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सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

सन्नाटा (Sannata by Purwa Bharadwaj)

अभी शब्दकोश लेकर बैठी हूँ. सन्नाटा की व्युत्पत्ति क्या है, यह शब्द कैसे बना है - जानना चाहती हूँ. मूल में क्या है और प्रत्यय क्या है?

इसे सुनते ही निस्तब्धता, नीरवता का बोध तो तुरत होता है, लेकिन क्या यह सबसे पहले किसी के अभाव का सूचक है ? जहाँ हरकत न हो, कोई स्वर न हो, कोई चेष्टा न हो, वही है सन्नाटा. यह भयावह स्थिति है और शायद इसलिए सन्नाटा पसरने से घबराहट होती है. अब चाहे दादरी में सन्नाटा हो या दिल्ली में ! 

इस हिसाब से सन्नाटा कब, क्यों और कहाँ छाता है, यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है. मुझे याद है 31 मार्च, 1997 का अगला दिन जब सीवान की सड़कों पर चंद्रशेखर को लेकर जुलूस जा रहा था. तब पूरे शहर में सन्नाटा छाया था. बीच-बीच में कुछ नारे उसे तोड़ते थे, मगर गूँज रहा था सन्नाटा.

मतलब साफ़ है कि सन्नाटे का कारण होता है. कोई ऐसा वैसा नहीं, बल्कि ज़बरदस्त कारण. चाहे वह घर के भीतर का सन्नाटा हो या इंसान के भीतर का या कौम के भीतर का.

सन्नाटे के कारण को खोजने से लोग परहेज़ करते हैं. उनको लगता है कि तब उँगली उठने लगेगी ताकतवर की ओर या तब जो सत्ता में है उसकी शिनाख्त की जाएगी. इससे दिक्कत होती है. खतरा रहता है कि उँगली कभी कहीं आपकी तरफ भी न उठ जाए. इसलिए बेहतर है कि सन्नाटे की कद्र की जाए. हो सके तो उसकी गुरुता, उसकी महिमा का बखान करने में हम सब शामिल हो जाएँ.

हिंसा से सन्नाटे का तार जुड़ता है. वह खुशनुमा की आँखों के सन्नाटे में दिखता है. जी हाँ, वही खुशनुमा जो नोमान की बहन है ! हिमाचल प्रदेश की रहनेवाली खुशनुमा जिसके भाई को लोगों ने गोरक्षा के नाम पर पीट पीटकर मार डाला था. या इरोम शर्मिला की आँखों पर गौर कीजिए ! आपको वहाँ भी सन्नाटा दिखेगा.

सन्नाटा जुड़ जाता है सूनेपन से, रिक्तता से. जब व्यक्ति विशेष के दायरे से निकलकर यह गलियों, चौराहों और शहरों में फैल जाता है तब कैसा लगता है, याद कीजिए. कर्फ्यू का दृश्य भी हो सकता है !

सच पूछिए तो सन्नाटा खतरनाक होता है. इससे डरना चाहिए. इसमें आवाजाही करने की मनाही रहती है. उसका पालन किया जाना चाहिए. यदि नहीं तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहिए. मुंबई के शक्ति मिल में जाने का दुस्साहस करनेवाली पत्रकार की ‘दुर्दशा’ आखिर इसीलिए हुई न कि उसने सन्नाटे में जाने का खतरा मोल लिया था !

इससे यह पता चलता है कि सन्नाटा सबके लिए एक सा नहीं होता है. किसी के लिए यह फायदेमंद भी हो सकता है. खासकर अपराध के लिए यह माकूल माहौल प्रस्तुत करता है. मानते हैं कि भूत-प्रेत-जिन्न वगैरह भी इसी में सक्रिय होते हैं.

लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि सन्नाटे का लाभ हमेशा बुरे या असामाजिक तत्त्व ही उठाएँ. नज़र बचाकर मनमर्ज़ी करने का मौका भी यह देता है. किसी को घर से भागने का तो किसी को घर लौटने का !

जो भी हो लोगों की नज़र में रहता है सन्नाटा. वे लगातार इस पर सोचते हैं, बात करते हैं. उसे परिभाषित करने की कोशिश करते हैं. अभी मुझे मुक्तिबोध याद आ रहे हैं. वही क्यों, ब्रेख्त, महमूद दरवेश और अनगिनत रचनाकार याद आ रहे हैं. चित्रकार याद आ रहे हैं जो सन्नाटे को अलग अलग रंग देते हैं और अलग अलग रेखाओं व आकृतियों से उसे घेरने का प्रयत्न करते हैं.

