोशिश भी होती है। मैंने एक लेख में यह चित्र देखा था –



स्रोत : इंटरनेट https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/voices/whats-in-a-name-forget-shakespeare-just-ask-a-bengali/

बांग्ला भाषा में डाक नाम का उलट होता है भालो नाम। हिन्दी में भी पुकार के नाम के साथ अच्छा नाम पूछा जाता है यानी वह नाम जो आधिकारिक दस्तावेजों (आज के समय में आधार कार्ड मान लीजिए 😊) में है। या असली नाम पूछा जाता है (वैसे में भी डाक नाम असली का विपरीत यानी नकली नाम नहीं होता)। भालो नाम औपचारिक पहचान है। उसके सामने डाक नाम व्यक्ति की अनौपचारिक पहचान है। इसके लिए अंग्रेज़ी में है ‘निकनेम’। ब्रिटेनिका के मुताबिक अंग्रेज़ी भाषा की विकास यात्रा के मध्य में यानी Middle English में ‘eke name’ का शाब्दिक अर्थ था ‘also-name’ और शारीरिक बनावट, रंग-रूप आदि पर ‘निकनेम’ रखे जाते थे। यह अतिरिक्त नाम है या इसे वैकल्पिक नाम कहें। इंसान के अलावा हम जगह, इमारत, टीम, निर्जीव वस्तु आदि के लिए भी पुकार का नाम, डाक नाम रख देते हैं और बहुत बार वह नाम औपचारिक ‘भालो नाम’ से अधिक लोकप्रिय हो जाता है।

मुझे याद है कि बहुत छुटपन में पापा कभी कभी मुझे 'भुटुक' कहते थे या 'भुटकुंइयाँ'। शायद छोटी होने के कारण। जहाँ तक ध्यान है 'भुटकुंइयाँ' एक जंगली फूल हुआ करता था। छोटा, कई दलों वाला, कई रंगों वाला और गंधहीन। उसके पत्ते रुखड़े-से होते थे, काँटेदार नहीं। पटना में रानीघाट मोहल्ले में हमारा घर हुआ करता था। रानीघाट में गंगा किनारे या लॉ कॉलेज और पी. जी. के हॉस्टल के पीछे जाकर गंगा के पास जो चारदीवारी थी उसके पास भुटकुंइयाँ का पौधा दिखा करता था। बाद में भी बहुत जगह दिखा। 

अभी अभी अंजु ने भुला दिए गए भुटकुंइयाँ के फल का ब्योरा दिया – बंबई से। उसका फल भी होता है – गोलमिर्च (कालीमिर्च) की तरह गोल गोल, छोटा छोटा। बस उसमें गोलमिर्च की तरह दरार नहीं होती, बल्कि अंजु के शब्दों में वह मकोय (रसबेरी) की तरह चिकना होता है। शुरू में  भुटकुंइयाँ के फल हरे होते थे और बाद में पककर बैंगनी हो जाते थे। अंजु 5-6 साल की उम्र से उसकी स्पेशलिस्ट थी और खाया करती थी। जब घर में उसकी किसी ने शिकायत की तब पिताजी ने उसके ज़हरीले होने की बात बताकर तंबीह की। आखिरकार अंजु लाल ने उसे खाना छोड़ा, इसलिए नहीं कि भुटकुंइयाँ के ज़हरीला होने के कारण वह डर गई थी, बल्कि उसके पापा को लाड़ली के लिए डर लगा था, इसका खयाल करके। डाक नाम की चर्चा उसे वापस रानीघाट की छूट गई गलियों में, अंकल की स्मृतियों में ले गई। उसके साथ मेरा भी गला रुँध गया।

वैसे मुझे बड़ी होने के बाद भुटुक, भुटकुंइयाँ नाम प्यारा ही लगने लगा था, मगर पहले तो लाज आती थी। वैसे पापा मुझे भुटुक पुकारते नहीं थे, बस कभी कभी नाम लेते थे। भैया को याद हो तो बता सकता है, वरना अब सब किस्सा बन गया है।  

