कोड़ते चलो जमीन कोड़ते चलो! --
किताब - रुद्र समग्र
संपादक - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991
बुझ गया चंदा, लुट गया घरवा, बाती बुझ गई रे
दैया राह दिखाओ
मोरी बाती बुझ गई रे, कोई दीप जलाओ
रोने से कब रात कटेगी, हठ न करो, मन जाओ
मनवा कोई दीप जलाओ
काली रात से ज्योति लाओ
अपने दुख का दीप बनाओ
हठ न करो, मन जाओ
मनवा कोई दीप जलाओ
शायर : फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'
संकलन : प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पाँचवीं आवृत्ति, 2012
(1)
हवा मेरे खिलाफ होती
तो सोचता - बहुत कठिन है इसके बीच से गुजरना
किन्तु खिलाफ
तो
मैं हूँ - हवा के
क्योंकि निर्विघ्न बहती इस हवा में
बहुत कुछ है ऐसा, जरूरी है जिसका रोका जाना
अब हवा है कि टकरा रही है मुझसे
चोट-पर-चोट-पर-चोट करती मेरे सीने पर
चाहती है : कर लूँ पीठ मैं भी उसकी ओर
और उकड़ूँ बैठ जाऊँ औरों की तरह उसके सम्मान में
और, यही मुझे मंजूर नहीं
मंजूर नहीं मुझे - बिना छने हवा को अपने पास से गुजरने देना
(2)
यह जो हवा को बीच राह रोक कर खड़ा हूँ मैं
- सहता उसकी हुंकार
- झेलता उसके दंश
खिलाफ नहीं हूँ उसके बहाव के
चाहता हूँ - बहे
पूरे वेग से, निर्विघ्न बहे
लेकिन यह नहीं कि
उसके बहाव के कारण
कोई तरुवर झुक जाए इतना कि चूमने लगे धरती
कोई आदमी रख ले आँखों पर हाथ, उकड़ू बैठकर फेर ले पीठ
और जैसे चाहे वैसे गुजर जाने दे उसे
या किसी सागर का गहरा नीला जल
लाँघ जाए तट की मर्यादा
और भूल जाए
कि जिधर से गुजरेगा उधर भी जीवन है : पूरा-का-पूरा जीवन
(3)
सच कहती है हवा
वह कभी नहीं रही खिलाफ मेरे
खिलाफ तो मैं ही चलता रहा उसके
जानती है हवा
जहाँ-जहाँ से गुजरती है वह
ऋणी हो जाता है सारा-का-सारा जीवन
अब चाहे तो सब कुछ ज्यों-का-त्यों छोड़ चुपचाप गुजर जाए
या कुछ उलट-पुलट दे : कुछ तहस-नहस कर दे
ऐसे में कैसे बर्दाश्त करे हवा
एक अकेले, निहत्थे
किन्तु सिर उठाए आदमी को
कवि - मुकेश प्रत्यूष
संकलन - हाशिये के लिए जगह
प्रकाशन - अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, द्वितीय संस्करण, 2022
इतनी भी क्या देर कर रही,
झटपट साज सजाओ ना !
मेरे सूने से आँगन में
नूपुर आज बजाओ ना !
यों तो वन-उपवन में उड़ती
है फूलों की धूल,
उपवन की क्यारी-क्यारी में
बिछे हुए हैं शूल
पर जब आता नव वसन्त है,
खिल उठते वनफूल,
सजती डाल, पवन चलता है
डाल-डाल पर झूल !
तुम भी जीवन की तरंग में
झूलो और झुलाओ ना!
गा-गाकर मधुगान कोकिले,
सरस वसंत बुलाओ ना !
2.
यों तो पहले से टूटे हैं
जग-वीणा के तार,
उत्सव बिना जगत सूना है,
लगता जीवन भार,
पर जब आता पावस, होती
फुहियों की बौछार,
सुन संगीत झमक उठता है
मन्त्रमुग्ध संसार।
प्यासे मेरे प्राण, प्रेम से
जीवन-सुधा पिलाओ ना!