मणि कौल की फिल्म भी याद आ रही है जिसके सन्नाटे को देखकर बचपन में हम भाई-बहन घबरा जाते थे. दरअसल यह घबराहट ऊब के कारण होती थी. सन्नाटे से सचमुच ऊब होती है. उसे तोड़ने का मन करता है. कम से कम जब तक हम बच्चे थे हमें सन्नाटा एकदम पसंद नहीं था.

बड़े होते जाने के साथ हम सीखने लगते हैं कि सन्नाटे से नज़र चुराकर निकल जाओ. कहीं और बस जाओ ताकि उससे छुटकारा मिल जाए. हम शोरगुल में रहने में इत्मीनान महसूस करते हैं. हम सोचते हैं कि हमारे आसपास सन्नाटा नहीं है तो इसका मतलब है कि सबकुछ सामान्य है. हमें क्या, सबको लगता है कि सन्नाटे में हमारी हिस्सेदारी नहीं है, इसलिए इससे बचना मुमकिन है.

धीरे-धीरे यह अहसास होता है कि सन्नाटा मारक होता है. एक बिंदु आता है जब यह स्थिति असह्य होने लगती है. हमें दूसरी जगह पर छानेवाला सन्नाटा भी खलने लगता है. हम चाहने लगते हैं कि सन्नाटा टूटे, कोई न कोई चीखे. कोई न कोई प्रतिरोध करे.

फिर भी न चाहते हुए भी ज़्यादातर बार सन्नाटा लंबा खिंच जाता है. कभी कभी तो साल क्या, शताब्दियाँ गुज़र जाती हैं. बहुत सी बातें ऐसी हैं, बहुत से पहलू ऐसे हैं कि अभी तक उन पर सन्नाटा छाया हुआ है. उनकी निशानदेही ही नहीं हुई है तो भला सन्नाटा टूटेगा कैसे

अहम सवाल होता है कि पहल कौन करेगा. सन्नाटे में पहला पत्थर कौन उठाएगा ? अंकुर फिल्म का अंतिम दृश्य याद आता है. जब एक बच्चा पत्थर फेंकता है तो अधिकांश (कम से कम सुधी दर्शकों में से 60%) राहत महसूस करते हैं. उनको लगता है कि उनका प्रतिनिधित्व हो गया. वे तब आराम से घर लौटकर अपने अपने सन्नाटे से आँख चुरा लेते हैं.

सबसे अधिक सुविधाजनक है कि खूब शोर करो. इतना चिल्ल पों मचाओ कि सन्नाटे का पता ही न चले. कोई उसको सूँघ न ले, किसी के दिल में उसका अहसास न हो. 

जिनको सन्नाटा चुभता है, वे दरअसल खतरनाक लोग होते हैं. वे राजनीतिक होते हैं. वे किसी न किसी साजिश की टोह लेते रहते हैं. या कहिए कि वे दिग्भ्रमित लोग हैं. उनकी स्मृति ख़राब होती है क्योंकि वे बहुत पहले की बात याद रखते हैं और एक एक सन्नाटे की कड़ी जोड़ते चलते हैं.

सन्नाटे का जाल होता है. मकड़ी के जाल की तरह उसकी बनावट पारदर्शी होती है. उसी की तरह वह अक्सर आँखों से ओझल होता है. वह जाल भँवर की तरह दबोचता है और अपने में गर्क कर लेता है. उसमें कुछ खुद फँसते हैं, कुछ फँसा दिया जाते हैं. कुछ को इसका बोध होता है और कुछ अपनी अबोधावस्था को चरम सुख मानते हैं.

एक सवाल यह भी है कि चुप्पी और खामोशी अर्थ लेने पर क्या सन्नाटे का वही अर्थ द्योतित होता है ? शायद नहीं.   


शनिवार, 4 जुलाई 2015

दोपहर (Dopahar by Purwa Bharadwaj)

आज की दोपहर अनमनी सी बैठी थी तो मनमाफ़िक का ध्यान आया. अरे, मैं हूँ कहाँ ? तीन साल गुज़र गए, 19 जून की तारीख भी बीत गई और मुझे ध्यान नहीं आया कि मनमाफ़िक की सालगिरह थी. 19 जून, 2012 को ऐसी ही एक दोपहर थी जब मैंने मनमाफ़िक शुरू किया था.