माँ जब मस्ती में होती थी तब मुझे पुरवैय्या बोलती थीपुकारती भी थी कभी कभी।पुरवैय्या का मतलब पूर्व दिशा से चलनेवाली हवा। पुरवैय्या हवा कितनी कष्टदायक है और कैसे पुराने दर्द को हरा कर देती है, जाड़े में हाड़ तोड़ देती है - इस मान्यता पर मैं हँसती थी कि मैं भी वही हूँ। पुरवैय्या से दो हाथ दूर रहना ही शायद फ़ायदेमंद है :)। इस प्रसंग में अपने प्राइमरी स्कूल - रानीघाट के मोड़ पर स्थित बुनियादी अभ्यासशाला के साथियों का  "पूर्वा सुहानी आई रे" कहकर चिढ़ाना कौंध गया। 'पूरब और पश्चिम' (हालाँकि इसके पोस्टर पर अंग्रेज़ी में 'पूरब और पच्छिम' लिखा है) फ़िल्म 1970 में आई थी और एक-दो साल बाद भी मेरे प्राइमरी स्कूल के सालों में यह सुपरहिट गाना सबकी ज़बान पर था। यदा कदा लड़के ही नहीं, लड़कियाँ भी इसे मेरा नाम सुनते ही दुहरा देते थे। वहीं 1967 की फ़िल्म 'मिलन' के मशहूर गाने का यह अंतरा सुनते हुए मैं इठलाती थी - 

रामा गजब ढाए, ये पुरवइया

नइया सम्भालो, कित खोए हो खिवइया

पुरवइया के आगे, चले ना कोई ज़ोर
जियरा रे झूमे ऐसे ...

सावन का महीना पवन करे सोर

उच्चारण भेद से पुरवैय्या लिखिए या पुरवइया, फ़र्क नहीं पड़ता। अन्यथा माँ पूरब ही कहती थी। बाद में करीबी दोस्त भी यही कहने लगे। पटना में लगभग सब यही पुकारते हैं। उनमें से किसी के मुँह से पूर्वा सुनना अटपटा और अजनबी लगता है। बहुत बाद में दिल्ली में भी कुछ दोस्त पूरब कहने लगे और उसमें मुझे संकोच महसूस हुआ। अजीब सा अहसास है यह ! डाक नाम से पुकारने का अधिकार भी हम अपने हाथ में रखना चाहते हैं। 

माँ मुझसे कभी कभार चिढ़े तो उसका 'लड़की' कहना याद है। आम तौर पर वो मुझसे दुखी भले हो जाए, तंग हो जाए, मगर नाराज़ कम होती थी। यह कब हुआ ? किशोरावस्था में मैं माँ के गुस्से और अनुशासनपसंदगी से त्रस्त रहती थी। मेरी कुछ पुरानी चिट्ठियों में यह भाव मिल जाएगा। बचपन में माँ से डरना तो भूलता नहीं है क्योंकि माँ ही थी जो सब पर शासन करती थी। वह भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी और  इसके नाते मौसी-मामू भी अपनी 'बड़की दी' के शासन करने के गवाह रहे। मेरी शादी के बाद हमारा रिश्ता एकदम बदल गया, ऐसा मुझे लगता है। मुझे समझ आ गया था कि माँ और मायका क्या होता है। उस भौतिक अलगाव ने मुझे माँ के करीब ला दिया था। आगे चलकर लड़की की ज़िंदगी पर निगाह जाने लगी, पढ़ाई-लिखाई और दीन-दुनिया के अनुभव ने gendered life की परतों से परिचित कराया। जब बाकायदा जेंडर पर काम करने लगी तब अनुभव को जेंडर लेंस से देखने की सलाहियत आने लगी। 

हमदोनों खूब बात करने लगे थे। उपन्यास की नायिकाओं से लेकर आस-पड़ोस के लोगों के बारे में माँ से गप्प होता था। बाद में टीवी के धारावाहिकों के पात्रों पर भी। उसमें जब उसकी याददाश्त धोखा देने लगी थी और वो धारावाहिकों में काम करनेवाले पुराने ज़माने के अभिनेता-अभिनेत्रियों के नाम भूलने लगी थी तब फ़ोन करके उनको पहचानने में मदद करने को कहती थी। मैं जानती होती थी तब तो फ़ौरन बता देती थी, अन्यथा गूगल करके बताती थी। ऐसे सवाल  वह कई लोगों से करती थी और धीरे-धीरे लोग झल्लाने लगे थे। मैंने उसको कह दिया था कि तुमको जो पूछना हो मुझसे पूछ लो - रात-बिरात कभी भी। 

लेकिन कभी कभी ऐसा होता था कि मैं किसी काम में डूबी हूँ और माँ किसी फ़िल्म में, किसी गाने में या किसी धारावाहिक में पात्रों के नाम पर अटकी है और तब मैं चिल्ला पड़ी उस पर कि माँ, नाम बाद में बताऊँगी। इतना ही नहीं, जब मेरा टीवी देखना छूट गया और फ़िल्म देखना भी कम होता गया तब मैं अभिनेता-अभिनेत्रियों को नहीं पहचान पाती थी। माँ की सुई पुराने ज़माने पर नहीं अटकी हुई थी। उसको नए से नए अभिनेता-अभिनेत्रियों के बारे में भी  जानना होता था। 'जोधा अकबर' में जोधा कौन है, और अकबर जो रजत टोकस है वह किस राज्य का होगा ? ऐसे सवालों के जवाब में बेटू के स्कूल जाने के रास्ते में दिखनेवाले दक्षिणी दिल्ली के टोकस मार्ग के हवाले से मेरा माँ को टोकस उपनाम के बारे में बताना - यह सब क्या था ? कभी कभी एक नगण्य से लगनेवाले पात्र को पहचानने के क्रम में माँ धारावाहिक या फ़िल्म की कहानी सुना जाती थी ताकि मैं उसका नाम पता कर सकूँ। 

