Translate

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

सिटकिनी (By Purwa Bharadwaj)

पिछले काफी दिनों से मेरे कई कमरों की सिटकिनी खराब थी. हर बार मुझे झल्लाहट से भर देनेवाली यह सिटकिनी कितनी मामूली है, लेकिन कितनी अहम !

मामूली इसलिए कि दिन भर में कई दफा इस्तेमाल होने के बावजूद मैं क्या, ज़्यादातर लोग इसे याद नहीं रखते हैं. महीनों बीत जाने के बाद भी उसके मरम्मत का ध्यान ही नहीं रहता है. जब तक कि वह सचमुच पीड़ा देने न लगे. कहने का मतलब कि भौतिक अर्थ में जब सिटकिनी से चोट लगने लगे या हाथ छिल जाए या किवाड़ बंद न हो पाए तब उस पीड़ा का बोध हमें तवज्जो देने के लिए मजबूर करता है.

सिटकिनी जानते हैं न आप ? वही ...जिसे लोग सिटकनी, चटखनी, चिटखनी, चिटखिनी, चिटकनी या चिटकिनी कहते हैं. दरवाज़ों को प्रायः अन्दर से बंद करने के लिए एक कुंडी समझिए. प्रायः लोहे, पीतल जैसी धातु से यह बनती है. वैसे इस प्लास्टिक युग में प्लास्टिक की सिटकिनी भी खूब मिलती है. आप ऐश्वर्यशाली हों तो अपने घर के दरवाज़ों में चाँदी-सोने की सिटकिनी भी लगा सकते हैं. और कुछ नहीं तो भगवान के मंदिर के पट की सिटकिनी चाँदी-सोने की बनवा ही लीजिए. आखिर सिटकिनी किस चीज़ की बनी होगी यह लोगों की औकात के हिसाब से होता है. भाव के हिसाब से भी ! भक्ति मापने के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे सहित अनेकानेक पूजा स्थलों की सिटकिनियों का सर्वेक्षण किया जा सकता है.

खैर, हम मध्यमवर्गीय लोग तो अपनी लोहे की सिटकिनी से ही जूझते रहते हैं. जिनमें अक्सर ज़ंग लग जाता है. हवा की नमी से. अटकते-झटकते वह काम करती रहती है और एक दिन पैर रोप देती है. कहती है, जा, अब न चलूँगी. उससे शुरू होता है खीझना, कोसना और बड़बड़ाना. उस नन्हीं सी जान को हम बख्शते नहीं. भई, हम आप बेहिस्स हो सकते हैं, अपने चारों तरफ की हवा से निरपेक्ष रह सकते हैं, लेकिन सिटकिनी बेचारी को हवा का संग ज़ंग दे गया तो वह क्या करे ! अब आप इसे राजनीति मत कहिएगा.

शब्दकोश ने बतलाया कि चटकना या चटखना अरबी भाषा की क्रिया है. इसके मूल में हल्की सी 'चट' की आवाज़ का होना है. कलियों के या शीशे के चटकने के संदर्भ में इसका इस्तेमाल आम है. वही आवाज़ सिटकिनी के दिल में है. जब आवाज़ के साथ सिटकिनी झट से खुल जाती है तो राहत मिलती है. हमें वह आवाज़ चाहिए. मगर न ज़रूरत से ज़्यादा और न ज़रूरत से बहुत कम. अधिक आवाज़ हो तो हमारे परिष्कृत कानों को चुभती है. हम  ऐसी सिटकिनी ढूँढने जाते हैं जो शोर न करे.बाज़ार इसका भरपूर फायदा उठाता है. बेआवाज़ कहकर पीतल की भारी और मँहगी सिटकिनी बिकती है और हम शौक से कम से कम अपने नए घर में उसे ज़रूर लगवाना चाहते हैं. मगर जो आवाज़ पर टिकी हो वो भला एकदम बेआवाज़ कैसे होगी ! कायांतरण क्या इस हद तक होता है !