दोपहर अक्सर अकेलापन और खालीपन लेकर आती है. उस दिन भी मैं अकेली थी. कविताओं और कहा जाए तो साहित्य की दुनिया से बढ़ती जा रही दूरी से जो छटपटाहट हो रही थी उसे दूर करने के लिए मैंने सोचा कि मैं अपनी मनपसंद रचनाओं का संकलन तैयार करूँ. उत्साही जीव तो मैं हूँ ही, फिर कोई रुकावट थी नहीं. तकनीकी जानकारी के अभाव ने भी मेरे उत्साह पर पानी नहीं डाला. पसंदीदा कविताओं के बीच से मैंने विजय देव नारायण साही की कविता टाइप कर डाली और उसे ब्लॉग पर डाल दिया. अगले दिन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ थे. लेकिन फिर मुझे अहसास हुआ कि मनमाफ़िक मेरे सिवा किसी को दिख ही नहीं रहा. ऐसे में अपने दोस्त कब्बू से ही पूछा जो बीच-बीच में ब्लॉग को लेकर मेरी जानकारी बढ़ाता रहता था. उसने लैपटॉप लिया और सर्च इंजन की सेटिंग दुरुस्त कर दी. मुझे उसने View और पूरा Stat देखना सिखलाया. उसके बाद मेरे उत्साह में जो इज़ाफा हुआ उसका क्या कहना!

लेकिन आज उत्साह नहीं है. दोपहर भी तो एक सी नहीं होती है. हर दोपहर अलग होती है - भाव में, रंग-रूप में और छोटाई-बड़ाई में भी. ज़रूरी नहीं कि धूप का चटकीलापन या हवा का रुख ही उसे अलग करे. शायद एक को दूसरे से अलग बनाने में मन का भाव ही सबसे अहम भूमिका निभाता है.

मुझे ऐसी अनगिनत दोपहर याद हैं जब पटना कॉलेज के गंगा किनारेवाले वाणिज्य (कॉमर्स) भवन से लेकर बी.ए.लेक्चर थियेटर, लाइब्रेरी और सड़क पार के PBH का हम चक्कर लगाया करते थे. खासकर PBH हमारा अड्डा था जहाँ AISF के साथियों का हर वक्त जमावड़ा रहता था. तब लेफ्ट राइट करते हुए मुझे कभी अहसास नहीं हुआ कि वह अक्सर दोपहर का ही समय हुआ करता था.

माँ ज़रूर गुस्सा होती थी कि खड़ी दोपहर में कहाँ-कहाँ घूमती रहती है लड़की. हँसी आती थी कि खड़ी दोपहर और बैठी दोपहर और सोई दोपहर क्या होता है. भरी दोपहर का मतलब भी तब समझ में नहीं आता था. अब जब हिंसा की खबरें देखती हूँ तो माँ की चिंता समझ में आती है. सुनसान होना दोपहर का एक गुण है और वह खतरनाक माना जाता है. किंचित् रहस्यमय भी. दोपहर में किसी ठूँठ पर बैठे जिन्न-प्रेत के किस्से याद कीजिए या सफ़ेद चादर में लिपटी किसी आकृति को.

मध्याह्न कहने पर सीधा ध्यान जाता है कि यह दिन के बीचो बीच का समय है जब सूरज ठीक हमारे सर पर होता है. बीचो बीच का मतलब मझधार समझिए या यह कि आधा सफ़र कट गया, यह निर्भर करता है आपके नज़रिए पर. सकारात्मक हैं आप तो कहेंगे कि आप मंज़िल की ओर बढ़ते जा रहे हैं, वरना नकारात्मक बंदा इसे ढलान ही मान लेगा. जब जब हेमंत कुमार की आवाज़  में मैं "बस एक चुप सी लगी है" मुखड़े वाला गीत सुनती हूँ तो इन पंक्तियों पर ज़रूर ठहरती हूँ - " सहर भी ये रात भी/ दोपहर भी मिली लेकिन/ हमीं ने शाम चुनी"

जीवन की दोपहर को देखें. यह परीक्षा की घड़ी भी बन जाती है. उसमें उम्मीद की जाती है कि आप तनकर खड़े रहें. उस वक्त इसका रिश्ता उम्र से नहीं रह जाता है. छाँह हो या न हो इस दोपहर से पार पाना होता है. इसका मतलब क्या यह है कि दोपहर जिजीविषा का उत्स है ?

