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शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

कड़वा मन (By Purwa Bharadwaj)

मन कड़वा होता है। खट्टा होता है। यह सच्चाई है। (यकीनन मीठा भी होता है, लेकिन अभी उसका भाव पटल पर नहीं है।)  कितना भी यह समझाओ अपने आप को कि यह क्षणिक है, आवेग है, आवेश है, समय के साथ तकलीफ चली जाएगी, तो भी मन में फाँस रह जाती है। अक्सर करीबी या परिचित के संदर्भ में यह अटक रह जाती है।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

सैर और दस्तरख़्वान (By Purwa Bharadwaj)

इन दिनों सुबह की सैर को नियमित करने का भरपूर प्रयास कर रही हूँ। पहली वजह अपना स्वास्थ्य ठीक रखने का दबाव है और दूसरी वजह है प्रिंगल रानी के लिए हवाखोरी की ज़रूरत। तीसरी वजह भी है और वह है अपने साथ होने का अहसास।

यह सिलसिला कितने दिन तक चलेगा उसे लेकर चिंता है, मगर ना से हाँ सही मानकर खुश हूँ। आज काफी देर तक मैं कल रात के खाने के बारे में सोचती रही। कल इरादा किया था कि फ्रिज को पूरा खाली कर देना है। कोने-कोने में, छोटे-बड़े डिब्बे में जो कुछ पड़ा है, उसे निपटा देना है। जिम्मेदारी अकेले मेरी नहीं थी, पूरा घर शामिल था। अपूर्व बिना ना-नुकुर के कुछ भी खा लेते हैं। बासी को लेकर नखरा मेरा भले हो, घर में और किसी का नहीं है। बेटी तो खाती ही रहती है। तीन दिन पहले का पिज़्ज़ा और चार दिन पुरानी कढ़ी वह चाव से खा लेती है। उसके लिए गर्म केवल भात होना चाहिए।

गुरुवार, 2 मार्च 2017

बादशाह अकबर की कविता (Mughal emperor Akbar's Poem)

कान्हाते अब घर झगरो पसारो 
कैसे होय निरवारो। 
यह सब घेरो करत है तेरो रस 
अनरस कौन मंत्र पढ़ डारो।।
मुरली बजाय कीनी सब वोरि 
लाज दई तज अपने अपने में बिसारो। 
तानसेन के प्रभु कहत तुमहिं सों तुम जितो हम हारो।।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

गर्दन एक कुएँ जैसी (Gardan ek kuyein jaisi by Prakriti Kargeti)

गर्दन एक कुएँ जैसी है 
कोई न कोई
रिश्ते की रस्सी से 
खाली बाल्टी बाँध
फेंक देता है गहरा 
फाँस पड़ती है 
साँस रुकती है,
पर कुआँ
बाल्टी भरने नहीं देता 
अपना ही पानी निगल जाता है.

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

यात्रा (Yatra by Purwa Bharadwaj)

यात्रा के लिए मैं प्रस्तुत रहती हूँ. रेल यात्रा हो या हवाई यात्रा. बस यात्रा नहीं. वह शुरू से मजबूरी का सौदा रही है और स्टीमर या नाव की यात्रा तो भूली बिसरी बात है.

बचपन में पापा के साथ अपने गाँव चाँदपुरा जाने का एकमात्र ज़रिया पानीवाला जहाज़ ही था. पहले स्टीमर लो और उसके बाद गंगा नदी पार करके पहलेजा घाट उतरो. घाट पर उतरकर थोड़ी दूर बालू में चलो. ककड़ी बिकती थी तो हड़बड़ी में उसे खरीदवाओ और फिर रेलगाड़ी पकड़कर चाँदपुरा पहुँचो. मुझे याद है एकबार पापा के साथ अकेले गाँव जाने का कार्यक्रम बना यानी माँ और भैया के बिना. भोर में उठकर माँ ने मुझे मुँह धुलाया था और हिदायतों के साथ यात्रा पर जाने की तैयारी करवाई थी.