माँ खूब पढ़ती थी और उसके बिस्तर पर या सामने के स्टूल पर (मेरे चिल्लाने पर) किताबों का थाक रहने लगा था। पापा जब तक थे बिस्तर पर दवाएँ (अधिकतर होमियोपैथी दवाएँ और थायरायड, ब्लड प्रेशर सहित विटामिन की गोलियाँ भी) रहती थीं, सिंदूर का डिब्बा (बाल में लगानेवाले रंगबिरंगे बैंड, साड़ी पिन, कंघी सहित), पापा को देने के लिए बिस्कुट और छोटी-बड़ी एक-दो डिक्शनरी भी। 

अंजु बरसों बाद जब दो-तीन साल पहले माँ से मिलने गई थी तो स्टूल पर रखी किताबों और माँ के हाथ में ‘रेत समाधि’ ने उसे अपनी किशोरावस्था की याद दिला दी थी। जब हम हाई स्कूल में थे और पड़ोस में रहते थे तो हमारा एक-दूसरे के घर खूब आना-जाना होता था। उस वक्त माँ की जो छवि उसके मन पर अंकित हुई थी, वह बरकरार रही। दशकों बाद उम्र और असमर्थता की चोट ने माँ का किताबों के प्रति चाव खत्म नहीं किया था, बल्कि ज्यों का त्यों बनाए रखा था। उसने अभी बताया कि लिखना-पढ़ना आंटी (माँ) का व्यक्तित्व था या यह कहना बेहतर होगा कि वह उनके जीने का संबल था। वह उनका विश्वास था, जैसे किसी का भगवान पर होता है, वैसे ही उनका पढ़ने-लिखने पर विश्वास था। वही उनकी सच्चाई थी, चट्टान की तरह ठोस और अडिग।

माँ के बिस्तर पर खाने-पीने के सामान देखकर या उसी कमरे में सबकुछ रखा देखकर मैं कितना नाराज़ होती थी, यह माँ-पापा को पता है या मुझे। गुड़िया, मीरा, गौरी और सोनू भी जानते थे जो माँ की तीमारदारी में रहते थे। चलने में असमर्थ होते जाने के कारण उपजी माँ की असुरक्षा की भावना से अनजान नहीं थी मैं, मगर उसको इतना लाचार देखना और कमरे को अस्त व्यस्त देखना माँ की गरिमा के अनुरूप नहीं था। जब माँ के कमरे से मैंने पापा का दीवान हटवाकर बगल के कमरे में रखवाने पर ज़ोर दिया था तब जानती हूँ कि वह कितना घुट रही थी। मैंने ब्रह्मास्त्र चलाया था कि तुम्हारे पास भैया, सुनीता, लावण्य आते हैं तो बैठने की जगह नहीं होती। उसका व्हील चेयर भी दीवान की वजह से आ-जा नहीं सकता था। माँ बेबस थी और मान गई। मैंने जानते-समझते ज़्यादती की, लेकिन मुझे लगा कि थोड़ी तो व्यवस्था बदले। माँ ने पापा के बाद अस्पताल जाने के सिवा कभी उस कमरे को नहीं छोड़ा। उसने ठान लिया था कि कहीं नहीं जाना है। उसको मन बदलने के लिए दिल्ली चलने को कहना भी मैंने छोड़ दिया था। अंतिम दिनों में माँ के साथ मैंने भी हार मान ली थी। 

आज माँ को गए पाँच महीने हो गए हैं और मन अटका है उसकी पुकार पर।

 


रविवार, 12 मई 2024

टेबुल क्लॉथ : एक भेंट (Tablecloth by Nandkishore Nawal)



आज से कई वर्ष पूर्व

तुमने मुझे जो टेबुल क्लॉथ भेंट किया था,

वह आज भी मेरी टेबुल पर ज्यों का त्यों बिछा है,


गंदा होने पर

न मैंने इसे धोबी को दिया,

न स्वयं ही साबुन से साफ किया -

यह सोचकर

कि इससे कहीं तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श धुल न जाय,

कि इससे कहीं तुनहारे अधरों का चिह्न न मिट जाय,

जिसे तुमने सुई से धागा काटते समय इस पर अंकित किया होगा ...