फैशन की वबा छोड़ दें तो अमूमन सिटकिनी लंबी होती है. कहना चाहिए नीचे से ऊपर लंबाई में लगाई जाती है. उसकी दिशा तय होती है. मगर हम ठहरे इंसान जिसे हर चीज़ की दिशा को मोड़ने और बदलने का शौक है. हम कभी कभी उस सिटकिनी को लिटा देते हैं, कभी आड़ा-तिरछा कर देते हैं तो कभी अंदर के बजाय बाहर से लगा देते हैं. वह है बेजान, इसलिए इंसान को झटका भले दे, हल्की चोट लगा दे, पर मुख़ालफ़त नहीं करती. उसके आकार-प्रकार में प्रयोग किया जाता है तब भी सिटकिनी चुपचाप अपना काम करती है. आप सबने गौर किया होगा कि हम सिटकिनी की चौड़ाई कम, लंबाई घटाते-बढ़ाते रहते हैं. ख़ूबसूरती के नाम पर और ज़रूरत के नाम पर. हाथ भर लंबी सिटकिनी देखने में भव्य मालूम होती है और छुटकू सी सिटकिनी प्यारी लगती है.

इसकी अहमियत की गवाही किस किस से लूँ ? और लूँ भी क्यों ? जो छोटा है, नज़र में रहकर भी नज़र नहीं आता, उसका वजूद क्या दूसरों पर निर्भर है ! नहीं, हरगिज़ नहीं. हर वो शै जो है वह अपना अस्तित्व रखती है. हम आप उसका इस्तेमाल करें और भूल जाएँ, यह हमारी फ़ितरत बताता है, उसकी नहीं. सिटकिनी है बस...ख़ामोश, मगर सक्रिय.

सिटकिनी रुकावट है, इससे लोग वाकिफ़ हैं. और रुकावट हमें चाहिए - अपने लिए, दूसरों के लिए कम.यह हमें निजता देता है. शर्मो हया की आड़ देता है. एक कमरे से ही नहीं, कभी कभी एक पूरी दुनिया से हमें परे ले जाता है. इसलिए जब बेबात और विरोध में किसी दरवाज़े या खिड़की की सिटकिनी मुँह पर बंद कर दी जाती है तो हमें सहसा महसूस होता है कि कोई है. सिटकिनी सत्ता को दिखा देती है, नियंत्रण की चाभी बन जाती है.

यानी सिटकिनी लोगों की मौजूदगी का अहसास कराती है. उसे खोलने और बंद करनेवाला कोई फ़र्द होता है. हाड़-मांस से बना. मलकूती मख़लूक नहीं, ज़मीनी इंसान. यह अलग बात है कि करतब करना सिखा देने पर जानवर भी सिटकिनी चला ले, मगर है वह इंसानी मतलब की चीज़.

सबसे बड़ी बात यह कि सिटकिनी हिफ़ाज़त करती है. बेपर्दगी से बचाती है. उसकी तीव्रता तय होती है इससे कि वह किसके घर की है या किस दरवाज़े की है. गुसलखाने की सिटकिनी हुई तो उसका वज़न बढ़ जाता है.   गुसलखाने के अंदर हसीना हुई तो उस सिटकिनी पर इज़्ज़त की रक्षा का दारोमदार रहता है. केवल उस जान की रक्षा नहीं, पूरे कुनबे की प्रतिष्ठा की रक्षा का भार रहता है. आज ही दफ़्तर का बाथरूम चर्चा में था. उसकी सिटकिनी घायल कर रही थी लोगों को और उसके अलावा दरवाज़ा जाम कर दे रही थी. फ़ौरी उपाय निकला कि सिटकिनी को फिलहाल काम में न लाया जाए और थोड़ा बरसात के मौसम में उसके नखरे सह लिया जाए. नतीजा दफ़्तर के कई लोग पहरेदारी कर रहे थे. एक सिटकिनी ने लोगों को खुद बखुद सिटकिनी में बदल दिया था. सतर्क, चुस्त और ऐलान करनेवाला.