चाँदपुरा मेरे गाँव का नाम है, स्टेशन का नाम नहीं है, यह उसी दौरान समझा था. (हालाँकि लंबे समय तक इसकी गुत्थी नहीं सुलझी थी कि गाँव का नाम और स्टेशन का नाम अलग अलग क्यों है या गाँव का नाम स्टेशन पर क्यों नहीं लिखा है.) हमारे स्टेशन का नाम चकमकरंद हॉल्ट है, माँ ने दिमाग में बिठाने का प्रयास किया था. वह नाम मज़ेदार लगा था, लेकिन भारी भी लगा था बोलने में. यह भी हिदायत मिली थी कि हाजीपुर स्टेशन आते ही तैयार हो जाना है क्योंकि हमारे स्टेशन पर गाड़ी बमुश्किल एक या दो मिनट रुकती थी. चकमकरंद हॉल्ट है, जंक्शन नहीं, यह अंतर हमारे लिए परिभाषा का अंतर नहीं था. यह गाड़ी रुकने के समय का अंतर था.

गाँव की यात्रा में पहले जब माँ साथ होती थी और पापा कॉलेज खुला होने के कारण साथ नहीं होते थे तो चकमकरंद हॉल्ट पर चचेरे चाचा लोग तैनात रहते थे. (उस समय चचेरा नहीं जोड़ा जाता था और चाचा का मतलब चाचा था. यह शब्दावली अलगाववाली थी या छोटे परिवार की ज़रूरत से उपजी थी, इस शब्दावली की यात्रा की पड़ताल नहीं की है मैंने. न ही रिश्तों की यात्रा पर गौर किया है मैंने. कभी कभी लगता है कि जैसे जगह की दूरी मील, कोस या किलोमीटर में नापते हैं तो क्या रिश्तों की दूरी मापने के लिए चचेरा, ममेरा, मौसेरा, फुफेरा शब्द हैं ?) हाजीपुर से निकलने के साथ ही माँ हमलोगों का सामान लेकर दरवाज़े के पास आ जाती थी. अपने सर पर आँचल सँभालती हुई (जो हमारे लिए नया होता था क्योंकि वह पालन-पोषण, मन-मिजाज़ पूरी तरह से शहरी थी और पर्दा नहीं करती थी). हमदोनों भाई-बहन को अपनी ओट में रखकर ताकि खुले दरवाज़े का आकर्षण हमें खतरे में न डाल दे. भैया माँ को लोहे का बक्सा घसीटकर लाने में मदद करता था. उस समय कुली का न रहना अखरता नहीं था. चाचा गाड़ी के चकमकरंद हॉल्ट पर आते ही साथ-साथ भागते हुए हर डिब्बे पर निगाह गड़ाए रखते थे. उन दिनों कोच नंबर या आरक्षित सीट के चक्कर से हमसब दूर थे. माँ डिब्बे का डंडा पकड़कर सर निकालकर हाथ से इशारा करती थी और चाचा भौजी-भौजी कहते हुए हमारे डिब्बे के समानांतर दौड़ने लगते थे. गाड़ी की दिशा और गति के मुताबिक़. पहले बक्सा उतारा जाता था और फिर गोद में टंगकर हमदोनों भाई-बहन. अंत में माँ सावधानी से पाँव जमाती हुई उतरती थी क्योंकि नीचे सीमेंट का प्लेटफ़ॉर्म नहीं था, पत्थर के टुकड़े थे.

हाँ, याद आया कि गाँव में घूमते हुए अक्सर हम बच्चे हॉल्ट की तरफ आ निकलते थे. पास में लगा हटिया, रास्ते की लगभग टखने भर धूल, आम की गाछी, बड़हर का पेड़, भुसुल्ला और करीब का स्कूल पार करके हॉल्ट पर आकर रेलगाड़ी की सीटी सुनना मन लगाने का साधन था. गार्ड का झंडी हिलाना, लालटेन जैसी बत्ती को देखना नया अनुभव था. पटरी गंदी नहीं लगती थी. करीने से सजे पत्थरों के टुकड़ों के बीच लोहे की पटरी माँग की तरह लगती थी – सीधी-सख्त और सादी भी. (अब शायद यह बिम्ब न उभरे क्योंकि बिम्बों की गढ़न को समझने लगी हूँ.) उन्हीं पत्थरों में से चिकने-चिकने गोलाई लिए हुए पत्थर गाना-गोटी खेलने के लिए मैं चुन लेती थी. कई बार वह गाना-गोटी मेरे साथ यात्रा करके पटना आया. 