आज यह 'क्लॉथ' निःसंदेह कुछ म्लान पड़ गया है,

लेकिन कौन देखता है यह म्लानता ?

इस म्लानता से ऊपर,

मेरे मन पर चाँदनी-सा बिछा है

तुम्हारा यह टेबुल क्लॉथ,

जिसमें तुम्हारी उँगलियों और अधरों के तारक-चिह्न अंकित हैं ...

                                                                                - 10.01.59


कवि - नंदकिशोर नवल
संकलन - उदय-वेला
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2014


एक ऐसी कविता जिसमें माँ और पापा दोनों हैं। वह भी तब जब दोनों नहीं हैं। पापा को गए ठीक चार साल हुए। लगभग यही वक्त रहा होगा। माँ को गए तीन महीने होने को आए। सोच रही हूँ कि क्या वही टेबुल क्लॉथ बिछाकर दोनों आमने-सामने बैठे होंगे - पापा हमेशा की तरह लिखते-पढ़ते हुए और माँ उनका डिक्टेशन लेती हुई या उनका लिखा सुनती हुई! माँ हमारे सामने पापा की प्रेम कविताओं का ज़िक्र भी नहीं करती थी, मगर कभी कभी कुछ घटनाओं के बारे में बताती थी जो कविताओं में दर्ज मिलते थे। किशोरावस्था में मुझे यह सब देखकर बहुत मज़ा आता था। आज जब संग्रह उठाया तो देखा कि पापा का समर्पण जीवन-संगिनी को ही है। इस संग्रह में संजय शांडिल्य और पापा की कविताएँ हैं।

बुधवार, 20 मार्च 2024

इतनी सारी ख़ुशी (नाओमी शिहाब न्ये Naomi Shihab Nye)



मुश्किल है जान पाना कि क्या करें इतनी सारी ख़ुशी के साथ

दुख के साथ कुछ तो रहता है रगड़ने के लिए

मरहम और कपड़े से एक ज़ख़्म का ख़्याल रखना

जब आसपास की दुनिया गिर पड़े, तो उसके टुकड़े तुम्हें उठाने पड़ेंगे

अपने हाथों में पकड़ने के लिए कुछ…जैसे फाड़े गए टिकट या रेज़गारी।

पर ख़ुशी तैरती है।

उसे तुम्हारी ज़रूरत नहीं कि पकड़ और दबा कर रखो

उसे किसी बात की ज़रूरत नहीं।

ख़ुशी अगले मकान की छत पर चली जाती है गाती हुई

और ग़ायब हो जाती है, अगर चाहे तो।

तुम तो ऐसे भी खुश हो वैसे भी।

कि कभी तुम एक पेड़ पर बने शांत मकान में रहते थे

और अब शोर और धूल की खुली खदान के ऊपर

तुम्हें नाखुश नहीं कर सकती।

हर चीज़ की अपनी ज़िंदगी है

वह कॉफ़ी केक और पके आड़ुओं की संभावना के साथ जाग सकती है...

और उस फ़र्श से भी प्यार कर सकती है, जिसपर झाड़ू लगाई जानी है... दाग़दार कपड़ों और खरखराते रिकार्ड्स से भी

क्योंकि कोई भी जगह इतनी बड़ी नहीं कि

ख़ुशी को भर ले, तुम कंधे उचकाते हो,

हाथ फैलाते हो और वह तुमसे तैरती हुई निकल जाती है

हर उस चीज़ में जिसे तुम छूते हो,

उसके लिए तुम ज़िम्मेदार नहीं

कोई श्रेय तुम नहीं लेते, जैसे रात का आसमान श्रेय नहीं लेता

चाँद का, पर पकड़े रखता है और बाँटता रहता है

और इस तरह से जाना जाता है।



फ़िलिस्तीनी-अमरीकी कवयित्री : नाओमी शिहाब न्ये

मूल अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद: निधीश त्यागी

संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं

प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023


गुरुवार, 14 मार्च 2024

आपके न रहने पर ... (नंदकिशोर नवल)


मैडम,
आप चली गईं
मुझको अकेला छोड़कर।
अब मेरे नास्ते की चिंता कोई नहीं करता।
खाना भी जैसे-तैसे खा लेता हूँ।
दाइयाँ समय से आती हैं
और अपना फर्ज पूरा कर चली जाती हैं।
बस पुस्तकें मेरे एकांत की संगी हैं,
पर कभी-कभी उनसे भी मन उचट जाता है;
मैं देर तक आँखें बंद कर सोचता रहता हूँ।
रवीन्द्रनाथ की पंक्तियाँ रह-रहकर याद आती हैं -
'सम्मुखे शांतिर पारावार,
भासाओ तरणी हे कर्णधार!'
पर मेरे सामने शांति का कोई पारावार नहीं,
न कोई कर्णधार दीखता है।
फिर भी आप चिंतित न होंगी,
मैं यथाशीघ्र आ रहा हूँ आपके पास।
आपका
नवल