बुधवार, 5 जुलाई 2017

हिंदी में काम (By Purwa Bharadwaj)

हिंदी में काम करती हूँ तो अक्सर अंग्रेज़ी से भी टकराना ही पड़ता है. लैपटॉप पर काम करने और 24 घंटे उपलब्ध इंटरनेट की सुविधा ने गूगल से भी ख़ासा परिचय करा दिया है. फिर भी गूगल पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहने की सतर्कता बरतती हूँ. हाँ, राह दिखाने के लिए गूगल की उपयोगिता से इनकार नहीं है.

अभी मैंने आत्महत्या गूगल पर टाइप किया तो सबसे पहले आया आत्महत्या करने के आसान तरीके, आत्महत्या के सरल उपाय, दर्दरहित आत्महत्या आदि. अलबत्ता उनके लिंक खोलो तो दार्शनिक तरीके से जीवन की सकारात्मकता पर उपदेश और निर्देश मिला. वहीं Sucide टाइप किया तो सीधा एक नंबर दिखा. एक हेल्पलाइन नंबर. मुंबई के आसरा हेल्पलाइन का जो अकेलेपन, उदासी और आत्महत्या का ख़याल आने जैसे संकट की घड़ी में व्यक्ति से बात करने को हर वक्त तैयार है. वह कितना कारगर है, यह अलग मसला है. या ऐसी मनोदशा में कोई मदद माँगने के लिए इंटरनेट का सहारा लेगा या नहीं और यदि हाँ तो वह किस तबके का, किस नगर-ग्राम का होगा, इसका विवेचन मुझे नहीं करना है. ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर किसी तरह की अटकलबाज़ी मुझे नहीं करनी है. मेरा ध्यान गया कि भाषा की खाई कितनी बड़ी है.

रविवार, 2 जुलाई 2017

पहचानना (Pehchanana by Purwa Bharadwaj)

कितना साधारण सा शब्द है पहचानना। बहुप्रयुक्त भी। उठते-बैठते यह हमारी ज़बान से ऐसे निकलता है जैसे अनायास हो जानेवाली क्रिया हो। लेकिन ऐसा है क्या ?

नहीं है। लोग यह जानते हैं कि पहचानना मुश्किल होता है। यह एक ऐसी क्रिया है जिसमें अक्सर लोग विफल होते हैं, जिसके लिए उन्हें लगभग पूरा जीवन खपा देना पड़ता है। यह आता है अभ्यास से या कहना चाहिए विफलता से सबक सीखने के बाद। यहाँ मुझे मीडिया में लंबे समय से काम कर रहे अपने एक दोस्त राकेश शुक्ला की बात याद आ गई। मेरे दोस्त ने बड़ी अच्छी बात कही थी कि अच्छा निर्णय आता है अनुभव से और अनुभव आता है बुरे निर्णय लेने के कारण हासिल विफलता से। 

रविवार, 18 जून 2017

फालतूपन (Redundancy by Purwa Bharadwaj)


रोजाना लगभग 50 किलोमीटर का सफ़र तय करते समय मेरा पसंदीदा काम है अपने दोस्तों को sms करना और उसके जरिए तार जोड़े रखना. चूँकि राह चलते शोर काफी रहता है, इसलिए फोन पर प्रायः बात नहीं करती हूँ. sms को बेहतर पाती हूँ कि अपनी कह दो और दूसरे को तत्काल परेशान भी न होना पड़े. हालाँकि उसमें भी तुरत जवाब पाने की उम्मीद रहती है और उत्साह बढ़ जाता है जब लगातार कुछ देर तक आदान-प्रदान चलता रहता है.