कठिनाई से दोपहर का रिश्ता सीधा है. आप कोई बैठक या धरना-जुलूस या नाटक के रिहर्सल का समय दोपहर रख कर जाँच लीजिए. वह अलग बात है कि दोपहर में भोज-भात हो तो उपस्थिति हो जाती है. दोपहर के भोजनवाले सत्र के ठीक पहले तो सेमिनार में भी संख्या बढ़ने की उम्मीद की जाती है. कई बार लोगों को खींचने के लिए दोपहर के भोजन को चुंबक की तरह इस्तेमाल किया  जाता है. लोगों की यह सोच बच्चों के लिए स्कूलों में दिए जा रहे दोपहरी के भोजन को लेकर भी है. वह कितना उपकरणात्मक  इस्तेमाल है और कितना अधिकार, यह लोग जानते हैं. मानें भले नहीं. हमारे आसपास ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो दोपहरी के भोजन खानेवाले बच्चों के प्रति अपने हिकारत के भाव को छुपाने की ज़हमत भी नहीं उठाते.


इसी से ध्यान आया कि दोपहर एक मापदंड भी है. यदि स्कूल में दोपहर तक बच्चे टिक गए, दफ्तर में साहब और बाबू लोग टिक गए तो मानिए कि सबकुछ बढ़िया चल रहा है. दोपहर बाद तक टिकना तो सफलता की कसौटी पर खरा उतरना है. यह इसका प्रमाण है कि काम की गुणवत्ता अच्छी है. औचक निरीक्षण भी कई बार दोपहर बाद किया जाता है ताकि सच्चाई का पता चले. वह अधिकारी लोग अधीनस्थों का करते हैं. उन अधीनस्थों की सूची बड़ी लंबी होगी और वह कभी कभी मज़ेदार किस्सों से भरपूर हो सकती है ! 

अलग अलग पाली (शिफ्ट) में काम करनेवालों के लिए बहुत बार दोपहर सुबह की तरह होती है यानी दिन की शुरुआत. कुछ ऐसे पेशे भी हैं जहाँ पाली का चक्कर हो या न हो लोग दोपहर में दफ़्तर पहुँचते हैं. जैसे अख़बार या इलेक्ट्रोनिक मीडिया वगैरह में (ज़ोर वगैरह पर है क्योंकि किसी को बदनाम करने का मेरा इरादा नहीं है.) काम करनेवाले बहुत सारे लोग. इसे कहते हैं सुख. वैसे कामकाजियों के बीच आरामतलब लोगों की पहचान घुलमिल जाती है और हम केवल रश्क करते हुए रह जाते हैं !

दोपहर का सुख नींद से बहुत जुड़ा हुआ है. जब सारी रात जगकर कोई नौजवान फिल्म देखे या गप्प मारे और उसे दोपहर तक सोने को मिल जाए तो उससे बढ़कर क्या हो सकता है !  हमें तो उतना नसीब नहीं है, मगर कभी कभार दोपहर की नींद खींचने को ज़रूर मिल जाती है. नींद न सही, इत्मीनान भरी दोपहर तो मिल ही जाती है. उसमें पुराने टीवी धारावाहिक देखो या पड़ोसन से गप्प करो या कागज़ काले करो. ऊब हुई तो साथी बनेंगे फोन या लैपटॉप. 

छुट्टी के संदर्भ में दोपहर का महत्त्व विवाद से परे है. स्कूलों में इस दोपहर की छुट्टी का जितना बेसब्री से इंतज़ार होता है उससे कम दूसरों को नहीं होता है. खाना, खेलना, पेंगे बढ़ाना, फरियाना सबकुछ होता है. फुरसत के इन पलों में छिटपुट काम निपटा लिए जाते हैं. इस तरह सुस्ती लेकर आनेवाली दोपहर आपकी गति भी बढ़ा देती है. माँ कभी बटन टाँकती हुई नज़र आती थी तो कभी कपड़े तह करते हुए. मेरी एक दोस्त कपड़े इस्त्री करने के लिए दोपहर चुनती है तो दूसरी को बेकिंग में नया आजमाने के लिए दोपहर की शांति अच्छी लगती है. घरेलू चिल्ल-पों से तात्कालिक राहत की यह घड़ी शौक पूरा करने के काम आती है. भूले-बिसरे गीत सुनो या पेंटिंग करो या कुछ भी मनमाफ़िक करो !