वापसी यात्रा में जल्दबाज़ी रहती थी. मन के अंदर भी और बाहर भी. जब स्टीमर महेन्द्रू घाट पर लगने को होता था तो लंगर डालते ही कुली धड़ाधड़ कूदने लगते थे. घाट से सटने के पहले ही कुली फाँद-फाँद कर स्टीमर पर आ जाते थे. उनको सब्र नहीं था क्योंकि सबको एक अदद असामी चाहिए था. मुझको हमेशा डर लगता था कि कहीं कोई पानी में न गिर जाए. बहुत कुली अधेड़ होते थे और अक्सर धोती-कुर्ता पहनते थे, मगर वज़न उठाने तक में जवान कुलियों को मात देते थे. उस समय उनकी लाल वर्दी जितनी आकर्षक लगती थी, फिर कभी नहीं लगी. अब तो कुली भी कम हो गए हैं और उनकी मौजूदगी पर ध्यान कम जाता है. सूटकेस में लगे चक्के और कम सामान लेकर चलने के सबक ने कुलियों से मेल-जोल भुला दिया है. वरना बहुत बार एक ही कुली मिल जाता था और माँ उसको पहचानकर हालचाल भी पूछ लेती थी. उन यात्राओं के हर चरण पर उत्साह था और आज भी वह उत्साह कमोबेश बरकरार है.

फिर भी बहुत कुछ बदला है. वह क्या है ? यात्रा संबंधी अनुभवों को पलटकर देख रही हूँ तो लगता है कि अव्वल तो सुविधाएँ बदली हैं. आय के अनुपात में, उम्र के मुताबिक, काम के हिसाब से, व्यस्तता को देखते हुए. यातायात के साधनों में तकनीकी तरक्की ने भी असर डाला है.
हमारे जैसे मध्यवर्गीय लोगों के लिए पहले हवाई यात्रा विकल्प नहीं थी. अब वह पहला विकल्प बनती जा रही है. यदि निजी काम से जाना हो तब भी एक बार हवाई जहाज़ के टिकट का दाम ज़रूर देख लेते हैं. बहुत ज़्यादा महँगा हुआ तो रेल यात्रा की तरफ आते हैं. हाँ, रात में सोकर जानेवाली यात्रा है तो हवाई यात्रा से बेहतर है रेल यात्रा. मुँह अँधेरे उठकर या देर शाम के घंटे-डेढ़ घंटे के हवाई सफर से अच्छा लगता है कि जाओ ट्रेन में बिस्तर बिछाओ और सो जाओ. अगली सुबह एक नए शहर में हो तो बहुत सुकून मिलता है. जब गाड़ी गंतव्य पर अलस्सुबह न पहुँचे तो हमलोग बड़े स्टेशन का इंतज़ार करते थे जहाँ 10 मिनट गाड़ी रुके और पानी की व्यवस्था हो. ताकि स्टेशन के नल पर जल्दी-जल्दी ब्रश किया जा सके, जिभ्भी की जा सके. जब सूखा नल, गंदा पानी, थूक-खखार दिखता था तो चिढ़ होती थी, मगर शायद आज की तरह उतनी घिन नहीं आती थी. आगे चलकर नागार्जुन की कविता जब पढ़ी तो घिन का समाजशास्त्र अधिक समझ में आया. खैर, स्टेशन पर मुँह धोकर साथ लाए गए खजूर-निमकी खाकर देर सुबह भी कहीं पहुँचना यात्रा को सार्थक कर देता था. दोपहर या शाम को यात्रा करके कहीं पहुँचो तो बासी-बासी लगता है. इसीलिए हवाई यात्रा में भले आराम ज़्यादा हो, मगर ताज़गी कम लगती है.

मुझे बार-बार रामगढ़ या नैनीताल जाते समय काठगोदाम स्टेशन पर उतरना याद आता है. वह भी बाघ एक्सप्रेस से J इतनी ताज़गी रहती है हवा में कि मन खुश हो जाता है. खासकर तब जब आप गर्मीवाली जगह से आए हों और यात्रा का अंतिम पड़ाव आपको उससे निज़ात दिलानेवाला हो तो पूरी यात्रा मुक्तिदायक लगने लगती है. वैसे ही कड़कड़ाती ठंड से गरम बयार की यात्रा तन-मन को उष्णता प्रदान करती है. वाकई यात्रा के दो छोर यदि विपरीत प्रकृति के हों तो भावों का उद्रेक तीव्र होता है.