बुधवार, 31 मई 2017

आपबीती : JNU जैसी छवि और दिल्ली पुलिस ('JNU' type image and Delhi Police by Purwa Bharadwaj and Rizwana Fatima)



तारीख 26 मई, 2017. समय सुबह 11.30 बजे. जगह नई दिल्ली का केन्द्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन. यानी देश की राजधानी के राजपथ के करीब का इलाका. मामला नागरिक गरिमा का हनन, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का. मुज़रिम दिल्ली पुलिस.

हम तीन लोगों – रिज़वाना फ़ातिमा, वंदना राग और पूर्वा भारद्वाज को गाँधी पर शोध के सिलसिले में एक संस्थान में जाना था. हमारा छोटा सा समूह है रसचक्र. हमने उसके माध्यम से अलग अलग किस्म की रचनाओं की प्रस्तुति शुरू की है. रसचक्र की अगली प्रस्तुति गाँधी पर करने की योजना है. उसी सिलसिले में आपस में तय हुआ था कि आधी दूरी मेट्रो से नापेंगे और बाकी गाड़ी से. दिल्ली विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर हम दो लोग - रिज़वाना फ़ातिमा और पूर्वा भारद्वाज मिले.

शनिवार, 13 मई 2017

माँ के नाम (Mother's day by Purwa Bharadwaj)

आज सब माँ को याद कर रहे हैं. Ritual कहें या फैशन या भावना का सार्वजनिक प्रकटीकरण या भीड़ में शामिल होना कहें या प्रदर्शन - जो हो लेकिन माँ के साथ की तस्वीर खोज रही थी. मैंने महसूस किया कि बहुत कम तस्वीरें हैं. क्यों ?


पहले चलन नहीं था और मेरे बचपन में फोकस बच्चों की फोटो खिंचवाने या 'पेयर' फोटो खिंचवाने पर था. कभी कभी पूरे परिवार की फोटो शादी-ब्याह, होली-दिवाली या ईद-बकरीद, पिकनिक, मेला-ठेला, पूजा, तीर्थाटन, देश-विदेश भ्रमण, (हमारे संदर्भ में) सभा-सेमिनार वगैरह के मौके की मिल जाती थी. साधन संपन्न होना इस शौक और इच्छा से जुड़ा हुआ था और अभी भी है. बाद के दिनों में मैंने याद करके माँ के साथ कुछ तस्वीरें खिंचवाई हैं. शादी के पहले की तस्वीरें इक्का-दुक्का ही हैं. उनमें से एक यह कॉलेज के दिनों की है. साथ तो साथ है और उसकी खुशी छलकनी चाहिए !

रविवार, 23 अप्रैल 2017

पंडिता रमाबाई सरस्वती 23.4.1858-5.4.1922 ( Pandita Ramabai Saraswati By Purwa Bharadwaj)


रमाबाई की जीवन-यात्रा विलक्षण रही है. इसका बीज तभी पड़ गया था जब महाराष्ट्र के सबसे ऊँचे माने जानेवाले कोंकणस्थ चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे ने समाज की प्रताड़ना की परवाह नहीं करके अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई को संस्कृत पढ़ाना शुरू किया था. उनके इस कदम के खिलाफ उडिपी में धर्मसभा हुई थी. उसमें लगभग चार सौ विद्वानों की मौजूदगी में उन्होंने साबित कर दिया था कि स्त्रियों को संस्कृत की शिक्षा देना धर्मविरुद्ध नहीं है, लोकविरुद्ध भले हो. फिर उन दोनों ने मिलकर गंगामूल प्रदेश में एक संस्कृत केंद्र स्थापित किया - कोलाहल से दूर पश्चिमी घाट की चोटी पर स्थित जंगल में. वहीं रमाबाई का जन्म हुआ था. उनकी एक बड़ी बहन थी कृष्णाबाई और बड़ा भाई था श्रीनिवास.