दोपहर में कौन क्या करता है, इसका सर्वेक्षण कराना चाहिए. है न ? क्योंकि दोपहर का रिश्ता ढूँढने से भी है.

गुरुवार, 28 मई 2015

धुँधलापन (Dhundhalapan by Purwa Bharadwaj)

कभी-कभी मुझे लगता है कि ज़िन्दगी और कुछ नहीं धुँधलापन है और उसको साफ़ करते रहने की जद्दोजहद है. आज फिर कुछ पुरानी तस्वीरें हाथ लग गईं. उनमें से कुछ धुँधली ज़रूर हो गई हैं, लेकिन खुशी है कि याददाश्त धुँधली नहीं हुई है. फिर धुँधलेपन से घबराना क्यों ? यह भी तो द्वैध में, binary में चीज़ों को देखना ही है ! या तो एकदम शीशे की तरह साफ़ हो या एकदम ओट में हो, काला हो या सफ़ेद हो ? रिश्तों में भी हम यही करते हैं. या तो एकदम दिल मिले हुए हों या एकदम दिल से निकाल बाहर फेंको. ऐसा होता तो नहीं है ! बहुत लोग ज़ेहन में, दिलो दिमाग में रहते हैं और वास्तव में वे वहाँ होते नहीं हैं. इसी तरह बहुतों के बारे में यह लगता है कि वे छूट गए हैं या भुला दिए गए हैं, फिर भी वे किसी कोने में दुबके रहते हैं. बहुत लोग उस धुँधली सी जगह में रहते हैं जिससे हम भी बेखबर रहते हैं. कुछ ऐसा ही लगा मुजीब रिजवी साहब के अंतिम संस्कार के समय. 

दिल्ली को गाली देनेवालों की कमी नहीं है और मैंने गाली भले नहीं दी, मगर लंबे समय तक उसको अपनी जगह मानने से भागती रही. पटना को भूल पाना, उसकी मंडली से बिछड़ जाना आसान नहीं था. लेकिन मुजीब साहब जैसे आत्मीय लोगों के व्यवहार से मुझे यह लगने लगा कि दिल्ली उतनी भी बेदिल नहीं जितना लोग कहते हैं. मेरे पापा की उम्र के रहे होंगे मुजीब साहब. अपूर्व ने महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय में उनके साथ दो-तीन साल करीब रहकर काम किया था. जब ईद आई तो पटना में न रहना और चुभने लगा था. दिल्ली की हमारी दूसरी ईद रही होगी जब हम सपरिवार मुजीब साहब के यहाँ गए. मैं चूँकि ताबां साहब की कविताओं की प्रशंसक थी और प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों और सम्मेलन के दौरान उनसे मिल भी चुकी थी, इसलिए मैंने मुजीब साहब को उनके दामाद के रूप में देखा. पहली ही बार में मुझे लग गया कि मेरी ईद तो हो गई. तरह-तरह की सेवइयों से नहीं, मुजीब साहब के दुलार और ख़ुलूस से ! अज़रा जी से मुलाकात हुई, सहबा से भी. मेरी बेटी छत पर जाकर घर के बच्चों के साथ खेलने भी लगी. हमलोग खुश-खुश घर लौटे. त्यौहार में कई साल उनके यहाँ जाते रहे. लेकिन जैसा कि होता है धीरे-धीरे संपर्क छूट गया. कई-कई साल बीत गए और हम ईद में दूसरी जगह जाने लगे. ज़ाकिर नगर की भीड़भाड़ वाली जगह का बहाना हमें दूर करता गया. धुँधलापन तारी होता गया. 