मौसम ही नहीं, जगह किससे जुड़ी है, यह भी यात्रा को अलग अलग मायने देता है. आप कहीं नौकरी करते हों और वहाँ से घर लौट रहे हों तो यात्रा जितना सुकूनदेह कुछ नहीं. आजीविका कमाने की आपाधापी में यदि आपके कंधे छिल गए हों, देह और दिल पर जख्म हों तो उससे दूर ले जानेवाली किसी भी तरह की यात्रा का आप दिल खोलकर स्वागत करते हैं. मायके से ससुराल और ससुराल से मायके जानेवाली यात्राओं के मूड में तो साफ़ फर्क होता है. लड़की की ससुराल यात्रा है या लड़के की, यह आपको भावमुद्रा, शरीर की मुद्रा से लेकर अर्थमुद्रा खर्च करने के तरीके सबसे झलक जाएगा J दूसरी तरफ अपनी जगह से बाहर निकलनेवाली यात्रा रोमांच, उत्साह, नयापन, चुनौती, उदासी, अकेलापन, मजबूरी हर तरह का भाव लाती है. दरअसल किसी भी तरह की यात्रा के मूल में यात्री का संदर्भ और स्थान से उसका रिश्ता ही यात्री के अनुभवों को गढ़ता है. यात्रा का केंद्र क्या है और केंद्र की ओर या केंद्र से दूर यात्रा हो रही है या आप परिधि में ही चक्कर काट रहे हैं, यह महत्त्वपूर्ण है.

यात्रा को समझना हो तो कौन कहाँ कैसे कब और क्यों का प्रश्न समझना होगा. ऐसा नहीं होता तो मेरे बाबा की हाजीपुर से पटना तक की पैदल यात्रा या नानाजी की शहर के भीतर की साइकिल यात्रा, मेरी बेटी की जर्मनी यात्रा, मेरी मदद करनेवाली जेवंती की सालाना पहाड़ यात्रा या बनारसी की सीतामढ़ी यात्रा, ननदोई की मणिपुर की बस यात्रा और अपने आसपास के लोगों की असंख्य यात्राओं को मैं एक ही तरीके से समझ पाती. जितने अनुभव उतने समझने के औजार होने चाहिए. पंडिता रमाबाई की समुद्री यात्रा पर हुए बवाल को समझने के लिए मुझे 19वीं सदी के महाराष्ट्र के समाज के गठन, उसकी राजनीति से लेकर सुधारकों के व्यक्तित्व और धर्मशास्त्र तक को समझना पड़ा था. इसी तरह अभी रुकैया सखावत हुसैन की कल्पना यात्रा ‘सुल्ताना का सपना’ समझने के लिए तत्कालीन बंगाल, मुसलमान और औरत की दुनिया को जानने के अलावा मैं फैंटेसी के आधार को पकड़ने की जद्दोजहद कर रही हूँ.

समय का सवाल बहुत मायने रखता है यात्रा में - यात्रा कब शुरू हो रही है, उसका मुहूर्त ठीक है या नहीं, उसकी अवधि क्या है, उसकी तैयारी में कितना समय लग रहा है, टुकड़ों में बँट हुई है यात्रा या एक साँस में लगातार चल रही है. घड़ी की सुई पर टकटकी लगी रहती है. समय से गुत्थमगुत्था रहने के कारण ही शायद तनाव पैदा होता है. हर यात्री के चेहरे पर हमें तनाव दिखता है. मेरे जानते असल में समस्या संक्रमण की प्रक्रिया से है. हमें कहीं से कहीं जाने के बीच की प्रक्रिया तनाव देती है. 