कवि - नंदकिशोर नवल
संकलन - नील जल कुछ और भी धुल गया
संपादक - श्याम कश्यप
प्रकाशक - शिल्पायन, दिल्ली, 2012



पापा की इस कविता के नीचे लिखा है - पत्नी की मृत्यु की कल्पना करके 15.5.11 को रचित। और मैंने इसे निकाला है जब तारीख होने जा रही है 15.3.24 ... और अनायास मन तारीखों के तार, उनके संयोगों को जोड़ने में उलझ गया है। 15 तारीख यानी माँ को गए एक महीना होने को आया और पापा ने 15 तारीख को ही सपना देखा था। भले वह मई महीने की तारीख थी। अरे मई का महीना ? पापा तो मई में ही गए थे ... तीन दिन पहले 12 मई, 2020 को। मई का महीना माँ-पापा की शादी की सालगिरह का महीना है और वह तारीख थी 22 मई, 1959 - बुद्ध पूर्णिमा।

पापा (नंदकिशोर नवल) ने 2011 में यह कविता माँ (रागिनी शर्मा) की गैरमौजूदगी में व्याकुल होकर लिखी थी और मैं पहुँच गई 2011 में जब माँ को इलाज के लिए दिल्ली लेकर आई थी। अचानक माँ भूलने लगी थी - लोगों के नाम-चेहरे उतना नहीं जितना रिमोट चलाना, फोन चलाना जैसे बुनियादी काम। हमें डर लगा कि माँ कहीं डिमेंशिया की चपेट में तो नहीं आ गई। आनन-फानन में दिल्ली में दिखाना तय हुआ। पापा जो कि माँ पर पूरी तरह निर्भर थे, उन्होंने अकेले रहना स्वीकार कर लिया था क्योंकि उन दिनों वे हवाई यात्रा भी नहीं करते थे और ट्रेन से जाने में वक्त लगाना उनको बेकार लगा। उससे भी ज़्यादा यह था कि बच्चे माँ पर फ़ोकस करें और यह भी कि दिल्ली में एम्स के चक्कर काटना उनसे मुमकिन नहीं था। दिल्ली में भी वे रिक्शे पर ही चल पाते थे या हद से हद ऑटो वाले की सीट पर ही आगे बैठते थे - पेट्रोल की गंध उन्हें बर्दाश्त नहीं थी और motion sickness भी था। खैरियत यह हुई कि एम्स में ब्रेन मैपिंग जैसे टेस्ट के बाद डिमेंशिया का डर खारिज कर दिया गया था। इससे न केवल माँ की सेहतमंदी की उम्मीद जगी, बल्कि वो वाकई सामान्य होने लगी। डॉक्टर ने केवल थायराइड की दवा की खुराक घटाई और पटना के न्यूरो डॉक्टर के नुस्खे पर लिखी 9 की 9 दवाइयों को बंद कर दिया। पापा के पास जल्दी ही माँ लौट आई, चंगी होकर। सबकी जान में जान लौट आई।

पापा माँ को मैडम पुकारने लगे थे और आप भी कहने लगे थे, यह कब से हुआ था और क्यों हुआ था, इसका जवाब दोनों में से किसी के पास नहीं था। लेकिन यह उतना मायने नहीं रखता, जितना इस कविता में व्यक्त पापा की व्याकुलता। वो सपने में कह रहे थे - मैं यथाशीघ्र आ रहा हूँ आपके पास। हुआ उल्टा। पापा पहले गए और हर रोज़ उनसे मिलने की तड़प में माँ ने तीन साल नौ महीने तीन दिन बिताए ... बहुत कष्ट था उसे। शारीरिक कष्ट से अधिक मानसिक कष्ट क्योंकि वो पूरी तरह बिस्तर पर आ गई थी और दूसरों पर निर्भर हो गई थी। परवशता और लाचारगी का अहसास उसके लिए मारक था। करवट दिलाने, उठने-बैठने, नहाने-खाने, खुजलाने-सहलाने सबके लिए उसे मदद की ज़रूरत पड़ने लगी थी। अंतिम समय में फोन तक खुद से नहीं लगा पाती थी। उसका पढ़ना छूटता जा रहा था जबकि महीने-दो महीने पहले तक आधी-आधी रात को उपन्यास पढ़ती रहती थी, घंटों टीवी देखती थी और खूब गपशप करती थी। कभी कभी सहायिका सामने अखबार का पन्ना खोलकर दिखाती तो वह लेटे लेटे खबरों की सुर्खियाँ पढ़ती। दूसरी आँख में मोतियाबिंद उतर आया था और उसका ऑपरेशन बाकी था। उसे इंतज़ार था कि जल्दी से आँख बेहतर हो ताकि वह पढ़ पाए। पापा के बाद उसका सहारा था पढ़ना, जो कि घटता जा रहा था।