बीच-बीच में मन कचोटता था. ग्लानिवश हम एक-दो बार बिना त्यौहार के भी उधर गए. सुखदेव विहार में पिछले साल दो बार गए थे. एक बार बहुत बीमार थे मुजीब साहब. हमें अपने पर गुस्सा आया कि जिनका स्नेह हम नहीं भूल पाते हैं उनको भी क्यों भुला देते हैं. फिर यह भी लगता था कि उनसे बहुत नज़दीकी तो रही नहीं कभी. अपूर्व काम के सिलसिले में या बैठकों में जहाँ-तहाँ मिल भी लेते थे, मगर मेरा गाहे-बगाहे ही मिलना हुआ था. तब भी ताज्जुब है कि मुजीब साहब बहुत अच्छे लगते थे और अपने लगते थे. बाद के दिनों में महमूद से दो-चार बार उनका हालचाल लिया था, मगर इधर कोई खबर नहीं थी. क्या स्मृति में धुँधलेपन ने जड़ जमा लिया था ? लेकिन यही तो सच्चाई है जीवन की !

मैं भूल गई थी कि कब्रिस्तान में आम तौर पर औरतें नहीं जाती हैं. अली जावेद साहब साथ थे, परंतु वे ठहरे कम्युनिस्ट आदमी ! उन्होंने मुझे टोका नहीं. मैं जामिया की मस्जिद के मैदान में जनाज़े की नमाज़ पढ़नेवालों की कतार से थोड़ी दूर एक पेड़ की छाँह में खड़ी थी. मुजीब साहब दूर में थे, मगर आँखों से ओझल ! ख़ामोशी थी और मुझे मुजीब साहब का ठहाका याद आ रहा था. जल्दी ही पास के कब्रिस्तान की तरफ़ लोग बढ़े. मैं हिचकते हुए वहाँ भी गई. हालाँकि किसी ने मुझे अजीब निगाह से नहीं देखा. मुजीब साहब की जमात थी यानी प्रगतिशीलों की. हिंदीवाले कुछ लोग थे जिनको मैं पहचानती थी. बाकी रिश्तेदार और जामिया के लोग लगे. धीरे-धीरे मिट्टी डालकर लोग छितराने लगे. मेरा मन किया कि मैं भी जाऊँ, लेकिन कैसे जाती ! एक और औरत वहाँ दिखी, मगर कोई रस्म में शरीक होने को कहता तब न ! मैं सोचने लगी कि रस्में मुझे पसंद नहीं हैं, फिर यह इच्छा क्यों हुई ! क्या मेरी 'Politics' में धुँधलापन है ?

श्मशान घाट पर बहुत बार गई हूँ, परंतु कब्रिस्तान में जाने का यह पहला मौका था. अपूर्व को यह जानकार हैरानी हुई. उन्होंने पूछा कि मेहर आंटी (मेरी दोस्त अफ्शां की माँ) के समय तुम कब्रिस्तान नहीं गई थी. मैंने इनकार में सिर हिलाया और सोचा कि इतने दिनों तक तो यह सवाल तक मेरे मन में नहीं उठा था. वैसे कब्रिस्तान में मुझे अटपटा नहीं लगा. यह अवश्य सोच रही थी कि क्या मेरे भी मुसलमान दोस्त-अज़ीज़ कम हैं ! मैं कितना कम जानती हूँ इन रस्मो रिवाज को और क्यों कम जानती हूँ ! क्या सिर्फ ईद-बकरीद मनाने के लिए दोस्त-अज़ीज़ हैं ? या दंगों और सांप्रदायिक तनाव पर चर्चा करने के लिए हैं ? फिर हम अपने रस्ते और वे अपने रस्ते. रस्ते मिलते क्यों नहीं हैं ?  नज़र धुँधलाने की हद पर दूर जाकर भी वे मिलते हुए नहीं दिखते हैं ! 