यात्रा अपने आप में घटना है और वह घटनापूर्ण हो जाए तब तो क्या बात है ! सहयात्रियों का उसमें बड़ा योगदान होता है. उनकी गप्पें, उनके खर्राटे, उनके कहकहे, उनके अचार का डिब्बा, उनकी रिश्तेदारों से होनेवाली अनबन के किस्से, उनकी राजनीति की दलीलें, सब मिल-मिलाकर यात्रा को या तो रोचक बना देते हैं या झेलाऊ. यों आजकल सहयात्रियों की उदासीनता यात्रा को सुखद बनानेवाली बात मानी जाती है. मुझे तो चुप्पा सहयात्री खलता है. रेल के ए.सी. डिब्बों में, मेट्रो में, हवाई जहाज़ में अधिकतर लोग फोन और लैपटॉप में लगे होते हैं. या अपनी नींद पूरी कर रहे होते हैं. (साधारण डिब्बों में हलचल बची हुई है, यह गनीमत है.) आज मेरे साथ भी ऐसा हुआ. बड़े दिनों बाद दिन भर की रेलयात्रा थी और मैं अपनी थकान मिटा रही थी. लगभग ढाई घंटे सोई मैं. सहयात्रियों का बीच में टोकना-टपकना नहीं हुआ और मुझे वह राहत देनेवाला लगा. लेकिन अब अधूरा अधूरा लग रहा है. चलते समय सामनेवाली सीट की लड़की अपनी माँ को फोन पर झिड़क रही थी कि सारी बात रोमिंग पर ही करोगी क्या, यह मैंने सुना और मुस्कुराई. हल्के से. उस मुस्कुराहट में छटाँक भर विदा लेनेवाला भाव भी छिपा था. बिना किसी से विदा लिए यात्रा ख़त्म कैसे होगी भला !  

रह गई बात दुर्घटना की जो यात्राओं में होती ही रहती है. हाल की रेल दुर्घटना के घाव ताज़ा हैं. जीवन को आगे ले जानेवाली यात्राएँ जीवन लीला की समाप्ति की ओर भी ले जाती हैं. तब भी यात्रा तो रुकती नहीं...


रविवार, 18 सितंबर 2016

घरवाली (Gharwali in Sanskrit)

पोतानेतानपि गृहवति ग्रीष्ममासावसानं
यावन्निर्वाहयतु भवती येन वा केनचिद् वा l 
पश्चादम्भोधरजलपरीपातमासाद्य तुम्बी 
कूष्माण्डी छ प्रभवति तदा भूभुजः के वयं के ? ll


गर्मी के ये दिन बीत जायें बस
बच्चों को सँभाले रहो
ओ घरवाली,
जैसे भी बन पाये, वैसे
फिर आयेगी बरसात गिरेगा पानी
जिसको पाकर फल जायेगी कुम्हड़े और लौकी की बेलें
तब हम क्या
और राजा महाराजा क्या ?


क्षुत्क्षामाः शिशवः शवा इव तनुर्मन्दादरो बान्धवो 
लिप्ता जर्जरकर्करी जतुलवैर्नो मां तथा बाधते l 
गेहिन्या स्फुटितांशुकं घटयितुं कृत्वा सकाकुस्मितं 
कुप्यन्ती प्रतिवेशिनी प्रतिदिनं सूची यथा याचिता ll  


भूख से दुबलाये बच्चे मुर्दों की तरह हो गये हैं
कुछ ही बचे हैं रिश्तेदार
वे भी करते हैं तिरस्कार
जर्जर गगरी लाख से जिसे साधा गया है कितनी ही बार
ये सब नहीं सालते मन को उतना, जितना
घरवाली का फटा वस्त्र सीने को
सूई-धागा लेने पड़ोस में जाना
पड़ोसिन का मुँह बिचकाना, कुढ़ना, मुस्काना


कवि - अज्ञात 
मूलतः विद्याकर के सुभाषितरत्नकोश से संकलित (संपादन दामोदर धर्मानंद कौसांबी) 
पुस्तक - संस्कृत कविता में लोकजीवन 
चयन और अनुवाद - डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी 
प्रकाशन - यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 2010

रविवार, 14 अगस्त 2016

घर जाना है (Ghar jana hai by Purwa Bharadwaj)

मुझे घर जाना है। यह कहते ही सवाल कौंधता है कि मैं किसे घर कह रही हूँ। क्या मायके की बात कर रही हूँ ? या ससुराल की ? या अपने घर यानी शादी के बाद बने अपने नीड़ की ? दोनों-तीनों घरों को अलग करनेवाला कारक क्या है ? क्या 'अपना' शब्द ?

