Translate

शनिवार, 17 नवंबर 2012

सागर-मुद्रा (Sagar-mudra by Ajneya)


यों मत छोड़ दो मुझे, सागर,
कहीं मुझे तोड़ दो, सागर,
                     कहीं मुझे तोड़ दो !
मेरी दीठ को और मेरे हिये को,
मेरी वासना को और मेरे मन को,
मेरे कर्म को और मेरे मर्म को,
मेरे चाहे को और मेरे जिये को
मुझ को और मुझ को और मुझ को
                      कहीं मुझ से जोड़ दो !
यों मत छोड़ दो मुझे, सागर,
                       यों मत छोड़ दो !





कवि - अज्ञेय
संकलन - सागर-मुद्रा (1967-1969 की कविताएँ)
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली, 1970

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

एक लहर फैली अनन्त की (Ek lahar failee anant ki by Trilochan)


सीधी है भाषा वसन्त की 

कभी आँख ने समझी 
कभी कान ने पायी 
कभी रोम रोम से 
प्राणों में भर आयी 
और है कहानी दिगन्त की 

नीले आकाश में 
नयी ज्योति छा गयी 
कब से प्रतीक्षा थी 
वही बात आ गयी 
एक लहर फैली अनन्त की l 


कवि - त्रिलोचन 
संकलन - त्रिलोचन : प्रतिनिधि कविताएँ 
संपादक - केदारनाथ सिंह 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1985

सोमवार, 12 नवंबर 2012

राजधानी में बैल (Rajdhani mein bail by Uday Prakash)


सूर्य सबसे पहले बैल के सींग पर उतरा 
फिर टिका कुछ देर चमकता हुआ 
हल की नोक पर 

घास के नीचे की मिट्टी पलटता हुआ सूर्य 
बार-बार दिख जाता था 
झलक के साथ 
जब-जब फाल ऊपर उठते थे 

इस फ़सल के अन्न में 
होगा 
धूप जैसा आटा 
बादल जैसा भात 

हमारे घर के कुठिला में 
इस साल 
कभी न होगी रात l 


कवि - उदय प्रकाश 
संकलन - एक भाषा हुआ करती है 
प्रकाशक - किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2009 

शनिवार, 10 नवंबर 2012

सपने (Sapaney by Paash)



सपने 
हर किसी को नहीं आते 
बेजान बारूद के कणों में 
सोई आग को सपने नहीं आते 
बदी के लिए उठी हुई 
हथेली के पसीने को सपने नहीं आते 
शेल्फों में पड़े 
इतिहास-ग्रंथों को सपने नहीं आते 

सपनों के लिए लाज़िमी है 
झेलनेवाला दिलों का होना 
सपनों के लिए 
नींद की नज़र लाज़िमी है 

सपने इसलिए 
हर किसी को नहीं आते l 


कवि - पाश 
किताब - सम्पूर्ण कविताएँ : पाश 
संपादन और अनुवाद - चमनलाल 
प्रकाशक - आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, 2002

सोमवार, 5 नवंबर 2012

मोह (Moh by Sumitranandan Pant)



छोड़ द्रुमों की मृदु छाया,
तोड़ प्रकृति से भी माया,
     बाले ! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन ?
                              भूल अभी से इस जग को !

तज कर तरल तरंगों को,
इन्द्रधनुष के रंगों को,
      तेरे भ्रूभंगों से कैसे बिंधवा दूँ निज मृग-सा मन ?
                                भूल अभी से इस जग को !

कोयल का वह कोमल बोल,
मधुकर की वीणा अनमोल,
       कह, तब तेरे ही प्रिय स्वर से कैसे भर लूँ, सजनि, श्रवण ?
                                             भूल अभी से इस जग को !

ऊषा-सस्मित किसलय-दल,
सुधा-रश्मि से उतरा जल,
           ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन ?
                                       भूल अभी से इस जग को !
                                                        
                                                                      (1918)


कवि - सुमित्रानंदन पन्त 
संकलन - आधुनिक कवि 
प्रकाशक - हिन्दी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, 1994 

रविवार, 4 नवंबर 2012

घर (Ghar by Shankho Ghosh)



मन-ही-मन 
रहा हूँ खोज घर 
एक, बहुत दिनों से l
जाऊँगा जाने कब 
डूब मैं 
प्रकाश की तरलता में !

घर क्या मिला तुम्हें ?
घर तो लिया है ढूँढ़ 
बहुत दिन पहले - 
मन-ही-मन,
चाहिए घर - दुनिया के बाहर l


कवि - शंख घोष 
बांग्ला से हिन्दी अनुवाद - प्रयाग शुक्ल 
संकलन - शंख घोष और शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1987

शनिवार, 3 नवंबर 2012

सन् 47 को याद करते हुए (47 ko yaad karte huye by Kedarnath Singh)


तुम्हें नूर मियाँ की याद है केदारनाथ सिंह 
गेहुँए नूर मियाँ 
ठिगने नूर मियाँ 
रामगढ़ बाज़ार से सुर्मा बेचकर 
सबसे अन्त में लौटने वाले नूर मियाँ 
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह 

तुम्हें याद है मदरसा 
इमली का पेड़ 
इमामबाड़ा 
तुम्हें याद है शुरू से अख़ीर तक 
उन्नीस का पहाड़ा 
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर 
जोड़-घटाकर 
यह निकाल सकते हो 
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर 
क्यों चले गए थे नूर मियाँ 
क्या तुम्हें पता है 
इस समय वे कहाँ हैं 
ढाका
या मुल्तान में 
क्या तुम बता सकते हो 
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं
पाकिस्तान में  

तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह 
क्या तुम्हारा गणित कमज़ोर है 


कवि - केदारनाथ सिंह 
संकलन - यहाँ से देखो
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1983