माँ चाहने लगी थी जाना। सुजाता जी और लिली मौसी दोनों ने ठीक कहा कि एक तरह से इच्छामृत्यु है यह। लेकिन हम क्या करें ? माँ को और कष्ट में हम नहीं देखना चाहते थे, मगर उसकी अनुपस्थिति से कैसे निबटें ? 14 फ़रवरी की रात घर में माँ की अंतिम रात थी। उसके पास भैया-भाभी थे। मैं दूर दिल्ली में थी। 15 की देर रात भैया माँ को अस्पताल से घर ले आया। वहीं ड्राइंग रूम में उसका बिस्तर लगा, ज़मीन पर, जहाँ पापा लेटे थे। पापा की ही तरह माँ का चेहरा शांत था। उसकी बेचैनी, उसके दर्द की छाप चेहरे पर नहीं थी। सब कह रहे थे कि उसे मुक्ति मिल गई। हम भी मान रहे थे, मगर सच पूछो तो नहीं भी मान रहे थे ... 

वो बात रह रहकर कानों में गूँज रही है कि माँ कह रही थी कि इस बार पटना आओगी तो खाली हाथ जाओगी, मुझको नहीं पाओगी। मैंने उसे झिड़क दिया था कि फालतू बात मत करो। 15 की सुबह से वह निढाल थी, होशो हवास जैसे न हो। लगातार पटना बात हो रही थी, मगर माँ से नहीं, भैया से, भाभी से, सोनू से, मौसी से, डॉक्टर से... और मैं माने बैठी थी कि पिछले सितंबर-अक्टूबर की तरह वह bounce back करेगी। भैया ने जब बताया कि माँ critical है तब भी शायद मुझे समझ में नहीं आया। या समझकर भी नहीं समझा। अपराध बोध से भरी हुई हूँ - जब  अपूर्व कह रहे थे मुझे कि पटना जाओ तब मैं तत्काल क्यों नहीं गई। जाने के लिए खुद को तैयार भी कर रही थी, लेकिन निर्णय नहीं कर पा रही थी। शायद भाग रही थी ... अपने से, आसन्न घड़ी से। मन कह रहा था कि यह घड़ी टल जाएगी, अभी माँ के पास समय है। लेकिन उसने समय नहीं दिया। 

निर्मल जी (निर्मल चक्रवर्ती) को भी अंदाजा नहीं था इसका। वे माँ की हर छोटी-बड़ी बीमारी जानते थे। उसकी असहायता समझते थे, इसलिए कभी खीझे नहीं। माँ की छोटी सी छोटी तकलीफ के लिए हम उनको कलकत्ता में परेशान करते रहते थे कि कोई दवा बता दीजिए। माँ भी उनको जब तब फोन करती रहती थी। उसे उम्मीद रहती थी कि निर्मल  जी की कोई न कोई दवा लग जाएगी और उसे फौरी ही सही, मगर राहत मिलेगी। मिलती भी थी और माँ उन दवाओं का नाम, उनकी खुराक याद करती रहती थी। इन दिनों माँ होमियोपैथी की किताब (जो कि नानाजी की थी और माँ-पापा दोनों के लिए धर्मग्रंथ का दर्जा रखती थी) पलट कर खुद से नहीं देख पाती थी। नहीं तो निर्मल जी से चर्चा भी करती थी कि फलाना दवा तो अतिसार में चलती है क्या खुजली के लिए कारगर है या 200 पोटेंसी तो रामबाण है, मगर कॉस्टिकम 30 घर में है तो काम चलेगा या नहीं। होमियोपैथी दवा का भंडार है माँ के पास। भैया, अब उन दवाओं के लिए कोई सुपात्र खोज रहा है। 