मुझे नहीं पता। पता करना भी नहीं चाहती हूँ। मेरे लिए घर घर है। उसमें कोई विशेषण या qualifier लगाने की ज़रूरत मुझे नहीं है। दुनिया को होगी क्योंकि दुनिया को बहू-बेटी और पत्नी की भूमिका को अलग अलग करना है। जेंडर आदि के मुद्दे पर काम करते हुए मैंने अपने मन को टटोलने की कोशिश की है कि मैं खुद कितना ढाँचे में फँसी हुई हूँ। ढाँचे से पूरी तरह मुक्त होना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन ढाँचे में पैवस्त भाषा को लेकर थोड़ी सावधानी बढ़ी है मेरी।

जब माँ और मोहल्ले की कई चाचियाँ गोधन के समय सामा-चकवा के गीत पर रोने लगती थीं तब मुझे ठीक-ठीक समझ में नहीं आता था कि क्या हो रहा है। ब्याहता औरतों से सुनती थी कि घर छूटने यानी मायका छूटने की तकलीफ फूटती है। असल रहता था कि मायके को फिर से घर न कह पाना। अब भले उस तकलीफ को बेहतर समझने लगी हूँ, लेकिन मायका घर का पर्याय क्यों नहीं रह जाता है ? वह तकलीफ उनके लिए और बढ़ जाती है जब शादी के बाद का घर भी आजीवन घर नहीं हो पाता है।

जहाँ तक घर को परिभाषित करनेवाले सुकून का सवाल है वह मुझे बहुत जगह मिलता है। जब सास-ससुर के पास सीवान जाती थी तो भी और जब जेठ-जेठानी के पास चंडीगढ़ जाती थी तो भी इत्मीनान से रम जाती थी। कभी-कभी दोस्तों के घर भी और पास-पड़ोस में भी मैं ज़्यादा 'at home' महसूस करती हूँ। होटल या सफर ने कभी मेरी नींद नहीं चुराई। जब लोग कहा करते हैं कि नई जगह उन्हें नींद नहीं आती तो मुझे हैरानी होती है। मैं बहुत जगह घरवाला अहसास रखती हूँ, फिर भी घर याद आता है।

हमारी तरफ एक और शब्द है डेरा। उसमें एक अस्थायीपन की बू है। मानो तंबू फिलहाल गड़ा हो और कभी भी उखड़ जा सकता है। माँ अक्सर हमारे पुराने घर को रानीघाट वाला डेरा कहकर याद करती है। वह उसके लिए बिलखती है और मैं उस डेरा शब्द में छुपे हुए अर्थ को समझने की कोशिश करती हूँ। यह डेरा कोई विद्यार्थियों के लिए किराये पर लिए गए मकान के लिए नहीं प्रयुक्त है और न ही डेरा सच्चा सौदा जैसे पंथ के लिए है, बल्कि घर के लिए है। ईंट-गारे से बने घर के लिए नहीं, अनुभवों से बने घर के लिए। इसीलिए जब माँ बोलती है तो मुझे घर करीब सुनाई पड़ता है और जब पापा बोलते हैं तो मुझे थोड़ी दूरी सुनाई पड़ती है।

घर के लिए स्थायी या अस्थायी होना बड़ा सवाल है। अमीर-गरीब, सवर्ण-अवर्ण, प्रवासी-आप्रवासी आदि कोटियों की पहचान में भी शायद घर के इस गुण की भूमिका रहती है।अस्थायी घर इंसान को और अधिक vulnerable बना देता है। जीवन में स्थायित्व की तलाश स्थायी घर की तलाश से शुरू होती है। घर मिल जाए तो लगता है कि सबसे बड़ा मसला हल हो गया। उस समय घर का ढाँचा असल मायने रखता है, घर के भीतर क्या होता है वह गौण हो जाता है। आश्रय देनेवाले के रूप में घर की परिभाषा सबसे ऊपर रहती है।