दफ़न संस्कार चल रहा था. आफ़ताब साहब उधर से आए और बोले कि आते हैं, अम्मां यहीं हैं. एक क्षण के लिए मैं गड़बड़ा गई. समझ में कुछ नहीं आया. तुरत ध्यान गया कि आफ़ताब साहब की अम्मां उसी कब्रिस्तान में हैं. आफ़ताब साहब को मैंने दूर से चुपचाप खड़े देखा. मेरा मन कैसा-कैसा हो गया. अम्मां याद आ गईं. वही जो ख़ूब पढ़ती थीं, खुदाबख्श लाइब्रेरी जाया करती थीं, पूरे घर पर राज करती थीं. पटना का राजेंद्रनगर का 11 डी का मकान आँखों में तिर गया जहाँ से मैंने गृहस्थी की शुरुआत की थी. कहने को हमारी मकान मालकिन, लेकिन हम सबके लिए भी अम्मां थीं. उनका कमरा मेरे डाइनिंग हॉल से सटा हुआ था, लेकिन दोनों तरफ की चिटखनी चढ़ी रहती थी. ख़ास ख़ास मौकों पर वह खुलती भी थी, लेकिन अम्मां का रुआब इतना था कि हम यदि जाते भी तो दबे पाँव और बोलते भी तो दबे गले से. खासकर मैं. अम्मां बहुत दुबली-पतली छोटे कद की थीं. उसमें उनका ऊँचा व्यक्तित्व सामनेवाले को खासा प्रभावित करता था. जब वे लोग राजेंद्रनगरवाले घर से चले गए थे तो कभी-कभी त्यौहार में सपरिवार वहाँ आते थे. एक दिवाली की बात है. मेरे घर के ऊपरवाले हिस्से में नए किरायेदार आ गए थे. अम्मां आईं. हमारे घर आईं. बगल में नीरा भाभी के यहाँ बैठीं. मैंने पूछा कि अम्मां ऊपर भी जाइएगा क्या. उन्होंने कहा कि पुराने रिश्ते चल जाएँ अब यही बहुत है और यही कोशिश है. कितनी मार्के की बात है ! मैं उनकी यह बात कभी नहीं भूलती हूँ. लौटते में आफ़ताब साहब के साथ हमदोनों भी अम्मां के पास गए. कब्र पर अम्मां की तरह ही सादे ढंग से लिखा था सादिया आलम. मेरी नज़र धुँधलाने लगी...

गुरुवार, 14 मई 2015

मैं डरता हूँ मुसर्रत से (Main darta hoon musarrat se by Meeraji)

मैं डरता हूँ मुसर्रत से 
कहीं ये मेरी हस्ती को 
परीशाँ, कायनाती नग्म-ए-मुबहम में उलझा दे 
कहीं ये मेरी हस्ती को बना दे ख़्वाब की सूरत !

मेरी हस्ती है इक ज़र्रा
कहीं ये मेरी हस्ती को चखा दे मेह्रे-आलमताब का नश्शा !
सितारों का अलमबरदार कर देगी मुसर्रत मेरी हस्ती को 
अगर फिर से उसी पहली बलन्दी से मिला देगी 
तो मैं डरता हूँ - डरता हूँ 
कहीं ये मेरी हस्ती को बना दे ख़्वाब की सूरत !

मैं डरता हूँ मुसर्रत से 
कहीं ये मेरी हस्ती को 
भुलाकर तल्खियाँ सारी 
बना दे देवताओं सा 
तो फिर मैं ख़्वाब ही बनकर गुज़ारूँगा
जमाना अपनी हस्ती का। 


मुसर्रत = आनंद 
हस्ती = जीवन, अस्तित्व 
परीशाँ = बिखरा हुआ 
कायनाती = सृष्टि में व्याप्त  
नग्म-ए-मुबहम = अस्पष्ट गीत 
मेह्रे-आलमताब = दुनिया को आलोकित करनेवाला सूरज 
अलमबरदार = ध्वजवाहक 
तल्खियाँ = कड़वाहटें


शायर - मीराजी 
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मीराजी 
संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010


रविवार, 22 मार्च 2015

दिनान्त पर आलू (Dinant par aaloo by Gyanendrapati)


सुबह सब्जी-मण्डी से गुजरते हुए 
बाजार में नए-नए आए 
ललछौंह आलुओं को देखा था 
सट्टी से सड़क तक उमड़े पड़ रहे थे 
नए-नए आए ललछौंह आलू 
घर-घर तक फ़ैल जाने को अधीर 
डलियों की चौड़ी अंजलियों में भरे लबालब 
पेटू झोलों के दन्तहीन मुँह में झाँकते उत्सुक 

दिन बिताकर 
उधर से लौटते हुए 
सँवलाए हुए दिखते हैं बचे हुए आलू 
उठ जाने से पहले उठे जाते हुए पैठ के साथ 
दिखते हैं मटैले धुमैले 
दिन-भर में ही जाने कितनी दुनिया देखे 
बाजार के रंग-ढंग 