उस दिन माँ की टकटकी लगी थी पापा की फोटो की तरफ। तब सुनीता (भाभी) ने फोटो उतार कर उसके हाथ में दे दी। माँ ने निहारा और मानो पापा से इजाज़त लेकर उसने आँखें मूँद लीं। शायद दोपहर-तिपहर की बात है। उसके बाद से ही उसने नज़र नहीं उठाई। साँस चल रही थी, पर उसे जाना था। लय टूटी तकरीबन सवा ग्यारह बजे रात को, लगभग पापा की तरह ही उसके जाने की प्रक्रिया थी। याद आया कि पापा ने अपने जानेवाले दिन अस्पताल में माँ को देखा था और एक तरह से जाने की अनुमति लेकर गए थे। व्हील चेयर पर बैठी माँ की की तरफ उन्होंने हाथ बढ़ाया था , मगर कोविड के इन्फेक्शन की आशंका से मैंने रोक दिया था। नर्स की निगरानी भरी आँखें और अपने मन का चोर क्योंकि दिल्ली से आने के कारण मेरे हाथ में कोरोंटाइन होने का ठप्पा लगा था जो कुर्ते की बाजू में छिपा था। हालाँकि न पापा को कोविड था, न हमें, मगर उसके खौफ़ ने वह अनमोल क्षण हमसे छीन लिया। माँ पापा का उठा हुआ हाथ भूल नहीं पाई। उसने मुझे दोष नहीं दिया, पर मैं आज तक अपने को कोसती हूँ। पापा को चार दिन वेंटिलेटर लगा था और माँ को भी अंतिम चार घंटे में वेंटिलेटर लगाना पड़ा था। दोनों के शरीर के अंग एक एक करके विदा लेते गए लगभग एक ही तरीके से। 

हमने सपने में भी नहीं सोचा था कि लंबे समय तक प्राकृतिक चिकित्सा, एक्यू प्रेशर, फिजियोथेरेपी वगैरह और आजीवन होमियोपैथी व संयमित खान-पान के कारण अपने vitals के सही सलामत रहने का दावा करने और गुमान करनेवाले माँ-पापा दोनों आखिर में गए multiple organ failure से। लाचारीवश एलोपैथी इलाज भी भरपूर हुआ और अंतिम दिनों में दवा फाँकना उनकी मजबूरी हो गई थी। एक तरह से मानसिक शांति मिलती थी यदि कोई दवा खिला दी जाए तो। अगले चंद घंटे इस इंतज़ार में कटते थे कि दवा असर करेगी। सुबह दोपहर शाम यह सिलसिला चलता रहता था। माँ-पापा दोनों डॉक्टर तो डॉक्टर, मुझसे भी ऐसे दवा के बारे में पूछते थे मानो मैं ही उनका नुस्खा लिखती हूँ। धीरे-धीरे हमें सोडियम घटने पर नमक भरा कैप्सूल देना , घरघराहट होने पर नेबुलाइज़र लगाना -जैसे काम का प्रशिक्षण मिल गया था। इमरजेंसी को टालने के लिए यह पर्याप्त था। लेकिन इस बार इमरजेंसी नहीं टली। 

लावण्य (भतीजा) बेचैन रहता है कि इस जीवन के आगे क्या है, उसके मामा-बाबा कहाँ हैं, क्या कर रहे होंगे। इस बार वह माँ को विदा करने बंबई से आया। पापा के समय तो उनके पास ही था। लॉकडाउन के चलते कचनार (बेटी) पिछली बार नहीं आ पाई थी और न ही अपूर्व आ पाए थे। इस बार विदाई के समय सब पहुँच गए थे। माँ को जाना था गुलबीघाट जहाँ से पापा विदा हुए थे। तरुण जी, योगेश, मीरा, गौरी सबने माँ की इच्छा को दोहराया। माँ वहीं गई। नहीं, उसे ले जाया गया। रास्ता थोड़ा अलग था। गुलबीघाट की अपनी लखनचंद कोठी (किराये का हमारा घर) वाले रास्ते से नहीं, अपने पुराने रानीघाट वाले रास्ते से हम सब गए। उधर जिधर से कभी माँ दूध लाने जाती थी या थायराइड और ब्लड प्रेशर की बीमारी के लिए डॉक्टर अरुण तिवारी को दिखाने जाती थी। पैदल ही जाती थी। बहुत बाद में जाकर रिक्शे से जाने लगी थी। एकाध बार भैया माँ को संभवतः गाड़ी से घुमाने ले गया होगा। मुझे याद है कि वह माँ को कभी कभार डॉक्टर के यहाँ से लौटते समय गाड़ी से चक्कर लगवा देता था - गर्दनीबाग का, रानीघाट का। घूमने की शौकीन माँ निहाल हो जाया करती थी। 

और अभी माँ-पापा के साथ ही मुझे याद आ रहे हैं श्याप कश्यप अंकल भी जिन्होंने ज़िद करके पापा का यह काव्य संकलन तैयार किया था। वो चले गए, गीता आंटी चली गईं। काश अपनी बारी भी जल्दी आए... पापा की तरह माँ से कहना चाहती हूँ - मैं यथाशीघ्र आ रही हूँ तुम्हारे पास।


सोमवार, 1 जनवरी 2024

आख़िरी बूँद तक ज़िंदगी (Mahmoud Darwish translated into Hindi)

