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गुरुवार, 9 अगस्त 2012

शायद (Shayad by Rajkamal Chaudhary)



सरदी की शाम
पार्क में
घने कुहासे की परछाईं में
किसी झाड़ के बीच
किसी पेड़ के नीचे
उन्मादों से तन-मन सींचे
नित्य
किसी परछाईं का परछाईं से
मिलना
घुल-मिल जाना
बहुत भला लगता है तुमको
हम सबको
शायद...

क्योंकि
अँधेरे से हम सबको बहुत प्रेम है
हेम-क्षेम
कि,
क्योंकि अन्ध हम
क्योंकि पिता हम सबका है तम 
क्योंकि उजाले से हम सब डरते हैं
छिपकर पाप सभी करते हैं
लाज एक बंधन है तुमको
हम सबको
शायद... 


*तम - अन्धकार
कवि - राजकमल चौधरी
संग्रह - विचित्रा
संकलन, संपादन - देवशंकर नवीन 
प्रकाशक - राजकाल प्रकाशन, दिल्ली, 2002


सोमवार, 6 अगस्त 2012

हिरोशिमा (Hiroshima by Ajneya)



एक दिन सहसा
सूरज निकला 
अरे क्षितिज पर नहीं,
नगर के चौक :
धूप बरसी
पर अंतरिक्ष से नहीं,
फटी मिट्टी से.

छायाएँ मानव-जन की 
दिशाहीन
सब ओर पड़ीं - वह सूरज
नहीं उगा था पूरब में, वह 
बरसा सहसा
बीचो-बीच नगर के :
काल-सूर्य के रथ के
पहियों के ज्यों अरे टूट कर
बिखर गये हों
दसों दिशा में.

कुछ क्षण का वह उदय-अस्त !
केवल एक प्रज्वलित क्षण की
दृश्य सोख लेने वाली दोपहरी.
फिर ?
छायाएँ मानव जन की 
नहीं मिटीं लम्बी हो-होकर
मानव ही सब भाप हो गये.
छायाएँ तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्थरों पर 
उजड़ी सड़कों की गच पर.

मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बना कर सोख गया.
पत्थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है.
               

कवि - अज्ञेय 
संकलन - सदानीरा, संपूर्ण कविताएँ-2
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986

दिल्ली-इलाहाबाद-कलकत्ता (रेल में) 10 -12 जनवरी, 1959 को लिखी गई कविता.

रविवार, 5 अगस्त 2012

धड़कन-धड़कन (Dhadakan-dhadakan by Ajneya)



धड़कन-धड़कन-धड़कन -
दायीं, बायीं, कौन आँख की फड़कन -
मीठी कड़वी तीखी सीठी
कसक-किरकिरी किन यादों की रड़कन ? 
उंह ? कुछ नहीं, नशे के झोंके-से में 
स्मृति के शीशे की तड़कन ?
                         -अगस्त 1964



कवि - अज्ञेय 
संकलन - सदानीरा, संपूर्ण कविताएँ-2
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986

शनिवार, 4 अगस्त 2012

मेरी प्यारी बेटी सुमिता (Meri pyari beti Sumita by Sumitranandan Pant)


           मेरी प्यारी बेटी सुमिता -
                   पाँच साल की
           अभी नहीं वह -  
                   कमरे में आ चुपके, मुझको
           देख एकटक, बोली,
                   "दद्दू, मुझे छोड़कर 
           भला, चले जाओगे क्या तुम ?"
                    मैंने पूछा,
            "क्यों कहती हो ?
                    कहाँ चला जाऊँगा मैं ?" - वह
चुप रह क्षण-भर, बोली,
            "तुम जो मर जाओगे !!"
विस्मय हुआ मुझे !
             वह नहीं समझती अब तक 
क्या है मृत्यु ?
             सूँघ उसका सिर, बोला हँसकर,
"किसने तुझसे कहा ?
              नहीं तो, तुझे छोड़कर
दद्दू भला कहाँ जाएगा ?-
              बतलाओ भी 
तुझसे किसने कहा ?"
              ध्यान से देख मुझे वह
              बोली, "दद्दू, हमें किसी ने
                          नहीं बताया !"
              भारी स्वर में कहा,
                          "ज्ञात है मुझे स्वयं ही !
               मुझे छोड़कर मत जाना तुम,
                           कभी न जाना !"

