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शनिवार, 2 जुलाई 2022

राजनीतिक करवटें, 1948 (Rajneetik karvatein, 1948 by Shamsherbahadur Singh)

(बतर्ज़ कव्वाली)

हाय लीडर दुरंगी न कम गुम हुए !!

बीच धारा अगम थी - गुड़म् गुम हुए !!


'इन्क़लाबी' हमारे न कम गुम हुए :

लेके साइकिल हमारी निगम गुम हुए !!


हमने देखा था उनको इसी मोड़ पर !

एकदम आए वो ! एकदम गुम हुए !!


ऐसे खो गए जाके आफ़िस में हम :

अपने कानों पर रक्खे क़लम गुम हुए !!


बोली बरसात में इन्क़लाबी दुल्हन :

'ले के छाता हमारा बलम गुम हुए !'


रक्खो एक् सौ चवालिस दफ़ा फूँक फूँक !

वर्ना रक्खा जो अगला कदम, गुम हुए !!


जैसे होश आज बंगाल सरकार के :

हम तो ऐसे, तुम्हारी क़सम, गुम हुए !!


ऐसी आँधी चले ... हम भी पूछें - कहाँ,

वो जो ढाते थे जुल्मों-सितम, गुम हुए ??


आ रहे हैं मसीह्-ओ-खिज़र झींकते :

हे ! अब इन्क़लाबों में हम गुम हुए !!


क्या गुरुजी मनुSजी को ले आयेंगे ?

हो गए, जिनको लाखों जनम गुम हुए !! 


अपनी किस्मत को यों रो रहे हैं चियांग - 

रह गए हम लँडूरे, सनम गुम हुए !!


किस एटम् गर से पूछे कि - इन्सान के 

हीरोशिमा में कितने अदम गुम हुए !?


हमने ज़ेरे-ज़मीं, की तरक़्क़ी पसन्द :

ले के शमशेर अपनी क़लम गुम हुए !!


आज - सन् 1948-49 के ज़माने में 

चियांग - चियांग-काई-शेक, जिन्हें फ़ारमूसा (ताइवान) में शरण लेनी पड़ी  

ज़ेरे-ज़मीं - 'अंडर ग्राउंड'


शायर - शमशेरबहादुर सिंह 

संकलन - सुकून की तलाश 

संपादन - रंजना  अरगड़े 

प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1998 




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