घर का गुण घर में रहनेवालों को परिभाषित करता है। कितना अजीब है न ? छोटा घर-बड़ा घर, खुला घर-दमघोंटू घर, लोगों से भरा घर-लोग विहीन घर, दोमंजिला-चरमंजिला घर - सब हाड़-मांस के इंसान के रिश्तों, उसकी आदतों, उसकी सोच, उसके स्वभाव और यहाँ तक कि उसकी आवाज़ तक को गढ़ता है। मैं अभी तक जितने तरह के घरों में रही हूँ उन सबने मुझको इस हद तक प्रभावित किया है कि मुझे कभी-कभी आर्किटेक्चर पढ़ने की ज़बरदस्त इच्छा होती है। वास्तु को जानने के लिए नहीं, बल्कि घर की बनावट से टकराते मानवीय गढ़न को समझने के लिए।

मुझे घर से जुड़े मुहावरों में दिलचस्पी है। घर बनाना, घर जमाना, घर टूटना, घर तोड़ना, घर लौटना या और भी। सबके केंद्र में औरत को रखा जाता है। घर को घर बनानेवाली भी औरत को कहा जाता है क्योंकि उसी की मांस-मज्जा पर वह टिका होता है। ऐसा नहीं है कि पुरुषों का खून-पसीना घर की नींव में नहीं जाता है। जाता है, भरपूर जाता है, लेकिन उसकी प्रकृति भिन्न होती है। मैंने अपने कई पुरुष मित्रों को घर के लिए तड़पते देखा है, फिर भी तड़प तड़प में भिन्नता होती है।

भैया जब भभुआ या सीवान या गैंगटॉक या हैदराबाद से भागा-भागा पटना आता है तो उसका घर आना सनी टावर्स या राजप्रिया अपार्टमेंट या मीठापुर में बँटा नहीं होता है। उसका अखंडित घर है उसका शहर, अपना शहर। मतलब दूरी घर के अर्थ का विस्तार कर देती है। तभी शायद लंदन और यॉर्क की यात्रा के बाद दिल्ली एयरपोर्ट पर ही हमें घर का अहसास होने लगा था।

हमारा घर आना कितना अलग है ! 'घरवापसी' शब्द का हश्र देखिए। हिंदूवादी लोगों ने उस घर को कितना हिंसक बना दिया है ! वैसे घर हिंसामुक्त होता नहीं है। घर को केवल रूमानियत से नहीं देखा जा सकता है। घर के भीतर साल दर साल हिंसा होती रहती है और किसी को भनक तक नहीं लगती। यदि घर का झगड़ा जगजाहिर हो जाए तो बुरा माना जाता है कि घर का मामला बाहर क्यों आ गया।

यह जो सीमा रेखा है घर के अंदर और बाहर की, वह बड़ी अनुल्लंघनीय है। लक्ष्मण रेखा का महत्त्व हमें पता ही है। यह घर जैसी संस्थाओं पर भी लागू होता है। हाल में जगमती सांगवान प्रसंग में बहस इसी को लेकर थी। घर का मामला सलटाने के लिए साम दाम दंड भेद - कुछ भी अपना लो चलेगा, बस सार्वजनिक होने से रोक लो। आज से तकरीबन 14 साल पहले एक नामी गिरामी प्रगतिशील स्कूल में जब बाल यौन शोषण की घटना हुई थी तो तब प्रबुद्धअभिभावकों ने यही कहा था कि घर (मतलब स्कूल) के अंदर ही बात रहनी चाहिए और पुलिस में जाने की ज़रूरत क्या है। मैं हैरान हुई थी कि जिस अधिकार को लड़कर हासिल किया है, उसे केवल घर की झूठी प्रतिष्ठा बचाने के नाम पर क्यों जाने दें !

बाद में घर की इज़्ज़त के बहुआयामी अर्थ स्पष्ट हुए। चारों तरफ हो रही 'ऑनर किलिंग' से लेकर मुख्तार माई का मामला और सैंकड़ों आत्महत्याओं का कारण समझ में आया। यह महज़ निजी और सार्वजनिक का झगड़ा नहीं है, बल्कि नियंत्रण और ताकत का झगड़ा है। किसका कायदा, किसका फैसला घर में चलेगा, किसको चुनने की आज़ादी है और किसको नहीं - इन सब से घर की नियति तय होती है।

किसी को घर मुहैया कराना कितना बड़ा दायित्व है, यह यदि देखना हो तो मुज़फ्फरनगर जाइए। अभी वहाँ एक कोशिश चल रही है पुनर्वास की। घर से बेदखल कर दिए गए लोगों को नए सिरे से जमाने की। इस उम्मीद में कि नया घर न केवल सर पर छत दे, बल्कि अपने बृहत्तर रिश्तों पर यकीन वापस आए। आस-पड़ोस आबाद हो, ज़िंदगी पटरी पर लौटे।