आँखें भर आईं !...
              मैं भावावेग रोककर
बोला, "सोना, बड़ा बनाकर
              पहले तुझको
पीछे जाऊँगा मैं !"
              "कभी नहीं !" उत्तेजित
स्वर में बोली,
              "हम होंगे ही नहीं बड़े, जब
खाएँगे ही नहीं -
              बड़े तब कैसे होंगे ?"

              सुनकर उसका तर्क,
                     गोद में लेकर उसको
               प्यार किया मैंने,
                     उसका सिर सूँघ, चूमकर !
               उसको समझाया,
                      लिपटाकर सहज गले से,
               "बेटा, सभी नहीं मरते -
                       मैं भी उनमें हूँ
                जो न कभी मरते !
                       मैं नहीं मरूँगा, तुझसे
                सच कहता हूँ !"

समझ गई वह भाव ह्रदय का
                उसे छोड़कर
मैं न कभी मरना चाहूँगा ! -
                मरने पर भी
मैं उसका ही बना रहूँगा !
               दीर्घ साँस निकली
 उसके उर से अनजाने,
               सुख संतोष झलक आया
द्रुत आतुर मुख पर -
             लिपट गई वह मेरे उर से
मुग्ध भाव-सी !


कवि - सुमित्रानंदन पन्त  
संकलन - स्वच्छंद  
प्रमुख संपादक - अशोक वाजपेयी, संपादक - अपूर्वानंद, प्रभात रंजन
प्रकाशक -  महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के लिए राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2000



शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

एक कवि से बातचीत (Conversation with a poet by Miroslav Holub)



क्या तुम कवि हो?
              हाँ, मैं हूँ.
तुम्हें कैसे मालूम?
             मैंने कविताएँ लिखी हैं.
अगर  कविताएँ लिखी हैं, तो इसका मतलब है कि तुम कवि थे.
 लेकिन अब?
             
मैं फिर एक रोज़ कविता लिखूँगा.
तो उस हालत में शायद तुम किसी दिन फिर कवि हो सको. लेकिन तुम कैसे जानोगे कि वह कविता है?
             वह आख़िरी कविता जैसी ही कविता होगी.
तब तो तय है कि वह कविता नहीं होगी. कविता सिर्फ एक बार होती है और
कभी वैसी ही दुबारा नहीं हो सकती.
             मुझे लगता है कि वह उतनी ही अच्छी होगी.
तुम इतना  निश्चित  कैसे हो सकते हो?  कविता का गुण भी सिर्फ एक बार के लिए होता है
और वह तुम पर नहीं हालात पर निर्भर होता है.
              मुझे लगता है हालात भी वैसे ही होंगे.
अगर तुम्हें यह लगता है तब तो तुम कवि नहीं होगे और न कभी कवि थे.
तुम्हें कैसे लगता है कि तुम कवि हो?
              शायद - मैं ठीक-ठीक नहीं जानता. और तुम कौन हो?



चेक कवि - मिरोस्लाव होलुब (1923 -1998) 
   संकलन - पोएम्स : बिफोर एंड आफ्टर
चेक से अंग्रेज़ी अनुवाद - एवाल्द ओसर्स  
प्रकाशक - ब्लडैक्स बुक्स, न्यूकैसल, इंगलैंड, 1990
   अंग्रेज़ी से अनुवाद: अपूर्वानंद

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

कींगरी और तूमा (Keengaree aur Toomaa by Veriar Alwin)