अगर कोई मुझसे फिर कहे: “मान लो कि तुम कल मरनेवाले हो तो तुम क्या-क्या करोगे?” जवाब देने के लिए मुझे एकदम वक्त नहीं चाहिए होगा। अगर मैं उनींदा महसूस कर रहा होऊँ, मैं सो जाऊँगा। अगर मैं प्यासा होता, मैं पानी पीऊँगा। अगर मैं लिख रहा होता, तो जो लिख रहा होता उसे पसंद करता और सवाल को नज़रअंदाज़ कर देता। अगर मैं ख़ाना खा रहा होता तो मैं ग्रिल्ड मीट की स्लाइस पर थोड़ी सरसों और गोलमिर्च मिलाता। अगर मैं दाढ़ी बना रहा होता, हो सकता है मैं अपने कान की लौ काट लेता। अगर मैं अपनी महबूबा को चूम रहा होता, मैं उसके होठों को खा जाता मानो वे अंजीर हों। अगर मैं पढ़ रहा होता, मैं कुछ पृष्ठ छोड़ देता। अगर मैं प्याज़ छील रहा होता, मैं कुछ आँसू गिराता। अगर मैं चल रहा होता, मैं चलता ही रहता कुछ मंद चाल से। अगर मैं ज़िंदा होता, जैसा मैं अभी हूँ, तो मैं ज़िंदा न होने के बारे में कुछ न सोचता। अगर मैं न होता, तो सवाल मुझे परेशान ही न करता। अगर मैं मोत्ज़ार्ट को सुन रहा होता तो मैं फ़रिश्तों की दुनिया के आसपास होता। अगर मैं सो रहा होता, तो मैं सोता रहता और चैन से गार्डेनिया के सपने देखता रहता। अगर मैं हँस रहा होता, तो मैंने अपनी हँसी बीच में रोक दी होती इस सूचना के लिए सम्मान के चलते। और मैं कर भी क्या सकता था, अगर मैं बहादुर ही होता एक अहमक से अधिक और ताकतवर होता हरक्यूलियस से ज़्यादा?




फ़िलिस्तीनी कवि

अरबी से अंग्रेज़ी अनुवाद : कैथरीन कॉबम

हिंदी अनुवाद: अपूर्वानंद

संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं

प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023

रविवार, 31 दिसंबर 2023

आख़िरी ट्रेन रुक गई है (Mahmoud Darwish translated into Hindi)


आख़िरी ट्रेन आख़िरी प्लेटफ़ॉर्म पर रुक गई है। वहाँ कोई नहीं है

गुलाबों को बचाने के लिए, कोई कबूतर नहीं शब्दों से तामीर की गई औरत पर उतरने के लिए।

वक्त ख़त्म हो चुका है। गाना बेहतर नहीं है झाग के मुक़ाबले।

हमारी ट्रेनों पर भरोसा मत करो, प्यारे। भीड़ में किसी का भी इंतज़ार मत करो।

आख़िरी ट्रेन रुक गई है आख़िरी प्लेटफ़ॉर्म पर। लेकिन कोई भी

नारसीसस की छाया नहीं डाल सकता वापस रात के आईनों में।

मैं कहाँ लिख सकता हूँ देह के अवतार का अपना सबसे ताज़ा वृत्तांत?

यह अंत है उसका जिसका अंत होना ही था। वह कहाँ है जिसका अंत होता है?

मैं कहाँ ख़ुद को अपनी देह में अपने वतन से आज़ाद कर सकता हूँ?

हमारी ट्रेनों पर भरोसा मत करो, प्यारे! आख़िरी कबूतर उड़ गया है।

आख़िरी ट्रेन आख़िरी प्लेटफार्म पर रुक गई है। और वहाँ कोई नहीं था।




फ़िलिस्तीनी कवि : ग़स्सान ज़क़तान

अरबी से अंग्रेज़ी: मुनुर अकाश और कैरोलिन फ़ॉश

हिंदी में : अपूर्वानंद

संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं

प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023











शनिवार, 30 दिसंबर 2023

रूमाल (Ghassan Zaqtan translated into Hindi)


हमारे बीच कहने को कुछ न बचा

सब उस ट्रेन में चला गया जिसने अपनी सीटी

उस धुएँ में छुपा ली जो बादल न बन सका

उस चले जाने में जिसने तुम्हारे हाथ पाँव बटोरा किए

कुछ भी नहीं बचा कहने को हमारे बीच

इसलिए रहने देते हैं तुम्हारी मौत को

चमकती चाँदी की गहरी कौंध

और रहने देते हैं उन शहरों के सूरज को

तुम्हारे कंधों पर रखे गुलाब

के अक्स में।




फ़िलिस्तीनी कवि : ग़स्सान ज़क़तान

अरबी से अंग्रेज़ी: फ़ादी जूदा

हिंदी में : निधीश त्यागी

संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं

प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023