घर की चौहद्दी  तय करना और दूसरी चीज़ों से उसे विशिष्ट बताना हम सबकी आदत में शुमार है। मैं कभी-कभी बेटी पर गुस्सा होती हूँ तो कहती हूँ कि घर को होटल न समझो कि केवल खाना-पीना और सोने से मतलब हो। उस क्षण मैं उसकी गर्माहट की आकांक्षी होती हूँ। चाहती हूँ कि घर में वह उसी तरह चहके, गपशप करे या झगड़ा ही करे जैसे पहले करती थी। निर्लिप्त न रहे। घर के लोग ही क्यों, मेहमान भी हो तो खुलकर रहे।  बार-बार दुहराते रहते हैं हम कि 'घर समझिए इसको' जहाँ कष्ट है, फिर भी मिठास है।

क्या कहने भर से घर घर हो जाता है ! नहीं, उसके लिए अनवरत लगे रहना पड़ता है। घरवालों का मूड सँभालो, उनकी सुविधा का ख़याल करो। घर में जिसकी भी आमद-रफ़्त हो उसे देखो। काम में मदद करनेवाली का सूजा हुआ मुँह भी घर को बोझिल बना देता है तो माली की बेरुखी आपको खिन्न कर देती है। चंद घंटों के लिए आनेवाला इलेक्ट्रिशियन भी खुशमिजाज़ हो तो घर का माहौल हल्का हो जाता है। मतलब घर को हरचंद खुशगवार बनाने की कोशिश में लगे रहना पड़ता है। इसमें कभी-कभी इतनी थकान होती है कि मुझे घर काटने लगता है।

कुछ-कुछ सालों के अंतराल पर मन करता है घर से भाग जाऊँ। एकाध बार भागी भी, मगर रिठाला (मेट्रो से पहुँचनेवाला एक छोर) से लौट आई या मूलचंद के इलाके से लौटा ली गई। लौटते समय अपने पर हँसी आई और घर से भागना मुहावरेदार बन कर रह गया। याद आया कि माँ एक बार गुस्सा होकर घर से निकली और नानी के घर चली गई। शाम ढलते ही मामू ने कहा कि चलिए बड़की दीदी, आपको मोटरसाइकिल से घर छोड़ दूँ। माँ ने घर लौटकर कोफ़्त के साथ कहा कि अजीब हालत है, घर से भागना चाहो तो भी घूम-फिरकर वहीं पहुँचा दिया जाता है। खुशकिस्मती कहूँ या जो भी नाम दूँ, हमदोनों घर से उतने बेज़ार नहीं हुए थे कि घर लौटना बुरा लगा हो।

मगर उनकी सोचिए जिनकी साँस घर में दम तोड़ती हो ! उनके लिए घर से भागना जीने का एकमात्र उपाय रह जाता है। लट्ठ लेकर दुनिया पीछे पड़ जाती है कि बच्चू घर से निजात नहीं है और बहुतों को पकड़-धकड़ कर घर वापस ले आया जाता है। घर से भागी हुई लड़कियाँ कवि की कविता का विषय भर नहीं बनती हैं, आम चर्चा का विषय बन जाती हैं और वह उनके लिए मारक होता है। लड़के भी भागते हैं और सब मायानगरी का रुख नहीं करते हैं। कोई फुटपाथ पर रात बिताता है तो कोई रेलगाड़ी में।

खतरे के बावजूद घर छोड़ा जा सकता है। नया घर ढूँढा या बसाया जा सकता है। बेघर होना बेचारगी ही नहीं है, वह आपकी राजनीति भी हो सकती है।  इरोम शर्मिला का घर अभी कहाँ है ? आप अपने को निष्कवच बना दीजिए और तब परवाज़ भरिए।

लेकिन मैं कहाँ से कहाँ चली गई ? फिलहाल मुझे तो घर जाना था, लेकिन एक घर से दूसरे घर जाना कितना मुश्किल हो जाता है ! कौन पहला है, कौन प्राथमिक है, कौन तय करेगा यह - इसी सब में समय निकलता जाता है।