ममतालु किसान-हाथों की मेहनती मजूर उँगलियों से 
ज़मीन की रात से उखाड़कर लाए हुए वे 
दिखते हैं 
रात की ज़मीन को छूते हुए 
थकी निदासी देह की कनपटी से 
और मैं देखता हूँ. आलुओं की देह के 
कार्बोहाइड्रेट में कहाँ से घुलती-मिलती है करुणा 
करुणा - जिसे छिलके के साथ छुड़ाकर 
शेष कार्बोहाइड्रेट को कतर-कतर 
चिप्स में बदलती हैं पैकेटबन्द खाद्यनिर्माता बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ 
उन्हें भरतीं पारदर्शी प्लास्टिक-कारागार में 
लाभ-लोभ के सर्वग्रासी जबड़ों के बीच लपलपाती जीभ को सौंपने 



कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

शनिवार, 21 मार्च 2015

केवल यही (It's not more by Eliseo Diego translated in Hindi)


कविता कुछ नहीं है 
सिवा एक प्राचीन स्टोव की चढ़ती 
परछाईं में बातचीत के 
जब सब चले गए हों,
और दरवाज़े के बाहर 
अभेद्य वन सरसरा रहे हों। 

कविता केवल कुछ भ्रम है 
जिनसे किसी को प्यार हो,
और जिनका क्रम समय ने बदल दिया हो,
जिनमें कि अब 
केवल एक संकेत,
एक अनभिव्यक्त आशा,
वास करती हो। 

कविता और कुछ नहीं है 
सिवा आनंद के, परछाइयों में 
बातचीत के,
जबकि और सब कुछ विदा ले चुका हो 
और केवल खामोशी हो। 



क्यूबाई कवि - एलिसेओ दिएगो (2.7.1920 - 1.3.1994)
स्पैनिश से अंग्रेज़ी अनुवाद - एलिसेओ दिएगो
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 

बुधवार, 18 मार्च 2015

श्वेत वस्त्र (Shwet vastra by Arutprakasa Vallalar Chidambaram Ramalingam)

आज कपड़ों और रंगों की बात हो रही थी कि तमिल पुनर्जागरण के अग्रदूत रामलिंग स्वामी के कथन पर नज़र पड़ गई. उन्होंने अपने एक प्रवचन में कहा है -

गेरुए वस्त्र युयुत्सा के द्योतक हैं -
युयुत्सा उस व्यक्ति की, जो लड़ता है,
अपनी ही प्रकृति से,
जिसने पराजय कर लिया है प्रकृति को,
प्राप्त किया है करुणा को,
श्वेत वस्त्र उचित हैं उसके लिए। 

अपने श्वेत वस्त्रों के बारे में रामलिंग स्वामी एक पद्य में कहते हैं -

झूलते हुए हाथों से शरमाकर 
मैं हाथ जोड़े चलता रहा 
नग्न होने की अनिच्छा से,
ढंक लिया अपने शरीर और सिर को,
सफेद वस्त्र में,
मैंने देखा नहीं उस ओर
जहां चालाकी टहलती हो,
मैं दुखी हो जाता,
वरना। 

अन्यत्र उनका कहना है -

मैं दुखी हुआ,
जब मित्रों ने सुनहले किनारे की
धोती, मुझे पहनायी,
कितना व्याकुल हो गया था मैं 
हे प्रभो !
फिर वह घबराहट,
जब उन्होंने भरी धूप में,
छतरी तान दी, मेरे सिर पर,
कांप गया मैं !
मैंने हाथों का रूमाल 
खोंस लिया था कमर में,
ताकि हाथ जुड़े रहे,
तेरी प्रार्थना करते रहे। 

आगे वे कहते हैं -

ऊँचे आसन मुझे 
अव्यवस्थित करते हैं,
पैरों के ऊपर पैर 
मुझे अभिनय-सा प्रतीत होता है,
नहीं सो सकता मैं 
नरम गद्दों पर,
मंच पर बैठकर मैं 
नहीं लटका सकता अपने पांव ;
ऊंची आवाजें 
भयभीत करती हैं मुझे,
हे मां, मुझे इन सबसे बचाओ !


कवि - रामलिंग स्वामी (1823 - 1874)
किताब - रामलिंग : कवि एवं पैगम्बर 
लेखक - पुरसु बालकृष्णन
अनुवाद - सुमति अय्यर 
प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, 1991