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रविवार, 15 मार्च 2015

कमइया हमार चाट जाता (Kamaiya hamaar chaat jata by Mahendra Shastri)

कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

जेकरा आगे जोंको फीका 
अइसन ई कसइया 
दूहल जाता खूनो जेकर 
अइसन हमनी गइया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

अंडा-बच्चा साथे हमरा 
दिन-दिन भर खटइया 
तेहू पर ना पेट भरे 
चूस लेता चँइया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

एकरा बाटे गद्दा-गद्दी 
हमनी का चटइया
एकरा बाटे कोठा-कोठी 
हमनी का मड़इया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

जाड़ा में बा ऊनी एकरा 
खाए के मलइया 
हमनीं का त रातो भर 
खेलाइलें जड़इया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 



भोजपुरी कवि - महेन्द्र शास्त्री 
संकलन - हिन्दी की जनपदीय कविता 
संपादक - विद्यानिवास मिश्र 
प्रकाशक - लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2002

शनिवार, 14 मार्च 2015

केवल मेरा दुख (Kewal mera dukh by Sanjay Shandilya)


सबका दुख है 
मेरा दुख
बहुत घनेरा दुख

मेरा दुख तो 
मेरा दुख
केवल मेरा दुख l


कवि - संजय शांडिल्य 
संकलन - उदय-वेला 
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2014 

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

ख़लिश भी आज तो कुछ कम है (Khalish bhi aaj to kuchh kam hai by Gulam Rabbani Taban)

ख़लिश भी आज तो कुछ कम है दर्द भी कम है 
चराग़ तेज़ करो हाय रौशनी कम है 

उदास उदास है महफ़िल तही हैं पैमाने 
शराब कम है अज़ीज़ो कि तश्नगी कम है 

हमारे साथ चलें आज कू-ए-क़ातिल तक 
वो बुलहवस जो समझते हैं ज़िंदगी कम है 

अभी तो दोश तक आई है ज़ुल्फ़े-आवारा 
अभी जहाने-तमन्ना में बरहमी कम है 

चराग़े-गुल न जले कोई आशियां ही जले 
जुनूं की राहगुज़ारों में रौशनी कम है 

बस और क्या कहें अहबाबे-तंज़-फ़र्मा को 
शऊर कम है, नज़र कम है, आगही कम है 

रहे है मह्व, सनम को ख़ुदा बनाए हुए 
सुना है इन दिनों 'ताबां' की गुमरही कम है 



ख़लिश = कसक 
तही = ख़ाली 
तश्नगी = प्यास 
 कू-ए-क़ातिल = क़ातिल (प्रिय) के कूचे तक 
बुलहवस = विलासी 
दोश = कंधे 
जहाने-तमन्ना = अभिलाषाओं का संसार 
बरहमी = आक्रोश, उन्माद 
अहबाबे-तंज़-फ़र्मा = कटाक्ष करनेवालों को 
शऊर = चेतना 
आगही = ज्ञान 
मह्व = डूबा रहता है, तन्मय 
सनम = बुत 


शायर - ग़ुलाम रब्बानी ताबां 
संकलन = जिधर से गुज़रा हूँ 
संपादक = दुर्गा प्रसाद गुप्त 
प्रकाशक = शिल्पायन, दिल्ली, 2014 

मेरे कॉलेज के दिनों की किसी कॉपी में लिखी यह रचना आज दशकों बाद ताबां साहब के नए संकलन में मिली है. उन दिनों भी मुझे ताबां साहब पसंद थे और आज भी पसंद हैं. 

सोमवार, 9 मार्च 2015

जी देखा है, मर देखा है (Jee dekha hai, mar dekha hai by Habeeb 'Jalib')

जी देखा है, मर देखा है
हमने सब कुछ कर देखा है

बर्गे-आवारा की सूरत 
रेंज-ख़ुश्को-तर देखा है

ठंडी आहें भरनेवालों 
ठंडी आहें भर देखा है

तिरी ज़ुल्फ़ों का अफ़साना 
रात के होंटों पर देखा है

अपने दीवानों का आलम 
तुमने कब आकर देखा है !

अंजुम की ख़ामोश फ़िज़ा में 
मैंने तुम्हें अकसर देखा है

हमने बस्ती में 'जालिब'
झूठ का ऊँचा सर देखा है। 



शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'
संपादक - नरेश नदीम 
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

फूलमंडनी (Phoolmandani by Chheetswami)

फूलनि के भवन गिरिधर नवल नगरी,
फूल सिंगार करि अति ही राजै। 
फूल की पाग सिर स्याम के राजही,
फूल की माल हिय में बिराजै ।। 
फूल सारी, कंचुकी बनी फूल की,
फूल लहंगा निरखि काम लाजै। 
छीतस्वामी फूल-सदन, बिलसत प्यारी संग,
मिलवत अंग, अनंग दाजै ।। 



ब्रज के मंदिरों में ग्रीष्म ऋतू में लकड़ी के बने चौखटों पर फूलों के माध्यम से अत्यंत कलात्मक जाल काटे जाते हैं और उन चौखटों से भवननुमा अनेक प्रकार से महल बनाए जाते हैं, जिनमें तिदरी, छज्जे आदि वास्तुकला के अनेक नमूने होते हैं। इन कलाकृतियों को 'फूल बांगला' नाम से जाना जाता है।  इन्हीं बंगलों में देव विग्रह को विभूषित किया जाता है। 


कवि - छीतस्वामी 
संकलन - अष्टछाप कवि और उनकी रचनाएं : छीतस्वामी 
संपादक - डा. वसंत यामदग्नि 
प्रकाशक - प्रकाशन विभाग, दिल्ली, 2003 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

मेरे सहचर मित्र (Mere sahchar mitra by Muktibodh)

मेरे सहचर मित्र
ज़िन्दगी के फूटे घुटनों से बहती 
रक्तधार का ज़िक्र न कर,
क्यों चढ़ा स्वयं के कन्धों पर 
यों खड़ा किया 
नभ को छूने, मुझको तुमने। 
अपने से दुगुना बड़ा किया 
मुझको क्योंकर ?
गम्भीर तुम्हारे वक्षस्थल में 
अनुभव-हिम-कन्या 
गंगा-यमुना के जल की 
पावन शक्तिमान् लहरें पी लेने दो। 
ओ मित्र, तुम्हारे वक्षस्थल के भीतर के 
अन्तस्तल का पूरा विप्लव जी लेने दो। 
उस विप्लव के निष्कर्षों के 
धागों से अब 
अपनी विदीर्ण जीवन-चादर सी लेने दो। ...


कवि - मुक्तिबोध 
संकलन - चाँद का मुँह टेढ़ा है 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2001 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

बाँसुरी की फूँक (Bansuri ki foonk by Nandkishore Nawal)


जिस छिद्र में फूँक भरने से 
मेरी बाँसुरी बजती है,
तुमने उसी में फूँक भरी है। 

उस फूँक से जो स्वर निकलेगा,
उससे सारा जंगल हिल उठेगा। 
पक्षी बोल उठेंगे,
हवा चल पड़ेगी,
फूल खिल उठेगा। 
                    - 7. 3. 1976 



कवि - नंदकिशोर नवल 
किताब - पथ यहाँ से अलग होता है 
संपादक - राकेश रंजन 
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2014