पढ़कर मन्त्र, छिड़क ममता-जल
आओ आज जिलाओ ना!
3.
शैल-शिखर पर उड़ते फिरते
हैं मेघों के यान;
गूँजा करते हैं जंगल में
निर्झरिणी के गान;
तिमिर-गहन निस्तब्ध रात्रि में
कोकिल की मृदु तान,
निद्रा में, सपने में गूँजा
करती है अनजान !
मेरे मन में, जीवन-वन में
गूँजो और गुँजाओ ना!
जीवन की इस अर्द्ध-रात्रि में
आओ, राह सुझाओ ना!
4.
नियति-व्यंग्य से, प्रकृति रोष से
मानव है भयभीत,
आँखों में आँसू भर कर वह
गाता दुःख के गीत
कठिन विरह अनुकूल जगत में
मधुर मिलन विपरीत,
जन्म-जन्म की हार और यह
दो-दो क्षण की जीत!
युग-युगव्यापी उत्पीड़न से
मेरे प्राण छुड़ाओ ना !
मेरे उर की दीप-शिखा में
आओ, नयन जुड़ाओ ना !
5.
जग का गहर तिमिर हरता है –
नव प्रभात रवि बाल,
डाल दिया करती मुट्ठी भर
संध्या अबिर गुलाल,
ज्योति तिमिर की वय:संधि में
जग का यौवन लाल,
चन्द्रकिरण बुनती है जलथल
दिग-दिगंत छवि जाल !
मेरे जीवन के निकुंज में
चन्द्रकिरण बन जाओ ना !
मेरी आंखों की पलकों पर
मधुर स्वप्न बन छाओ ना !
6.
क्षणिक जगत, जीवन क्षण भंगुर,
किंतु अमर है पीर!
सुख है चंचल, दुख है चंचल
प्राण-स्रोत गंभीर !
खेल रहे हैं हम-तुम दोनों
जन्म-मरण के तीर !
दोनों जग के बीच खिंची है
लंबी एक लकीर !
बहुत पुरानी इस लकीर को
आओ आज मिटाओ ना !
जन्म-ज्योति से मृत्यु-तिमिर की -
सीमा दूर हटाओ ना!
प्यासे मेरे प्राण, प्रेम से
जीवन-सुधा पिलाओ न !
कवि - गोपाल सिंह 'नेपाली'
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, दूसरी आवृत्ति - 2014
मैं तितलियों का मुरीद था
मेरा रंगो-बू से क़रार था
मेरे हौसले थे हवाओं में
मुझे मछलियों से प्यार था
ये हाल ही की तो बात है
कि तभी निज़ाम बदल गया
मेरी ज़िन्दगी में सुकून था
मेरे मुँह में मेरी ज़बान थी
इसी मेज़ पर अख़बार था
यहीं जुगनुओं की दुकान थी
ये हाल ही की तो बात है
कि तभी निज़ाम बदल गया
तेरा हुस्न था मेरा इश्क़ था
दुनिया में बस ये बवाल था
तेरे होंठ जैसे गुलाब हों
उन्हें चूमने का ख़याल था
ये हाल ही की तो बात है
कि तभी निज़ाम बदल गया
न तो जाम से कोई ख़ौफ़ था
न चाय में कोई खोट था
मेरी जेब में वो हसीन सा
उफ़्फ़ इक हज़ार का नोट था
ये हाल ही की तो बात है
कि तभी निज़ाम बदल गया
कवयित्री : श्रुति कुशवाहा
संकलन : सुख को भी दुख होता है
प्रकाशन: राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2025
सिर्फ़ बस्ती के उजड़ने से नहीं
सिर्फ़ आदमी के मरने से नहीं
सिर्फ़ गाछ के उखड़ने से नहीं
एक पत्ती के झरने से भी फ़र्क़ पड़ता है
- 2005
कवि - कृष्णमोहन झा
संकलन - तारों की धूल
प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2025