     यह मज़ेदार बात है कि गोंड लोगों के पास 'रामायण' का दूसरा ही रूप है जिसमें लक्ष्मण हीरो है और पूरी कहानी संगीत की ताकत पर टिकी है. लक्ष्मण के पास एक अदभुत 'कींगरी' है, एक 'निम्मत कींगरी', एक बाँसुरी जिस पर प्यार के गीत बजाए जाते थे. एक बार उसने 'कींगरी' बजाना बन्द करके उसे खूँटी पर टाँग दिया. 'कींगरी' आँसू बहाने लगी. लक्ष्मण की बाँसुरी की गूँज स्वर्ग तक पहुँची जहाँ परियों की देवी इन्द्रकमानी ने उसे सुना. वह अपने स्वर्गिक दरबार को छोड़ धरती पर आकर बाँसुरी बजानेवाले को तलाश करने लगी. लेकिन लक्ष्मण पवित्रता और उसकी 'कींगरी' सत्य की प्रतीक थी. इन्द्रकमानी का कोई हाव-भाव उसे ललचा न सका. किन्तु राम को लक्ष्मण और सीता के सम्बन्धों पर सन्देह हो गया. उसने अनाज रखने के लोहे के ड्रम में लक्षमण को बन्द करके आग में डलवा दिया. लेकिन लक्ष्मण मज़े से बाँसुरी बजाता रहा और जब नौ दिन बीते तो वह सुरक्षित उससे बाहर निकल आया.
      एक रोज़ भीमा लोगों का एक समूह आश्रम (करंजिया) में आया. मर्द 'तूमा' बजा रहे थे और उनके आगे औरतें नाच रही थीं. प्रधानों की तरह भीमा भी गोंड कबीले की एक शाखा हैं और संगीत तथा नृत्य को समर्पित हैं. बहुत पहले, सीता का रामचन्द्र से झगड़ा हो गया. वह समझ नहीं पा रहे थे कि पत्नी को कैसे मनाया जाए. लेकिन विशालकाय भीमसेन ने अपने बदन से कुछ मैल निकालकर उसका एक छोटा-सा आदमी बनाया. फिर उसने एक कद्दू, अहीर का बाँस, कुछ मोम, और काले हिरन के स्नायु से बनी एक डोरी ली और सबसे पहला 'तूमा' बनाया. भीमसेन ने इसको छोटे आदमी को दिया जिसने इतना बढ़िया गाना और नाच किया कि सीता अपना गुस्सा भूल गई. इसके बाद 'तूमा' का नाम 'मोहन-बाजा' पड़ गया यानी खुशी देनेवाला बाजा. इसको बजानेवाला छोटा आदमी पहला भीम (भीमा) कहलाया. तब से भीमा के वंशज गाँव-दर-गाँव नाचते-गाते घूमते रहते हैं. मैंने उनसे पूछा, 'क्या आपके अपने खेत हैं ?' 'यह हमारा खेत और बैलों की जोड़ी है' ; 'तूमा' की ओर इशारा करते हुए उन्होंने जवाब दिया. 


लेखक - वेरियर एलविन 
किताब - एक गोंड गाँव में जीवन
मूल - 'लीव्स फ्रॉम द जंगल : लाइफ इन अ गोंड विलेज'
आदि सन्दर्भ पुस्तकमाला, संपादक - प्रदीप पंडित 
अनुवाद - नरेन्द्र वशिष्ठ 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2007

वेरियर एलविन ने गोंड गाँव करंजिया में कई साल बिताए जिसका ब्योरा 1932 से 1936 के दौरान लिखे उनके रोजनामचे में मिलता है.

बुधवार, 1 अगस्त 2012

ताला (Tala by Sanjay Shandilya)



कितना परेशान करता है यह ताला 

जब बन्द करो
बन्द नहीं होगा

खोलो हड़बड़ी में
खुलेगा नहीं
पसीना छुड़ा देगा सबके सामने

एकदम बच्चा हो गया है यह ताला 

कभी अकारण अनछुए ही
खुल जाएगा ऐसे
साफ़ हुआ हो जैसे
कोई जाला...मन का काला !


कवि - संजय शांडिल्य
संकलन - जनपद : विशिष्ट कवि 
संपादक - नन्दकिशोर नवल, संजय शांडिल्य
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2006